akhilesh yadavसमाजवादी पार्टी को विधानसभा चुनाव में यूपी पुलिस से सहयोग मिलने का पूरा भरोसा है. यूपी पुलिस में थाना प्रभारियों की तैनातियां इसी इरादे से की गई हैं. समाजवादी पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता ही कहते मिलेंगे कि पुलिस की वर्दी में हमारे जैसे ही कार्यकर्ता हैं.

लोगों का कहना है कि न केवल थाना प्रभारी, बल्कि पुलिस महानिदेशक से लेकर पुलिस अधीक्षकों और थाना प्रभारियों तक की तैनाती विधानसभा चुनाव को देखते हुए की गई है.

चुनाव आयोग चाहे जितना फेरबदल कर ले, पर पूरा पुलिस महकमा थोड़े ही बदला जा सकता है! यह आम लोगों की राय नहीं है. यह खास लोगों की सूचना है, जो सत्ता गलियारे के फैसलों और गतिविधियों पर निगाह रखते हैं.

ऐसे जानकारों का मानना है कि चुनाव आचार संहिता लागू होते ही प्रदेश के पुलिस महानिदेशक चुनाव होने तक डीजीपी के पद से हटाए जा सकते हैं, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि प्रदेश के सभी थानों पर तैनात थाना प्रभारी थोड़े ही बदले जा सकते हैं!

उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था भले ही बदहाल हो, लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यूपी पुलिस को जितनी सुविधाएं और तरजीह दी हैं, उतना अन्य किसी भी महकमे को नहीं दीं. यह दरियादिली सियासी इरादे से ही दिखाई गई और 2017 का चुनाव इसका लक्ष्य था.

विधानसभा चुनाव में प्रदेश के करीब 14 करोड़ मतदाता वोट डालेंगे. चुनाव आयोग यूपी के चुनाव को लेकर कुछ अधिक ही संजीदा है. आयोग को इस बात की पक्की सूचना है कि सत्ताधारी समाजवादी पार्टी विधानसभा चुनाव में ‘अपनी’ पुलिस का इस्तेमाल करेगी.

उत्तर प्रदेश में इस समय हर चौथे पुलिस थाने में यादव उपनामधारी थानेदार तैनात हैं. कुछ थानों में तो सब-इंस्पेक्टर ही थाने के इंचार्ज हैं. चुनाव आयोग इस बात को स्वीकार कर चुका है कि 2017 का चुनाव किसी चुनौती से कम नहीं है.

चुनाव आयोग राज्य के सभी थानों की निगरानी भी कर रहा है. आयोग को शक है कि थाने चुनाव में गड़बड़ी के केंद्र में भूमिका अदा कर सकते हैं. अभी कुछ ही दिन पहले मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. नसीम जैदी ने लखनऊ में यह स्वीकार किया था कि चुनाव में आयोग का सारा फोकस थानों पर होगा, क्योंकि थाने चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं.

मुख्य चुनाव आयुक्त का कहना था कि अगर थाने सही नहीं होंगे, तो चुनाव भी सही तरीके से सम्पन्न नहीं हो पाएंगे. चुनाव में किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी न हो इसके लिए चुनाव आयोग ने कई सख्त कदम उठाए हैं. इस बार नामांकन दाखिले के पहले ही केंद्रीय सुरक्षा बल की तैनाती कर दी जाएगी. चुनाव आयोग ने इस बार 75 प्रतिशत मतदान का लक्ष्य रखा है और इस बात का खास तौर पर ध्यान रखा जाएगा कि बूथों पर दबंगों का कब्जा न होने पाए.

पुलिस की मदद से बूथों पर दबंगों का कब्जा करा कर लोगों को वोट डालने से रोकने की रणनीति को कारगर नहीं होने देने की व्यवस्था की जा रही है. अधिकांश थानेदारों के एक खास जाति का होने के बारे में पूर्व में चुनाव आयोग ने पुलिस महानिदेशक से सभी थाना प्रभारियों की सूची भी मांगी थी. आयोग का निर्देश था कि नियमतः केवल इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारियों को ही थाना प्रभारी बनाया जाए, लेकिन इस निर्देश का पालन नहीं हुआ.

चुनाव में खास तौर पर ग्रामीण इलाकों और कस्बों में भोले-भाले लोगों को प्रभावित करने या भयग्रस्त करने में पुलिस की क्या भूमिका होती है, इसे लोग अच्छी तरह जानते हैं. अब तो फरवरी में चुनाव होने की चर्चा भी शुरू हो चुकी है.

विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ताधारी दल अति-जातिवाद से राजनीतिक लाभ प्राप्त करने का प्रलोभन भले ही पाल ले, लेकिन असलियत यही है कि अति-जातिवाद के कारण ही प्रदेश को कानून व्यवस्था का संकट झेलना पड़ रहा है. इसका खामियाजा भी सत्ताधारी दल को झेलना पड़ता है.

पुलिस के जातिवाद से प्रभावित होने के कारण कार्रवाइयों में निष्पक्षता नहीं रही और इस वजह से अपराधियों और असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद रहे. यूपी में पिछड़ी जाति की आबादी तकरीबन 35 प्रतिशत है, जिसमें 10 प्रतिशत आबादी यादव जाति की है. इस 10 प्रतिशत आबादी को प्रसन्न करने के सारे उपाय समाजवादी पार्टी ने किए. इसके लिए सपा ने आरोप भी झेले कि सरकार ने पुलिस महकमे का पूरी तरह यादवीकरण कर दिया है.

यादवों को ही पुलिस और प्रशासन में ऊंचे पदों पर बिठाया गया है. लेकिन इसका कोई असर पार्टी या सरकार पर नहीं पड़ा. यहां तक कि हाईकोर्ट को हस्तक्षेप कर लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को हटाना पड़ा. खुद गृह विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मुलायम परिवार के कब्जे वाली लोकसभा सीटों के अधिकांश थानों के प्रभारी यादव हैं. अभी हाल तक बदायूं के 22 थानों में से 16 थानों के प्रभारी यादव थे.

कानपुर के 44 थानों में से 25, लखनऊ के 43 थानों में से लगभग आधे से ज्यादा, कन्नौज में 9 में से 5, फर्रुखाबाद में 14 में से 7, इटावा में 21 में से 9 थाना प्रभारी यादव जाति के रहे हैं. हाल तक तैनातियों का आंकड़ा यह रहा है कि यूपी के 75 जिलों के 1,526 थाने में करीब 600 यादव थानेदार थे. राजधानी लखनऊ के 43 पुलिस थानों में से लगभग 20 थानों पर यादव थानेदार नियुक्त हैं.

मथुरा के 21 थानों में से लगभग 10 पुलिस थानों में यादव थानेदार हैं. संभल जिले के 11 पुलिस स्टेशनों में से लगभग 7 पर यादव जाति के थानेदार हैं. गाजियाबाद के 17 में से लगभग 9 थानों पर यादव जाति के थानेदार तैनात हैं. फिरोजाबाद के 21 में से लगभग 9 पुलिस स्टेशनों पर यादव थानेदार हैं. एक अघोषित नियम के तहत प्रदेश के सभी जिलों में लगभग 50 प्रतिशत थाना प्रभारी यादव ही नियुक्त हो रहे हैं. हाल यह है कि प्रदेश के 67 प्रतिशत थानाध्यक्ष यादव जाति से आते हैं.

पुलिस के अलावा प्रशासन में भी इसी तरह अति-जातिवादी तौर तरीके से नियुक्तियां और तैनाती की गई हैं. आपको याद ही होगा कि पीसीएस से जो 86 एसडीएम चुने गए थे उनमें से 54 यादव जाति के अभ्यर्थी थे. इसी तरह 75 बेसिक शिक्षा अधिकारियों में से 62 बेसिक शिक्षा अधिकारी यादव जाति के हैं. जिन स्थानों पर यादव जाति के बीडीओ हैं, उन्हें तीन-तीन, चार-चार ब्लॉकों का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया है.

अभी हाल तक उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव, उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष रामवीर यादव, अधीनस्थ सेवा आयोग के अध्यक्ष राज किशोर यादव और माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड के अध्यक्ष रामपाल यादव रहे हैं. इसी तरह सपा ने संगठन में भी अति-जातिवादी रवैया ही कायम रखा. समाजवादी पार्टी के 75 जिलाध्यक्षों में से 63 जिला अध्यक्ष यादव जाति के रहे हैं.

‘एक ही साधे सब सधे’ के फार्मूले पर चले अखिलेश

प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 2017 पर अपना लक्ष्य साधते हुए अपने मौजूदा कार्यकाल में यादव थाना प्रभारियों की तैनाती के अलावा पुलिसकर्मियों को प्रोत्साहित करने के कई और भी काम किए हैं. प्रदेशभर में पुलिस को आधुनिक वाहन प्रदान किए गए और साप्ताहिक अवकाश की अनिवार्यता बहाल की गई.

यूपी पुलिस को जीपीएस लगी 3200 आधुनिक गाड़ियां और 1600 मोटरसाइकिलें दी गईं. विभिन्न योजनाओं के तहत भारी धनराशि झोंकी गई और पुलिस थानों और आवासीय भवनों को दुरुस्त करने का काम किया गया. अखिलेश ने दूरदृष्टि रखते हुए उत्तर प्रदेश के सभी पुलिसकर्मियों के लिए 20 करोड़ कॉल्स मुफ्त करने और गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर (नोएडा) को रोमिंग-फ्री की सुविधा देने इंतजाम कर दिया.

इसके अलावा पुलिस थानों के बंद पड़े बेसिक फोन को दुरुस्त कराया गया और साढ़े तीन हजार नए बेसिक फोन व पांच हजार नए सीयूजी फोन की व्यवस्था भी की गई. यानि, अखिलेश यादव ने बड़े सोचे-समझे तरीके से पुलिस विभाग को अपने ‘फेवर’ में लेने के तौर-तरीके अख्तियार किए हैं.

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