मार्च 2012 में सत्ता में आने के बाद दो साल विश्राम की मुद्रा में चले जाने वाले विभागों में अल्पसंख्यक कल्याण, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, नागरिक सुरक्षा, पिछड़ा वर्ग एवं विकलांग कल्याण, कारागार, पर्यटन, परिवहन, होमगार्ड, वस्त्र उद्योग एवं रेशम, खादी एवं ग्रामोद्योग, दुग्ध विकास, प्राविधिक शिक्षा, ग्रामीण अभियंत्रण (स्वतंत्र प्रभार) और खनन आदि शामिल हैं. इनमें से कई विभाग 2014 में सक्रिय हुए, लेकिन इनमें से भी कुछ विभागों की सक्रियता औपचारिक रही. कई विभागों के 2012 एवं 2013 के काम महज घोषणात्मक रहे हैं, जिनका क्रियात्मकता से कोई लेना-देना नहीं है.
upaaaबीते अक्टूबर में समाजवादी पार्टी के लखनऊ में हुए तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश सरकार के मंत्रियों के कामकाज के तौर-तरीके, उनके भ्रष्टाचार और उनके जन-विरोधी रवैये पर ही चर्चा मुख्य रूप से घूमती रही. यह चर्चा केंद्र में इसलिए रही, क्योंकि सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने इस पर अपनी चिंता जताई थी. यह ऐसा विषय था, जिस पर मुलायम सिंह लगातार बोलते रहे हैं और अब भी बोल रहे हैं. हालांकि, मुलायम की इस चिंता में गद्दार सपाइयों का मसला घुसाकर घालमेल करने की भी कोशिश की गई, लेकिन मुलायम की बातें जनता में तीर की तरह घुस गईं, घालमेल की कोशिशें चाहे जितनी भी होती रहें. अब यह बात साफ़ हो गई कि अखिलेश सरकार के मंत्रियों के परफॉर्मेंस पर ही 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा. अधिवेशन में ही वरिष्ठ सपा नेता नरेश अग्रवाल ने मंच से कहा था कि मंत्रियों के पास कहने के लिए अपना कुछ भी नहीं है, अखिलेश यादव के सिवाय. सही भी है कि कुछ खास वरिष्ठ मंत्रियों को छोड़ दिया जाए, तो काम के दृष्टिकोण से अखिलेश के कामों के सिवाय कहने के लिए कुछ है भी नहीं.
मंत्रियों के कामकाज एवं उनके जन-विरोधी क्रियाकलापों पर बात आई और उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न किए जाने की मुलायम सिंह यादव ने मंच से शिकायत की, तो अखिलेश ने क़रीब सात दर्जन उन मंत्रियों की लालबत्ती छीन ली, जो केवल दर्जा प्राप्त मंत्री थे. उनका भ्रष्टाचार भी उनके दर्जे जैसा ही था, जिनके पास लालबत्ती के सिवाय कुछ था भी नहीं. जबकि मुलायम की शिकायत के दायरे में दर्जा प्राप्त मंत्री नहीं, बल्कि वे मंत्री थे, जो कैबिनेट या राज्य मंत्रियों की सूची में शामिल थे. वैसे मंत्री, जिनके हाथ में उनका विभाग और सत्ता का अधिकार था तथा वे अपने निजी हित में उसका पूरा उपभोग कर रहे थे (हैं). मुलायम की मंचीय शिकायतों के ज़रिये सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन ने यह रास्ता खोला कि भ्रष्टाचार के आरोपों एवं शिकायतों के बरक्स हम अखिलेश सरकार के मंत्रियों के परफॉर्मेंस का भी हिसाब-किताब लें, ताकि सक्रिय-निष्क्रिय मंत्री का स्पष्ट विभाजन कर सकें. सक्रिय एवं निष्क्रिय मंत्रियों के बीच में हम सामान्य चाल वाले मंत्रियों की एक कैटेगरी और बना सकते हैं, ताकि वह बीच की विभाजक रेखा के बतौर बनी रहे. मंत्रियों की सक्रियता एवं निष्क्रियता तय करने के लिए उनके विभागवार कामकाज का ब्यौरा खंगाला गया और ज़मीनी स्तर पर उस ब्यौरे के साथ उनकी छवि की तुलना की गई. कई मंत्रियों के कामकाज का दस्तावेजी रिकॉर्ड बिल्कुल नगण्य मिला. जाहिर है, अखिलेश सरकार के कई मंत्री ज़मीनी स्तर पर केवल बात-बहादुरी से काम चलाते रहे, व्यवहारिकता के धरातल पर उनका काम लचर रहा. स्पष्ट है कि ऐसे मंत्रियों की रुचि भ्रष्टाचार एवं जन-विरोधी कार्यकलापों में ही रही, जैसा सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव लगातार कहते रहे या अब भी कह रहे हैं.
सरकारी रिकॉर्ड पर मंत्रियों का जो कामकाज दिखता है, उसके हिसाब से समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद तक़रीबन दो साल तक तो अखिलेश सरकार के अधिकांश मंत्री सत्ता का आनंद ही लेते रहे. कुछ ही मंत्री ऐसे थे, जो सत्ता में आने के फौरन बाद या मंत्री की कुर्सी संभालने के बाद ही सक्रियता से काम में जुट गए, लेकिन अधिकांश मंत्री वर्ष 2012 एवं 2013 में आराम फरमाते रहे. अखिलेश यादव ने जब सत्ता पर अपनी पूरी पकड़ बना ली, तब उनके मंत्री काम पर जुटे. मंत्रियों के कामकाज के सरकारी रिकॉर्ड देखें, तो उसकी समीक्षा से कई रोचक पहलू उजागर हो रहे हैं. मसलन, जो मंत्री कहीं बयानों में नहीं रहते, जो खुद को विवादों से अलग रखते हैं, जो खुद को बिल्कुल लो-प्रोफाइल में रखते हैं, वे अपने काम में सक्रिय पाए गए हैं. उनका काम दस्तावेजी प्रमाण के साथ दिखता है. आरोप एवं शिकायतें तो मंत्रियों के साथ चलते ही हैं, इसमें कुछ शिकायतें सही भी होती हैं, लेकिन काम भी चलता रहता है. ऐसे मंत्रियों में समाज कल्याण मंत्री अवधेश प्रसाद, पंचायतीराज मंत्री कैलाश, श्रम मंत्री शाहिद मंजूर, माध्यमिक शिक्षा मंत्री महबूब अली, स्वतंत्र प्रभार वाले ग्राम्य विकास राज्य मंत्री अरविंद सिंह गोप के नाम खास तौर पर उल्लेखनीय हैं. राजा भैया जैसे मंत्री, जिन्हें तमाम किस्म के विवादों में घसीटा जाता रहा है, उन्हें देखें, तो किसी भी सक्रिय मंत्री के काम से उनकी तुलना की जा सकती है. सक्रिय मंत्रियों की सूची में शिवपाल यादव, आजम खान एवं अहमद हसन जैसे वरिष्ठ मंत्रियों के नाम लिए जा सकते हैं. ये मंत्री चर्चा और सुर्खियों में रहते हैं पर इनका विभागीय काम भी अपनी गति से चलता रहता है.
ऐसे मंत्री भी हैं, जो अपने साथ केवल आरोप एवं शिकायतें ही लेकर चलते हैं. काम-धाम बिल्कुल नहीं करते और अन्य गतिविधियों में लिप्त रहते हैं. सामान्य सक्रिय मंत्रियों में परिवहन मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव, राजनीतिक पेंशन मंत्री राजेंद्र चौधरी, कारागार मंत्री बलराम यादव, बेसिक शिक्षा मंत्री राम गोविंद चौधरी, लघु सिंचाई मंत्री राज किशोर, लघु उद्योग मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भगवत सरन गंगवार और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री मनोज पांडेय के नाम लिए जा सकते हैं. जिन मंत्रियों के नाम सक्रिय एवं सामान्य सक्रिय मंत्रियों की सूची में नहीं हैं, उनकी कैटेगरी के बारे में आप अच्छी तरह समझ सकते हैं. इसमें रेखांकित करने वाली बात यह भी है कि इन सक्रिय एवं सामान्य सक्रिय मंत्रियों में भी कई ऐसे हैं, जिनका विभाग तक़रीबन दो साल तक विश्राम करता रहा और 2014 में अचानक सक्रिय हो गया. 2012 एवं 2013 में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अलावा उंगली पर गिने जाने लायक कैबिनेट मंत्री ही अपने काम में सक्रिय रहे. कुल मिलाकर स्थिति यह है कि अखिलेश सरकार के 25 कैबिनेट मंत्रियों की टीम में यदि आठ-नौ मंत्री ही सक्रिय हैं, तो उत्तर प्रदेश में चल रहे विकास कार्यों के बारे में आसानी से सोचा-समझा जा सकता है. स्वतंत्र प्रभार वाले पांच मंत्रियों में से केवल एक अरविंद सिंह गोप का नाम सक्रिय मंत्रियों में शुमार है. 25 राज्य मंत्री जिन मंत्रियों के साथ संबद्ध हैं, उनकी सक्रियता का आकलन उनके बॉस मंत्रियों के परफॉर्मेंस के आधार पर किया जा सकता है.
मार्च 2012 में सत्ता में आने के बाद दो साल विश्राम की मुद्रा में चले जाने वाले विभागों में अल्पसंख्यक कल्याण, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, नागरिक सुरक्षा, पिछड़ा वर्ग एवं विकलांग कल्याण, कारागार, पर्यटन, परिवहन, होमगार्ड, वस्त्र उद्योग एवं रेशम, खादी एवं ग्रामोद्योग, दुग्ध विकास, प्राविधिक शिक्षा, ग्रामीण अभियंत्रण (स्वतंत्र प्रभार) और खनन आदि शामिल हैं. इनमें से कई विभाग 2014 में सक्रिय हुए, लेकिन इनमें से भी कुछ विभागों की सक्रियता औपचारिक रही. कई विभागों के 2012 एवं 2013 के काम महज घोषणात्मक रहे हैं, जिनका क्रियात्मकता से कोई लेना-देना नहीं है. समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही जो विभाग अपने काम में सक्रिय हो गए, उनमें पीडब्ल्यूडी, नगर विकास, समाज कल्याण, लघु सिंचाई, राजनीतिक पेंशन, पंचायती राज, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, बेसिक शिक्षा और श्रम अव्वल रूप से शामिल हैं. सरकार बनने के बाद एक से डेढ़ साल तक विश्राम करने के बाद सक्रिय हुए विभागों में उद्यान, दुग्ध विकास, खाद्य एवं रसद, मत्स्य और महिला कल्याण आदि उल्लेखनीय हैं. सरकार बनने के बाद से आज तक कामकाज में नगण्य साबित होने वाले विभागों में धर्मार्थ कार्य, नागरिक सुरक्षा, पिछड़ा वर्ग कल्याण, पर्यटन, खादी एवं ग्रामोद्योग, खनन और प्राविधिक शिक्षा आदि शामिल किए जा सकते हैं. जिन विभागों के नाम सूची में कहीं भी नहीं हैं, उनके काम किस लायक हैं, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं.
कामकाज में नगण्य विभागों में भी कुछ विभाग संबद्ध मंत्रियों की गतिविधियों के कारण शिकायतों-आरोपों के केंद्र में रहे. इनमें खनन विभाग अव्वल है. खनन विभाग के कैबिनेट मंत्री एवं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खास गायत्री प्रसाद प्रजापति अपनी गतिविधियों के कारण प्रसिद्ध हो चुके हैं. उनका बेटा अनिल प्रजापति भी उन्हीं के नक्शेक़दम पर चलकर नाम कमा रहा है. अमेठी ज़िले में तहसील की सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा किए जाने के मामले में कैबिनेट मंत्री के बेटे का नाम आया. मंत्री के बेटे पर बैनामे के कागजात में हेराफेरी, स्टांप चोरी के साथ ही तहसील की खाली पड़ी ज़मीन पर जबरन कब्ज़ा करके निर्माण करने का आरोप है. यह मामला इतना गंभीर है कि स्थानीय अधिवक्ता संघ भी इस पर आधिकारिक नाराज़गी व्यक्त कर चुका है, लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. मंत्री के बेटे पर ज़मीन कब्जाने का यह कोई पहला आरोप नहीं था, इसके पहले अमेठी की एक विधवा की ज़मीन पर कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रजापति द्वारा कब्ज़ा किए जाने के ख़िलाफ़ पीड़ित विधवा महिला अपने परिवार के साथ लखनऊ में धरने पर बैठ चुकी है.
अमेठी तहसील के पास टाउन एरिया में रहने वाले प्रदीप श्रीवास्तव से कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के बेटे अनिल प्रजापति ने लाइफ क्योर मेडिकल एंड रिसर्च सेंटर नामक एनजीओ के नाम पर ज़मीन खरीदी. इस एनजीओ का डायरेक्टर खुद अनिल प्रजापति है. खरीदी गई ज़मीन के बगल में खाली पड़ी अमेठी तहसील की ज़मीन पर कब्जा करके अनिल प्रजापति ने निर्माण कार्य भी शुरू करा दिया. तहसील के वकीलों ने इसकी शिकायत अमेठी के उप-ज़िलाधिकारी आरडी राम से की, लेकिन मामला कैबिनेट मंत्री के बेटे से जुड़ा होने के कारण कोई कार्रवाई नहीं हुई. वकीलों ने इसके ख़िलाफ़ कार्य बहिष्कार कर दिया और सुल्तानपुर ज़िला न्यायालय पहुंच गए. अदालत ने उस भूखंड पर निर्माण कार्य फौरन रोकने का आदेश दे दिया.
प्रदेश के खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति की आर्थिक ताकत देखते-देखते इतनी बढ़ गई कि उनका ऐश्‍वर्य और आधिपत्य दोनों ही सड़क पर दिखने लगा है. अमेठी में मंत्री ने एक सिनेमा हॉल ही खरीद लिया. विमल पिक्चर हॉल खरीदने के बाद अब उन्हें उस परिसर के इर्द-गिर्द की सारी इमारतें एवं ज़मीनें चुभने लगीं. मंत्री ने विमल सिनेमा हॉल के बगल में विधवा शिवदेवी गुप्ता की ज़मीन पर भी जबरन कब्जा जमा लिया. प्रशासन ने बाकायदा बुल्डोजर लगाकर ज़मीन की चाहरदीवारी ढहा दी. दीवार गिराए जाते वक्त मंत्री का कथित पीआरओ भी वहीं मौजूद था. इसकी सूचना अमेठी के ज़िलाधिकारी और उप-ज़िलाधिकारी (सदर) को दी गई. ज़िलाधिकारी ने एसओ को कब्जा हटवाने का आदेश दिया, लेकिन प्रशासन मंत्री का कब्जा नहीं हटवा पाया. क़ानून हाथ में रखने वाले मंत्री के आगे पूरा ज़िला प्रशासन बेचारा और नाकाम साबित हुआ.
दूसरी तरफ़ खनन विभाग के कारनामों की अभी भी प्रदेश में चर्चा सर्वाधिक है. जानकारों का कहना है कि सबसे अधिक पैसा खनन से ही आता है, जिससे मालामाल होने वाले लोगों की कतार काफी लंबी है. अवैध खनन का पूरे उत्तर प्रदेश में बोलबाला है. मौरंग खनन में पट्टा कहीं का है, रॉयल्टी चल रही है कहीं और की. प्रदेश की वन भूमि में भी अवैध खनन का धंधा बेतहाशा चल रहा है. एक-एक बैरियर से कम से कम 40 लाख रुपये की वसूली होती है. नेता-नौकरशाह-माफिया की तिकड़ी सिंडिकेट की शक्ल में यह धंधा चला रही है. जालौन एवं उरई जैसे इलाकों में लाल सोने के नाम से मशहूर मौरंग खनन का अवैध कारोबार सिंडिकेट द्वारा चलाया जा रहा है. एक खदान के मौरंग प्रपत्र एमएम-11 दूसरी अवैध खदानों पर भी बखूबी चल रहे हैं. फिर भी खनिज विभाग के अफसर इसकी चेकिंग नहीं करते. स्पष्ट है कि उन्हें इसकी एवज में हर माह मोटी रकम मिल रही है.
अवैध मौरंग खनन के काले कारोबार में सत्ता शीर्ष से जुड़े लोगों द्वारा बेखौफ होकर खनन किया जा रहा है. वैसे तो जनपद जालौन में उरई एवं कालपी तहसील में ही सर्वाधिक मौरंग खदानें हैं, जिनमें उरई तहसील में सिमिरिया, खरका, मुहाना हैदलपुर, ददरी, अमरौड़ जैसी प्रमुख खदानें चल रही हैं, लेकिन खास बात यह है कि ददरी एवं अमरौड़ के पट्टाधारकों द्वारा दूसरी ऐसी खदानों के लिए अवैध रूप से एमएम-11 दे दिया गया, जहां किसी कारण से खनन पर रोक लगी थी या पट्टा था ही नहीं. जब इस रैकेट का पर्दाफाश हुआ, तो प्रशासन ददरी की मौरंग खदान के पट्टाधारक पर प्राथमिकी दर्ज कराने की बात-बहादुरी करने लगा. सत्ता शीर्ष के एक मंत्री के मुंहबोले नेता ने खनिज अधिकारी को अपना फरमान भी जारी कर दिया कि ऐसी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी. नेता के फरमान पर खनिज अधिकारियों की बोलती बंद हो गई और उन्होंने चुप बैठने में ही भलाई समझी. इसी तरह कालपी तहसील में हिमनपुरा, समसी, मोहरदेवी, भेंड़ी खुर्द जैसी खदानें चल रही हैं. खास बात यह है कि मोहरदेवी एवं समसी मौरंग खदान का न तो पट्टा स्वीकृत है, न ही निजी भूमि के रूप में ही खनन के लिए स्वीकृति है, फिर भी सत्ता शीर्ष के नेताओं और खनिज विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से धड़ल्ले से यहां दूसरे पट्टाधारकों के एमएम-11 का प्रयोग कर अवैध रूप से खनन किया जा रहा है. खनन के गोरखधंधे से आने-वाले अनाप-शनाप पैसे को बटोरने के लिए सत्ता शीर्ष ने मंत्री के साथ-साथ एक और खास व्यक्ति को लगा रखा है.
मंत्रियों के कारनामों के ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं. प्रदेश के कपड़ा एवं रेशम मंत्री शिवकुमार बेरिया की अपनी ही सरकार व प्रशासन के ख़िलाफ़ बेलगाम बयानबाजी और फूहड़ हरकतें अखिलेश सरकार को शर्मसार चुकी हैं. सीएमओ का अपहरण कराने वाले विधायक विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह को मंत्रिमंडल में दोबारा शामिल करने की घटना भी अखिलेश सरकार की छवि में चार चांद लगाने वाली साबित हुई. सीएमओ के अपहरण के मामले में पंडित सिंह को अक्टूबर 2012 में मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया था, लेकिन अखिलेश ने उन्हें फिर से मंत्रिमंडल में वापस ले लिया. याद करते चलें कि पंडित सिंह ने एनआरएचएम भर्ती में अपने लोगों की नियुक्ति का दबाव बनाने के लिए तत्कालीन सीएमओ एसपी सिंह का अपहरण कर लिया था. पंडित सिंह की दबंगई का हाल यह है कि अपहरण मामले में न केवल संबंधित सीएमओ, बल्कि तत्कालीन डीएम अभय, एसपी कृपा शंकर, सीडीओ अरविंद सिंह तक को भूमिगत हो जाना पड़ा. बाद में शासन ने 13 अक्टूबर को इन सभी अधिकारियों का वहां से तबादला कर दिया. मामले की जांच लखनऊ के मंडलायुक्त को सौंपी गई, लेकिन तत्कालीन मंडलायुक्त संजीव मित्तल ने आरोपी पंडित सिंह को ही जांच की परिधि से बाहर रख दिया. पिछली सपा सरकार के दौरान हुए 35 हज़ार करोड़ रुपये के खाद्यान्न घोटाले में भी पंडित सिंह का नाम उजागर हुआ था.
अखिलेश सरकार के मंत्रियों एवं विधायकों की नैतिक-प्रतिबद्धता जांचने के लिए एक मीडिया संस्थान ने सत्ता से जुड़े क़रीब एक दर्जन लोगों का स्टिंग ऑपरेशन किया था और सत्ता के गलियारे में चल रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने की छोटी-सी कोशिश की थी. पैसा लेकर काम कराने का वादा करने वाले लोगों में राज्य के श्रम एवं रोज़गार विभाग में एडवाइजर और राज्य मंत्री की हैसियत में रहे हाजी मोहम्मद अब्बास, उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के चेयरमैन एवं राज्य मंत्री के दर्जे में रहे श्रीप्रकाश राय, राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त आवश्यक वस्तु निगम के चेयरमैन रहे हाजी इकराम कुरैशी, सपा विधायक एवं पूर्व मंत्री शाकिर अली, पूर्व राज्यमंत्री आनंद सेन यादव, सपा विधायक चंद्रा रावत, सपा विधायक शारदा प्रताप शुक्ला, सपा के राज्य कार्यकारिणी सदस्य राम प्रकाश यादव, सपा के युवा मोर्चा के सचिव सतीश यादव, सपा के संभल ज़िला सचिव उरमान सिंह यादव, उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष अमित अग्रवाल उर्फ अमित जानी और लखनऊ के पूर्व पार्षद अयाज अहमद आदि के नाम शामिल हैं. इन नेताओं ने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास विभाग में वीडीओ की भर्ती के लिए लोगों से आठ से तेरह लाख रुपये तक की रिश्‍वत मांगी. कई जगह रिश्‍वत का आधा हिस्सा टोकन मनी के रूप में पहले मांगा गया. यह भी दावा किया गया कि पंचायतीराज विभाग में भी नियुक्तियां इसी तर्ज पर हो रही हैं. इनमें से कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि पुलिस विभाग में भी नियुक्तियां इसी तर्ज पर तय होने लगी हैं. कई लोगों ने यह दावा किया कि उनकी सपा के वरिष्ठ नेताओं एवं मंत्रियों से साठगांठ है.
दो बार मंत्री रह चुके सपा विधायक शाकिर अली को छोड़कर इन सभी नेताओं ने पैसा लेकर भर्ती कराने का भरोसा दिलाया. स़िर्फ शाकिर अली अकेले ऐसे नेता निकले, जिन्होंने पैसा लेकर काम करने से मना कर दिया. विडंबना यह है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दर्जा प्राप्त राज्य मंत्रियों की फौज से पहले 35 और फिर दूसरी खेप में 82 मंत्रियों को निकाल कर सुर्खियां तो बटोर लीं, लेकिन असलियत यह है कि बर्खास्त मंत्रियों की बैकडोर से वापसी के इंतजाम भी हो रहे हैं. कई परोक्ष रूप से ताकतवर हो भी चुके हैं. प्रदेश में मंत्री का भ्रष्टाचार उजागर करने वाले पुलिस अधिकारी का तबादला कर दिए जाने जैसे मामले भी सरकार की प्राथमिकताएं उजागर कर चुके हैं. आपको याद होगा कि चीनी निगम के अध्यक्ष रहे केसी पांडेय के भ्रष्टाचार और उनके द्वारा पशु तस्करी को संरक्षण दिए जाने का प्रमाण पेश करने वाले गोंडा के पुलिस अधीक्षक नवनीत राणा का तबादला कर दिया गया था. इसके अलावा उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्तर के दो दर्जन मंत्रियों पर गंभीर अपराध के मामले भी विचाराधीन हैं और इन्हीं छवियों के आधार पर समाजवादी पार्टी को 2017 के चुनाव में उतरना है.
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस दौरान अपने द्वारा किए गए विभिन्न विकास कार्यों का बखान मा़ैके-बेमौ़के करते रहते हैं. और, काम हो भी रहे हैं. लेकिन, सरकार और समाजवादी पार्टी के सामने सबसे अहम सवाल यह है कि राज्य मंत्रिमंडल में कुछ गिने-चुने नामों को छोड़कर शेष मंत्री निहायत नाकारा साबित हुए हैं. समाजवादी पार्टी एक तरफ़ राज्य में 2017 के विधानसभा चुनाव की ओर देख रही है, वहीं दूसरी तरफ़ अपने इर्द-गिर्द मौजूद और सत्ता पर काबिज चेहरे भी, जिनके भरोसे उसे जनता की अदालत में जाना है.


विकास दर में राज्य सबसे पिछड़ा क्यों
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रियों की विकास कार्यों में दिलचस्पी और उनकी प्राथमिकता का ही नतीजा है कि सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के मामले में सालाना विकास दर (सीएजीआर) के लिहाज से चार पिछड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश आख़िरी पायदान पर आ गया. एसोचैम का यह आधिकारिक खुलासा है. एसोचैम ने बीमार राज्यों मसलन बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश को लेकर एक अध्ययन कराया था, जिसके मुताबिक, उत्तर प्रदेश जीएसडीपी में मात्र 6.9 फ़ीसद की सीएजीआर हासिल कर सका है, जो इन चार पिछड़े राज्यों में सबसे कम है. औद्योगिक क्षेत्र में उत्तर प्रदेश मात्र 6.9 फ़ीसद की सीएजीआर हासिल कर सका, जबकि इसी अवधि में पूरे देश में 7.4 फ़ीसद के हिसाब से विकास हुआ. प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी उत्तर प्रदेश 4.8 फ़ीसद सीएजीआर के साथ सबसे पीछे रहा.


सीसीटीवी कैमरे से घबराते क्यों हैं मंत्री
अखिलेश सरकार ने मंत्रियों के आवास पर सीसीटीवी कैमरे लगाने का फैसला किया, तो मंत्रियों में घबराहट फैल गई. कई मंत्रियों ने अपनी नाखुशी सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर दी. मुख्यमंत्री तो कैमरे लगवाने पर दृढ़ थे, लेकिन आख़िरकार कैमरे लगवाने का उत्साह ढीला पड़ गया. उल्लेखनीय है कि जबसे समाजवादी पार्टी की सरकार बनी है, तबसे विधायकों एवं मंत्रियों के बारे में तमाम शिकायतें सरकार से लेकर पार्टी तक पहुंच रही हैं. इस पर पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह अपनी नाराज़गी कई बार जाहिर कर चुके हैं. इसे देखते हुए अखिलेश यादव ने मंत्रियों के घरों पर भी सीसीटीवी कैमरे लगवाने का निर्णय किया. मंत्री इसे निजी जीवन में दखल बता रहे हैं.


मस्ती और उत्सव से विकास को सद्गति
काम-धाम छोड़कर मंत्रियों के उत्सव मनाने, मस्ती करने और विदेश घूमने के मामले अख़बारों में आ चुके हैं. मस्ती और फिजूलखर्ची का आलम यह है कि स्टडी टूर के नाम पर विदेश घूमने गए मंत्रियों ने एमस्टरडम के सात सितारा होटल में तीन लाख रुपये एक रात के किराए पर कमरे लिए थे. अखिलेश सरकार के 17 मंत्री एवं विधायक इंटरनेशनल स्टडी टूर के नाम पर विदेश तफरीह के लिए गए थे. 20 दिनों के स्टडी टूर में ब्रिटेन, यूएई, नीदरलैंड, ग्रीस एवं तुर्की के सैर-सपाटे की योजना थी. अखिलेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री आजम खान के नेतृत्व वाले इस प्रतिनिधि मंडल में राजा भैया, अंबिका चौधरी, शिवकांत ओझा एवं शिवकुमार बेरिया समेत कई मंत्री और विधायक शामिल थे. आलीशान सैफई महोत्सव में करोड़ों रुपये खर्च कर मस्ती करने में अखिलेश सरकार भी देश भर में नाम कमा चुकी है.


 
 

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