35 वर्ष से कम उम्र की 65 फीसदी आबादी वाले देश में अगर डेढ़ दशक में ढाई लाख से ज्यादा नौजवान बेरोजगारी या नौकरियों से जुड़ी परेशानियों के कारण आत्महत्या कर लें, तो यह युवा भारत के लिए बड़ी चिंता की बात है. नौजवानों की सक्रिय और सकारात्मक भागीदारी के बिना क्या भारत ‘न्यू इंडिया’ बन पाएगा?

new-indiaबिहार के सुपौल जिले का निर्मली प्रखंड हर साल कोसी का कहर झेलता है, लेकिन इसके एक अत्यंत पिछड़े गांव में इस साल के बाढ़ के बीच भी लड्‌डू बंटे थे, कारण था गांव के एक लड़के का एसएससी-सीजीएल में सेलेक्शन. उस गांव के लोगों ने तब तक कर्मचारी चयन आयोग या संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा के बारे में सुना भी नहीं था. लेकिन बाढ़ के बीच आई वो खुशी शायद बाढ़ के साथ ही चली गई. अगर ऐसा न होता, तो उस परिणाम के बाद गांव में ‘अफसर’ के नाम से जाना जाने वाला लड़का आज नोएडा के एक कॉल सेंटर में काम नहीं कर रहा होता.

लेकिन उस परिणाम के बाद से नोएडा तक का उस लड़के का सफ़र मौत के मुंह से होकर गुजरा है, वो भी किसी आकस्मिक हादसे से नहीं, बल्कि आत्महत्या की कोशिश से. नाम और पहचान गुमनाम रखने की शर्त पर वो नौजवान बताता है, ‘बीते 6 महीनों में अब तक की मेरी जिन्दगी के सबसे बुरे दौर गुजरे हैं. एसएससी-सीजीएल में चयन की जो खुशी मिली, उससे अब तक नौकरी नहीं मिल सकी और जो गम मिला, उससे हमेशा के लिए सर से पिता का साया छीन गया. पिता बीमार रहते थे, सोचा था नौकरी लगेगी तो इलाज कराउंगा, लेकिन चयन के बाद भी अब तक नौकरी नहीं मिल सकी और बीमार पिता पिछली बरसात में जो बिस्तर पर पड़े, तो फिर उठ न सके. मेरे सर पर दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी है, हमारे पास कुछ जमीन भी है लेकिन उसकी उपज हर साल बाढ़ की भेंट चढ़ जाती है.

पारिवारिक परिस्थितियों से तंग आकर एक बार आत्महत्या की कोशिश की, लेकिन बच गया.’ वो नौजवान तो बच गया, लेकिन सभी लोग नहीं बच पाते, न तो आत्महत्या की कोशिश से और न ही बेरोजगारी की विभीषिका से. 29 दिसंबर 2017 को मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ के बारगोला खिरक निवासी 28 वर्षीय धनीराम ने फांसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली, वो नौकरी न मिलने से परेशान था. पिछले ही साल सितम्बर महीने में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर के थरियांव गांव में एक युवक ने गरीबी और बेरोजगारी से तंग आकर फांसी लगा ली थी. हंसवा गांव का लक्ष्मीकांत अपने बड़े भाई के साथ नौकरी की तलाश में दिल्ली गया था, लेकिन वहां काम नहीं मिल सका और निराश-हताश लक्ष्मीकांत ने मौत को गले लगा लिया. सितम्बर महीने में ही पंजाब के बटाला जिलान्तर्गत गोमन निवासी कुलविंदर कौर ने नौकरी की कोशिशों में मिली बार-बार की असफलता से तंग आकर फांसी लगा ली थी.

ऐसा भी नहीं है कि नौकरी की तलाश करते हुए थककर जान देने को मजबूर युवाओं में सिर्फ अकुशल लोग ही हैं, प्रशिक्षण प्राप्त डिग्री धारी युवा भी नौकरी के अभाव में जान दे रहे हैं. पिछले साल जून महीने में मध्य प्रदेश के रीवा से एक एमबीए के छात्र की आत्महत्या की खबर आई थी. 30 वर्षीय रामनिवास एमबीए की डिग्री लिए नौकरी की तलाश में खूब भटका, लेकिन अंततः हताश होकर फांसी लगा लिया. वहीं अप्रैल 2017 में मैनेजमेंट के एक छात्र 24 वर्षीय अर्जुन भारद्वाज ने मुंबई के एक होटल की 19वीं मंजिल से कूद कर जान दे दी थी, वो परीक्षा में असफल होने के कारण निराश था. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जहां नौकरी न मिलने या परीक्षा में असफल होने के कारण नौजवान आत्महत्या का रास्ता अपना रहे हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में पिछले 16 वर्ष से हर दिन करीब 26 नौजवान बेरोजगारी के कारण मौत को गले लगा रहे हैं, वहीं पढ़ाई की मुश्किलों के कारण हर दिन लगभग 17 छात्र ख़ुदकुशी कर रहे हैं.

सरकार की स्वीकारोक्ति

सरकार की तरफ से भी छात्रों-बेरोजगारों की आत्महत्या को लेकर आंकड़े जारी किए गए हैं. 7 जनवरी 2018 को गृह मंत्रालय ने बीते 3 वर्ष में छात्रों की आत्महत्या को लेकर एक रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014-16 के बीच 26,476 छात्रों ने खुदकुशी कर ली. गृह मंत्रालय की यह रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश में हर घण्टे एक छात्र खुदकुशी कर रहा है. यह भी गौर करने वाली बात है कि छात्र खुदकुशी की सबसे ज्यादा घटनाएं महाराष्ट्र में सामने आई हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने भी पिछले साल 2000-15 के बीच छात्र-बेरोजगार खुदकुशी को लेकर एक विस्तृत आंकड़ा जारी किया था. इस रिपोर्ट के आंकड़े भयावह है. इसमें बताया गया है कि 2000-15 के बीच 1,54,751 बेरोजगारों ने मौत को गले लगा लिया, वहीं इस दौरान 2,59,849 छात्रों ने आत्महत्या की.

इन दोनों आंकड़ों का औसत देखें, तो भारत में हर आधे घंटे में एक छात्र-बेरोजगार खुदकुशी करता है. केवल 2015 में 10,912 बेरोजगारों और 8934 छात्रों ने खुदकुशी की, वहीं 2014 में यह आंकड़ा 9918 और 8068 था. छात्र-बेरोजगार आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र पहले नम्बर पर है, इसके बाद तमिलनाडु का स्थान आता है. बीते कुछ सालों के दौरान जिस राज्य में छात्र-बेरोजगार आत्महत्या के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं, वो सिक्किम है. बेरोजगारी दर के मामले में सिक्किम का स्थान देश में दूसरा है. शायद यही कारण भी है कि यहां होने वाली आत्महत्याओं में से 27 फीसदी का संबंध बेरोजगारी से है और खुदकुशी करने वालों की औसत उम्र 21-30 साल है.

नौकरियों के निराशाजनक आंकड़े

2017 में खबर आई थी कि सरकार ने 2,80,000 नौकरियों के लिए बजट का प्रावधान किया है. सरकार की तरफ से इसे ‘नौकरियों की बाढ़’ कहा गया था. आयकर विभाग में सबसे ज्यादा नौकरियां देने की बात कही गई थी. बताया गया था कि इस विभाग में नौकरियों की संख्या 46,000 से बढ़ाकर 80,000 की जाएगी. वहीं उत्पाद शुल्क विभाग में भी 41,000 नई भर्तियों की बात कही गई थी. लेकिन 2017 के बीत जाने के बाद भी अब तक ‘नौकरियों की वो बाढ़’ कहीं नजर नहीं आ रही है. बीते दिनों खबर आई थी कि सरकार 2018-19 के बजट में बेरोजगारों के अच्छे दिन लाने के लिए कई प्रवधान करेगी, लेकिन ऐसे में यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि बीते सालों के बजट में नौकरियों के लिए जो प्रावधान किए गए क्या वो धरातल पर उतर पाए हैं. ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस समस्या की वस्तुस्थिति से अवगत नहीं है. 2017-18 के बजट सत्र में ही केंद्रीय योजना राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने आंकड़ों के जरिए सदन को बताया था कि देश की बेरोजगारी दर में इजाफा हो रहा है.

6 फरवरी को राज्यसभा में पूरक सवालों का जवाब देते हुए राव इंद्रजीत सिंह ने जानकारी दी थी कि वर्तमान समय में बेराजगारी दर 5 फीसदी को पार कर रही है, जबकि अनुसूचित जाति के बीच यह दर सामान्य से ज्यादा, 5.2 फीसदी है, जो 2011 में 3.1 फीसदी थी. मंत्री जी ने ही बताया था कि जो बेरोजगारी दर आज 5 फीसदी है, वो 2013 में 4.9 फीसदी, 2012 में 4.7 फीसदी और 2011 में 3.8 फीसदी थी. यह भी सरकार के द्वारा ही संसद में बताया गया था कि 2013 की तुलना में 2015 में केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 89 प्रतिशत तक की कमी आई गई. साल 2013 में केंद्र द्वारा की गई सीधी भर्तियों में 1,54,841 लोगों को रोजगार मिला था, जो 2014 में घटकर 1,26,261 रह गया. 2015 में सरकार महज 1 लाख 35 हजार लोगों को नौकरी दे सकी, जबकि 2014 में यह आंकड़ा 4 लाख 21 हजार और 2013 में 4 लाख 19 हजार था.

आगे भी अंधेरा…

नौकरी और पढ़ाई, यही दोनों क्षेत्र हैं, जिनकी चुनौतियां युवाओं को आत्महत्या के लिए विवश कर रही हैं. आने वाले समय में भी यह समस्या दूर होती नहीं दिख रही है. नौकरी की चुनौती को हम इससे समझ सकते हैं कि 2018 के पहले हफ्ते में बेरोजगारी दर 5.7 प्रतिशत रही, जो पिछले 12 महीनों में सबसे अधिक है. वहीं पढ़ाई की बात करें, तो देश में उच्च शिक्षा की हालत बिहार के एक विश्वविद्यालय से समझी जा सकती है, जहां 2016 में स्नातक में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थी अब तक प्रथम वर्ष की परीक्षा भी नहीं दे सके हैं. ऐसा भी नहीं है कि नौकरी की समस्या किसी एक आंकड़े और पढ़ाई की परेशानी किसी एक विश्वविद्यालय तक सीमित है. हाल के वर्षों में आने वाले तमाम आंकड़े बेरोजगारी की राह पर बढ़ते भारत की तस्वीर ही पेश करते हैं. देश में नए निवेश का प्रस्ताव गिरकर 8 ख़रब डॉलर पर आ गया है, जो दो साल पहले 15 ख़बर डॉलर हुआ करता था. यह आंकड़ा भी नई नौकरियों के सृजन में बाधक है. सेंटर फॉर मॉनिटरींग इंडियन इकॉनोमी का आकलन है कि 2017 में पिछले सालों की तुलना में नौकरी में मात्र 0.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

भारत जैसे देश में, जहां प्रति वर्ष लगभग एक करोड़ नए युवा नौकरी के लिए बाजार में उतर जाते हैं, वहां 0.5 प्रतिशत की वृद्धि ऊंट के मुंह में जीरा के समान है. सीएमआईई के इस आकलन में यह भी कहा गया है कि बीते साल शहरी रोज़गार में 2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि ग्रामीण रोज़गार में 0.3 प्रतिशत की गिरावट आ गई. एक तरफ हताश और निराश युवा आत्महत्या की राह पर बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत की श्रम भागीदारी घटती जा रही है, यानि देश में सक्रिय श्रम संसाधन की कमी होती जा रही है. श्रम भागीदारी का जो आंकड़ा 2016 में 46.6 प्रतिशत था, वो 2017 में घटकर 43.9 हो गया, जबकि श्रम भागीदारी का वैश्विक औसत 63 है.

इस आंकड़े को हम पढ़ाई या प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे युवाओं की दशा से जोड़कर देख सकते हैं. हमारे देश में सरकार के स्तर पर चलाए जा रहे शैक्षिक संस्थानों की दशा तो पहले से ही डंवाडोल है और उसमें सुधार की भी गुंजाइश नजर नहीं आ रही, दूसरी तरफ निजी संस्थानों की गलाकाट प्रतियोगिता में बहुत से छात्र खुद को ढाल नहीं पाते. यही कारण भी है कि इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए जाना जाने वाला कोटा छात्र आत्महत्या के लिए भी सुर्खियों में रहता है. भारत की शैक्षिक व्यवस्था के पास ऐसा कोई रोडमैप नहीं है, जिससे भावी समय की मांग के अनुसार युवाओं को तैयार किया जा सके.

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