श्रम करने वाले हाथों के सम्मान से आंदोलन करने वाले 

लोगों के बीच गाये प्रेम और इंसानियत के गीत 

प्रेमचंद ने  प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के वक़्त 1936 में लेखकों को एक ज़िम्मेदारी देते हुए कहा था कि हमें हुस्न का मेयार बदलना है। मतलब सौंदर्य के मापदंड बदलने हैं। कुछ वक़्त तक प्रेमचंद के इन शब्दों की रौशनी में हिंदी और उर्दू ही नहीं, बल्कि तमाम भारतीय भाषाओं के लेखक अपने लिखे से समाज के प्रचलित मापदंडों को बदलने की कोशिशें करते भी रहे। लेकिन आज़ादी के बाद लेखक और कलाकार धीरे-धीरे मध्यवर्गीय चरित्र और कांग्रेस के ज़माने की मौक़ापरस्ती में उलझते गए और अपनी बदलावकारी क्रांतिकारी भूमिका से दूर होते गए। आज हालात और भी ख़राब हैं।  
लेकिन जो संगठन वैचारिक और सांगठनिक रूप से प्रगतिशील और जनवादी  हैं, और जो कला को केवल अभिजात्य या आध्यात्मिक ही नहीं मानते, वे अपने आपको समाज के निचले और हाशिये के तबकों से जोड़े रखने और अपनी समझ को साफ़ रखने के लिए बार-बार जन के पास और जन के बीच जाते हैं – अपनी जड़ें, अपने कार्यभार और अपना भरोसा फिर से हासिल करने के लिए। 

यात्रा की तैयारी और बिछुड़े हुए साथियों की याद 

“ढाई आखर प्रेम” के नाम तले देशभर में यात्रा निकालने का मक़सद अलग-अलग जगह अलग-अलग रहा होगा लेकिन जब हमने सोचा कि मध्य प्रदेश में इसे करना है तो यह भी सोचा कि इसे इप्टा के विचार के साथ कैसे करना है। इप्टा के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया से बात हुई। कुछ रास्ते सोचे गए। फिर हरिओम को भी हमारा प्रस्ताव अच्छा लगा कि इंदौर शहर के मज़दूर इलाक़ों से लेकर नर्मदा घाटी के आदिवासी इलाकों से लगाकर अच्छी खेती वाले निमाड़ के समृद्ध आंदोलनरत गाँवों तक की यात्रा की जाए। 
जब रास्ता तय हो गया तो नवंबर के किसी एक दिन मैं, प्रमोद बागड़ी, अशोक दुबे और हरनाम सिंह बड़वानी गए। रास्ते में पहले पीथमपुर आता है जो औद्योगिक शहर बसाया गया है। यहाँ पिछली साल भी कार्यक्रम किया था और इस साल फिर करना ही था। मज़दूर संगठन एटक के कॉमरेड रुद्रपाल यादव हमारे साथ पीथमपुर तक आये।  मज़दूर साथियों को बुलाया। कॉमरेड मोहन निमजे के जीते-जी एटक यहाँ मज़बूत थी लेकिन अब लोग बिखरने लगे हैं। मज़दूरों पर हमला भी बहुत है। वहाँ के साथियों से कार्यक्रम का दिन और वक़्त तय करके हम बड़वानी पहुँचे। मेधा पाटकर, मुकेश भाई, भगवान भाई, राजा तथा नर्मदा बचाओ आंदोलन के अन्य साथियों के साथ मिलबैठकर गाँव तय किए गए और बाक़ी रहने, खाने, आदि की व्यवस्थाओं की सम्भावनाएं टटोलीं गईं। मेधा ने जया और  सारिका का और बाक़ी साथियों का हालचाल पूछा ही लेकिन रास्ते में भी और बड़वानी में भी बात करते-करते हम लोग कॉमरेड एस. के. दुबे को याद करते रहे। पिछले कुछ वर्षों में वो हमारी लगभग हर गतिविधि का अभिन्न हिस्सा रहते थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यालय में दीवारों पर की गई चित्रकारी की वजह से विमलभाई याद आए जो 2022 की 15 अगस्त को अचानक ही रुख़सत हो गए थे। वे टिहरी के थे और नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ-साथ एनएपीएम में भी सक्रिय थे।
आंदोलन के कार्यालय में एक तस्वीर आशीष की भी लगी थी। आशीष बड़वानी के पास के ही एक गाँव छोटा बड़दा का रहने वाला था और बहुत सक्रिय कार्यकर्त्ता था। आंदोलन में उसकी गाँव-गाँव तक पहचान भी थी और सरकारी अधिकारी हों या बाँध बनाने वाले पूंजीपतियों के दलाल, सब उससे ख़ौफ़ भी खाते थे। विमल भाई जब गए तो 60 के भी नहीं हुए थे। जाने की तो उनकी भी कोई उम्र  नहीं थी लेकिन आशीष तो सिर्फ़ 38 वर्ष का ही था जब 2010 में दिल के दौरे से उसकी मृत्यु हुई थी। 
बहरहाल हमें लग रहा था कि अगर ठीक से प्रचार हुआ तो राज्य के बाहर से और इप्टा के अलावा अन्य संगठनों के साथी भी इस यात्रा में शरीक होना चाहेंगे। फिर भी व्यवस्थाओं को देखते हुए तय किया गया कि केवल उतने ही यात्रियों की संख्या तय की जाए जो एक बस और एक कार में आ जाएँ। यात्रा कोई मौज-मज़े के लिए थी नहीं सो कम ख़र्च में ज़्यादा से ज़्यादा अच्छा क्या हो सकता है, यही ध्यान रखा गया। रुकने और सोने के लिए गुरुद्वारे वालों ने मुफ़्त में जगह मुहैया करवाने का वादा कर दिया। केवल गद्दे और कम्बल टेंट से बुलवाने का बंदोबस्त करने का कहा जो ज़्यादा महँगा भी नहीं था और ठीक-ठाक था। हमें बड़वानी में दो रातें काटनी थीं और दिन में आसपास के गाँवों में जाना था।  
बहरहाल, 21 दिसंबर आ गई।

फैशन शो होगा तो मेहनत के सौंदर्य का होगा 

इस बीच चीज़ों को उनके कलात्मक और विचारधारात्मक पहलुओं से सबसे बेहतर तरह से जानने-समझने वाली हमारी साथी जया मेहता ने कहा कि अगर इंदौर में दिल्ली की तर्ज पर देश के मशहूर फैशन डिज़ाइनर प्रसाद बिडपा (बेंगलुरु) का खादी और हथकरघे से बने कपड़ों का फैशन शो रखना है तो वह केवल किसी भी सुडौल शरीर वाले युवाओं को खादी या हैंडलूम के कपडे पहनाकर नहीं करना है बल्कि हमें असल श्रमिकों को मंच पर लाना है। अब ये कैसे हो? इस उधेड़बुन में यह विचार आया कि क्यों न महेश्वर, जो इंदौर से 75 किलोमीटर दूर है और हथकरघे की साड़ियों के लिए देश भर में मशहूर है, वहाँ से क्यों न करघा चलने वालों को लेकर आया जाए। अब कैसे लेकर आया जाए। वहाँ एक रेवा सोसाइटी है जो होल्कर राजघराने के वंशज रिचर्ड होल्कर और उनकी पत्नी सैली होल्कर ने क़रीब 40 वर्ष पहले शुरू की थी। आज उससे क़रीब 250 महिलाएँ और पुरुष जुड़े हैं और उनकी आजीविका इसी से चलती है। अब रिचर्ड होल्कर और सैली होल्कर से संपर्क कैसे किया जाए। इंटरनेट पर पड़ताल की और  रेवा सोसाइटी के बोर्ड मेम्बरों के बारे में पता किया और हमारे एक दोस्त बाज़िल शेख़ जिन्होंने कभी सैली होल्कर के साथ कुछ अध्ययन किया था, ने बताया कि सीपीएम की पोलित ब्यूरो सदस्य कॉमरेड सुभाषिणी अली भी उस सोसाइटी में ट्रस्टी हैं। कॉमरेड सुभाषिणी को फ़ोन लगाया। कहीं व्यस्त होंगी, नहीं उठाया। फिर सुधन्वा को फ़ोन लगाया और सुभाषिणी जी से बात करने के लिए कहा। एक मिनट में ही वापस फ़ोन आया कि तुरंत बात कर लो, वो कहीं जाने के लिए एयरपोर्ट पर हैं। तुरंत बात की। उन्होंने रिचर्ड होल्कर और सैली होल्कर के बेटे यशवंत होल्कर का नंबर दिया जो महेश्वर के कामकाज को देखते हैं। बोलीं कि तुम फ़ोन मत करना। वो ही फ़ोन करेंगे जब उन्हें वक़्त होगा क्योंकि उनकी माँ की तबियत कुछ नासाज है। दो दिन बाद यशवंत होल्कर जी का सन्देश आ गया और सुभाषिणी जी के हवाले से उन्होंने कहा कि आप को जो भी मदद चाहिए, आपका स्वागत है। हमने महेश्वर जाकर उनके कर्मचारियों से बात करके उन्हें कहा कि हम चाहते हैं कि आपकी सोसाइटी की साड़ी बुनने वालीं 10-12 महिलाएँ इंदौर में हो रहे हमारे फ़ैशन शो में भाग लें, इसके लिए उन्हें सुन्दर साड़ियाँ उपलब्ध करवाएँ और महेश्वर से उनके इंदौर आने-जाने का प्रबंध करवा दें। सब हो गया। वे 21 दिसंबर को भी वक़्त पर आ गईं जब प्रसाद बिडपा ने ऑडिशन रखा था।
उनमें से अनेक ने बताया कि वे पहली बार इतनी महँगी साड़ी पहन रही हैं। उस दिन ऑडिशन में क़रीब 70-80 लोग आये थे। प्रसाद बिडपा का नाम तो एक आकर्षण था ही लेकिन सभी साथियों ने प्रचार में भी काफी मेहनत की थी। प्रसाद ने सबको मंच पर कैसे चलना है, कहाँ खड़े होना है, एक पोज़ में कितने सेकंड खड़े रहना है, आदि का प्रशिक्षण दिया। एक और उल्लेखनीय बात ये भी है कि हम लोगों ने कभी कोई फैशन शो – किसी भी तरह का आयोजित किया ही नहीं था, तो हमें नहीं पता था कि इसमें क्या-क्या ज़रूरतें होती हैं। अब प्रसाद ने फ़ोन पर कहा कि कुछ मेकअप आर्टिस्ट भी चाहिए होंगे जो रैम्प पर उतरने वाले मॉडल्स का हल्का-फुल्का मेकअप करेंगे। अब ये नयी समस्या थी। सारिका को कहा कि तुम्हारी जान-पहचान के लोगों में से कुछ लोग ब्यूटी पार्लर जाते होंगे तो तुम देखो कि कौन बिना पैसा लिए इस काम को करने तैयार हो सकता है। सारिका ने कहा कि मैं तो कभी पार्लर जाती नहीं फिर भी देखती हूँ। उसने हमारी नयी कवयित्री दीपाली चौरसिया को कहा और वे दोनों अनेक ब्यूटी पार्लर गए। अंततः एक दीपाली दाते मेकओवर्स नाम की ब्यूटी पार्लर फर्म से उनका संपर्क हुआ और दीपाली दाते बिना किसी शुल्क के अपने आठ-दस लोगों के स्टाफ के साथ और अपने ही खर्च से अपने साजो-सामान के साथ 60-70 लोगों का मेकअप करने तैयार हो गईं। इस तरह की अनेक जो सहायताएँ मिलीं उन सबका ज़िक्र भी संभव नहीं है। फिर भी इस रास्ते पर आगे बढ़ने और हौसला दिलाने के लिए विभाष सुरेका, सुरेंद्र संघवी, राघव बागड़ी, ऋचा बागड़ी, श्रेया भार्गव, प्रवीण खारीवाल और राहुल निहोरे, दिलीप भावनानी, आनंद मोहन माथुर, चुन्नीलाल वाधवानी, राजा मान्ध्वानी, पायस लाकरा, शब्बीर हुसैन, मुश्ताक़ हुसैन, अश्विनी , अखिलेश शुक्ल, आदि ने जो सहयोग किया, उस सबके बिना ये संभव होता ही नहीं।

श्रम के सौंदर्य और गरिमा का मंच पर सम्मान 

इंदौर के गांधी हॉल में 22 दिसंबर को खादी और हथकरघे के वस्त्रों का अद्वितीय फैशन शो हुआ। अद्वितीय इसलिए कि प्रसाद बिडपा ने कहा कि अपने तीन-चार दशकों के अनुभव में यह पहली बार हुआ कि उनके रैम्प पर वो महिलाएँ आईं जिन्होंने ख़ुद वो कपड़े बनाये थे जो उन्होंने पहनकर प्रदर्शित किए।  दो दिन के प्रशिक्षण में ही महिलाएँ मंच पर पूरे आत्मविश्वास के साथ मौजूद हुईं। इससे श्रम के सौंदर्य का अलग ही दृश्य उपस्थित हुआ। तीन-चार साल की बच्ची से लेकर 60-65 वर्ष की महिलाओं और पुरुषों ने गरिमापूर्ण तरह से हथकरघे और खादी के वस्त्रों को पहनकर प्रदर्शित किया। लगभग 50 महिलाओं और पुरुषों ने “वैष्णव जन तो तेने कहिए”, “एकला चलो रे” और अन्य शास्त्रीय गान और धुनों पर फैशन शो में भाग लिया। इस शो में ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्य भी शामिल हुए। छोटी-सी लड़की पिंकल हार्डिया ने शो स्टॉपर की भूमिका निभायी और और अदिति मेहता ने अपने नृत्यों से दर्शकों का मन मोह लिया। यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि इस कार्यक्रम के एक दिन पहले 70 से ज़्यादा लोग ऑडिशन में शामिल हुए थे लेकिन अगले दिन संख्या काफी घट गई। साथी लोग कानाफूसी कर रहे थे कि अगर ऐसे नौसिखियों को और उम्रदराज लोगों को और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को भी रैम्पवॉक में शामिल किया जाएगा तो वो लोग क्यों शामिल होना चाहेंगे जो मॉडलिंग को प्रोफेशनल तौर पर कर रहे हैं। ये बात जब प्रसाद बिडपा के कानों में पड़ी तो उन्होंने कहा कि आज के शो में कोई भी प्रतियोगी नहीं है बल्कि सब खादी और हथकरघे के वस्त्रों को लोकप्रिय बनाने के अभियान के स्वयंसेवक हैं। जिसे आना हो आये, जिसे न आना हो न आये।  मुझे प्रसाद का यह स्टैंड बहुत अच्छा लगा।  
इसके पूर्व आईआईटी, मुंबई के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर कीर्ति त्रिवेदी ने खादी की दुर्दशा के बारे में लोगों को बताया कि शासकीय नीतियों के कारण खादी को कॉर्पोरेट के हवाले कर दिया गया है और जिसे सरकार खादी कहकर अरविन्द मिल्स और रेमंड्स कंपनी के ज़रिये बेच रही है, वो दरअसल खादी है ही नहीं। उसमें 66 फ़ीसदी पोलिस्टर है और मात्र 33 फ़ीसदी कॉटन है। मालवा के कबीर कहे जाने वाले कबीर गायक पद्मश्री प्रह्लाद टिपाणिया जी ने अपने साथियों के साथ कबीर के भजनों को प्रस्तुत किया तो माहौल सुकून देने वाले संगीत से सराबोर हो गया। मंदसौर प्रगतिशील लेखक संघ के साथियों ने “ताकि जागें लोग” शीर्षक से एक छोटी-सी महत्त्वपूर्ण पुस्तिका भी प्रकाशित की थी जिसका विमोचन प्रह्लाद टिपानिया जी ने किया। इसके अतिरिक्त वरिष्ठ रंगकर्मी फ्लोरा बोस (बेंगलुरु) ने जया मेहता के निर्देशन में उजान बैनर्जी के साथ एक छोटा-सा नाटक प्रस्तुत किया जिसमें मार्मिक तरह से बताया गया कि पराधीन भारत में किस तरह हमारे सूत काटने वाले मज़दूरों की आजीविका को ब्रिटैन में मशीनों से बने धागे से ख़त्म किया गया। इंदौर में चरखे से सूत कातने का प्रशिक्षण देने वाली कस्तूरबा गांधी आश्रम की पद्मा ताई एवं राजस्थान में 30 हजार ग्रामीण महिलाओं को हथकरघे से जोड़ने वाली बाड़मेर राजस्थान की रूमा देवी का सम्मान किया गया। नृत्य, संगीत, नाटक के साथ ही मुकेश बिजौले, पंकज दीक्षित और अशोक दुबे जैसे चित्रकारों के कविता-पोस्टरों की प्रदर्शनी भी लगायी गई थी। इंदौर के कार्यक्रम में अशोकनगर से इप्टा और प्रलेस के वरिष्ठ सदस्य विनोद शर्मा भी शामिल हुए। रात के खाने का यह तय हुआ था कि जो मॉडल्स हैं वो, और जो साथी बाहर से आये हैं, उनके खाने का प्रबंध करना है।  संख्या तय नहीं हो रही थी।  ज़िम्मेदारी आस संस्था के साथी वसीम ने सहर्ष ले ली थी। पहले हमने कहा 60 लोग हो जाएँगे, फिर दो घंटे बाद कहा कि आप 70-80 का इंतजाम रखना। रात में जब मैं वसीम के पास पहुँचा और पूछा कि क्या बचा? तो वसीम ने कहा कि विनीत भाई, अब तो दाल-चावल भी ख़त्म हो गए। कुल क़रीब 120 से ज़्यादा लोगों ने खाना खाया था। तब वसीम ने यह भी बताया कि उन्होंने जिस खाना बनाने वाले को ज़िम्मा दिया था, उसके यहाँ कुछ अचानक अप्रिय घटित हो जाने से वो नहीं कर पाया तो सारा खाना बनाने और परसकर खिलाने का काम दरअसल वसीम के साथ के ऑफिस के स्टाफ ने ही किया है। मेरे शुक्रिया पर वसीम कहता – अब शुक्रिया कहकर आप हमारा किया हुआ बेकार नहीं कीजिए।

प्रेम की यात्रा के सहयात्री  

यात्रा में इंदौर से जया मेहता, प्रमोद बागड़ी, सारिका श्रीवास्तव, अशोक दुबे, विवेक मेहता, हरनाम सिंह, रऊफ खान, विजय दलाल, रवि शंकर, उजान बनर्जी, अथर्व शिंत्रे, शिवम शुक्ला, विवेक, तौफ़ीक़, नितिन, गुफ़रान, रुद्रपाल यादव, के साथ ही अशोकनगर से सीमा राजोरिया, हरिओम राजोरिया, रतनलाल, कबीर राजोरिया, अभिषेक अंशु, मंदसौर से असद अंसारी, हूर बानो सैफी, दिनेश बसेर, निखिलेश शर्मा, छतरपुर से शिवेन्द्र शुक्ला, अंकित अग्रवाल, लखन अहिरवार, अधिराज चतुर्वेदी, बेंगलुरु से फ्लोरा बोस और सुमेर राजू भी शामिल हुए। हमारे साथ रायपुर से निसार अली भी शामिल हो गए थे जो छत्तीसगढ़ की नाचा गम्मत लोक शैली के कलाकार हैं। और बढ़िया बात तो यह हुई कि एकलव्य, भोपाल से चुनिंदा किताबें लेकर रघुवीर जी भी आ गए ताकि अच्छी किताबों की प्रदर्शनी भी लगाई जा सके और साथ ही जहाँ जितना संभव हो, किताबें बेचीं भी जा सकें। भोपाल से कवयित्री और संपादक आरती काफी समय पहले से ही यात्रा में चलने की इच्छा ज़ाहिर कर चुकी थीं लेकिन एक रोज़ पहले ही बोलीं कि स्वास्थ्य ठीक नहीं है। ऐसा न हो कि और तबीअत ख़राब हो जाए तो मैं अन्य साथियों पर वजन बन जाऊँ। मैंने बहुत देर तक समझाया कि यात्रा से और लोगों के संगसाथ से तबीअत ठीक हो जाएगी।  चलो। चलो।  और आखिरकार आरती भी यात्रा में शरीक हुई। और मेरा कहा भी सही साबित हुआ। उसकी तबीअत कोई ज़्यादा ख़राब नहीं हुई। 

शासन निर्मित बाढ़ से तबाही

इंदौर के बाद क़रीब 30 कलाकारों के जत्थे वाली प्रेम और इंसानियत की यह यात्रा पीथमपुर, ठीकरी और पिपलूद गाँवों में कार्यक्रम करती हुई, गीत जाती हुई, नाटक करती हुई और स्थानीय कलाकारों से उनके लोक संगीत को सुनती हुई 23 दिसंबर की रात बड़वानी पहुँची। अगले दो दिनों तक 24 और 25 को बड़वानी के विभिन्न गाँवों में हम लोग गए, उनके संघर्षों की कहानियाँ सुनीं और हाल में 17 सितम्बर 2023 को उन पर शासन ने जो कहर बरपाया, वो भी सुना। दरअसल, 17 सितम्बर को बिना चेतावनी दिए ओंकारेश्वर बाँध के गेट खोल दिए जाने से अनेक गाँवों में अचानक ही बाढ़ जैसे हालात हो गए। सैकड़ों लोगों के घर ढह गए, हज़ारों मवेशी मर गए और बह गए। घर-गृहस्थी का सारा सामान और हज़ारों क्विंटल सोयाबीन और अन्य फसलें ख़राब हो गईं। जाँगरवा गाँव में हम लोग देशी बैलों को देखकर ख़ुश हो रहे थे कि कितने सुन्दर बैल हैं लेकिन वहीं नज़दीक खड़ी महिलाएँ रोने लगीं कि इन जानवरों के लिए चारा न होने की वजह से ये मर रहे हैं। लोगों के डूबे और ढहे घरों को, पानी से भरे खेतों को जिनमें फसल सड़ चुकी थी, देखना बहुत कारुणिक था। हम लोग गणपुर चौकी, कवठी, सेमल्दा और एकलवारा गाँवों में गये और लोगों के बीच प्रेम, मनुष्यता और सद्भाव के गीत गाये। हमारे युवा साथियों ने हरिशंकर परसाई जी की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनकी एक कहानी “सदाचार का तावीज” पर आधारित एक नाटक भी तैयार कर लिया था जो जगह-जगह खेला। निसार अली ने दो-तीन छोटे-छोटे नाटक तैयार कर लिए थे जो मनोरंजक होने के साथ शिक्षाप्रद भी होते थे और उन्हें हर उम्र और हर तरह के लोग पसंद करते थे। जहाँ जैसा समय होता, वहाँ प्रस्तुति को छोटा-बड़ा कर लिया जाता। छतरपुर, मंदसौर और अशोकनगर के साथी जनगीतों और कबीर के गीतों की तैयारी के साथ आये ही थे।  
दो दिन बड़वानी में हम लोग गुरुद्वारे में रुके। तीसरे दिन यानि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस की रात को पूनम का चाँद था। हम लोग रात में पहुँचे महेश्वर जहाँ ऋषि दत्तात्रेय का एक मंदिर है और सहस्त्रधारा के नज़दीक है। मात्र रुपये 2100 लेकर मंदिर के संचालक महोदय ने हमारे लिए रुकने की जगह उपलब्ध करवा दी थी। इस जगह का नाम जलकोटि है। रात में ही उज्जैन से शशिभूषण, कविता और दिवि आ गए थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथी गोगांवां के जगदीश भाई टेंट से गद्दे और कम्बल रखवा गए थे। सुबह सभी लोग सहस्त्रधारा में जाकर नर्मदा स्नान का आनंद ले आये।  

आंदोलन के गाँव और लोग 

सुबह अशोकनगर के साथी सत्तार ख़ान और उनकी शरीके हयात अफ़रोज़ भी आ गईं। 26 दिसम्बर 2023 को पूरे महेश्वर में एक प्रभात फेरी निकालकर गीत गाते हुए लोगों को शाम को अहिल्या घाट पर होने वाले कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया और पर्चे बाँटे। फिर हम लोग जगदीश भाई के गाँव गोगांवां गए। गोगांवां आंदोलन का महत्त्वपूर्ण गाँव रहा है। फिल्म अभिनेत्री मीता वशिष्ठ को शाम को महेश्वर के घाट पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने आना था। वो एक रात पहले ही चेन्नई से  इंदौर आ गईं थीं। वो भी इंदौर से निकलकर सीधे गोगांवां आ गईं। नर्मदा देखी और गोगांवां में जमा हुए महिलाओं-पुरुषों से ख़ूब आत्मीयता से बात की। जगदीश भाई ने महेश्वर बाँध के ख़िलाफ़ लड़ी गई बहादुराना लड़ाई के बारे में सबको बताया। अभी महेश्वर बाँध रुका पड़ा है। मतलब बाँध की कंक्रीट की दीवार अनियोजित विकास, भ्रष्टाचार और जनविरोधी रवैय्ये की एक स्मारक है। महेश्वर बाँध से 61 गाँवों का विस्थापन हुआ था। हज़ारों परिवार विस्थापित हुए थे। अनेक बार पुलिस का दमन हुआ, लोग जेलों में ठूँसे गए। और आखिरकार यह सब करके और क़रीब 3000 करोड़ रुपये ख़र्च करके बाँध की दीवार बेमतलब वहाँ खड़ी है। न उससे बिजली बन रही है और न ही उसका कोई अन्य उपयोग हो रहा है। 

हमने गोगांवां जाते हुए खेतों में साड़ियाँ लगीं देखीं तो पूछा कि ये क्यों? पता चला कि इधर जंगली सूअरों का आतंक काफ़ी है।  शाम को जैसे ही किसान खेत से घर चले जाते हैं वैसे ही जंगली सूअरों की पूरी टोली खेत का सफाया कर देती है। जंगली सूअर के बारे में यह माना जाता है कि वो एक सीधी लकीर में चलता है। अगर उस सीध में कोई अड़चन दिखे तो वो रास्ता बदल लेते हैं। इसलिए साड़ी देखकर वो रास्ता बदल लेते हैं। हालाँकि यह सवाल फिर भी मन में बना रहा कि अगर सूअर रास्ता बदल भी लेते होंगे तो किसी और के खेत को तबाह करते होंगे जो उनके रास्ते में आ जाता होगा। बहरहाल। 

किले से बाहर लोगों के बीच कला 

गोगांवां से हम लोग महेश्वर पहुँचे तो नर्मदा नदी का पर्याय बन चुकीं मेधा पाटकर हमारे बीच अपनी महिला साथियों के साथ वक़्त से पहले ही पहुँच गईं। लाइट-साउंड वग़ैरह के इंतज़ार में थोड़ी देर हो रही थी।  मेधा बोलीं कि विनीत भाई, शुरू करते हैं न, हम लोग तो ऐसे ही कर लेते हैं। आप क्यों लाइट और साउंड के चक्कर में पड़ रहे हैं। जैसे-तैसे लाइट साउंड तैयार हुआ और फिर जब महेश्वर के किले के बाहर नर्मदा के घाट पर अशोकनगर के साथी हरिओम, सीमा और कबीर द्वारा कबीर गायन, निसार अली द्वारा नाट्य प्रस्तुति, हूर बानो और उनके साथियों के जनगीत गायन, अदिति मेहता और सुरभि बोर्डिया का कत्थक, शर्मिष्ठा घोष का गायन, मीता वशिष्ठ का 14वीं सदी की कश्मीरी कवयित्री लल्लेश्वरी, जिन्हें लाल देड भी कहते हैं, पर सम्मोहक वक्तव्य और महेश्वर की बुनकर महिलाओं का अपने ही शहर में रंगबिरंगी रोशनियों के बीच फैशन शो हुआ तो आते-जाते लोगों के कदम थम गए। और वहीं जम गए। मेधा बोलीं कि नहीं, लाइट साउंड से रौनक तो बढ़ गई। मेधा ने अपने वक्तव्य में कश्मीर की झेलम से लेकर नर्मदा तक नदियों की दुर्दशा और उस बहाने से पूरी मनुष्य सभ्यता पर प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से गहराते जा रहे संकट की ओर इशारा किया और कहा कि देश में केवल कावड़ यात्राएँ ही नहीं निकल रही हैं, ढाई आखर प्रेम की यात्रा भी निकल रही है जो इंसानियत के लिए ज़्यादा ज़रूरी है। मेधा का वक्तव्य एक कविता और एक नदी की तरह था। सञ्चालन करते हुए मैंने कहा कि हमने राजप्रासादों में रहने वाली शास्त्रीय कला को क़िले के बाहर नर्मदा के तट पर आम लोगों के बीच लाया और यह साबित हुआ कि अगर शास्त्रीय कला भी लोगों के बीच प्रदर्शित की जाए तो आम लोग उसका रसास्वादन कर सकते हैं। तब तक इंदौर के साथी अशोक दुबे, विवेक मेहता, अरविन्द पोरवाल, अनुराधा तिवारी और देवास से प्रलेस के साथी कुसुम वागड़े, ओमप्रकाश वागड़े, एकलव्य, देवास से शोभा भी आ गए। ठीकरी से सेंचुरी मिल के साथी भी आ पहुँचे। बंद हो चुकी सेंचुरी मिल के कर्मचारी नवीन मिश्र जी गायक भी हैं। उन्होंने भी जनगीत गाये।  

मोहब्बत के नये रिश्ते 

महेश्वर और महेश्वर के आसपास के गाँवों में जो परिचय  से था, उसमें एक इजाफ़ा ये हुआ कि महेश्वर में भी हमें सस्ते में रहने का इंतजाम तो हो गया था और एक वक़्त का खाना जगदीश भाई गोगांवां में अपने घर पर ही खिला रहे थे लेकिन फिर भी दो वक़्त के खाने का प्रबंध और करना था। इंदौर में वसीम ने बताया था कि मेरे चाचा महेश्वर में रहते हैं। वो कुछ मदद कर सकते हैं। उनका नाम शब्बीर भाई है। शब्बीर भाई से बात की तो बोले कि आपको वसीम ने कह दिया है तो आप किसी बात की चिंता मत कीजिए। और उन्होंने महेश्वर में काफी मदद की। सस्ते में अच्छा खाना खिलाया और मेवे के लड्डू अपने हाथों से बनाकर हम सभी के लिए लाये। इसी तरह रेवा सोसाइटी के ओंकार भाई ने मीता और अन्य महिलाओं को कपडे बदलने के लिए वक़्त पर होटल के कमरों का इंतजाम महेश्वर में कर दिया जबकि सारे होटल भरे हुए थे। इसी तरह एक समस्या अचानक आ खड़ी हुई थी महेश्वर के अहिल्या घाट पर कार्यक्रम करने के लिए। अचानक प्राप्त हुई शर्तों में उल्लेख था कि आपको घाट पर कोई कार्यक्रम करना है तो खासगी ट्रस्ट (होल्कर राजपरिवार के सदस्यों की ट्रस्ट) को रुपये एक हज़ार बतौर शुल्क देने पड़ेंगे जो कि आसानी से दी जा सकने वाली राशि थी।  लेकिन उसमें अगली शर्त थी कि ढाई लाख रुपये सुरक्षा राशि के तौर पर जमा करने होंगे ताकि अगर घाट पर मौजूद प्राचीन सामग्री में कोई तोड़फोड़ या नुक्सान हो तो उसका मुआवजा वसूला जा सके। ये टेढ़ी शर्त थी। हम लोग पहले ही यात्रा में थे और बहुत मुश्किल से यात्रा लायक पैसे भी पूरे नहीं जुट पाए थे। तारीख़ भी 25 दिसंबर थी यानी क्रिसमस। मैंने बहुत संकोच के साथ यशवंत होल्कर जी को व्हाट्सप्प पर भेजा कि इस समस्या से उबारने में आप कोई मदद कर सकते हैं क्या? क्योंकि खासगी ट्रस्ट के सचिव कर्नल भटनागर ने मुझे ट्रस्टियों के नाम बताये थे। बहरहाल मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि अपने परिवार के साथ क्रिसमस की छुट्टियों में बाहर गये हुए यशवंत जी मेरे सन्देश को देखेंगे और कोई जवाब देंगे, लेकिन थोड़ी देर बाद ही जवाब आया – मैं देखता हूँ। और उसके पाँच मिनट बाद खासगी ट्रस्ट के दफ्तर से फ़ोन आया कि आप बस 25 हज़ार जमा करवा दें जो आपको कार्यक्रम के बाद वापस मिल जाएँगे। मेरे पास तो 25 हज़ार भी नहीं थे।  मैंने शब्बीर भाई को कहा और उन्होंने जाकर 25 हज़ार जमा करवाए दिए जो उन्हें कार्यक्रम के अगले ही रोज़ वापस मिल गए।  इस यात्रा में यह सब नये और महत्त्वपूर्ण रिश्ते बने।   
इंदौर में 27 दिसंबर को दिन में हमने शाम को भाषा सिंह का “चुनाव, युद्ध और मीडिया” विषय पर व्याख्यान रखा था। भाषा को दिल्ली से आना था और संजय वर्मा एवं दीपक असीम को उन्हें इंदौर से महेश्वर लेकर आना था। शाम 5 बजे तक ये लोग भी आ गए। यह भी उल्लेखनीय है कि महेश्वर में प्रसाद बिडपा नहीं थे लेकिन उनके फैशन शो को देखकर शर्मिष्ठा और जया ने महेश्वर की महिलाओं को तैयार करके फिर से महेश्वर में रैम्प पर चलवाया और उनके लिए वो बहुत यादगार हुआ। भाषा ने उन पर एक विशेष स्टोरी की अपने चैनल पर। 
26 दिसंबर को महेश्वर का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद खाना खाकर हम लोगों को रात में ही इंदौर पहुँचना था जहाँ से सुबह मीता वशिष्ठ को मुम्बई जाना था और हम लोगों के इंदौर शहर में अन्य कार्यक्रम थे। महेश्वर से इंदौर के रास्ते में आगरा-मुंबई राजमार्ग पर पड़ने वाले घाट सेक्शन में तभी एक एक्सीडेंट हो जाने के कारण चार ट्रक जलकर ख़ाक हो गए थे और दोनों तरफ़ ट्रकों और बसों की लम्बी कतारें लगीं थीं। हम लोग इंदौर काफ़ी देर रात पहुँच सके और जब तीन बजे के आसपास सोये तो लग नहीं रहा था कि अगले दिन के सुबह के नुक्कड़ नाटक का कार्यक्रम कर पाएँगे, लेकिन वो भी कर लिया। मालवा मिल के पास मज़दूर क्षेत्र में कबीर चौक पर जनगीत भी गाये, पुस्तक प्रदर्शनी भी लगायी और निसार अली के नाचा-गम्मत के साथ सदाचार का तावीज भी किया। दोपहर में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के शहीद सआदत ख़ान और अमझेरा के शहीद राजा बख्तावर सिंह के स्मारक पर गए। ये स्मारक भी कोई इमारत नहीं थी बल्कि बरगद के और नीम के पेड़ हैं  जिन पर इन शहीदों को फाँसी पर लटकाया गया। शहीद सआदत ख़ान की छठवीं पीढ़ी के वंशज रिज़वान खिलजी जी हमारे इसरार पर वहाँ आ गए थे जिन्होंने पूरे इतिहास से रूबरू करवाया। 

चुनाव, युद्ध और मीडिया 

शाम को स्टेट प्रेस क्लब के साथ मिलकर भाषा का व्याख्यान हुआ। सभागार पूरा भरा हुआ था और भाषा एक घंटे तक सम्मोहक तरह से विषय पर बोली। इसमें युद्ध के कवरेज से लेकर चुनाव्को के कवरेज तक मीडिया को उन्होंने अनेक तरफ से कठघरे में खड़ा किया और महिलाओं के समबन्ध में आजकल के तथाकथित साड़ुओं की बातों को चुनौती देते हुए कहा – “चाहे कोई धीरेन्द्र शास्त्री कहे या कोई और, महिलाएँ अब अपनी आज़ादी खोने नहीं देंगी।”  अभिनेत्री फ्लोरा बोस ने अपने हाल ही में दिवंगत पति प्रसिद्द कश्मीरी शायर शांतिवीर कौल की फ़िलिस्तीन पर लिखीं कविताओं सहित साहिर लुधियानवी की जंग के ख़िलाफ़ नज़्म का भावप्रवण पाठ किया और मैंने फ़िलिस्तीनी – अमेरिकी कवि लिसा सुहैर मजाज की कविता “क्या बोली वो” के मेरे ही अनुवाद का पाठ किया। 
इसी के साथ मध्य प्रदेश का जत्था ख़त्म हो गया। लेकिन अब मुझे और निसार अली को गुजरात का “ढाई आखर प्रेम” का कला जत्था निकालने भी जाना था। गुजरात के साथियों से भी मैं ही संपर्क में था और यह बात मुझे पता थी कि अहमदाबाद से वरिष्ठ कॉमरेड रामसागर सिंह परिहार जी के अलावा कोई साथी आगे नहीं जा सकेंगे। तो मैंने निसार अली को इंदौर में ही रोक लिया कि अब तुम रायपुर वापस जाकर उलटे तीन दिन बाद फिर गुजरात के लिए आओ, इसके बजाय इंदौर से ही अहमदाबाद चलते हैं।  निसार मान गए।  अब मान गए तो चार दिन तक केवल लेटे-बैठे तो रह नहीं सकते तो हमने सोचा कि उनके नाचा गम्मत के कुछ और प्रदर्शन रख दिए जाएँ। देवास के साथियों ने एक प्रदर्शन की ज़िम्मेदारी ली तो साथ में सदाचार का तावीज नाटक की टीम भी साथ चली गयी और ओटला तथा प्रगतिशील लेखक संघ के साथियों के सहयोग से देवास में बहुत अच्छा प्रदर्शन हुआ। साथ ही इंदौर में एक प्रदर्शन निसार अली ने रूपांकन में भी कर दिया और दोनों नाटकों के दो प्रदर्शन हमने मालवा मिल के आसपास दुबे का बगीचा और पंचम की फेल में भी कर दिए। इस तरह 27 दिसंबर को ख़त्म होने के के बजाय ढाई आखर प्रेम की यात्रा इंदौर में 31 दिसंबर तक चलती रही।  
पहले दिन खलघाट से ही नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथी मुकेश भाई, भगवान् भाई, कमलू जीजी, राजा, और बहुत से साथी हमारे साथ यात्रा में यात्री की तरह भी शामिल रहे और पूरे क्षेत्र से वाकिफ होने के कारण हमारे मार्गदर्शक भी रहे। उनके आंदोलनों के अनुभवों से नये साथियों ने बहुत कुछ सीखा। इंदौर से रवि शंकर तिवारी, सारिका श्रीवास्तव, शिवम् शुक्ला, गुफ़रान, विलास बम्ब्रू आदि साथी भी यात्रा में शामिल हुए और विभिन्न मौकों पर जैसी ज़रूरत आयी, वैसे कामों में हाथ बँटाया। कभी मतभेद भी हुए, कभी डाँट-डपट और रूठना-मनाना भी लेकिन साथ -साथ की गयी इस यात्रा ने आखिरकार लोगों के साथ प्यार के रंग को ही गाढ़ा किया। 

यात्रा के दौरान तैयार किये जाते रहे कलाकार 

होता ये आया था कि निसार अली अपनी नाचा गम्मत की तीन लोगों की टीम लेकर चला करते थे। तो पहले वो पहुँचे अपने साथियों के साथ पंजाब।  तीन लोग थे। पंजाब के साथियों ने उनके आने-जाने और प्रवास का बेहतरीन इंतज़ाम कर दिया।  फिर वो और भी जगह गए।  मध्य प्रदेश में पैसों की थी किल्लत तो साथियों ने कहा कि और तीन लोगों को बुलाएँगे तो खर्च और बढ़ जाएगा।  लेकिन मेरा मन था कि निसार मध्य प्रदेश के जत्थे में भी शामिल हो। तो मैंने एक दिन निसार को फ़ोन किया की क्यों निसार, मध्य प्रदेश नहीं आओगे? निसार बोलै कि आप कहोगे तो क्यों नहीं आएँगे? मैंने कहा कि हमारे पास पैसे नहीं हैं लेकिन तुमको आना पड़ेगा।  निसार ने कहा कि जैसा आप कहो।  मैंने कहा कि मैंने तुम्हारे प्रदर्शन देखे हैं।  उनमें तुम्हें जिन साथियों की ज़रूरत पड़ती है, वो हम यहीं तैयार करवा देंगे। निसार आ गए। उनके ठहरने का इंतजाम अशोक दुबे जी ने रूपांकन वाचनालय पर कर दिया गया जहाँ चौबीसों घंटे सौ-पचास नौजवान विद्यार्थियों की मौजूदगी रहती ही है। इंदौर से यात्रा शुरू हुई तो मैंने निसार को अथर्व से मिलवा दिया कि तुम इसे तैयार कर लो। अथर्व और निसार ने बस में बैठे-बैठे ही बातचीत कर ली और पीथमपुर, ठीकरी, पिपलूद, बड़वानी, जांगरवा, कवठी, गोगांवां और महेश्वर तक के प्रदर्शन अथर्व ने निसार के साथ किए। हर प्रदर्शन में अथर्व और निखरता भी गया।  
अब 27 दिसंबर की सुबह आ गए हम इंदौर। और अथर्व ने कहा कि मेरी परीक्षाएं हैं और तौफीक ने कहा कीकि  वो भी नौकरी की वजह से नहीं आ सकेगा।  तो तुरंत ही “सदाचार का तावीज” और “नाचा गम्मत” के दोनों प्रदर्शनों में अथर्व और तौफीक की जगह आदित्य और विकास को लाया गया।  उन्होंने ही तौफीक और अथर्व की जगह की जगह आगे इंदौर और देवास में भूमिकाएँ निभाईं और शानदार निभाईं। 
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