महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के साथ पूरे देश में निर्णायक करवट ले रहा किसान किसानों के पास चारा क्या है!farmers

  • मंदसौर में प्रदर्शनकारी किसानों पर फायरिंग के बाद और उग्र हुआ आंदोलन
  • यूपी में भी किसानों के सड़क पर उतरने की तैयारी, गांवों में हो रही हैं बैठकें
  • स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू होने पर ही मानेंगे देश के किसान
  • शिवराज सिंह ने क्यों भंग कर दिया था मध्य प्रदेश राज्य किसान आयोग?

किसानों के पास और कोई रास्ता भी नहीं बचा था. देश में आजादी के बाद से लेकर आज तक किसानों की सबसे अधिक उपेक्षा हुई और किसानों की सबसे अधिक मौतें हुईं. किसान चाहे आत्महत्या से मरा हो या पुलिस ने उसे गोली मारी हो. मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिस की गोली से करीब आधा दर्जन किसानों के मारे जाने के बाद लोगों को सरकार की प्राथमिकता समझ में आई और ‘जय जवान-जय किसान’ के शाश्वत नारे की असलियत किसानों के खून के साथ बहती दिखाई पड़ी.

किसानों को सत्ता ने बेवकूफ बनाया, किसानों को नेताओं ने बेवकूफ बनाया और किसानों को किसान-नेताओं ने बेवकूफ बनाया. उद्योपतियों ने अपने उत्पाद की कीमत अपनी मर्जी से तय करने का अधिकार ले लिया, लेकिन किसान आज तक अपने उत्पाद की कीमत खुद तय नहीं कर पाया.

सरकार ने फसलों की न्यूनतम कीमत तय नहीं की और किसान अपने उत्पाद खेतों में ही छोड़ कर उसी खेत में फांसी लगा लेने पर विवश होते रहे. किसान आंदोलनों से जुड़े उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ किसान नेता शिवाजी राय कहते हैं कि देश में हिंसा पर आमादा होने के बाद ही सरकारें ध्यान देती हैं. यह एक तरह से आखिरी अस्त्र हो चुका है. जाटों ने इसे आजमाया, सफल रहे. गूजरों ने आजमाया, सफल रहे.

एक समय किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत भी जब-जब उग्र हुए तब-तब सरकार उनके आगे नतमस्तक हुई. राय ने कहा कि कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर और दक्षिण से लेकर उत्तर भारत तक जिस समुदाय ने हिंसा का रास्ता अपनाया, सरकारों ने उनके आगे घुटने टेके. सरकारों ने खुद ही जन-आंदोलनों के हिंसक बनने का रास्ता खोला है. उसी रास्ते पर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र चला, अब उत्तर प्रदेश के किसान भी सड़क पर उग्र होकर उतरने का मन बना रहे हैं.

पुलिस फायरिंग में किसानों के मारे जाने के बाद भड़की हिंसा को सरकार और सरकार के एजेंट आपराधिक शक्ल देने के कुचक्र में लगे हैं. आगजनी और उपद्रव को दूसरी दिशा में मोड़ने की कोशिशें हो रही हैं. फिर साजिश हो रही है कि किसानों की मूलभूत मांगें सरकारी साजिशों में विलुप्त हो जाएं.

इसके लिए किसानों के बीच अलग-अलग किस्म की राजनीति घुसेड़ने की कोशिशें तेज हो गई हैं. मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आंदोलनरत किसान कहते हैं कि किसान जब सड़कों पर दूध बहाने लगे और अपनी फसलें नष्ट करने लगे तो समझना चाहिए कि अब इंतिहा हो चुकी है, क्योंकि किसानों के लिए अपनी फसल बर्बाद करना सबसे अधिक पीड़ादायक होता है.

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र दोनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं. मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध भारतीय किसान संघ वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ बैठक के बाद आंदोलन खत्म करने का ऐलान कर देता है तो आंदोलन में अगुआ भारतीय किसान यूनियन और राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ संघर्ष जारी रखने की घोषणा करता है.

किसानों के आंदोलन ने जब उग्र रूप धारण किया तब दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों शिवराज सिंह चौहान और देवेंद्र फड़नवीस ने किसानों की उपज की वाजिब कीमत निर्धारित करने, कर्जा माफ करने व अन्य मांगों पर काम करने का धड़ाधड़ संदेश देना शुरू किया. इसके लिए दोनों मुख्यमंत्रियों ने टि्‌वटर और अन्य सोशल मीडिया माध्यमों का सहारा लिया. शिवराज ने टि्‌वटर पर कहा कि तीन-चार दिन के अंदर आठ रुपए किलो की दर से प्याज की खरीद शुरू हो जाएगी और महीने के अंत तक जारी रहेगी.

यह भी कहा गया कि सरकार मूंग की दाल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदेगी. मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि उपज खरीदने के लिए एक हजार करोड़ का मूल्य संतुलन फंड बनाया जाएगा. मंडी में किसानों को 50 प्रतिशत नकद भुगतान तत्काल होगा और बाकी का 50 प्रतिशत उनके बैंक खाते में जाएगा. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किसानों के कल्याण के लिए बड़ी-बड़ी बातें कहते रहे हैं. वे खुद को भी किसान ही कहते हैं. लेकिन वे यह नहीं कहते कि उन्होंने अपने राज्य में गठित किसान आयोग को भंग क्यों कर दिया!

मध्यप्रदेश में 19 सितंबर 2006 को जब राज्य किसान आयोग का गठन किया गया था तब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही थे और 31 दिसम्बर 2010 को किसान आयोग को भंग कर दिया गया, तब भी मुख्यमंत्री चौहान ही थे. तब चौहान ने तर्क दिया था कि आयोग केवल सिफारिशी संस्था है. ऐसा कह कर आयोग की सिफारिशें ताक पर रख दी गई थीं. शिवराज सरकार ने आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के बजाय उसे भंग ही कर दिया.

मध्य प्रदेश में किसान आयोग ने अपने चार वर्ष तीन माह के कार्यकाल में सात प्रतिवेदन राज्य सरकार को सौंपे थे. इनमें 811 सिफारिशें की गई थीं, लेकिन उनमें से अधिकांश कूड़ेदान में डाल दी गईं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने भी कहा कि 31 अक्टूबर से पहले किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा. महाराष्ट्र सरकार पांच एकड़ जमीन वाले करीब सवा करोड़ किसानों का कर्ज माफ करेगी, जिसके लिए महाराष्ट्र सरकार को 30 हजार करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी.

लेकिन इन सरकारी आश्वासनों के समानान्तर हम यह भी जानते चलें कि हफ्ते दस दिन के किसान आंदोलन में करोड़ों का नुकसान हो चुका है. महाराष्ट्र के लासलगांव स्थित प्याज की सबसे बड़ी मंडी में ही अकेले सौ करोड़ से अधिक के कारोबार को नुकसान पहुंचा. किसान आंदोलन की वजह से केवल महाराष्ट्र में अब तक पांच लाख लीटर दूध का नुकसान हो चुका है. बड़ी तादाद में प्याज और अन्य सब्जियां बरबाद हुईं. मध्य प्रदेश में भी किसान आंदोलन में हजारों लीटर दूध बहा दिए गए और सब्जियां बरबाद कर दी गईं.

किसान आंदोलन की शुरुआत महाराष्ट्र के अहमदनगर स्थित पुणतांबा गांव से हुई. वहां के किसानों ने 22 मार्च को ही आंदोलन का रास्ता अख्तियार करने का फैसला कर लिया था. पुणतांबा की मंडी अहमदनगर और नासिक सीमा पर सबसे बड़ी मंडी है, जहां से आसपास के कई शहरों और कस्बों में दूध, फल और सब्जी की सप्लाई होती है. किसानों की कर्ज-माफी के मसले पर महाराष्ट्र और केंद्र सरकार की वादाखिलाफी के विरोध में शुरू हुए किसान आंदोलन ने पूरे देश में किसानों को जाग्रत कर दिया.

महाराष्ट्र में कई साल से मानसून खराब होने के कारण पैदावार ठीक नहीं हुई और किसानों की स्थिति काफी खराब हो गई. इस साल जब फसल अच्छी हुई तो किसानों को उसकी उचित कीमत नहीं मिली. इस वजह से किसानों ने यह भी तय किया कि खरीफ के समय वे केवल अपनी जरूरत के मुताबिक ही फसल पैदा करेंगे. पुणतांबा के किसानों ने एक जून से किसान क्रांति मोर्चा के नाम से आंदोलन शुरू कर दिया. पश्चिम महाराष्ट्र के किसानों ने आंदोलन शुरू किया. नासिक और अहमदनगर आंदोलन का केंद्र बना और इसने बड़ी तेजी से पूरे महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश तक आंदोलन की आग फैला दी.

मध्यप्रदेश में 2 जून से शुरू हुए आंदोलन ने इंदौर, धार, उज्जैन, नीमच, मंदसौर, रतलाम, खंडवा और खरगोन तक के किसानों को अपने साथ शामिल कर लिया. मध्य प्रदेश में तो करीब दो दशक बाद ऐसा आंदोलन हुआ. इससे पहले बैतूल जिले के मुलताई गांव में 1998 में किसानों ने उग्र आंदोलन किया था. 12 जनवरी 1998 को प्रदर्शन के दौरान 18 किसानों की मौत हुई थी. उस समय मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी.

महाराष्ट्र के किसानों की मांग है कि उनका कर्ज माफ किया जाए और सरकार कृषि उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत से 50 प्रतिशत अधिक तय करे. 60 साल और उससे अधिक उम्र के किसानों को पेंशन मिले. किसानों को बिना ब्याज के ऋृण का प्रावधान हो और दूध की कीमत 50 रुपए लीटर की जाए. महाराष्ट्र के किसानों की यह भी मांग है कि सूक्ष्म सिंचाई उपकरणों के लिए किसानों को पूरी सब्सिडी मिले. दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के किसान कर्ज माफी के अलावा दूध की कीमतों में बढ़ोत्तरी और किसानों पर दर्ज मामलों को अविलंब वापस लेने की मांग कर रहे हैं.

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसान आंदोलन की खासियत यह भी है कि वे स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग कर रहे हैं. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट यह सिफारिश करती है कि फसल उगाने में किसानों की जितनी लागत लगती है उससे 50 प्रतिशत अधिक कीमत उसे मिलनी चाहिए. महाराष्ट्र के किसानों का आंदोलन पूरे देश के लिए चिंता का कारण इसलिए भी बना हुआ है कि देश में सबसे अधिक प्याज महाराष्ट्र में ही पैदा होता है. दूसरी तरफ महाराष्ट्र दूध का भी सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है.

दूध उत्पादन और प्याज उत्पादन में मध्य प्रदेश का दूसरा स्थान है. मध्य प्रदेश में अधिकांश खेती बरसात पर निर्भर करती है. लगातार दो साल के सूखे ने किसानों को आर्थिक रूप से जर्जर बना दिया. किसानों ने खेती के लिए अधिक ब्याज पर कर्ज लिया, लेकिन फसल मरने की वजह से वे ऋृण नहीं चुका पाए. इस वजह से मध्य प्रदेश में कई किसानों ने आत्महत्या कर ली. अरहर और सोयाबीन के मामले में महाराष्ट्र के किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा.

सब्जियों में तो क्या महाराष्ट्र, क्या मध्य प्रदेश और क्या उत्तर प्रदेश, सब जगह किसान बुरी तरह मारे गए. सब्जियां फेंकनी पड़ीं. प्याज टमाटर कौड़ियों के भाव बिका. मध्यप्रदेश में तो सैकड़ों किसानों ने अपने खेतों में प्याज की खड़ी फसल जुतवा दी. इंदौर में तो प्याज की कीमत तीन रुपये प्रति किलो से 50 पैसे प्रति किलो तक पहुंच गई. देश में प्याज उत्पादन में महाराष्ट्र के बाद मध्यप्रदेश का ही स्थान है. इंदौर, रतलाम, खांडवा, नीमच, धार और उज्जैन में बड़े पैमाने पर प्याज की खेती होती है.

यही हाल आलू का हुआ है. यूपी से लेकर मध्य प्रदेश और पंजाब तक किसानों ने आलू कौड़ियों के भाव बेचा. पंजाब में तो 70 आलू किसानों ने आत्महत्या कर ली. उत्तर प्रदेश में भी किसानों को अपना आलू सड़कों पर फेंक देना पड़ा. उत्तर प्रदेश का फर्रुखाबाद क्षेत्र आलू उत्पादन के लिए देशभर में अव्वल है. लेकिन आलू की फसल यहां के किसानों की मौत का सामान बन गई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आलू खरीदने की घोषणा की लेकिन यह घोषणा जमीनी यथार्थ नहीं बन पाई.

योगी सरकार ने 478 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर एक लाख मीट्रिक टन आलू खरीदने का ऐलान तो किया, लेकिन वह लक्ष्य-साधक नहीं साबित हुआ. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस समय नोटबंदी लागू कर रहे थे, उस समय देश में बंपर आलू पैदा हो रहा था. लेकिन नोटबंदी में आलू किसान ऐसा बेमौत मरा कि उसे 50 पैसे किलो तक आलू बेचना पड़ा. यूपी और पंजाब के किसानों की एक जैसी दशा हुई. हालत यह है कि जिस तरह उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों ने गन्ने की खेती छोड़ दी, उसी तरह उत्तर प्रदेश के आलू बेल्ट के किसान आलू की खेती छोड़ देने का मन बना रहे हैं.

यही वजह है कि कृषि उपज की लागत से 50 फीसदी अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग धीरे-धीरे पूरे देश में जोर पकड़ती जा रही है. केंद्र और राज्य की सरकारों को यह मानना ही पड़ेगा कि लागत और महंगाई के मद्देनजर किसानों को उनकी कृषि उपज का मिलने वाला भाव काफी कम है.

सरकार को खेती को मुनाफे का धंधा बनाने के लिए हर कृषि उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना ही पड़ेगा. न्यूनतम समर्थन मूल्य से मतलब उस कीमत से है जो सरकार किसी खाद्यान्न के बदले किसान को भुगतान की गारंटी देती है. सरकार ने गेहूं, धान और गन्ना समेत कई कृषि उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर रखा है, लेकिन वह किसान की लागत की तुलना में काफी कम है, जिसके कारण किसानों को मजबूर होकर आत्महत्या करना पड़ रहा है.

किसानों को अपनी फसल की लागत हासिल करना भी मुश्किल हो रहा है. कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि 1970 में गेहूं 76 रुपए क्विंटल था, वह 2015 में करीब 1450 रुपए क्विंटल हुआ और 2017 में 1650 रुपए प्रति क्विंटल हो गया, जबकि इस अवधि में सरकारी कर्मचारियों का मूल वेतन और डीए करीब दो सौ गुना बढ़ गया, केंद्रीय और राज्य कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में अनाप-शनाप बढ़ोत्तरी हुई, लेकिन किसानों की आय थमी की थमी रह गई. उसे लागत की रकम भी नहीं मिल पाई. सरकारों ने किसानों की उपेक्षा करके घोर अपराध किया है. चपरासी का वेतन संतोषजनक से होकर सम्मानजनक स्थिति पर पहुंच गया, लेकिन किसानों को इस देश में भिखमंगा बना कर रख दिया गया.

स्वामीनाथन आयोग भी कहता है कि 1925 में 10 ग्राम सोने का मूल्य 18 रुपए और एक क्विंटल गेहूं 16 रुपए का होता था. 1960 में 10 ग्राम सोना 111 रुपए और एक क्विंटल गेहूं 41 रुपए का था. मौजूदा समय में जब 10 ग्राम सोने का मूल्य 29000 रुपए है, तो एक क्विंटल गेहूं महज 1625 रुपए का है. 1965 में केंद्र सरकार के प्रथम श्रेणी अधिकारी के एक माह के वेतन से छह क्विंटल गेहूं खरीदा जा सकता था.

आज उस केंद्रीय कर्मी के एक माह के वेतन से 30 क्विंटल गेहूं खरीदा जा सकता है. यह तुलनात्मक आंकड़ा साबित करता है कि सरकार किसानों के श्रम का सम्मान कितने अन्यायपूर्ण तरीके से करती चली आ रही है. सरकार कृषि उपज का जो समर्थन मूल्य घोषित करती है वह देश की लगभग 60 फीसदी से अधिक आबादी के सम्मान और समानता से जीने के मौलिक अधिकार का सीधा-सीधा उल्लंघन है.

बहरहाल, महाराष्ट्र के किसान आंदोलन को लेकर वहां की सियासत भी आपस में ही ठन गई है. भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल शिव सेना किसानों के मुद्दे पर सरकार से अलग खड़ी है तो भाजपा सरकार के मंत्री भी किसान आंदोलन का खुला समर्थन कर रहे हैं. शिवसेना सांसद संजय राउत किसान आंदोलन के समर्थन में लगातार बयान जारी कर रहे हैं और किसानों की कर्ज-माफी के मसले पर फड़नवीस सरकार के हठ की आलोचना कर रहे हैं. शेतकारी संगठन के नेता और फड़नवीस सरकार में राज्य मंत्री सदाभाऊ खोत किसान आंदोलन में शरीक हैं.

किसान आंदोलन को महाराष्ट्र के 15 से 20 किसान संगठनों का समर्थन प्राप्त है. भारतीय किसान यूनियन के मुख्य प्रवक्ता राकेश टिकैत ने भी कहा कि किसानों का आंदोलन देशभर में फैलेगा. अपनी उपज का उचित मूल्य पाने और कर्ज-माफी को लेकर महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के जो किसान सड़क पर उतरे हैं, उनके साथ पूरे देश का किसान है.

किसानों का यह आंदोलन पूरे देश में फैलेगा. केंद्र और राज्य सरकारों की किसान विरोधी नीतियों का नतीजा है कि आज अन्न उत्पादकों को सड़क पर उतरना पड़ रहा है. अभी समय है कि सरकार किसानों की समस्याओं पर ध्यान दे जिससे किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिल सके. टिकैत ने कहा कि उत्तर प्रदेश में भी किसानों की स्थिति बहुत दयनीय है इसको लेकर भी यहां के किसान आंदोलन करेंगे.

समाजवादी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने किसानों के आंदोलन को पार्टी का समर्थन जताते हुए कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार को किसानों की जरा भी चिंता नहीं है और भाजपा शासित राज्यों में किसानों के साथ बर्बर व्यवहार किया जा रहा है. चौधरी ने मंदसौर में किसानों पर पुलिस फायरिंग की तीखे स्वर में निंदा की. सपा नेता ने कहा कि भाजपा की किसान विरोधी नीति के कारण तीन वर्ष में लाखों किसानों ने आत्महत्याएं कीं.

उत्तर प्रदेश में हर महीने कर्ज से दबे 50 किसान फांसी पर लटक कर जान दे रहे हैं. राष्ट्रीय लोक दल के वरिष्ठ नेता अनिल दुबे ने भी कहा कि उत्तर प्रदेश के किसान सरकारी उपेक्षा से आजिज आ चुके हैं और जोरदार आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है. गन्ना किसान पहले से अपने करोड़ों के बकाये को लेकर परेशान हैं, लेकिन सरकार झूठ पर झूठ परोस रही है. सब्जियां उपजाने वाले किसान अब कौड़ियों के मोल अपनी सब्जियां बेचने के लिए तैयार नहीं हैं. रालोद नेता ने कहा कि किसानों का आंदोलन पूरे देश को अपनी चपेट में ले लेगा.

उत्तर प्रदेश के करीब-करीब सारे किसान नेता कहते हैं कि छोटे और सीमांत किसानों का कर्जा माफ कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों को राहत तो दी, लेकिन इससे किसानों का व्यापक हित कतई नहीं सध रहा. हालांकि योगी सरकार के फैसले ने महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसानों को अपनी आवाज उठाने का मौका दे दिया, क्योंकि इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री भी किसानों का कर्जा माफ करने का वादा काफी अर्से से कर रहे थे.

केंद्र क्यों नहीं लागू करता स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें!
देश में हरित क्रांति के पिता माने जाने वाले प्रो. एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 18 नवम्बर 2004 को एक आयोग का गठन किया गया था. तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. कृषि क्षेत्र में मौलिक परिवर्तन और सुधार की स्थितियों का अध्ययन करने के लिए गठित स्वामीनाथन आयोग (नेशनल कमीशन फॉर फार्मर्स) ने वर्ष 2004 से 2006 के बीच अपनी चार रिपोर्टें पेश कीं. आयोग ने किसानों की बढ़ती समस्याओं और उनकी आत्महत्याओं पर गहरी चिंता जताई थी.

आयोग ने किसी फसल के उत्पाद पर आने वाले खर्च का डेढ़ गुना अधिक दाम किसानों को दिए जाने की सिफारिश की थी. आयोग ने यह भी कहा था कि अतिरिक्त और बेकार जमीनों को जरूरतमंदों के बीच बांटा जाए. आयोग की सिफारिशों में सबसे खास बात यह थी कि आयोग ने कहा था कि गैर-कृषि कार्य के लिए कारपोरेट सेक्टर को किसी भी कीमत पर कृषि भूमि और वन भूमि नहीं दी जाए.

आयोग ने जंगल में आदिवासियों और चरवाहों को जाने और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीयता के अधिकार पर भी जोर दिया था. कृषि भूमि की खरीद-फरोख्त के लिए भी आयोग ने कड़े नियम लागू करने की वकालत की थी. लेकिन अफसोस यह है कि कांग्रेस सरकार ने स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया और भाजपा सरकार ने भी उस फाइल की धूल झाड़ने की जहमत नहीं उठाई.

राष्ट्रीय किसान आयोग के गठन पर सियासत क्यों!
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की तर्ज पर केंद्र सरकार राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन क्यों नहीं करती? यह सवाल संसद से सड़क तक लगातार उठते रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार न इसका जवाब देती है और न इसके गठन के लिए कोई पहल करती है.

जदयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी राज्यसभा में लगातार यह मांग करते रहे हैं कि राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन हो, जिसे संवैधानिक अधिकार मिले और जो किसानों के कल्याण और उनके संरक्षण के लिए ठोस काम कर सके. विडंबना यह है कि वर्ष 2004 में प्रो. एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में जो किसान आयोग बना, वह भी निष्क्रिय कर दिया गया और उसकी सिफारिशें भी लागू नहीं की गईं.

महाराष्ट्र के 40 लाख से अधिक किसान परिवार कर्ज में डूबे
देश में सबसे अधिक किसानों की आत्महत्या महाराष्ट्र में ही होती है. मराठवाड़ा और विदर्भ को किसानों की कब्रगाह कहा जाने लगा है. पिछले कई वर्षों से सूखे और सत्ता की उपेक्षा की मार झेल रहे महाराष्ट्र के किसानों की हालत दयनीय है. देश में किसानों की आत्महत्या के मामलों में महाराष्ट्र का प्रतिशत 45 है.

पिछले दो दशक में महाराष्ट्र के 28 जिले सूखा, ओला और बारिश जैसी प्राकृतिक आपदा से प्रभावित रहे हैं. महाराष्ट्र के किसान सबसे अधिक केला, कपास, संतरा, नासपाती, सोयाबीन और प्याज जैसी नगदी फसलें उगाते हैं, जिसमें लागत सबसे अधिक आती है. इसकी वक्त पर कीमत नहीं मिली तो उपज बरबाद हो जाती है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय का आधिकारिक आंकड़ा है कि महाराष्ट्र के 40 लाख 67 हजार 200 किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं. पिछले दो दशक में सबसे ज्यादा 64 हजार किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की. वैसे, देशभर में किसानों की हालत चिंताजनक है.

एक किसान की आवाज़…
जो किसान खेत में टिटहरी के अण्डे नजर आने पर उतनी जगह की जोत छोड़ देता है, वो यात्रियों से भरी बस के कांच कैसे फोड़ देता है? जो किसान खड़ी फसल में चिड़िया के अंडे/चूजे देख उतनी फसल नहीं काटता है, वो किसी की सम्पत्ति कैसे लूट सकता है? जो किसान पिंडाड़े में लगी आग में कूदकर बिल्ली के बच्चे बचा लेता है, वो किसी के घर में आग कैसे लगा देता है?

जो किसान दूध की एक बूंद भी जमीन पर गिर जाने से उसे पोंछकर माथे पर लगा लेता है, वो उस अमृत को सड़कों पर कैसे बहा देता है? जो किसान गाड़ी का हॉर्न बजने पर सड़क छोड़ खड़ा हो जाता है, वो कैसे किसी का रास्ता रोक सकता है? जो किसान चींटी को अंडा ले जाते और चिड़िया को धूल नहाते देख कर बता सकता है कि कब पानी आएगा, वो कैसे किसी के बहकावे में आएगा? ये दुखद घड़ी क्यों आई? कुछ तो चूक हुई है.

नदी से संवाद करने वाले, किसानों से संवाद करना भूल गए. जो किसान अपनी फसल की रखवाली के लिए खुले आसमान के नीचे, आंधी-तूफान, हिंसक जानवर से नहीं डरता, वो बन्दूक की गोली से नहीं डरेगा. किसान तो बस मीठी बोली से ही मानेगा. एक बार उसके अन्दर का दर्द अच्छे से जानिए, वो अन्नदाता है, उसे केवल मतदाता मत मानिए.

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