भाजपा को अब भी शहर के लोग वोट देते हैं. गांव के लोग इसलिए वोट नहीं देते, क्योंकि किसानों को भाजपा ने त्रस्त कर दिया. भाजपा ने वादा किया था कि हम किसानों की आमदनी दोगुनी कर देंगे, जो लागत होगी, उससे डेढ़ गुना एमएसपी दाम मिलेगा. फिर वही बात है कि डेढ़ गुणा दाम देने की सरकार की क्षमता ही नहीं है. सरकार के पास उतने पैसे ही नहीं हैं. अब कह रहे हैं कि छह साल में आमदनी दोगुनी कर देंगे. वह भी संभव नहीं है, क्योंकि जमीन की उत्पादकता तो डबल हो नहीं सकती. मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ानी है, वो सरकार बढ़ाती नहीं है, तो फिर छलावा. गुजरात के किसानों ने भाजपा को संकेत दे दिया है कि हम भाजपा के खिलाफ हैं. हां इसमें ये बात याद रखनी चाहिए कि अगर कोई ये समझे कि राहुल गांधी इलेक्शन जीत गए हैं, तो ये गलत बात है. भाजपा से हताश होकर, मोदी से रुष्ट होकर लोगों ने भाजपा के खिलाफ वोट दिया है. उसका फायदा कांग्रेस को हुआ है, क्योंकि वही पार्टी वहां थी. वहां मल्टीपार्टी नहीं है. यूपी नहीं है कि वहां समाजवादी पार्टी भी है, मायावती भी हैं, चार पार्टियां हैं. गुजरात में तो बस दो ही पार्टी है. जिसे भाजपा वाले पप्पू बोलते थे, गालियां देते थे, परिवादवाद बोलते थे, अचानक पता चला कि वही आदमी 2019 में प्रधानमंत्री पद के लिए टक्कर दे सकता है. राजनीति को हल्के तरीके से लेना उचित नहीं, ये किसी का व्यक्तिगत व्यापार नहीं है. विडंबना देखिए, कांग्रेस को भाजपा वाले कहते हैं कि वे परिवारवाद चला रहे हैं. भाजपा तो पूरे देश को समझती है कि ये हिन्दुओं का परिवार है, जबकि ऐसा है नहीं. हिन्दू भाजपा के साथ नहीं हैं.

भाजपा के साथ 18 प्रतिशत लोग हैं. जिनके दिमाग में भाजपा ने ये भर रखा है कि हमलोग हिन्दू हैं, मुसलमान खराब लोग हैं, चार-चार शादियां करते हैं, ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं. एक दिन मुसलमान हमसे ज्यादा हो जाएंगे, तो फिर इस देश का क्या होगा? ये सब मिथ्या है. सब निराधार बातें हैं. प्रश्न यह है कि हिन्दू समाज इनके साथ है क्या, नहीं है. राहुल गांधी को ये बात समझ में आ गई. यह जनभावना होती है कि हमारे इलाके में सोमनाथ का मंदिर है, मान्यता है, तो वहां जाना चाहिए. यही सोचकर राहुल सोमनाथ मंदिर गए. उस पर भी लोग हंसे, हंसिए नहीं. भाजपा का तो एक ही मुद्दा है, मंदिर मस्जिद. लेकिन मंदिर पर किसी का एकाधिकार तो नहीं है. राहुल सोमनाथ गए, तो उनसे सवाल क्या पूछे गए? वो उस सोमनाथ मंदिर में कैसे गए, जवाहरलाल नेहरू जिसके पुनर्निर्माण के खिलाफ थे. ये एक नई बात थी. किसी के दादा जी किसी बात के खिलाफ हों, तो क्या उसके पोते के अधिकार खत्म हो जाते हैं? एक आदमी मंदिर क्यों जाता है? एक तो व्यक्तिगत आस्था और दूसरा जब चुनाव में कोई खड़ा होता है, तब मंदिर जाना पड़ता है. कोई नेता मंदिर नहीं भी जाता है, तब भी चुनाव के वक्त जाना पड़ता है, जनता को ये विश्वास दिलाने के लिए कि हम नास्तिक नहीं हैं, हम आस्तिक हैं.

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