आज जयप्रकाश नारायण जी को हमारे बीच से जाने को लेकर 41 साल हो रहे हैं ! वे भारत की आजादी के आंदोलन मे जान की बाजी लगाने वाले लोगों में से एक थे वैसे ही समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक थे और सर्वोदय आन्दोलन में आचार्य विनोबा भावे जी के बाद दूसरे स्थान पर रहे हैं !

77 साल के जीवन में  शूरू के 20-25 साल अपनी शिक्षा के अलावा अन्य 50-55 साल के जीवन के हर एक क्षण भारत की विभिन्न समस्याओ के समाधान के खोज और विभिन्न प्रयोग करने मे गये हैं ! उसमे का 1947 तक याने 20 से 25 साल स्वतंत्रता आंदोलन उसके बाद समाजवादी पार्टी के लिए और कुछ मत भिन्नता के कारण सर्वोदय के काम मे लग गए थे ! उसमे भी सम्पूर्ण बिहार दान तक अपने अथक प्रयास से करा दिया था !

लेकिन इन सब उपलब्धियो के आलावा भारत के जनतांत्रिक प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए जनतांत्रिक समाज के गठन कर के बाकायदा हमारी चुनाव प्रणालि से लेकर सत्ता के विकेंद्रीकरण तथा शिक्षा, ऊत्तर-पूर्व के प्रदेशो की समस्या से कश्मीर की समस्या तक अपने अथक प्रयास से ऊन सब पर उपाय खोजने मे सतत प्रयास करते रहे उस पर उन विषयों के विशेषज्ञों के साथ विचार विमर्श करने का काम करते रहे हैं ! मेरा देश के इन दोनों क्षेत्रों में जे.पि की प्रेरणा से उनके मृत्यु के बाद लगातार संम्पर्क जारी है और दोनो जगह के लोग कहते हैं कि जे.पी जी भारत की भूमि से आखिरी नेता थे जिन्हे हमारे दुख-दर्द के बारे में कुछ लेना देना था लेकिन उनके जाने के बाद हम अपने आप को बहुत ही असहाय महसूस करते हैं !

और सबसे बड़ी बात महात्मा गाँधीजी के जैसा किसि भी सत्ता के पद पर ना जाते हुए ! आचार्य जावडेकर और विनोबा जी की कल्पना के आचार्य जो हमारे देश तथा समाज को तटस्थता से सोच विचार कर उचित मार्गदर्शन करें ! जयप्रकाश नारायण जी उस कड़ी के आखिरी आचार्य हो गये हैं !

उनके जाने के 42 सालों के दौरान हमारे देश के दुसरा आचार्य नहीं दिख रहा है और आज जो विलक्षण शून्यता का आलम जारी है और उसी का परिणाम वर्तमान समय में केंद्र से लेकर विभिन्न राज्यो मे जो अराजक जैसी स्थिति बनी हुई है उसका कारण है !

वह आज ही के दिन 42 साल पहले गये हैं और बिल्कुल उनके उनके पस्चात घोर सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत हुई है ! हालांकि बहुत लोग उनही के ऊपर यह आरोप लगाते हैं कि यह घोर सांप्रदायिक लोगों को उन्होने अपने बिहार आंदोलन के दौरान राजनितिक संजीवनी देने का काम किया है अन्यथा गाँधी हत्या के बाद मुँह छुपाकर चलने वाले लोग आज मुह जोर होकर पूरे देश को सांप्रदायिक आग मे डाल दिया है !

कुछ हद तक यह बात सही भी है लेकिन आधी सही है ! क्योकिं 1974-75 के दौरान कॉ श्रीपाद अमृत डांगेजी और उनके साथियों ने जिस तरह से इस आंदोलन के खिलाफ काम किया बिल्कुल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में भी कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों ने अंग्रेजो का साथ दिया और स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण दौर में दगाबाजी की थी ! और बाद मे एतिहासिक भूल की थी यह कन्फेशन किया है ! और उसी तरह 1962 के चीन युद्घ के समय कुछ कम्युनिस्ट पार्टी के लोग चीनी आक्रमण को भारत की मुक्ति का आक्रमण लग रहा था और उसी समय सी पी एम की और सी पी आई की दो पार्टी बन गई ! अब चीन जैसे साम्राज्यवादी देश को भारतीय भूमि पर रहनेवाले कीसी भी व्यक्ति को भारतीय बोलेंगे? और वही भूल तीसरी बार श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के वन वुमन पार्टी का तानाशाही का दौर में और संजय गांधी जैसा बिगडेल लडके का किसी भी संवैधानिक अधिकार ना रहते हुए वह जिस तरह से केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों के काम मे दखलंदाजी करता था वह अत्यंत गैर कानूनी तरीके से संविधान की परवाह किए बिना ! उपर से बे-तरतीब भ्रष्टाचार,चरम सीमा पर महंगाई और बेरोजगार युवकों के अंदर गुस्सा बढते जा रहा था जिसे जेपिने अपना नेतृत्व प्रदान करने के बाद कई शर्तो के साथ उनके द्वारा शूरू किये गये आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करने के लिए तैयार हुये और उसके पहले उन्होने श्रीमती इंदिरा गाँधी जी को प्रिय इंदू सम्बोधन करते हुए दर्जनो चिठ्ठीया लिखी लेकिन मेड्म ने उनके एक भी खत को एक्नोलेज तक नहीं किया !

74-75 के आंदोलन की भूल की करके ही डांगे साहब को पार्टी से अलग कर के अलग पार्टी बनाने का फैसला किया है ! लेकिन उसके बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ लोग जे.पि के ऊपर दोषारोपण करते रहते हैं ! किसी भी जन आन्दोलन में आप यह नहीं कह सकते कि फलना नहीं आयेगा और वलनाही आयेगा ! अगर जेपी आंदोलन मे भाग ना लेने की गलती कम्यूनिस्टो ने नहीं कि होती और उसमे शामिल  हुये होते तो क्या जनसंघ की हिम्मत हुई होती ? अपने आप वो बाहर रहे होते और जेपी आंदोलन मे शामिल होने के कारण जो राजनितिक उपलब्धी प्राप्त हुई होती सो अलग ! लेकिन पहले गलती करना फिर भुल हो गई कहने वाले कम्युनिस्ट आज म्यूज़ियम  के पीस   बन कर रह गये हैं ! इसका सबसे बड़ा कारण सतत गलत निर्णय लेने से आज पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए मौका दिया है !

 

कॉंग्रेस से भी अधिक तीखे तेवर आपात्काल में कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं का रहा है तथाकथित फासिस्ट संमेलन करते हुए जेपि को गाली देते हुए मैंने खुद देखा सुना है उल्टा उन्हिके साथ एक ही मंच पर उपस्थित काँग्रेस वाले लोग काफी ठीक-ठाक बोलते थे और कुछ काँग्रेस  के लोगों को मैने मेडम  इन्दिरा जी गलत कर रही है और जेपी के साथ डॉयलॉग करना चाहिए यह भुमिका लेते हुए देखा है और वह लोग बाद मे आपात्काल में जेल भी गए हैं ! चंद्रशेखर,मोहन धारिया,कृष्ण कान्त,लक्ष्मी कान्तमा,और आखिर में जगजीवन राम,हेमवती नंदन बहुगुणा,और उनके भी बाद यशवंतराव चह्वाण इत्यादि लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को बार-बार जेपि को गालियाँ देते हुए देखता हूँ !

2017 के इसी अक्तूबर महीने मे मुझे बिहार प्रदेश कम्युनिस्ट पार्टी ने अक्तूबर क्रांति के 100 साल पूरे होने पर एक वक्ता के रूप में बुलाया था और ऊसी सभा में एक कम्युनिस्ट पार्टी के विद्वान ने जिनका उस कार्यक्रम पत्रिकामे कही नाम नहीं था और नांहि कार्यक्रम संचालक ने उन्हे स्टेजपर बुलाया था ! लेकिन ओ जबरदस्ती आकर खुर्चि ना रहते हुए संचालक की खुर्चि पर जम गये थे और उन्होंने कहा कि मुझे खैरनार साहब ने बिहार के मेरे नेता जेपी बोलकर अपने भाषण कि शुरुआत की है इसलिये मै कुछ बोलना चाहता हूँ !  और वो प्रोफेसर जेपी के बारे में काफी कुछ अनर्गल बोला था मै तो सिर्फ सभा की मर्यादा का पालन करने के लिए उनके द्वारा दिया गया भाषण को अनदेखा कर दिया अन्यथा मै आया था रूस की अक्तूबर क्रांति के 100 साल पर बोलने और दूसरे दिन अखबारों में हमारे बीच की जुगलबंदी की खबर छपी होती !

आज 1974-75 से भी बदतर दौर से हमारा देश गुजर रहा है ! उस समय एक व्यक्ति की तानाशाही की बात थी आज एक केडर बेस पार्टी और उसके मातृसंघटनकी सिर्फ तानाशाही नहीं बल्कि आज से 100 साल पहले के जर्मनी की और इटली जैसा फासिस्ट दौर से गुजर रहे हैं ! 74-75 से बदतर हमारी सभी संवेधानिक संस्थाये जिसमे सर्व प्रथम मीडिया,न्यायालय,कार्य पालिका और रिझर्व बैक,सी बी आई,ई डी,आई बी,पुलिस,परा मिलिटरी और मिलिटरी भी सभी दहशत में है !

और इसीलिये लोग अपने आप को बहुत ही असहाय महसूस कर रहे हैं और यह देश के स्वास्थ के लिए बहुत ही चिंता की बात है और इसिलिए आज जेपी के 42वे पुण्य तिथि पर बरबस याद आ रही है कि आज अलख जगाने वाले आखिरी आचार्य हमारे बीच नहीं हैं !

और उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करनेका मतलब कोई भी कर्मकांड के बजाय 25 जून 1975 को उन्होने जो नारा दिया था कि सिहासन खालि करो कि जनता आती है ! का नारा बुलंद करते हुए वर्तमान स्तिथी के खिलाफ सभी प्रगतिशील ताकतों को इकठ्ठा कर के बाकायदा रस्ते पर उतरकर आंदोलन करना! किसान,मजदूर,विद्यार्थियो ने शुरुआत कर दी है अब आप और हम सभी ने उनको साथ देने हेतु उतरना यही जेपी के प्रती सही श्रधान्जली होगी !

डॉ सुरेश खैरनार ,नागपूर

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