ayodhyaसभी आधुनिक राज्यों में किसी-न किसी प्रकार का सीमाकारी कानून (लॉ ऑफ लिमिटेशन) होता है. इसके बिना मुकदमेबाजी पर कोई रोक नहीं रहेगी, पुराने जख्म बार-बार हरे होंगे, समाज में भयंकर क्षोभ पैदा होगा और व्यवस्थित राज्य का रख-रखाव असंभव हो जाएगा. सीमाकारी कानून बहुत पुराने दावों और उन पर आधारित मुकदमों को बार-बार उठाने को रोकता है क्योंकि ये मुकदमे कटुता पैदा करते हैं और सार्वजनिक शांति को भंग करते हैं. इसीलिए सीमाकारी कानून को शांति और सुस्थिरता का कानून कहा जाता है. यह लोकनीति का अनिवार्य तत्व माना जाता है.

सीमाकारी कानून

दुनिया में शायद ही कोई बड़ा देश होगा जिसने अपने अतीत में बाहरी हमलों, आंतरिक क्रांतियों और शासन के उग्र परिवर्तनों का सामना न किया हो. इस प्रकार की प्रत्येक उथल-पुथल के बाद चल और अचल संपत्ति का स्वामित्व बदलता रहा है. सीमाकारी कानून के अभाव में सभ्य शासन-व्यवस्था को बनाए रखना असंभव होगा. अगर हमलावर भिन्न धर्म को मानने वाला हुआ या आंतरिक उथल-पुथल में धार्मिक परिवर्तन भी हुए तो धार्मिक संपत्ति का प्रभावित होना भी निश्चित होता है.

जब अरब सेनाओं ने स्पेन पर अधिकार किया और वहां अपना शासन स्थापित किया तो ईसाई गिरजों को मस्जिदों में परिवर्तित किया गया. जब कैथलिक स्पेनियों ने अरब-नियंत्रित हिस्सों पर दोबारा कब्जा किया तो मस्जिदों को फिर गिरजों में बदला गया.

भारत में भी यह निर्विवाद तथ्य है कि यहां धार्मिक क्रांतियां हुईं, जैसे बौद्ध धर्म का उत्थान और पतन और हिंदू धर्म का पुनरुत्थान आदि. सबसे बड़े परिवर्तन अरब और तुर्की हमलों के फलस्वरूप हुए. बड़ी संख्या में बौद्ध, जैन और हिंदू मंदिरों को नष्ट किया गया. मंदिरों से संबंधित संपत्ति  को जब्त किया गया और उनकी जगह मस्जिदें बनाई गईं.

यदि धर्मशास्त्रियों और धार्मिक कट्‌टरपंथियों का यह तर्क मान लिया जाता है कि मंदिरों, मस्जिदों और गिरजों आदि का प्रतिकूल स्वामित्व हो ही नहीं सकता और ये पूजा-स्थल तथा इनसे जुड़ी संपत्ति पहले की तरह मंदिर, मस्जिद या गिरजे के रूप में ही बनी रहेगी, चाहे वे टूटी-फूटी स्थिति में हों, नष्ट किए गए हों या उन पर निर्माण हुआ हो तथा इस भूमि के साथ किसी प्रकार की कोई बाध्यकारी परंपरा है, जिसे किसी भी हालत में छोड़ा नहीं जा सकता, तो यह निश्चित ही विपत्ति का कारण होगा. उच्च न्यायालयों ने इस तरह की मान्यता को स्वीकार नहीं किया है.

बेतुकी मान्यता

यह मान्यता ही इतनी बेतुकी है कि यदि इसे सामान्य सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया गया- जैसा कि कुछ मुसलमान और हिंदू मांग कर रहे हैं-कि एक दफा ईश्वर या खुदा को समर्पित संपत्ति हमेशा के लिए और हर स्थिति में अपना मूल विशिष्ट धार्मिक स्वरूप बनाए रखेगी या उस संपत्ति के स्वामी का फर्ज है कि वह उसके मूल धार्मिक स्वरूप को बनाए रखे तो यह कानून-व्यवस्था बनाए रखने की दृष्टि से बिल्कुल हानिकारक होगा.

अगर इस मान्यता को स्वीकार किया गया तो यह ईश्वर को समर्पित सभी प्रकार की संपत्तियों पर लागू होगी. यह नियम हिंदू मंदिरों पर भी लागू होगा. इससे एक अजीब और खतरनाक स्थिति पैदा होगी. जहां मुसलमानों ने ईश्वर को समर्पित हिंदू मंदिरों को अपने कब्जे में लिया, उन्हें गिरा कर उन स्थानों पर मस्जिदें बनाईं, वहां मुसलमानों का यह फर्ज माना जाएगा कि वे उस भूमि का वह पवित्र स्वरूप बनाए रखें जो हिंदुओं की नजर में उनका है.

जैसा कि एक अंग्रेज जज ने कहा था कि इस सामान्य नियम को स्वीकार किया गया तो एक ही जगह पर एक ही समय तीन तरह की पूजा होने लगेगी और यह कूनन व्यवस्था को बनाए रखने के खिलाफ बात होगी. यह स्पष्ट है कि यह बात सामान्य नियम के तौर पर स्थापित हो गई कि ईश्वर को समर्पित भूमि का प्रतिकूल स्वामित्व नहीं हो सकता और सीमाकारी कानून लागू नहीं होगा तो फिर इस देश में हिंदू मंदिर के स्थान पर बनी कोई भी मस्जिद ऐसी नहीं होगी जिसे अब हिंदू वापस नहीं ले सकते.

विश्व हिंदू परिषद और संघ परिवार की अन्य संस्थाओं ने मुस्लिम कट्‌टरपंथियों के तर्कों को अपना कर न केवल मथुरा और बनारस के दो मुस्लिम धार्मिक स्थानों पर कब्जा करने के अधिकार का दावा किया है, बल्कि 30000 अन्य पूजा-स्थलों पर अधिकार का भी दावा किया है. अगर इस कपोल-कल्पित दावे को व्यवहार में बदला गया तो स्थिर शासन अतीत की वस्तु बन जाएगी, जंगल का कानून लागू होगा और देश अराजकता की स्थिति में चला जाएगा.

संसद द्वारा बनाया गया कानून

संसद ने यथास्थिति बनाए रखने तथा हिंसा को रोकने के लिए पूजा-स्थलों का कानून बनाया है. यह कानून वस्तुतः अनावश्यक था. इसने उसी बात को दोहराया है जो सीमाकारी कानून मेंे कही गई है. इस अधिनियम के तहत पुराने दावों के आधार पर कब्जा लेने के सभी मुकदमों पर रोक लगी है और वर्तमान स्थिति को केवल नंगे बल-प्रयोग से ही बदला जा सकता है.

पूजा-स्थलों के नये कानून के अंतर्गत अयोध्या का विवाद नहीं आता. सुन्नी सेंट्रल बोर्ड ऑफ वक्फ ने बाबरी मस्जिद के प्रतिकूल कब्जे का जो मुकदमा दायर कर रखा है, वह नियमानुकूल है अथवा नहीं, इस बात का फैसला अदालत ही कर सकती है.

विश्व हिंदू परिषद के महासचिव अशोक सिंघल ने 1990 में जोर देकर कहा था कि वे बाबरी मस्जिद भूमि का वह 80 फुट लंबा 40 फुट चौड़ा टुकड़ा चाहते हैं, जो रामजन्म स्थान है. उन्होंने कहा था कि इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता. यह भूमि इस समय विहिप के लोगों के पास है. 1990 के बाद विहिप की भूख बढ़ गई है.

अदालत से बाहर का समाधान

अगर इस विवाद को अदालत से बाहर हल करना है तो इसका तरीका इस प्रकार होगा-

मुस्लिम संस्थाएं बाबरी मस्जिद के एक हिस्से को, जिसमें केंद्रीय गुम्बद है और जिसमें मूर्तियां रखी गई हैं, हिंदुओं को स्वेच्छा से दे दें. इसके बदले में उन्हें पश्चिम की ओर मस्जिद से लगी भूमि दी जा सकती है और उस पर तीन नए गुम्बद बनाए जा सकते हैं, ताकि दोनों पूजा-स्थल अगल-बगल में बने रहें.

अथवा

मुसलमान उस जगह को बिल्कुल छोड़ दें और अयोध्या में किसी और जगह भूमि ले लें जहां नई मस्जिद बनाई जा सकती है. अगर जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद जैसे असंदिग्ध समभाव रखने वाले नेता मूर्तियों को नहीं हटवा सके तो मुसलमानों का यह सोचना समझदारी नहीं होगा कि वर्तमान छोटे कद के नेता यह काम कर सकेंगे.

अथवा

उच्चतम न्यायालय सारे मुकदमों की सुनवाई करे और फैसला दे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवाद के मुद्दे तैयार किए हैं. सभी मुद्दों को देने के बजाय यहां प्रमुख मुद्दों को संक्षेप में दिया जा रहा है.

प्रमुख मुद्दे

वाद सं. 1-बी (सी) : क्या इमारत का इस्तेमाल प्राचीन काल से मुसलमानों द्वारा नमाज के लिए किया जाता था? यदि किया जाता था तो इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

वाद सं. 2 : क्या वादी के पास 1949 तक इस संपत्ति का कब्जा रहा और जैसा कि शिकायत में कहा गया है, उसे 1949 में उस संपत्ति से वंचित किया गया?

वाद सं. 3 : क्या मुकदमा समय की सीमा में है?

वाद सं. 4 : क्या हिंदुओं को आमतौर पर और भगवान श्रीराम के भक्तों को खासतौर पर कानून में निर्धारित अवधि से अधिक समय तक उस स्थल को प्रतिकूल कब्जे में लगातार रखने के कारण, आदेश के तौर पर वहां पूजा का अधिकार मिल गया है जैसा कि प्रतिवादियों ने कहा है?

वाद सं. 11 (सी) : क्या विवादित इमारत के निर्माण से पूर्व उसका कोई भाग हिंदुओं द्वारा पूजा के काम में लाया जाता था? यदि इसका उत्तर सकारात्मक हो तो क्या विवादित स्थान पर इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार वहां कोई मस्जिद नहीं बन सकती थी? अगर मुस्लिम संस्थाएं और विश्व हिंदू परिषद मस्जिद के स्थान पर पहले मंदिर होने या न होने की जांच के आधार पर विवाद हल करना चाहें तो उच्चतम न्यायालय द्वारा तीन पुरातत्वविदों की एक समिति बनाई जाए जिसमें एक पुरातत्वविद् विश्व हिंदू परिषद, एक मुस्लिम संगठन और एक उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर सरकार नियुक्त करे और वहां खुदाई कराई जाए जिससे यह समिति अपनी सुविचारित राय बना सके. यदि पहले के ढांचे के कोई साक्ष्य न मिलें तो यह स्थल मुसलमानों को दे दिया जाए. यदि पहले के ढांचे का साक्ष्य मिल जाए तो मुसलमान यह स्थल हिंदुओं को सौंप दें तथा इसमें किसी भी तरह की धार्मिक बहस को न लाया जाए.

किसी से पूछने की जरूरत नहीं

किसी पक्ष से यह पूछने की जरूरत नहीं है कि उसे यह फैसला स्वीकार्य होगा अथवा नहीं. सबसे बड़ी अदालत में एक बार फैसला हो जाने के बाद इसे सख्ती से लागू किया जाए.

अदालत के फैसले का सरकार को पूरी ताकत के साथ समर्थन करना होगा. मैं यहां कहना चाहता हूं कि यह कानून या तकनीक का सवाल नहीं है. यह राजनैतिक इच्छा का सवाल है. क्या सत्ताधारियों में इन गैर-संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था की रक्षा करने की इच्छा-शक्ति है?

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