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व्यापमं घोटाले की जांच अंततः सीबीआई से कराने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दे ही दिया. इसके पहले इस मामले की जांच सीबीआई से कराए जाने के संबंध में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जबलपुर हाईकोर्ट में की थी, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने की वजह से हाईकोर्ट ने इस विषय में कोई निर्णय नहीं लिया. सीबीआई जांच के आदेश के बाद बात यहां आकर अटक गई है कि क्या सीबीआई इस मामले की तह तक पहुंच पाएगी? क्या सीबीआई उस मामले का पर्दाफाश कर पाएगी, जिसमें 2500 लोग आरोपी हैं और 500 लोग फरार हैं? क्या छह साल से व्यापमं में हो रही धांधली के अब तक एकत्र सबूतों के आधार पर सीबीआई मामले के मास्टरमाइंड और रसूखदार लोगों को सलाखों के पीछे पहुंचा पायेगी? क्या उनके खिलाफ वह नए और पुख्ता सबूत जुटा पायेगी? क्या सीबीआई इस मामले से जुड़े 47 लोगों की मौत की अबूझ पहेली को सुलझा पाएगी? क्या इसके बाद मामले से जुड़े लोगों की मौतों का सिलसिला बंद हो जाएगा? इन सवालों के जवाब ढूंढना बेहद जरूरी है.

चौथी दुनिया के हाथ जो दस्तावेज लगे हैं, उनसे साफ तौर पर जाहिर होता है कि मामले में सबूतों की लीपा-पोती करने में मध्य प्रदेश पुलिस के अधिकारियों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. जो इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस इस मामले में अहम साबित हो सकते थे, उन सबूतों को मिटाने या उनमें छेड़छाड़ करके मामले को भटकाने की पुरजोर कोशिश की गई है. जिस तरह सोची-समझी योजना के तहत इस पूरे घोटाले को अंजाम दिया गया, उससे कंप्यूटर से प्राप्त डेटा और लोगों की फोन पर आपसी बातचीत जैसे बहुत से तकनीकी सबूतों पर आकर शक की सूई टिक जाती है. इस संबंध में न ही हर प्रदेश में जांच की व्यवस्था है और न ही पुलिस महकमों के पास ऐसी टीम है, जो इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को एकत्र करने, उनकी जांच करने और उनके रखरखाव को लेकर प्रशिक्षित हो. ऐसा ही कुछ मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले में भी हुआ है. तकनीकी विशेषज्ञों की कमी और पुलिस महकमे की कम जानकारी की वजह से नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर से प्राप्त एक्सएल सीट विवादों में बनी हुई है. कांग्रेस उस एक्सएल सीट को सही बता रही है तो भाजपा गलत. सवाल यह है कि आखिर इस सच को जाने बगैर सही-गलत का पता कैसे लगाया जा सकता है.

7 जुलाई, 2013 को इंदौर के राजेंद्र नगर थाने में पीएमटी की परीक्षा में स्कोररों के शामिल होने की खबर मिलने के बाद जब पुलिस ने उन लोगों को गिरफ्तार किया तो कई बड़े नामों का खुलासा हुआ. व्यापमं के परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी और व्यापमं के सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा के नामों के खुलासे के बाद इंदौर के राजेंद्र नगर थाने की पुलिस टीम ने 18 जुलाई, 2013 को शाम 16ः30 मिनट पर व्यावसायिक परीक्षा मंडल के भोपाल कार्यालय से आरोपी नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर की हार्ड डिस्क सीज की, लेकिन हार्ड डिस्क सीज करते वक्त सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस का पालन नहीं किया गया. न ही हार्ड डिस्क के डेटा को जब्त करते वक्तसीज किया गया, न ही डेटा की पहचान की गई और न ही सीलिंग में डिजिटल सिग्नेचर का उपयोग किया गया. इन वजहों से इन दस्तावेजों की सबूतों के रूप में वैल्यू खत्म हो जाती है, जो कि आरोपियों के बच निकलने में अहम साबित हो जायेंगे. इसके साथ ही हार्ड डिस्क को सीज करते वक्त दस्तावेज में इलेक्ट्रॉनिक्स एविडेंस एक्ट या आईटी एक्ट की किसी भी धारा का जिक्र नहीं किया गया था. हार्ड डिस्क को साल 2012 में निर्मित बताया गया है, जबकि जांच एजेंसी ने जांच के दौरान साल 2012 से पहले का डेटा भी उस कंप्यूटर से रिकवर करने का दावा किया है. इससे सारी की सारी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाते हैं.

इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सीज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइंस जारी की है. ऐसा न किए जाने की वजह से सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की पूरी संभावना है. ऐसी शंका होती है कि हार्ड डिस्क से प्राप्त दस्तावेजों में बदलाव किया गया है और मुख्यमंत्री को बचाने की कोशिश की गई है. 18 जुलाई, 2013 को व्यापमं कार्यालय से नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर से हार्ड डिस्क बरामद की गई. बरामदगी के बाद हार्ड डिस्क को बगैर डिजिटल सिग्नेचर के गुजरात के  गांधी नगर स्थित फॉरेंसिक लैब में क्लोनिंग (दूसरी प्रति) और उसके अंदर के दस्तावेजों के  परीक्षण के लिए भेज दिया गया. बात केवल सीलिंग के तरीके पर आकर नहीं रुकी. पुलिस के पास तीन अगल-अलग दस्तावेजों में नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर से हार्ड डिस्क सीज करने की तारीख और समय अलग-अलग लिखा गया है. इसके अलावा हार्ड डिस्क का सीरियल नंबर  गझ1570ऋश्रट65ढडघ कझ झ/छ. 647466-001 दर्शाया गया है. स्पेशल टास्क फोर्स भोपाल ने जो पत्र गांधी नगर की फॉरेंसिक लैब के संचालक को 29.09.2013 को लिखा, उसमें हार्ड डिस्क सीज करने की तारीख 18.07.2013, शाम 16ः30 दर्ज है. वहीं इंदौर के पुलिस अधीक्षक ने 27.07.2013 को जो पत्र गांधी नगर की फॉरेंसिक लैब के संचालक को लिखा है, उसमें जब्ती दिनांक 26.07.2013 और समय 13.30 दर्ज है. एसटीफ के पत्र में हिताची की हार्ड डिस्क का नंबर  गझ1570ऋङट65ढडघ कझ झ/छ. 647466-टट1 दर्ज है, जबकि गुजरात फॉरेंसिक लैब की जांच रिपोर्ट में हार्ड डिस्क का सीरियल नंबर गझ1570ऋङ065ढ5घ बताया गया है. पुलिस अधीक्षक इंदौर कार्यालय द्वारा लिखे पत्र में नितिन महिंद्रा के कार्यालय से बरामद हिताची कंपनी की हार्ड डिस्क का सीरियल नंबर ऋङ3चझदछघ झ/छ-जऋ15629 दर्ज है,  लेकिन जब इंदौर के राजेंद्र नगर थाने की पुलिस ने प्रॉपर्टी सीज मेमो बनाया था, उसमें हिताची की हार्ड डिस्क को नितिन महिंद्रा के ऑफिस के केबिन के कंप्यूटर सीपीयू से 18.07.2013 को शाम 16ः30 पर दर्ज की गई थी.

ट्रुथ लैब एंड क्राइम स्टॉफर फाउंडेशन में जांच के लिए प्रशांत पांडेय ने जो पेनड्राइव भेजी थी, उसमें सीएम उमा भारती जी, सीएम, एमएस लिखा गया है, जबकि 18 जगहों पर स्थान रिक्त छोड़ दिए गए हैं. इसी एक्सएल सीट को लेकर कांग्रेस के प्रमुख नेताओं ने भोपाल में  फरवरी 2015 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और आरोप लगाया था कि नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर से प्राप्त एक्सएल सीट से छेड़छाड़ की गई है. इस प्रेस कॉन्फेंस के बाद एक्सएल सीट की वैधता की जांच के लिए प्रशांत पांडेय ने नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर से प्राप्त अन्य दस्तावेजों को जांच के लिए 13 मार्च, 2015 को बेंगलुरु स्थित ट्रुथ लैब भेजा था. जांच में वह एक्सएल सीट सही पाई गई. प्रशांत पांडे ने चौथी दुनिया से बात करते हुए बताया कि उनके द्वारा दिए गए सबूतों की जांच बिना किसी ऐजेंसी से कराए बगैर हाईकोर्ट में एक्सएल सीट के फर्जी होने की रिपोर्ट दी थी. एसआईटी के प्रमुख चंद्रेश भूषण ने भी अपने बयान में यह बात मानी थी कि हमने सिर्फ पेनड्राइव की सामग्री पर अपनी प्रथम दृष्टया रिपोर्ट दी है. इसके बाद कोर्ट ने एसआईटी की सात बिंदुओं की रिपोर्ट को मान लिया था. इसके बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा था कि एसआईटी ने एसटीएफ से पूछकर ही पेनड्राइव को फर्जी बता दिया. उन्होंने यह भी कहा कि यह तो ऐसा हो गया, जैसे चोर ही चोरी का फैसला सुनाए. इसके बाद एसआइटी को लिखे अपने पत्र में दिग्विजय सिंह ने पूछा था कि किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले एसआईटी को प्रशांत पांडेय से और बेंगलुरु के  ट्रुथ लैब का पक्ष भी जानना चाहिए था, जिसने पेनड्राइव की सामग्री को प्रमाणित किया था. गौरतलब है कि ट्रुथ लैब के सलाहकार मंडल में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एन. वेंकटचेलैया सहित न्यायपालिका, आरबीआई और नौकरशाही से जुड़े रहे 15 प्रतिष्ठित लोग शामिल हैं. ऐसे में उनकी जांच रिपोर्ट पर भी गौर करना चाहिए था.

भले ही सीबीआई को तकरीबन एक दशक के इस मामले की जांच सौंप दी गई है, लेकिन उसके लिए मामले की जांच का दायरा बहुत बड़ा है. तकरीबन 2500 लोग आरोपी हैं. यदि सीबीआई हर दिन कम से कम एक आरोपी से पूछताछ करती है तो उसे पूछताछ करने में सात साल से भी ज्यादा का समय लग जायेगा. यदि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों से पूछताछ करगी तो इसके लिए उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों की जरूरत होगी. इसके अलावा मामले से जुड़े लोगों की मौत की वजह से लोगों के खिलाफ आरोप सिद्ध करने और मुख्य आरोपियों तक पहुंचने में कई तरह की तकनीकी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा. मध्य प्रदेश का प्रशासनिक महकमा जांच में कितने समर्पण के साथ सीबीआई का सहयोग करेगा, यह देखना भी दिलचस्प होगा. कुल मिलाकर जांच का हाल चारा घोटाले जैसा होने जा रहा है, जिसमें फैसला आने में सालों लग गए. ऐसे भी वीआईपी लोगों से जुड़े राजनीतिक मामलों में जांच का सीबीआई का रिकॉर्ड बेहतर नहीं है, ऐसे में इस मामले में भी ज्यादा अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए.


कैसे लिए जाते हैं इलेक्ट्रानिक साक्ष्य

भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872 की धारा-65(ख) के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की अंतर्वस्तुओं का सबूत सिद्ध किया जा सकता है. यह नया प्रावधान है, जिसमें ऐसे रिकॉर्ड को सिद्ध करने का तरीका बताया गया है. इसका प्राथमिक उद्देश्य द्वितीयक साक्ष्य द्वारा सबूत को पक्का करना है. द्वितीयक साक्ष्य की यह सुविधा कम्प्यूटर आउटपुट के  बारे में लागू होती है और ऐसे आउटपुट को सबूत के प्रयोजनों के लिए दस्तावेज माना जायेगा. इस धारा में यह भी कहा गया है कि उपधारा-1 के अनुसार, यदि कोई सूचना, जो कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में अंतर्निहित है और जिसका मुद्रण करके  या कॉपी करके  रिकॉर्ड किया जाता है, उसे भी दस्तावेज माना जायेगा. इस धारा में कुछ शर्तें दी गई हैं, जिनका अनुपालन करना जरूरी माना गया है. जहां ये शर्तें पूरी हो जाती हैं, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड साक्ष्य में स्वीकार कर लिए जाते हैं और किसी भी कार्यवाही में मूल दस्तावेज पेश करना जरूरी नहीं रह जाता है. कम्प्यूटर आउटपुट को साक्ष्य बनने के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी करनी चाहिए.

  1. कम्प्यूटर आउटपुट में जो सूचना है, वह कम्प्यूटर में उस समय भरी गई थी, जबकि कम्प्यूटर लगातार चल रहा था और उस समय इससे संबंधित सारी सूचनाएं एकत्र कर रहा था और कम्प्यूटर उस व्यक्तिद्वारा संचालित किया जा रहा था, जिसका इसके  इस्तेमाल पर नियंत्रण था.
  2. इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में भरी गयी सूचना इस प्रकार की थी, जो कि नियमित रूप से सामान्य गतिविधियों द्वारा भरी गई है.
  3. डाटा फीडिंग के दौरान कम्प्यूटर का नियमित संचालन किया जाता था और यदि कोई अंतराल था तो इससे कम्प्यूटर की सही सूचना पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.
  4. इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की सूचना सामान्य गतिविधियों के दौरान प्राप्त की गई थी.
  5. इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सीज करते समय उसे डिजिटल सिग्नेचर से सिक्योर करना आवश्यक है.

प्रशांत पांडेय ने एसआईटी से इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों के संबंध में पूछे थे ये सवाल-

  1. व्यापमं कार्यालय, भोपाल  से हार्ड डिस्क सीज करने की तारीख क्या है?
  2. जो टीम व्यापमं कार्यालय से हार्ड डिस्क सीज करने गई थी, क्या वह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एकत्र करने में सक्षम थी?
  3. टीम ने मुख्य सर्वर और कार्यालय में मिले लैपटॉप को सीज क्यों नहीं किया?
  4. व्यापमं कार्यालय गई टीम ने हार्ड डिस्क सीज करने के दौरान दस्तावेजों से संभावित छेड़छाड़ को रोकने के लिए आईटी एक्ट की धारा 15 और इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस एक्ट का पालन क्यों नहीं किया?
  5. कितनी बार नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर से प्राप्त हार्ड डिस्क को एसेस किया गया, उस हार्ड डिस्क को राइट प्रोटेक्टेड क्यों नहीं किया गया?
  6. उन दस्तावेजों को जांच के लिए किन-किन फॉरेंसिक लैब्स में भेजा गया?
  7. दस्तावेजों की जांच के लिए  गुजरात के गांधीनगर स्थित लैब में ही क्यों भेजा गया, जिस लैब को पहले भी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ का दोषी पाया गया है?
  8. इन दस्तावेजों के जांच के लिए दिल्ली, हैदराबाद या चंडीगढ़ स्थित सीबीआआई की लैब में क्यों नहीं भेजा गया?
  9. क्या पुलिस के पास हार्ड डिस्क से मिली प्रत्येक फाइल की दस्तावेज की तारीख के साथ हैश वैल्यू उपलब्ध है?
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