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औघड़ों के पास सचमुच कोई ऐसी ताकत होती है, जिससे वे परा जगत की तथाकथित शक्तियों को अपने वश में कर लेते हैं? क्या औघड़ विज्ञान की तार्किक दुनिया से परे होते हैं. उनमें असामान्य शक्तियों का निवास होता है? आम तौर पर औघड़ कहने से जो चित्र सामने आता है, उसमें दिखाई देता है श्मशान में रहने वाला एक अजीब-सा आदमी, जो भभूत लपेटे रहता है तथा हड्डियों आदि की माला पहने रहता है. विचित्र कपड़े पहनता है तथा शराब-मांस पीता-खाता रहता है. वह किसी चीज से परहेज नहीं करता तथा भयंकर क्रोधी होता है. लेकिन औघड़ भगवान राम ऐसी किसी भी परंपरागत छवि से बिल्कुल भिन्न हैं. औघड़ उन्हें अघोरेश्‍वर कहते हैं तथा उनका मानना है कि औघड़ भगवान राम के रूप में बाबा किनाराम ने पुनर्जन्म लिया है. भगवान राम अगर उस किस्म के औघड़ होते, जैसे औघड़ों से हम सामान्यत: परिचित हैं, तो शायद उनका वह सामाजिक महत्व न होता, जो आज है. वह उतने परोपकारी औघड़ हैं, जितना कि जनसामान्य के कल्याण के लिए कार्य करने वाला कोई महात्मा. उनके नाम की भी एक कहानी है. औघड़ों में जो भी साधना करता है, उसे अपने नाम के आगे राम लगाना होता है. पैदा होने के बाद मां-बाप ने उनका नाम भगवान रखा था. अत: साधना के क्षेत्र में प्रवेश करते ही उनके नाम के आगे राम लग गया और वह भगवान राम हो गए.

बिहार में आरा रेलवे स्टेशन से आठ मील उत्तर, गंगा से डेढ़ मील दक्षिण और सोन से पांच मील पश्‍चिम में गुंडी नाम का गांव है. गांव चारों ओर से सघन और सुंदर अमराइयों से घिरा हुआ है. 5,000 से ज़्यादा की आबादी है. लगभग 160 वर्ष पहले इस गांव में बाबा रामेश्‍वर दास रहते थे. बाबा गृहस्थ होते हुए भी सांसारिक बंधनों से मुक्त रहते थे. उनके बारे में विभिन्न प्रकार की किवदंतियां हैं. कहते हैं, उनके दर्शन के लिए अनेक साधक-संत आया करते थे. इसी गांव में साई सामसीन जी फकीर थे. उनकी पूजा हिंदू-मुसलमान दोनों करते थे. औघड़ बाबा पकड़ी जगतपुर के बहुत ही सिद्ध अवधूत थे. कहा जाता है कि वह अक्सर वायुमार्ग से गुंडी गांव आया करते थे तथा यहीं पर बाबा रामेश्‍वर दास जी, साई साहब एवं बसुरिया बाबा का सत्संग हुआ करता था.

इसी गांव में बैजनाथ सिंह रहते थे, जिनके बहुत दिनों तक कोई संतान नहीं हुई. वह यज्ञावतार जी के बहुत भक्त थे. उनकी प्रेरणा से जो भी गायक गुजरता था, वह यज्ञावतार जी के मंदिर में अवश्य गाता था. उन्हीं बैजनाथ सिंह के यहां संवत् 1994 वि. भाद्र शुक्ल सप्तमी, रविवार को एक पुत्र हुआ. जब उस बालक का जन्म हुआ, तो बैजनाथ सिंह ने कहा कि मेरे परिवार में साक्षात भगवान ने जन्म लिया है. उन्होंने उसका नाम भी भगवान रख दिया. जब भगवान पांच वर्ष के थे, तभी बैजनाथ सिंह का देहांत हो गया. इकलौता पुत्र होने के कारण भगवान का स्वभाव हठीला हो गया था. उन्हें पाठशाला भेजा गया, पर वहां की पढ़ाई में उनका मन नहीं लगा. वह पाठशाला जाने के बदले अपने गृह-देवालय और अपने ही बगीचे में पूजा-अर्चना में समय लगाने लगे. वहीं समवयस्क बच्चों के साथ सुबह-शाम कीर्तन आदि करते थे. वह उन्हें ध्रुव और प्रहृलाद की कहानियां भी सुनाया करते थे. भगवान सात वर्ष की वय तक ही घर में रहे. इसके बाद वह गांव में रहते ज़रूर थे, पर घर से बाहर. शुरू में दो-चार वर्ष तक तो उन्होंने घर से आया हुआ भोजन किया, परंतु बाद में वह भी बंद कर दिया.

शुरू में वह अपने घर के निकट शिव मंदिर के पास ज़मीन के भीतर कोठरी बनाकर रहते थे. उसमें कभी-कभी दो दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए ही उनकी पूजा चलती रहती थी. दैनिक पूजा का यह क्रम इस उम्र के बालक के लिए अति कठोर था. दोनों नवरात्रि में उनका विशेष व्रतोपवास एवं पूजन चलता था. इस व्रत में भगवान नौ दिनों तक केवल जल पीकर रहते थे तथा दिन-रात पूजन, सत्संग एवं कीर्तन का कार्यक्रम करते रहते थे. जब इस प्रकार की साधना से भगवान को शांति नहीं मिली, तब वह गांव के बाहर अपने खेत के निकट कुटी बनाकर रहने लगे. वहां स्कूल के छात्र अवकाश के समय बड़ी संख्या में आते थे. उन बच्चों ने ही भगवान को भगवान दास कहकर पुकारना शुरू किया. घर वालों का आग्रह था कि भगवान दास घर में रहें, पर वह घर छोड़कर निकल पड़े और गया की ओर बढ़ने लगे. वह दिन भर चलते थे, पर रात उन्हें अरहर के खेत में गुजारनी पड़ती थी. साथ में कुछ भी सामान नहीं था. गया में कुछ दिन रहकर भगवान दास जगन्नाथ पुरी गए. उन दिनों वह जैन मुनियों की तरह आचरण करते थे. जगन्नाथ जी के दर्शन करके वह वापस आए और रामानुज संप्रदाय के एक अधिवेशन में सम्मिलित हुए. उसमें देश के विभिन्न भागों से साधु-संत आए थे. उस अधिवेशन से लौटकर भगवान दास दालान में लेटे थे. उसी समय उन्हें एक अद्भुत चमत्कारिक प्रकाश दिखाई पड़ा. उस घटना के वक्त दिन के समय भी उनकी आंखें बंद हो गईं तथा हृदय तेजी से धड़कने लगा. बाद में कई वर्षों तक यह धड़कन उभरती रही, लेकिन फिर बंद हो गई.

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