1212जनता परिवार में विलय के नाम पर समाजवादी पार्टी में साफ़-साफ़ विभाजन हो गया है. यह विभाजन केवल कार्यकर्ताओं में नहीं, बल्कि नेताओं में भी है. सपा नेतृत्व को डर है कि बृहत्तर जनता पार्टी बनाने के चक्कर में कहीं समाजवादी पार्टी का ही नुक़सान न हो जाए. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने विलय का फैसला लिया, तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी टूट भी सकती है. समाजवादी पार्टी के इस अंतर-कंपन पर भाजपा निगाह लगाए बैठी है. इस ख़तरे की आशंका को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने विलय पर पहल से परहेज करना शुरू कर दिया है. सपा नेतृत्व यह भी नहीं चाहता कि विलय के रास्ते में किसी भी अड़चन का ठीकरा उसके सिर फूटे. लिहाजा, बिहार में जदयू और राजद के बीच विलय को लेकर चल रही नोकझोंक और बढ़ रही अड़चनों का फ़ायदा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को मिल रहा है. विलय को लेकर समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश में नकारात्मक रुझान दिखाया है. इस महाविलय को सपा नेता लालू यादव की राजनीति बता रहे हैं, जिस पर पहले नीतीश कुमार धराशायी हुए और अब अगर सपा ने हाथ मिलाया, तो मुलायम सिंह धराशायी हो जाएंगे. लिहाजा, बृहत्तर जनता परिवार के आपसी विलय की योजना विलंबित-ताल में जाती साफ़-साफ़ दिख रही है.

जनता परिवार के नेताओं ने पिछले दिनों दिल्ली में मुलायम सिंह यादव के घर पर बैठक करके विलय का फॉर्मूला तय किया था और आगे काम करने के लिए मुलायम सिंह यादव को अधिकृत किया था, लेकिन पार्टी कैडर में नकारात्मक रुख देखते हुए मुलायम ही इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं. जंतर-मंतर पर हुआ धरना मुलायम का यह रुख बनाने में निर्णायक तौर पर सामने आया, क्योंकि यह पाया गया कि धरना-मंच पर लालू-नीतीश ने अपनी-अपनी राजनीति तो खूब चमकाई, लेकिन धरना में भारी भीड़ उत्तर प्रदेश से आए नेताओं और कार्यकर्ताओं की थी. जंतर-मंतर पर धरने के बाद कार्यकर्ताओं में यह धारणा बनी कि पार्टी का विलय वे किसी भी क़ीमत पर न होने दें और अगर इसके बावजूद विलय हुआ, तो प्रदेश में समानांतर समाजवादी पार्टी का गठन हो. इस नजाकत को देखते और भांपते हुए समाजवादी पार्टी नेतृत्व ने विलय प्रकरण पर उत्साह दिखाना फिलहाल बंद कर दिया है. समाजवादी पार्टी में सवाल उठ रहे हैं कि महाविलय के बाद कांग्रेस से गठबंधन करने के मसले पर सपा नेतृत्व उत्तर प्रदेश के लोगों को क्या जवाब देगा और महाविलय से सपा को क्या फ़ायदा मिलने वाला है?
विलय के बाद समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय हैसियत का क्या स्वरूप खड़ा होगा और जनता परिवार के नेताओं का ऐतिहासिक चरित्र देखते हुए भविष्य में महा-गठबंधन टूटा (जो अवश्यंभावी है), तो फिर समाजवादी पार्टी किस स्वरूप में आकर खड़ी होगी? सपा नेतृत्व के पास इन सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं है. मुलायम सिंह यादव के पौत्र एवं सांसद तेज प्रताप सिंह और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बेटी राजलक्ष्मी की शादी तय होने के बावजूद समाजवादी पार्टी विलय को लेकर इच्छुक नहीं दिख रही है. पार्टी इतना तो तय मानती है कि विलय से समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में कोई मजबूती नहीं मिलने वाली. उत्तर प्रदेश विधानसभा में समाजवादी पार्टी के पास तगड़ा बहुमत है, जिससे पार्टी 2017 तक राज्यसभा में ज़्यादा सदस्य भेज सकती है. विलय का जो दृश्य सामने आ रहा है, उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि राजद और जदयू में विलय होने के बाद ही समाजवादी पार्टी के इसमें विलय की कोई संभावना बनेगी. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का जनता परिवार में विलय का साफ़-साफ़ मूड नहीं है. जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भी यह संकेत दे चुके हैं कि राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड का विलय पहले होगा. उन्होंने साफ़ कहा कि अभी बिहार में विलय की ज़रूरत है, क्योंकि राज्य में इसी साल नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं. लेकिन, बिहार में ही विलय की प्रक्रिया सियासी दांव-पेंच में उलझ गई है. विभिन्न भोजों के ज़रिये विलय की राजनीति हो रही है. किसी में नीतीश नहीं जाते, तो किसी में लालू, तो किसी भोज में बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अप्रत्याशित रूप से हाजिर हो जाते है. इसी बीच मांझी भाजपा नेताओं से भी मिलते रहते हैं और इसी में विलय की सारी सियासत गड्डमड्ड होकर रह गई है. विलय होने की स्थिति में उत्तर प्रदेश में समानांतर समाजवादी पार्टी की संभावनाएं तेजी से तैयार हो रही हैं. पार्टी में उपेक्षित चल रहे वरिष्ठ नेताओं की खासी तादाद है, जो समानांतर समाजवादी पार्टी को नेतृत्व देने के लिए लगभग तैयार ही बैठे हैं. इनमें अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा जैसे कई नेताओं के नाम लिए जा सकते हैं, जो यह मानते हैं कि जब नीतीश और लालू हाथ मिला सकते हैं, तो अमर और बेनी क्यों नहीं. सपा के अस्तित्व काल से ही बेनी वर्मा जुड़े हुए थे. मुलायम सिंह खुद बेनी वर्मा को बुलाने गए थे. तब जनेश्‍वर मिश्र को महासचिव पद की ज़िम्मेदारी दी गई थी. लेकिन, बाद में समाजवादी पार्टी पारिवारिक जागीर बन गई और उन्हीं जनेश्‍वर मिश्र पर अमर सिंह को महासचिव बनाकर थोप दिया गया. जनेश्‍वर मिश्र उपाध्यक्ष बना दिए गए थे. बाद के क्रम में बेनी प्रसाद वर्मा को भी बाहर जाना पड़ा और अमर सिंह को भी बेइज्जत होकर पार्टी से निकलना पड़ा. आज पार्टी में अच्छे-अच्छे नेता हाशिये पर पड़े हैं. अगर जनता परिवार के दलों का विलय होता है, तो ऐसे विक्षुब्ध नेताओं को समानांतर समाजवादी पार्टी गठित कर मूल समाजवादी संस्कृति की धारा पर लौटने का विकल्प या बहाना मिलेगा. क्योंकि, वे मानते हैं कि मुलायम, नीतीश, शरद, लालू, चौटाला, देवगौड़ा वगैरह के विलय के बाद वही सब अराजकताएं उभरेंगी, जो जनता पार्टी के काल में उभरी थीं. ऐसे में प्रदेश के नेता अपने भविष्य और वजूद को लेकर भी खासे चिंतित हैं. विलय के बाद आलाकमान के बदलने वाले स्वरूप को लेकर भी उत्तर प्रदेश के नेता आशंकित हैं और उन्होंने अभी से कहना शुरू कर दिया है कि वे नीतीश या लालू को अपना नेता नहीं मानेंगे. सपा के ही कुछ लोग इनमें आजम खान का भी नाम लेते हैं, जो मुलायम के अलावा किसी अन्य को नेता नहीं मानते, यहां तक कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी नहीं.


विलय को लेकर घमासान

प्रस्तावित विलय को लेकर जदयू और राजद के बीच मचे घमासान का असर केवल बिहार में ही नहीं है, बल्कि इसका गहरा असर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी पर भी पड़ रहा है. बिहार में सत्तारूढ़ जदयू के कई विधायकों के भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में रहने की ख़बरें हैं, तो उत्तर प्रदेश में भी सपा नेताओं और विधायकों के भाजपा के संपर्क में रहने की ख़बरें हैं. बिहार के भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने तो साफ़-साफ़ कह दिया है कि जदयू के 50 से अधिक विधायक भाजपा के समर्थन में हैं और वह जब चाहें, बिहार में जदयू की सरकार धराशायी करा सकते हैं. यह संदेश और संकेत केवल बिहार के लिए थोड़े ही है. सपा नेतृत्व को भी यह पता है कि पार्टी के कई नेता और विधायक भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं तथा कभी भी पाला बदल हो सकता है. ऐसे में विलय का निर्णय समाजवादी पार्टी के लिए आत्मघाती हो सकता है और इससे विक्षुब्धों को वैकल्पिक धारा चुनने का सरल मा़ैका मिल सकता है. समानांतर समाजवादी पार्टी के गठन की छटपटाहट का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि अभी पिछले ही दिनों दादा मियां के उर्स पर लखनऊ में एकत्र हुए तक़रीबन दो दर्जन विधायकों और एक मंत्री ने सरकार के ख़िलाफ़ खुली नाराज़गी जाहिर की. इसकी ख़बर मिलने पर सपा प्रमुख ने अपने एक खास दूत को बात करने के लिए भेजा, लेकिन उन दूत महाशय को भी खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी. वह दूत अखिलेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री भी हैं.

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