accompanied-parliament-shah10 सितंबर को जब राजद के विवादित नेता शहाबुद्दीन को जमानत पर रिहा किया गया, तो दो बातों पर बहुत तवज्जो नहीं दी गयी. इन में से एक थी- शहाबुद्दीन के स्वागत के लिए अनेक विधायकों समेत हजारों की भीड़ और सैकड़ों गाड़ियों के काफिले की तैयारी किसके  कहने पर हुई थी. दूसरी बात यह थी कि रिहाई के बाद जब लालू प्रसाद व शहाबुद्दीन जिंदाबाद के नारे लगाये जा रहे थे, तो अचानक नीतीश कुमार के  खिलाफ कुछ लोगों द्वारा नारेबाजी करने के पीछे क्या और किसकी रणनीति थी? इन दो सवालों के जवाब खोजना जरूरी है क्योंकि इन दो बातों के पीछे जिस सियासत का आकार उभर के सामने आता है, वही शहाबुद्दीन के सियासी महत्व का प्रतीक है. इन दोनों सवालों पर आम मन:स्थिति की चर्चा से पहले हमें दो अन्य विवादित नेताओं की विवादित रिहाई को याद कर लें,  जिसने बिहार को झकझोर के रख दिया था. इनमें से एक थे पप्पू यादव, जिन्हें कम्युनिस्ट विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया था. और दूसरे थे रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्‍वर मुखिया, जिनके खिलाफ अनेक नरसंहार के आरोप थे, लेकिन उनके विरुद्ध कोई सुबूत नहीं पेश किया जा सका था. इन दोनों नेताओं की रिहाई के बाद ऐसा जश्‍न देखने को नहीं मिला था. जबकि शहाबुद्दीन की तरह ये दोनों नेता भी अपने-अपने समाजों के एक खास सेक्शन में लोकप्रिय थे.

पप्पू यादव और ब्रह्मेश्‍वर मुखिया से जुड़े मामलों को याद करने के बाद हम फिर शहाबुद्दीन मामले पर लौटते हैं, क्योंकि आखिर शहाबुद्दीन में वो कौन सी खास बात थी, जिनकी रिहाई पर शाहाना स्वागत की तैयारी की गयी थी. क्या शहाबुद्दीन ग्यारह साल जेल में बिताने के भी बाद इतने लोकप्रिय थे कि खुद ब खुद हजारों लोग उनके स्वागत में उमड़ पड़ते?

दरअसल 7 सितंबर को जब पटना हाईकोर्ट ने भागलपुर जेल में बंद शहाबुद्दीन की जमानत पर रिहाई का हुक्म दिया, तो उसके बाद राजनीतिक गलियारों में दो दिनों तक शहाबुद्दीन के स्वागत की चर्चा फैलाई जाती रही. इस चर्चा को आगे बढ़ाने वालों में बिंदी यादव भी एक थे. आपराधिक छवि के ये वही बिंदी यादव हैं, जो राजद व जदयू दोनों के करीब रहे हैं और हाल ही में उनके बेटे की गिरफ्तारी रोडरेज की घटना के आरोप में हुई थी. यहां यह याद रखना जरूरी है कि ब्रह्मेश्‍वर मुखिया व पप्पू यादव जब रिहा हुए, तो उनका सत्ता से कोई डायरेक्ट सरोकार नहीं था, जबकि शहाबुद्दीन जब रिहा हुए, तो वह कुछ महीने पहले ही राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य बनाये जा चुके थे और उनका दल फिलहाल गठबंधन सरकार का सबसे बड़ा दल है. हालांकि शहाबुद्दीन की लोकप्रियता एक खास वर्ग में है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी यह लोकप्रियता सीवान की सरहद तक सीमित रही है. सीवान के बाहर अपनी लोकप्रियता का प्रदर्शन खुद शहाबुद्दीन ने कभी किया भी नहीं. ऐसे में यह तय है कि राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं ने शहाबुद्दीन के स्वागत की जबर्दस्त तैयारी की थी. हालांकि इसके लिए राजद ने कोई औपचारिक घोषणा नहीं की थी. मतलब स्पष्ट है कि ग्यारह साल के लंबी अवधि तक जेल में रहने वाले शहाबुद्दीन के स्वागत के लिए खुद ब खुद उनके समर्थक नहीं उमड़ पड़े थे. इसके लिए उनकी पार्टी ने एक खास रणनीति के तहत यह तैयारी की थी. और तब जैसे ही हजारों की भीड़ भागलपुर जेल के पास शहाबुद्दीन के स्वागत के लिए पहुंची, तो स्वाभाविक तौर पर शहाबुद्दीन अह्लादित हुए और पूरे जोश में उन्होंने लालू प्रसाद को अपना नेता बताया और लगे हाथों नीतीश कुमार को परिस्थितियों का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया. उनकी इस घोषणा से जनता दल बुरी तरह नाराज हुआ और इतना ही नहीं अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए जदयू ने अपने प्रवक्ता नीरज कुमार से कहलवाया कि शहाबुद्दीन अपनी जुबान पर लगाम रखें. उन्होंने यहां तक कहा कि बिहार सरकार ऐसी सुई चुभोती है, जिसमें दर्द तक नहीं होता. नीरज के इस बयान से राजद और जदयू के बीच की कड़वाहट बढ़नी थी, सो बढ़ ही गयी. लेकिन लालू प्रसाद और नीतीश कुमार को दलीय स्तर पर कड़वाहट की अपनी सीमाएं मालूम हैं और इसीलिए दोनों ने बारी-बारी से कहा कि गठबंधन में कोई समस्या नहीं है. लेकिन शहाबुद्दीन के बहाने जो राजनीति की जानी थी, वह कर ली गयी. इसलिए ऊपर जिन दो सवालों की चर्चा की गयी है कि शहाबुद्दीन के स्वागत के लिए जो भीड़ उमड़ी थी, उसके पीछे किसकी रणनीति थी और उस समय नीतीश कुमार को नीचा दिखाने वाला बयान या नारेबाजी का क्या मकसद था. दरअसल शहाबुद्दीन के बहाने दोनों दल अपना शक्ति प्रदर्शन एक दूसरे के खिलाफ कर रहे थे, लेकिन इस शक्ति प्रदर्शन की सीमाएं दोनों दलों के नीति निर्धारकों को पता थी. इसलिए दोनों दल इस मामले में एक दूसरे के खिलाफ शह-मात और जिच का खेल खेलते रहे. उधर नीतीश कुमार को इस मामले में अपनी छवि बचाने का तब मौका मिल गया, जब शहाबुद्दीन की जमानत को चुनौती देने के लिए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चंदा बाबू की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की घोषणा कर दी. चंदा बाबू के तीन बेटों की हत्या का इल्जाम शहाबुद्दीन पर था. इसके बाद बिहार सरकार ने भी अलग से शहाबुद्दीन की जमानत को चुनौती देने का ऐलान किया. जदयू ने इसकी घोषणा के लिए दिल्ली में बैठे अपने वरिष्ठ नेता शरद यादव को चुना जो अब तक इस मामले में बिल्कुल खामोश थे. हालांकि गौर से देखें तो जदयू ने यह ऐलान मजबूरी में किया क्योंकि सात दिनों की लंबी चुप्पी के बाद उसने जमानत को चुनौती देने की घोषणा इसलिए की कि प्रशांत भूषण जब इसके लिए पहल कर चुके थे तो स्वाभाविक तौर पर राज्य सरकार को अपना पक्ष इस मामले में रखना ही पड़ता और तब उसके लिए फजीहत उठाने के अलावा कोई और रास्ता न बचता.

शहाबुद्दीन पर सियासत और उस मुद्दे पर राजद-जद यू के बीच शह-मात के खेल में लालू के लिए एक लंबी रणनीति का हिस्सा भी लगता है. शहाबुद्दीन भले ही आपराधिक छवि के नेता रहे हों, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जमानत के बाद उन्हें एक मुस्लिम फेस के रूप में हर किसी ने पेश करने की कोशिश की है. इस खेल में भाजपा भी शामिल है. शहाबुद्दीन की जमानत पर रिहाई के बाद सोशल मीडिया में इसकी बानगी देखने को भी मिली. मुसलमानों के एक वर्ग ने शहाबुद्दीन के खिलाफ विरोधी दलों और मीडिया के रवैये को मुस्लिम विरोध की मानसिकता के तौर पर लिया. इस वर्ग ने सोशल मीडिया में अपनी ऐसी ही प्रतिक्रिया दी भी. कइयों ने तो शहाबुद्दीन की रिहाई को शेर की रिहाई तक घोषित कर दी. उधर लालू प्रसाद को मुस्लिम फेस के रूप में राजनीति करने का भी मौका मिला. कुछ मुसलमानों ने शहाबुद्दीन की जमानत पर रिहाई के लिए लालू प्रसाद की भूमिका तलाशी. उनके इस तर्क को शहाबुद्दीन के उस बयान से और भी बल मिला, जिसमें उन्होंने जेल से छूटते ही लालू प्रसाद को अपना एक मात्र नेता घोषित कर दिया था.

शहाबुद्दीन को लेकर नीतीश बनाम लालू की राजनीति में मुस्लिम मानसिकता का एक और महत्वपूर्ण एंगल भी है. राजद-जदयू गठबंधन के रूप में भले ही चुनाव लड़ा हो लेकिन लालू यह मौका कभी नहीं छोड़ सकते कि मुस्लिम वोटों पर उनका वर्चस्व कम हो. अगर ऐसे में मुसलमानों का एक वर्ग शहाबुद्दीन की रिहाई में लालू की भूमिका तलाशता है, तो फिर शहाबुद्दीन की जमानत को अगर सुप्रीम कोर्ट रद्द करता है, तो इसके लिए वही वर्ग नीतीश की भूमिका तलाश करेगा. इससे मुस्लिम वोटों के प्रति लालू की रणनीति ही सफल मानी जायेगी. यह बात तब आसानी से साबित हो सकेगी, जब हम उस संभावित स्थितियों की कल्पना करें, जब लालू और नीतीश अलग हो कर चुनाव लड़ें, तो मुसलमानों का बड़ा हिस्सा शहाबुद्दीन मामले को लेकर लालू के पक्ष में खड़ा दिखेगा.

शहाबुद्दीन के नाम पर सियासत का एक और अहम पहलू यह है कि वह अगर जेल से बाहर रह गये, तो उनका राजनीतिक रसूख मुसलमानों पर तेजी से बढ़ेगा, जो कि लालू के लिए मुफीद नहीं हो सकता. क्योंकि लालू यह तो चाहेंगे कि मुस्लिम फेस का लाभ उन्हें मिले, लेकिन मुस्लिम फेस उनके लिए कालांतर में चुनौती ही बन बैठे, ऐसा लालू प्रसाद क्यों गवारा करेंगे?

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