नेल्सन मंडेला अब हमारे बीच नहीं रहे. महात्मा गांधी के बाद वह एक मात्र व्यक्ति थे, जो मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के जीते-जागते अवतार थे. वे तक़रीबन 26-27 वर्षों तक दक्षिण अफ्रीका के रॉबेन आइलैंड में कैदी के तौर पर रहे. हम सभी को उन्हें सैल्यूट करना चाहिए. जब वे साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति बने तो वहां व्याप्त रंगभेद समाप्त हो गया था. वास्तव में गांधी और नेहरू जिन मुद्दों के साथ खड़े रहे, उनके बाद मंडेला ही थे जो उस परंपरा के थे.
नरेंद्र मोदी ने जम्मू में धारा 370 को लेकर एक वक्तव्य दिया कि इस बात को लेकर बहस होनी चाहिए कि धारा 370 कश्मीर की जनता के हित में है या नहीं. हमेशा की तरह इस मुद्दे पर भी भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल वास्तविकता से भटक गए. बीजेपी के नेता अरुण जेटली ने कहा कि धारा 370 असंवैधानिक है और इसने देश को नुकसान पहुंचाया है. जबकि कांग्रेस पार्टी इसे सही साबित कर रही है. वास्तव में होना तो यह चाहिए कि अगर धारा 370 को लेकर कोई भी बहस हो, तो वह कश्मीरियों के बीच होनी चाहिए. यह जम्मू और कश्मीर से जुड़ा हुआ मसला है, इसलिए मुंबई, त्रिवेंद्रम या चेन्नई में बैठे लोग इस बात पर बहस करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं कि कश्मीर में धारा 370 का लागू होना उचित है या अनुचित. कश्मीर का भारत में अभिगमन धारा 370 के आधार पर ही हुआ था, इस प्रावधान के साथ कि जब तक कश्मीर की जनता चाहेगी, वहां पर घारा 370 लागू रहेगी. अगर कश्मीर की जनता कहेगी कि अब वह नहीं चाहती कि राज्य में धारा 370 लागू रहे, तो कोई ज़बर्दस्ती इसे लागू नहीं कर सकता. हां, यह सही है कि इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा, लेकिन तभी जब इसकी पहल और इसका अनुमोदन जम्मू-कश्मीर की जनता करेगी. इस बिंदु से सभी भटक ही गए. भारतीय जनता पार्टी को तो यह भी अंदाज़ा नहीं है कि अगर इसमें कुछ छेड़छाड़ करेंगे, तो आप कश्मीर पर सभी नैतिक अधिकार खो देंगे और पाकिस्तान को आपके ऊपर हंसने का मौक़ा मिल जाएगा.
वास्तव में कश्मीर का मसला भारत और कश्मीर की जनता के बीच है. पाकिस्तान को इस मामले से कोई मतलब नहीं होना चाहिए, जबकि वह कश्मीर की जनता की बात करता है. पाकिस्तान कश्मीर पर कोई अधिकार नहीं दिखा सकता. नवाज शरीफ का एक चौंका देने वाला बयान पढ़ने में आया कि कश्मीर को लेकर भारत-पाकिस्तान में एक और जंग हो सकती है, हालांकि, बाद में उन्होंने इसका खंडन किया. मैं उम्मीद करता हूं कि उनका यह खंडन सही हो. उन्हें यह समझना चाहिए कि युद्ध ही आख़िरी विकल्प नहीं हो सकता. दोनों ही देशों के पास परमाणु हथियार हैं. एक विकल्प के रूप में युद्ध को हमेशा के लिए ख़त्म करना चाहिए. कश्मीर ऐसा मसला भी नहीं है जिस पर पाकिस्तान कोई कवायद करे. पाकिस्तान पहले ही कश्मीर पर धावा बोलकर और ग़ैर-क़ानूनी तरी़के से क्षेत्र के आधे हिस्से पर क़ब्ज़ा किए बैठा है. अगर कश्मीर की जनता स्वायत्त रहना चाहती है तो कश्मीर ही क्यों, हर कोई स्वायत्त रहने की बात करेगा. देश के अन्य हिस्सों में यह बातें चल रही हैं. राज्य और अधिक ताक़त चाहते हैं, नगरपालिकाएं और मज़बूती चाहती हैं, पंचायतें और अधिक ताक़तवर बनना चाहती हैं. समाजसेवी अन्ना हजारे ने भी एक प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत वे चाहते हैं कि ग्रामसभाओं को स्वतंत्र व और अधिक शक्तिशाली बनाया जाए. यह मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अधिक स्वंतत्रता चाहता है और चाहता है कि वह अपने फैसले ख़ुद करे. लेकिन धारा 370 के बारे में इस तरह से लापरवाही से बात करना देश की एकता और अखंडता को चोट पहुंचाएगा. इसे अभी और हमेशा के लिए समझने की ज़रूरत है.

संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है. ग़ौर करें तो समय सीमा के आधार पर यह सत्र बहुत छोटा है, जबकि इसमें कई सारे महत्वपूर्ण बिल पेश होने हैं. लेकिन मेरा अनुमान है कि यह सत्र भी हंगामों की भेंट चढ़ जाएगा. कई महत्वपूर्ण बिल लटके हुए हैं. कम से कम तेलंगाना और तोकपाल बिल इन दो को तो इस सत्र में पास होना ही चाहिए. इसके अलावा भी और कई महत्वपूर्ण बिल हैं, जिन्हें पास होना अभी बाक़ी है, लेकिन उन पर भी कोई एकमत नहीं बन पाया है. मुझे नहीं लगता कि यह सरकार प्रशासन को लेकर, संसद को लेकर या किसी भी चीज़ को लेकर गंभीर भी है.  

संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है. ग़ौर करें तो समय सीमा के आधार पर यह सत्र बहुत छोटा है, जबकि इसमें कई सारे
महत्वपूर्ण बिल पेश होने हैं. लेकिन मेरा अनुमान है कि यह सत्र भी हंगामों की भेंट चढ़ जाएगा. कई महत्वपूर्ण बिल लटके हुए हैं. कम से कम तेलंगाना और लोकपाल बिल, इन दो को तो इस सत्र में पास होना ही चाहिए. इसके अलावा भी और कई महत्वपूर्ण बिल हैं, जिन्हें पास होना अभी बाक़ी है, लेकिन उन पर भी कोई एकमत नहीं बन पाया है. मुझे नहीं लगता कि यह सरकार प्रशासन को लेकर, संसद को लेकर या किसी भी चीज़ को लेकर गंभीर भी है. यह दुखद स्थिति है. सरकार को चाहिए कि वह जागे और इसे एक बेहतर संसद सत्र बनाए. एक प्रस्ताव यह भी है कि क्रिसमस की छुट्टियों के बाद सत्र की समय सीमा बढ़ा दी जाए. इसे एक अच्छा विचार कहा जा सकता है. क्रिसमस के दो-तीन दिनों बाद फिर से सत्र की शुरुआत हो सकती है. नया साल कोई भारतीय उत्सव तो है नहीं, साथ ही भारत में नए साल की छुट्टी भी नहीं होती. इस तरह से संसद का सत्र जनवरी के पहले सप्ताह तक बढ़ाया जा सकता है और यह कोशिश करनी चाहिए कि जितने अधिक से अधिक मसले हल हो सकें, उन्हें निपटाया जाए.
नेल्सन मंडेला अब हमारे बीच नहीं रहे. महात्मा गांधी के बाद वह एकमात्र व्यक्ति थे, जो मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के जीते-जागते अवतार थे. वे तक़रीबन 26-27 वर्षों तक दक्षिण अफ्रीका के रॉबेन आइलैंड में कैदी के तौर पर रहे. हम सभी को उन्हें सैल्यूट करना चाहिए. जब वे साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति बने तो वहां व्याप्त रंगभेद समाप्त हो गया था. वास्तव में गांधी और नेहरू जिन मुद्दों के साथ खड़े रहे, उनके बाद मंडेला ही थे, जो उस परंपरा के थे. सरकार को चाहिए कि उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए एक वरिष्ठ प्रतिनिधि मंडल वहां भेजे. मैं नहीं जानता कि सरकार इस बारे में क्या सोच रही है और अगर देश के मौजूदा मन को नहीं समझ पा रही है, तो मुझे नहीं लगता कि किसी भी मुद्दे से गंभीरता से निपट पाएंगे. ऐसे मौ़के बार-बार नहीं आते, इसलिए सरकार को इस अवसर पर आगे आना चाहिए. ईश्‍वर ही जाने कि कब हमें नेल्सन मंडेला मिलेंगे. न जाने फिर कब ऐसा अवसर मिले. लेकिन फ़िलहाल इस दौर में भारत को अपनी सही भूमिका निभानी होगी. बेशक, हमने उन्हें भारत रत्न से नवाजा है और उनको पहचाना है, और अब मौक़ा है कि उनके जाने के बाद हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दें.

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