riverसाल 1975 में जब बागमती नदी के दोनों किनारे तटबंध निर्माण की कवायद शुरू की गई थी, तब गांवों के लोगों को लगा था कि यह सहीं नही है. उस वक्त लोगों ने बांध निर्माण का विरोध तो किया, परंतु तत्कालीन हुक्मरानों के फैसले में इनकी आवाजें दबकर रह गईं. आमजनों की भावनाओं की अनदेखी कर शुरू कराया गया कार्य भी अधर में ही अटक गया. इस बीच प्रतिवर्ष बागमती नदी में आने वाली बाढ़ से व्यापक स्तर पर जानमाल का नुकसान आम बात बनी रही. भारत-नेपाल सीमा पर बसा सीताम़ढी जिला विकास के मामले में तब एक कोने में दुबका दिखता रहा. राजधानी पटना से भाया मुजफफरपुर होते सीताम़ढी तक की वन वे सड़क को साल 2000 से पूर्व ही

एनएच-77 का दर्जा दे दिया गया था. परंतु स़डक का हाल गांव की पगडंडी से बेहतर नहीं हो सका था. साल 2005 में बिहार में चले सत्ता परिवर्तन के दौर ने शासन की कमान नीतीश कुमार के हाथों में दे दी. इस वक्त नीतीश ने अलग-अलग चुनावी सभाओं में मंच से यह घोषणा की थी कि अगर बिहार में शासन का कमान मिला तो सबसे पहले आवागमन की व्यवस्था को दुरुस्त करेंगे.

सीताम़ढी-मुजफफरपुर एनएच-77 के कटौझा का तात्कालिक हाल यही था कि साल के चार माह तक लोगों के लिए 60 किलोमीटर की दूरी तय कर एक दिन में वापस आना मुश्किल बना रहता था. लोगों को कटौझा में बा़ढ के दौरान तकरीबन ढाई किलोमीटर की यात्रा नाव अथवा ट्रैक्टर से करने की विवशता होती थी. शारीरिक, आर्थिक व मानसिक यातनाओं के दौर को झेलने वालों ने भरोसा कर बिहार में सत्ता परिवर्तन के लिए कमर कसी थी. चुनाव बाद जब नीतीश कुमार ने शासन की बागडोर संभाली तो सबसे पहले कटौझा में बागमती नदी पर रामवृक्ष बेनीपुरी सेतू का निर्माण कराने के साथ हीं लोगों में नयी उम्मीदें भी भरी.

अब चर्चा कुछ स्थानीय पहलुओं पर भी जरूरी है. बताया जाता है कि साल 1975 में बांध निर्माण कार्य का अंतिम प़डाव सीताम़ढी जिले के रून्नीसैदपुर प्रखंड के तिलकताजपुर गांव के समीप रहा. जहां नेपाल सीमा से दोनों किनारे बांध के बीच जमा बा़ढ का पानी इस गांव के समीप खुले मैदान में उतरते ही अपने रौद्र रूप से लोगों को बेचैन करता रहा. एक ओर जहां खेतों में लहलहाते फसलों के साथ सैकड़ों लोगों का आशियाना तबाह होता रहा, वहीं आवागमन की असुविधा के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा समेत अन्य परेशानियों का सामना लोगों की नियति बनी रही.

तकरीबन तीन से चार माह तक लोगों को आवश्यक कार्य के लिए नाव से ही आवागमन की मजबूरी थी. तटबंध निर्माण के बाद का हाल यह है कि दोनों बांध के बीच पड़ जाने के कारण कई गांवों से लोगों को अपना पुस्तैनी मकान छोड़कर पलायन करना पड़ा है. सरकारी स्तर पर विस्थापितों को पुनर्वास के लिए मामूली जमीनें दे दी गई, जो परिवारों के बढते सदस्यों की संख्या के हिसाब से अपर्याप्त साबित होता रहा. संपन्न लोगों ने आवश्यकतानुसार जमीन खरीद कर नया आशियाना तैयार कर लिया.

परंतु सैकड़ों मध्यम वर्गीय व कमजोर परिवारों के लिए जीवन यापन अब भी गंभीर चुनौती बनी है. जानकारों की मानें तो क्षेत्र के तिलकताजपुर, मधौल व मानपुर रत्नावली गांव के ही करीब 4 हजार परिवारों को अपना पुस्तैनी घर छोड़कर भागना पड़ा है. आलम यह है कि कभी घनी बस्ती के रूप में चर्चित रहे इन गांवों का वर्तमान में भूगोल बदल गया है. जो पूर्व में पड़ोसी थे, वे वर्तमान में काफी दूर हो गए हैंै. कोई बस्ती में तो कोई वीरान सरेह में बसने को मजबूर हैं.

जहां तक नदी के हाल का सवाल है तो तटबंध का निर्माण कई मायने में नदी के लिए भी घातक साबित हो रहा है. संभव है आने वाले सालों में इसके भयावह रूप से लोगों को सामना करना पड़े. बताया जाता है कि तटबंध निर्माण से पूर्व प्रतिवर्ष बा़ढ के पानी के साथ आने वाली मिट्टी की परतें जमीन की उर्वरा शक्ति को ब़ढाती थीं, जिससे एक ओर बा़ढ से लोगों की तबाही ब़ढती थी, तो दूसरी ओर जमीन में फसलों का बेहतर होना इनके सारे जख्मों के लिए मरहम का काम करता था. परंतु बांध बनने के बाद अब बा़ढ के पानी के साथ आने वाली मिट्टी व बालू की परतें नदी के गर्भ में ही जमा होने लगी हैं.

नतीजतन एक ओर जहां किसानों के जमीन की उर्वरा शक्ति का ह्रास होने लगा है. वहीं दूसरी ओर नदी का गर्भ भरने लगा है. ऐसे में भारी बा़ढ के दौरान तटबंधों के टूटने की संभावना अधिक ब़ढती जा रही है. लोगों की मानें तो बागमती नदी की धारा में शायद ही कोई स्थान रहा है, जहां से किसी भी महीने में कोई पानी पार कर एक से दूसरे छोर तक जाने का साहस करता था. लेकिन वर्तमान में हाल यह है कि नदी की बीच धारा में कई स्थानों पर टापू बन गया है. हाल के दशक में नदी की कई उपधारायें भी निकल आई हैं. यह कभी भी तटबंधों को ध्वस्त कर आम जनों के लिए घातक साबित हो सकती हैं.

सबसे पहली धारा कंसार गांव के समीप से निकली जो खड़का होते हुए भर्थी से मुख्य धारा में मिली. वर्तमान में कटौझा के समीप बागमती नदी पर बने पुल के उत्तरी व दक्षिणी भाग से दो धारायें आकर मिलती हैं. इन दोनों ही धाराओं के बीच तकरीबन 2 हजार एकड़ उपजाऊ जमीन वर्तमान में बीहड़ का रूप ले चुकी है. उन जमीनों का हाल यह है कि कोई भी भूस्वामी अब वहां जाना भी नहीं चाह रहे हैं, क्योंकि बालू के टीले में बदल चुके वे जमीन अब खरही जंगल का रूप ले चुके हैं. भूस्वामियों के लिए वे जमीन फिलहाल किसी काम के नही रह गए हैंै.

क्षेत्र की बदहाली दूर करने को लेकर सरकारी योजनाओं के तहत विकास का खाका तो खींचने का प्रयास किया गया. परंतु वह अब तक नहीं किया जा सका है, जिसकी जरूरत सबसे पहले थी. रून्नीसैदपुर की पूर्व विधायक गुड्डी देवी ने बतौर विधायक विस्थापितों के  पुनर्वास के लिए जमीन मुहैया कराने को लेकर सार्थक पहल की थीं. गांव की गलियों को मुख्य सड़क से जोडने के अलावा शिक्षा, चिकित्सा व बिजली समेत अन्य समस्याओं का निदान कराने का उन्होंने हर संभव प्रयास किया था.

जिसका परिणाम अब लोगों के बीच है. मगर चुनावी वादा कर वोट बटोरने वाले प्रतिनिधियों ने कुछ भी ऐसा नही किया, जिससे स्थानीय लोगों की समस्या का स्थायी निदान संभव हो सके. न रोजगार को लेकर कोई योजना सरकारी स्तर पर इन क्षेत्रों में पहुंची है और न ही औधोगिक विकास को लेकर ही कोई प्रयास किया जा सका है.

नतीजा है कि हर साल सैकड़ों की संख्या में लोग पलायन को मजबूर हैं. जीवन यापन के लिए परदेश में पसीना बहाना इनकी नियति बन गयी है. आवश्यकता है क्षेत्र में रोजगार के लिए बेहतर अवसर के साथ ही सरकारी स्तर पर आमलोगों के मूलभूत जरूरतों को पूरा करने की. इन घरों को रोशन करने की, जहां अब तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच सकी है. सरकार प्रायोजित योजनाओं का लाभ हकदारों को मिले इसकी गारंटी की जवाबदेही भी जनप्रतिनिधियों को लेनी होगी.प

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