पेड न्यूज चिंता का एक  विषय है. यह है क्या? पेड न्यूज का मतलब है संपादक, रिपोर्टर या प्रकाशक द्वारा पैसा लेकर खबर छापना. शायद इससे उन्हें कोई फर्क़ नहीं पड़ता. लेकिन, जैसे ही पेड न्यूज के रूप में कोई ग़लत खबर छपती है, नुक़सान हो चुका होता है. मीडिया की छवि ख़राब हुई है. वह यह नहीं कह सकता कि हम बहुत ही पवित्र हैं और हम आलोचना से परे हैं. दरअसल, देश में प्रेस और न्यायपालिका दो ऐसी संस्थाएं हैं, जिनमें सुधार की ज़रूरत है. कार्यपालिका और विधायिका सभी देशों में और ख़ासकर भारत में कभी भी सम्मानित नहीं रहीं. 

blog-morarkaयह निराशाजनक है कि हमारा पूरा मीडिया कुछ-कुछ नकारात्मक मोड में है. ऐसा क्यों है, मैं नहीं समझ पा रहा. मैं समझ सकता हूं कि लोकतंत्र में हम सबके अलग-अलग विचार हो सकते हैं. कोई सरकार का समर्थन कर सकता है, कोई आलोचना कर सकता है, तो कोई किसी एक विशेष पार्टी का समर्थन कर सकता है. लोकतंत्र में यह सब स्वीकार्य है. लेकिन, जब राष्ट्रीय मुद्दों की बात आती है, तो फिर आलोचना में मतभेद नहीं होना चाहिए. नवीनतम मामला यमन से भारतीयों को सुरक्षित निकाल लाने का है. विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने बहुत ही साहसपूर्वक काम किया. खुद जिबूती में तैनात होकर और यमन के साना में रहने का साहस दिखाकर उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कितनी जल्दी और कैसे सुरक्षित रूप से हम भारतीयों को वहां से निकाल सकते हैं. और न स़िर्फ भारतीयों, बल्कि अन्य देशों के लोगों की मदद करने में भी उन्होंने पर्याप्त उदारता दिखाई.

यह सब सरकार के लिए, विदेश मंत्रालय के लिए और देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि के रूप में माना जाना चाहिए. बजाय इसके, हम पाते हैं कि कुछ लोग ऐसे हैं, जो व्यक्तिगत रूप से जनरल वीके सिंह के ़िखला़फ हैं. और, सेना के कुछ भूतपूर्व जनरल, जो वीके सिंह के उम्र तिथि विवाद पर अपने स्टैंड की वजह से उन्हें नापसंद कर रहे हैं, ऐसे लोग यदि व्यक्तिगत रूप से नापसंदगी ज़ाहिर कर रहे हैं, तो ठीक है, लेकिन प्रेस को वस्तुनिष्ठ होना चाहिए. जब पूरा देश उनके अच्छे कामों की सराहना कर रहा है, तब आप उनकी आलोचना कैसे कर सकते हैं? मैंने इंटरनेट पर देखा है कि हर आदमी उनकी भरपूर प्रशंसा कर रहा है, उन्हें हीरो के तौर पर देखा जा रहा है. यहां हमने देखा कि जनरल वीके सिंह ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए प्रेसटीट्यूट्‌स शब्द का इस्तेमाल किया. इसका उच्चारण असल शब्द के क़रीब है. मैंने सोशल मीडिया पर आप समर्थकों को आपटार्ड कहते देखा है. जाहिर है कि यह टार्ड शब्द कहां से आया है? यदि आपटार्ड स्वीकार्य है, तो फिर प्रेसटीट्यूट क्यों नहीं? प्रेस शब्द उस वास्तविक शब्द के बहुत क़रीब है, लेकिन तथ्य यह है कि आप इसे लेकर सड़क पर नहीं उतर सकते. आपने दूसरों को गाली देने या आलोचना करने के लिए जो प्रतिमान स्थापित किए हैं, वैसे ही आपको भी अपनी आलोचना या गाली सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए. टाइम्स नाउ पर छह-सात पैनलिस्ट थे. इनमें से ज़्यादातर मीडियाकर्मी ही थे. उनकी बातों से लग रहा था कि आ़िखर प्रेस को ऐसा क्यों बोला गया. मैं नहीं समझता कि प्रेस को आलोचना से अलग क्यों रखा जाना चाहिए.
मैं खुद जन्म से ही एक कॉरपोरेट घराने से आता हूं. शुरू से सुनता रहा हूं कि कॉरपोरेट घराने ब्लैक मनी, ब्लैक मार्केटिंग और टैक्स चोरी में शामिल होते हैं. लेकिन, मैं कभी इससे आहत नहीं हुआ, क्योंकि ये आरोप मेरे ऊपर लागू नहीं होते थे और इसलिए मैं आहत नहीं होता था. यह किसी ने किसी वजह से कहा होगा और हो सकता है कि इसमें कुछ सच्चाई भी हो. कुछ कॉरपोरेट घराने ऐसे हों, जो इन कामों में शामिल हों और इस वजह से उनकी छवि खराब हुई हो, लेकिन इससे मैं कभी आहत नहीं हुआ, क्योंकि मैं कभी ऐसे कामों में शामिल नहीं रहा. यहां मेरी समझ से बाहर है कि टाइम्स नाउ पर बहस में शामिल पैनलिस्ट ने जनरल वीके सिंह की आलोचना क्यों शुरू कर दी? ठीक है, एक मंत्री होने के नाते वह संयम बरतते हुए ऐसे शब्दों को टाल सकते थे, लेकिन अगर उन्होंने ऐसा कह भी दिया, तो इससे कोई आसमान नहीं टूट पड़ा. ऐसा नहीं है कि आज का प्रेस यह दावा कर सकता है कि वह रिश्वतखोरी नहीं करता, भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होता और उसकी आलोचना नहीं की जा सकती.
पेड न्यूज एक चिंता का विषय है. यह है क्या? पेड न्यूज का मतलब है संपादक, रिपोर्टर या प्रकाशक द्वारा पैसा लेकर ़खबर छापना. शायद इससे उन्हें कोई ़फर्क़ नहीं पड़ता. लेकिन, जैसे ही पेड न्यूज के रूप में कोई ग़लत ़खबर छपती है, नुक़सान हो चुका होता है. मीडिया की छवि खराब हुई है. वह यह नहीं कह सकता कि हम बहुत ही पवित्र हैं और हम आलोचना से परे हैं. दरअसल, देश में प्रेस और न्यायपालिका दो ऐसी संस्थाएं हैं, जिनमें सुधार की ज़रूरत है. कार्यपालिका और विधायिका सभी देशों में और खासकर भारत में कभी भी सम्मानित नहीं रहीं. लेकिन प्रेस और न्यायपालिका, जिन पर अन्य संस्थाओं की निगरानी की ज़िम्मेदारी है, वे ही अब संदेह के घेरे में हैं. अगर न्यायपालिका अपनी बेहतर छवि पेश नहीं कर पा रही है और प्रेस एक शब्द से आहत हो जाता है, तो यह सब मेरी समझ से बाहर है.
तो क्या ये आलोचनाएं सही थीं, इसलिए यह सब हंगामा हो रहा था? मैं समझता हूं कि यही वक्त है कि यह सब ट्‌वीटिंग वगैरह रुकनी चाहिए. अपने काम पर ध्यान दीजिए. मैं समझता हूं कि जनरल वीके सिंह के नेतृत्व में हमारे प्रशासन और लोगों ने बेहतरीन काम किया है. मैं समझता हूं कि संयुक्त राष्ट्र भारत के इस काम के लिए एक धन्यवाद प्रस्ताव पास कर सकता है. और, एक हम हैं कि अपनी आदत के मुताबिक अपने ही अच्छे कामों की आलोचना कर रहे हैं और उसे कमतर आंक रहे हैं. मैं समझता हूं कि यह सब फौरन बंद होना चाहिए. व्यक्तिगत रूप से मैं कह सकता हूं कि जनरल वीके सिंह ने बहुत ही उल्लेखनीय काम किया है. कम से कम कैबिनेट को चाहिए कि वह एक धन्यवाद प्रस्ताव लाए और सरकार के प्रतिनिधि के रूप में उनके काम के लिए धन्यवाद दे. हर किसी के वश का नहीं है कि वह जिबूती या साना में रहकर इस तरह का काम कर सके. ज़ाहिर है, वह एक पूर्व आर्मी चीफ हैं और इसलिए उन्हें इसका लाभ मिला. लेकिन, प्रेस द्वारा इस तरह से चरित्र हनन करना ग़ैर-ज़िम्मेदाराना और ग़ैर-ज़रूरी है और वह भी उस एक शब्द के लिए, जिसे उन्होंने खुद नहीं गढ़ा है. बहुत सारे लोगों ने उनसे पहले इस शब्द का इस्तेमाल किया है. यह एक वास्तविक शब्द नहीं है. उन्होंने स़िर्फ इसका इस्तेमाल आहत होकर किया कि एक तो अपनी ज़िंदगी ़खतरे में डालकर यह काम किया. बावजूद इसके, प्रेस उन पर अनाप-शनाप आरोप लगा रहा है.
दूसरी बात न्यायपालिका की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की. इसका औचित्य संदेह से परे नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी ने इशारों में न्यायपालिका से कहा है कि वह उन पीआईएल को, जो उनके (मोदी) विकास की धारणा की राह में रुकावट हों, न सुने. कम से कम मैं देश के मुख्य न्यायाधीश श्री एचएल दत्तू से अपेक्षा रखता हूं कि वह ऐसी किसी पीआईएल की सुनवाई से खुद को अलग कर लेंगे. उन्होंने खुद यह स्वीकारा है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशंसक हैं और यदि पीआईएल पर अलग तरीके से सुनवाई होने लगी, तो न्यायपालिका पर कई सारे सवाल खड़े होने लगेंगे.
मैं समझता हूं कि सरकार को अपना काम करने दें, यह पांच साल के लिए चुनी गई है. श्री मोदी को संविधान के दायरे में रहते हुए अपने तरीके से अपना काम करने का पूरा अधिकार है. लेकिन, न्यायपालिका और प्रेस नागरिकों के हितों की निगरानी करने वाली संस्थाएं हैं और लोहिया जी ने इसे चौखंभा राज कहा था. न्यायपालिका और प्रेस दो ऐसी संस्थाएं हैं, जो भारत में लोकतंत्र की गरिमा को बचाए रखती हैं. इस तरह की सुविधा मध्य-पूर्व या हमारे आस-पास के बहुत सारे देशों में नहीं है. ऐसा केवल विकसित पश्चिमी लोकतंत्र में है. हमारे पास कुछ है, इसे बचाना चाहिए, इसे मजबूत बनाना चाहिए. बाहरी शक्तियों के बजाय हम खुद ही इसे नष्ट कर दें, इससे बचना होगा. हम यह ऩुकसान बिना किसी कारण कर रहे हैं. आशा है कि सद्बुद्धि आएगी.

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