दो हज़ार दस ने हमें रंगों का विद्रूप रूप दिखाया. एक तरफ कॉमनवेल्थ में हुए घोटाले के आरोपी मुस्कराते दिखे, टूजी स्पेक्ट्रम के मुजरिम मुस्कराते सीबीआई के दफ्तर गए और मुस्कराते ही बाहर आए. दूसरी तऱफ मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले डॉ. विनायक सेन को अदालत ने उम्रक़ैद की सज़ा दे दी. अदालतें सबूत पर चलती हैं और सबूत पुलिस गढ़ती है. ऐसा कैसे हो सकता है कि जिसे पुलिस देशद्रोही मान रही है, उसके पक्ष में देश के बुद्धिजीवी, पत्रकार तथा विश्व के उन्नीस नोबेल पुरस्कार विजेता खड़े हो जाएं. आपको एक तथ्य बता दें, पंडित जवाहर लाल जी के खिला़फ, डॉ. लोहिया के खिला़फ, लोकनायक जय प्रकाश नारायण के खिला़फ, आज के केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई सदस्यों के खिला़फ तथा विपक्ष के अधिकांश नेताओं के खिला़फ धारा 120 और धारा 120 बी के अंतर्गत केस दर्ज हुए और इन्हें कुछ नहीं हुआ. ये धाराएं अंग्रेजों ने बनाई थीं. आज तक इनका इस्तेमाल हो रहा है. राजनैतिक आंदोलनों में जो भी लोग जेल जाते हैं, पुलिस शांति भंग के साथ इन धाराओं को भी लगा देती है. ये धाराएं देशद्रोह की धाराएं हैं.

बीते साल ने अच्छी यादें कम और बुरी यादें ज़्यादा दी हैं. अच्छी बात केवल एक रही, बिहार में जनता का फैसला, जिसने धर्म और जाति के परे जाकर निर्णय दिया और स़िर्फ बातें करने वालों को नकार दिया. आशा इस बात की करनी चाहिए कि बिहार जैसा फैसला बाकी प्रदेशों की जनता भी लेगी. क्या दो हज़ार ग्यारह में आशा की जाए कि देश को कुछ ऐसी उपलब्धि होगी, जिसका फायदा ग़रीब, किसान, दलित, अल्पसंख्यक तथा उन सबको होगा, जो देश में लोकतंत्र चाहते हैं.

इन धाराओं का जिन पर इस्तेमाल हुआ है, उनमें प्रकाश सिंह बादल, नीतीश कुमार, लालू यादव, रामविलास पासवान, शरद यादव, अटल बिहारी वाजपेयी तथा लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग शामिल हैं. ये धाराएं जैसे लगती हैं, वैसे ही वापस होती हैं. लेकिन विनायक सेन के साथ ऐसा नहीं हुआ. छत्तीसगढ़ में ग़रीबी है, बेकारी है तो इनके खिला़फ गुस्सा भी है. नक्सलवादी वहां हैं, उनकी संख्या बढ़ रही है. नक्सलवादियों के नाम पर बहुत से निर्दोषों को भी पुलिस सताती है. निर्दोषों के पक्ष की आवाज़ उठाना आजकल देशद्रोह हो गया है.
किसी भी तरह की आवाज़ क्यों उठे! सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले डराए जा रहे हैं, धमकाए जा रहे हैं. यहां तक कि मारे भी जा रहे हैं. संसद ने जनता के हाथ में ताक़त दी है, लेकिन जिनकी लूट खसोट पर आंच आ रही है, वे चाहते हैं कि कोई इस क़ानून का इस्तेमाल न करे. सरकारी अधिकारी भी चाहते हैं कि या तो यह क़ानून बदल दिया जाए या इसकी ताक़त खत्म कर दी जाए. इसकी वे जी-जान से कोशिश कर रहे हैं और चाहते हैं कि राजनेता उनका साथ दें. वैसे यह दो हज़ार दस में नहीं हो पाया, दो हज़ार ग्यारह में भी नहीं हो पाएगा, कहा नहीं जा सकता.
दो हज़ार दस ने जनता के विश्वास को ध्वंस कर दिया. भारत के लोगों का विश्वास लोकतंत्र में है और लोकतंत्र के तीनों अंगों का चेहरा पिछले साल धुंधला गया. न्यायपालिका के ऊपर न्यायपालिका ने हमला किया. सुप्रीमकोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऊपर न केवल टिप्पणी की, बल्कि उस टिप्पणी को हटाने वाली याचिका भी खारिज कर दी. देश की अदालतों के बारे में लोगों के बीच क्या बातें होती हैं, इसे इनसे रिश्ता रखने वाले सभी जानते हैं. जजों के ऊपर रिटायर होने के बाद आरोप लग रहे हैं तथा सीबीआई अदालतों में जजों के ऊपर चार्जशीट दायर हुई.
संसद अब बुनियादी बहस या नए सपने को उतारने के लिए क़ानून बनाने वाला लोकतंत्र का मंदिर नहीं रहा. संसद सदस्यों के पास न बहस के विषय हैं और न तर्क. अगर मीडिया विषय न दे तो शायद जितना कोरम संसद में रहता है, उतना भी न हो. इतिहास में पहली बार संसद नहीं चली. विपक्ष और सरकार ने ऐसा मान लिया, मानों वे सर्वशक्तिमान हैं. शायद हैं भी, जब तक जनता उन्हें मानती है, तभी तक. कार्यपालिका के साथ मीडिया ने भी दो हज़ार दस में साख खोई. एक मछली सारे तालाब को गंदा कर सकती है, यह कहावत एक बार फिर सही साबित हुई. कुछ बड़े पत्रकार नीरा राडिया के साथ मंत्री बनाने के खेल में पकड़े गए. कई पत्रकार बड़े संपर्क अधिकारी जैसा काम करते हैं. और अब कहने वाले कहने लगे हैं कि पत्रकारों को साथ लो, अच्छे दलाल बन सकते हैं.
राहुल गांधी कांग्रेस की आज आशा भी हैं और भविष्य भी. इसलिए कांग्रेस न बिहार को याद रखना चाहती है और न बंगाल, आसाम, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश और गुजरात के लिए कोई योजना ही बनाना चाहती है. दो हज़ार दस में फुसफुसाहट थी, पर दो हज़ार ग्यारह में खुलकर मांग होगी कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए. कांग्रेस का एक वर्ग है, जो दो हज़ार चौदह का इंतजार नहीं करना चाहता. दो हज़ार दस में भाजपा में जहां सार्थक विपक्ष बनने की इच्छा खत्म होती लगी, वहीं नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी भाजपा के नए ट्रेंड सेटर बनकर उभरे. भाजपा में अनुशासनहीनता का खुलकर प्रदर्शन हुआ. पूरी भाजपा चाहती थी कि येदुरप्पा इस्ती़फा दें, पर उन्होंने पूरे नेतृत्व को नचा दिया. इससे पहले केंद्रीय नेतृत्व के महत्वपूर्ण लोगों के न चाहने के बाद भी अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने. विपक्षी दल की जगह भाजपा रीति-नीति में कांग्रेस से होड़ लेती दिखाई दी.
बीते साल ने अच्छी यादें कम और बुरी यादें ज़्यादा दी हैं. अच्छी बात केवल एक रही, बिहार में जनता का फैसला, जिसने धर्म और जाति के परे जाकर निर्णय दिया और स़िर्फ बातें करने वालों को नकार दिया. आशा इस बात की करनी चाहिए कि बिहार जैसा फैसला बाकी प्रदेशों की जनता भी लेगी. जनता के नज़रिए से दो हज़ार दस किसानों की आत्महत्या के लिए भी जाना जाएगा. क्या दो हज़ार ग्यारह में आशा की जाए कि देश को कुछ ऐसी उपलब्धि होगी, जिसका फायदा ग़रीब, किसान, दलित, अल्पसंख्यक तथा उन सबको होगा, जो देश में लोकतंत्र चाहते हैं. आइए नए साल का इसी आशा के साथ बाहें फैलाकर स्वागत करें.

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