uidपूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में हुए अनाज घोटालों की जांच अभी तथाकथित तौर पर जारी ही थी कि मौजूदा भाजपा सरकार भी राशन घोटाले में फंस गई. राशन या अनाज घोटाला या कोई दूसरा घोटाला दर घोटाला सत्ता का शाश्वत सत्य है. सत्ता किसी भी पार्टी की हो, घोटालेबाजों पर कोई फर्क नहीं पड़ता. वे जानते हैं कि उनका बाल नहीं बांका होने वाला, इसलिए घोटाला होता रहता है. मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल का अनाज घोटाला आज तक किसी कानूनी नतीजे तक नहीं पहुंच पाया.

हालांकि इसकी जांच सीबीआई कर रही थी. अब तो इस शीर्ष जांच एजेंसी के लिए भारतीय लोकतांत्रिक भाषा में कहा जाने लगा है, ‘सीबीआई जांच कर रही थी, कर रही है और करती रहेगी.’ अभी उत्तर प्रदेश में जो राशन घोटाला हुआ है, उसमें अत्याधुनिक हथियार ‘आधार-कार्ड’ इस्तेमाल में लाया गया है. सरकार ने जिस तेज गति से आधार-कार्ड प्रणाली को देश में लागू किया और जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक की राय को ठेंगा दिखा दिया, उसकी वजह लोगों को अब समझ में आ रही है.

घोटालेबाजों की सुविधा के लिए अब आधार-कार्ड भी एक औजार की तरह इस्तेमाल में लाया जाएगा. यूपी के विभिन्न जिलों में घोटालेबाजों ने ऐसा कर दिखाया है. विडंबना यह है कि राशन घोटाले में दुकानदार, डीलर, कोटेदार और कुछ मामूली लोगों को फंसा कर मामला निपटा दिया जाता है. कोई नेता, नौकरशाह, बड़ा पूंजीपति या बड़ा दलाल नहीं पकड़ा जाता. जबकि प्रदेशभर में हुए राशन-घोटाले एक ही ‘मोडस-ऑपरेंडाई’ यह बताने के लिए काफी है कि राशन-घोटाले में शामिल लोग ‘एकसूत्रित’ हैं. इस सूत्र का सिरा कहां और किनके हाथ में है? यह सरकार पक्की तौर पर जानती है, पर उस स्तर पर कार्रवाई नहीं कर सकती. बेशर्मी इतनी बढ़ गई है कि घोटाले की खबरें भी अब महज औपचारिक ही होकर रह गई हैं.

घोटालेबाज़ों के इस तरह काम आ रहा आधार-कार्ड

उत्तर प्रदेश सरकार के नौकरशाहों ने अपने तंत्र के जरिए कराए राशन घोटाले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन कार्ड धारकों के आधार-कार्ड को घोटाले का आधार बना लिया. राशन कार्ड धारकों के आधार-कार्ड के जरिए प्रदेश के 50 जिलों में 1.86 लाख से अधिक परिवारों का राशन बाजार में बेच डाला गया. घोटाले में आधार-कार्ड में दर्ज डाटा के साथ फर्जीवाड़ा किया गया. सरकार ने माना कि उत्तर प्रदेश के 50 जिलों में आधार से संचालित ‘प्वाइंट ऑफ सेल’ (पीओएस) मशीनों के जरिए असली लाभार्थियों के विवरण के साथ फर्जीवाड़ा किया गया और अरबों रुपए का राशन घोटाला किया गया. 50 जिलों में सबसे अधिक इलाहाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और नोएडा में आधार-कार्ड राशन घोटाला हुआ. इलाहाबाद में 37,500 राशन-कार्ड लाभार्थी परिवारों का राशन हड़पा गया. इसी तरह मेरठ में 27,000, मुजफ्फरनगर में 19,000, गाजियाबाद में 16,500 और नोएडा में 16,000 राशन-कार्ड धारक परिवारों के साथ घोटाले हुए. इस फ्रॉड में कम्प्यूटर तकनीक का इस्तेमाल किया गया और लाभार्थियों के वास्तविक आधार-कार्ड नम्बर में फेरबदल कर दिया गया.

घोटालेबाजों ने बायोमेट्रिक ट्रांजैक्शन पूरा किया. ट्रांजैक्शन के बाद वास्तविक आधार नम्बर फिर से सिस्टम से जोड़ दिया गया. इस वजह से वास्तविक लाभार्थी को राशन नहीं मिल सका और वह राशन बाजार में बेच डाला गया. राशन से वंचित रहे असली लाभार्थियों के आधार-कार्ड के ब्यौरे बता रहे हैं कि उन्हें राशन मिलता रहा है. स्वाभाविक है कि ऐसे सुनियोजित घोटाले में सत्ता के गलियारे में बैठे नौकरशाहों से लेकर खाद्य विभाग और अन्य सम्बद्ध विभागों के अधिकारी, कर्मचारी, राशन डीलर, कोटेदार, दलाल, कम्प्यूटर जानकारों का पूरा सिंडिकेट शामिल है.

घोटाले की जांच में शामिल एक अधिकारी ने बताया कि शातिर घोटालेबाज राशन कार्ड से जुड़े आधार-कार्डों के नम्बर कुछ देर के लिए बदल देते हैं. फेरबदल कर दूसरे आधार-कार्ड नम्बर वाले व्यक्ति के अंगूठे के निशान का इस्तेमाल कर राशन उठा लिया जाता रहा. राशन उठा लेने के बाद आधार-कार्ड नम्बर को फिर से सही कर दिया जाता है. असली कार्ड धारक हतप्रभ और ठगा रह जाता है. घोटाला उजागर होने के बाद योगी सरकार भले ही यह कहती रहे कि भविष्य में उच्च स्तर की मशीनें लगेंगी जो आंख के रेटीना से पहचान करेंगी वगैरह, वगैरह. सरकार के खाद्य एवं रसद विभाग ने भी घोटाला संपादित हो जाने के बाद बड़बोला बयान दिया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना के सॉफ्टवेयर में दखल के अधिकार सीमित कर दिए गए हैं. लेकिन जो घोटाला हो गया उसका क्या होगा? घोटाले के बाद जो उपाय किए या सुझाए जाते हैं, वह पहले क्यों नहीं किए जाते? यह आधिकारिक तथ्य है कि हर घोटाले के बाद सरकार भविष्य में कोई ऐसा तंत्र विकसित करने का झांसा देती है, जिससे घोटाला नहीं होगा, लेकिन घोटाला जारी ही रहता है.

अ़फसरों पर आंच नहीं, डीलरों पर कार्रवाई का प्रहसन

आधार-कार्ड के जरिए प्रदेशभर में जमकर राशन घोटाला किया गया. इसकी चपेट में यूपी के करीब 50 जिले आए. राशन-घोटाले का जिलावार ब्यौरा आप के समक्ष रख रहे हैं, ताकि आपको घोटाले का पूरा परिदृश्य और सरकारी अफसरों की खुद को भोला-भाला दिखाने की नौटंकी साफ-साफ दिख सके. मेरठ जिले से बात शुरू करते हैं. मेरठ जिला आपूर्ति कार्यालय अब खुद यह कह रहा है कि खाद्यान्न माफियाओं ने एक-एक आधार-कार्ड को कई-कई राशन कार्डों से लिंक कराकर घोटाला किया. घोटाला उजागर हुआ तो शासन ने आनन-फानन मेरठ जिले के 149 राशन डीलरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया.

घोटाले में कम्प्यूटर तकनीक का काम करने वाली एजेंसी के भी लिप्त होने की बात उजागर हुई. यह बात अब सामने आ रही है कि एक-एक राशन डीलर के 40 फीसदी राशन कार्ड फर्जी थे, जिसे विभिन्न आधार-कार्डों से लिंक कर घोटाला किया जा रहा था. आप इस सूचना को भी रेखांकित करते चलें कि प्रदेश में भाजपा सरकार के सत्तारूढ़ होते ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मेरठ जिले में चल रहे राशन घोटाले के बारे में जानकारी दे दी थी. प्रदेश के पूर्व मंत्री और सत्ताधारी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को हाशिए पर रख दिया गया और उन्हें सियासत की मुख्यधारा से ही काटकर अलग कर दिया गया. ईमानदारी और सरलता डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी की ‘अयोग्यता’ थी.

बहरहाल, अकेले मेरठ जिले में करीब 50 हजार राशन कार्ड फर्जी पाए गए थे. सरकार ने राशन-कार्डों को आधार-कार्ड से लिंक करने का नियम बना कर घोटालेबाजों के हाथ में एक और कारगर तकनीकी औजार दे दिया. सरकार का आधिकारिक आंकड़ा ही बताता है कि केवल मेरठ जिले के साढ़े चार लाख राशन-कार्ड आधार-कार्ड से लिंक किए गए. इन कार्डों में परिवार के मुखिया समेत करीब 18 लाख 53 हजार यूनिट (सदस्य) हैं. इसके अलावा 9229 अंत्योदय कार्ड हैं. अधिकारी बताते हैं कि पहले राशन-कार्डों के जरिए घोटाले होते थे, अब आधार-कार्ड भी घोटाले का आसान जरिया बन गया.

आधार-कार्डों के ‘ऑनलाइन’ सत्यापन में यह खुलासा हुआ कि हजारों हजार राशन-कार्ड धारकों के आधार-कार्ड एक साथ दर्जनों राशन-दुकानों से लिंक्ड हैं और उनके नाम पर राशन उठाए जा रहे हैं. मामला उजागर होते ही इस पर रोक लगाने और कानूनी कार्रवाई करने के बजाय पूरा सरकारी अमला इसे दबाने में ही लग गया. अब जब शीर्ष स्तर से कार्रवाई का दबाव बना तब यह पता चला कि जिस एजेंसी को राशन-कार्ड का ब्यौरा फीड करने और उसे आधार-कार्ड से लिंक करने का ठेका दिया गया था, वह भी आंकड़ों को गड्‌डमड् ड करने में लिप्त थी. एजेंसी ने पति को पिता, पिता को पति और राशन-कार्ड धारकों के परिवार के सदस्यों के नाम तक गायब कर दिए या फेरबदल कर दिए. गरीबों को मुफ्त या निम्न दर पर अनाज दिए जाने के लिए बने राशन-कार्ड अधिकाधिक उन पॉश इलाकों के पाए गए हैं, जहां रहने वाले लोगों को राशन-कार्ड से कोई मतलब नहीं है. इन पॉश इलाकों के राशन-कार्ड सरकारी अफसरों के आधार-कार्डों से लिंक कर घोटाले किए जा रहे थे, लेकिन सरकार ने अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं की.

आधार-कार्ड को लिंक कर ‘प्वाइंट ऑफ सेल’ (पीओएस) मशीनों के जरिए राशन दिए जाने की प्रक्रिया में भी घोटालेबाजों ने मन-मुताबिक तकनीकी-फेरबदल का फर्जीवाड़ा किया और गरीबों का राशन हड़पा. पॉश इलाकों में रहने वाले लखपती और करोड़पतियों के नाम से बने फर्जी राशन-कार्ड भारी संख्या में बरामद हुए हैं. अब कोई अधिकारी यह नहीं बता रहा कि इन राशन कार्डों को आधार-कार्ड से लिंक कैसे किया गया. मेरठ के पल्लवपुरम, शास्त्रीनगर, जागृति विहार, शताब्दीनगर, आदर्श नगर, जैन नगर, थापर नगर, साकेत जैसी पॉश कालानियों में रहने वाले समृद्ध और समर्थ निवासियों के नाम पर हजारों फर्जी राशन-कार्ड बना लिए गए थे. इन राशन-कार्डों को अफसरों और दलालों के आधार-कार्ड से लिंक कर वास्तविक लाभार्थी गरीब परिवारों का राशन बाजार में बेचा जा रहा था.

इसी तरह मुजफ्फरनगर में भी राशन-कार्डों को आधार-कार्ड से लिंक कर राशन घोटाला किए जाने का मामला खुला. इस जिले में भी एक आधार-कार्ड का डाटा कई-कई राशन-कार्डों से लिंक कर राशन उठाया जा रहा था. सरकार से मिली उस आधिकारिक सूचना पर आप आश्चर्य करेंगे कि एक-एक आधार-कार्ड हजारों हजार बार राशन उठाने में काम में लाए गए. जिले के 64 आधार-कार्ड ऐसे पाए गए हैं, जिन्हें 19 हजार 795 बार इस्तेमाल में लाया गया और सरकार कहती है कि उसे घोटाले का पता नहीं था! घोटालेबाज गरीबों का राशन बाजार में बेच रहे थे, सरकार के करोड़ों अरबों रुपए पर खुलेआम डाका डाल रहे थे, लेकिन शासन में विभिन्न आसनों पर बैठे नौकरशाहों को इसकी जानकारी न हो, यह संभव ही नहीं है. नौकरशाहों और सरकारी अमले की मिलीभगत के बिना घोटाला हो ही नहीं सकता. सरकार के अधिकारी जब यह बयान देते हैं कि ‘पुलिस हैकरों की सरगर्मी से तलाश कर रही है’, तो यह बयान फुहड़ चुटकेले से अधिक कुछ नहीं लगता.

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में भी गरीबों के राशन-कार्डों को फर्जी आधार-कार्डों से लिंक कर राशन उठाए जाने का मामला खुला. घोटालेबाजों ने यहां भी ‘प्वाइंट ऑफ सेल’ (पीओएस) मशीनों का घोटाले में इस्तेमाल किया और सरकारी धन हड़पा. जिला आपूर्ति विभाग के अफसरों ने आधा दर्जन लोगों पर कार्रवाई शुरू कर के अपना हाथ झाड़ लिया.

नोएडा के सेक्टर-20 में निशा जोशी, दादरी कोतवाली में बिसाहड़ा निवासी राहुल सिंह, रोहित कुमार, दादरी निवासी विकास मित्तल, अमित कुमार और दीपक पीलवान के खिलाफ आईटी एक्ट, आधार एक्ट-2016 और खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया है. जबकि गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) जिले में सौ से अधिक कार्ड ऐसे पाए गए, जिस पर महज एक महीने में पांच सौ से अधिक बार राशन जारी कराया गया. जबकि एक कार्ड पर एक महीने में एक ही बार राशन दिए जाने का नियम है. गौतम बुद्ध नगर में 395 कोटेदार और दो लाख से अधिक राशन कार्ड धारक हैं. नोएडा, दादरी और जेवर स्थित 144 राशन दुकानों पर ही ‘प्वाइंट ऑफ सेल’ (पीओएस) मशीनें लगी हैं.

राजधानी लखनऊ के करीब कानपुर जिले में भी करीब 10 हजार राशन-कार्डों को आधार-कार्ड से लिंक कर राशन उठाने का गोरखधंधा फिलहाल सामने आया है. इससे सरकारी खजाने पर 40 लाख 45 हजार 250 रुपए की चोट लगी. घपले में जिले के 42 कोटेदारों के शामिल रहने की आधिकारिक स्वीकारोक्ति की गई है. कानपुर के राशन वितरण का केवल जुलाई महीने का डाटा बता रहा है कि 42 कोटेदारों ने एक राशन-कार्ड पर एक ही आधार-कार्ड से सैकड़ों बार राशन निकाला. कानपुर में भी पाया गया कि असली लाभार्थी के आधार-कार्ड में दर्ज आंकड़ों में छेड़छाड़ कर अन्य व्यक्तियों का ब्यौरा दर्ज कर राशन उठाया जा रहा था.

घोटालेबाजों ने महज 17 आधार कार्डों के जरिए सारे घोटाले को अंजाम दिया. केवल 17 आधार-कार्डों के जरिए केवल जुलाई महीने में 1393.8 क्विंटल गेहूं और 929.2 क्विंटल चावल उठाया गया. तकरीबन ढाई हजार क्विंटल सरकारी अनाज का घोटाला हुआ, लेकिन अधिकारी यह कहते नहीं शरमाते कि ‘यह कोई नया मामला थोड़े ही है’, वे बड़े गर्व से यह बताते हैं कि अप्रैल-2012 में कलक्टरगंज थाना क्षेत्र में दो सौ क्विंटल चावल पकड़ा गया था. घोटालेबाजों ने पुलिस के साथ मिल कर बरामद चावल की जगह सिंघाड़ा दर्ज कर दिया था. इसी तरह का दूसरा मामला इसी साल फरवरी महीने में उजागर हुआ. पोखरपुर स्थित लक्ष्मी मित्तल फुड परिसर से 652 बोरे गेहूं और दो सौ क्विंटल सरकारी चावल पकड़ा गया. एफआईआर दर्ज कराने की औपचारिकता निभाई गई और घोटालेबाज मस्त रहे.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिले भी खाद्यान्न घोटाले से अछूते नहीं हैं. इलाहाबाद के खुल्दाबाद थाने में दर्ज एक मुकदमा इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि घोटाले में शामिल रहने के आरोपी दो कोटेदारों ने ही खाद्यान्न आपूर्ति अधिकारी के खिलाफ याचिका दाखिल कर दी. इन कोटेदारों का कहना है कि घोटालेबाजों को बचाकर आपूर्ति अधिकारी ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी. याचिका दाखिल करने वाले कोटेदारों का कहना है कि वे आधार-कार्ड के बायोमेट्रिक पहचान तकनीक का इस्तेमाल कर ‘प्वाइंट ऑफ सेल’ (पीओएस) मशीनों के जरिए नियमपूर्वक राशन देते हैं, इसकी जांच करा ली जाए. पूर्वांचल के गाजीपुर जिले में भी खाद्यान्न घोटाला पकड़ में आने के बाद करीब दो दर्जन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की औपचारिकता निभाई गई है. केवल एक महीने में गाजीपुर के 31 आधार-कार्डों के जरिए 3060 बार राशन उठा लिया गया. दो दुकानें ऐसी निकलीं, जहां से 18 क्विंटल राशन उठाया गया.

दस्तावेजों पर गाजीपुर जिले के साढ़े पांच लाख राशन कार्डों पर करीब 25 लाख लोगों को सस्ते दर पर या मुफ्त राशन मुहैया कराया जा रहा है, लेकिन असलियत में अधिकांश सरकारी राशन बाजार में बिक रहा है.

घोटाले में शामिल है सरकारी तंत्र, शासन लापरवाह

यह स्पष्ट और प्रमाणित हो चुका है कि खाद्यान्न या राशन घोटाले में सरकारी तंत्र शामिल है, लेकिन सरकार इस तथ्य के प्रति पूरी तौर पर लापरवाही बरत रही है. केंद्र सरकार की खाद्य सुरक्षा योजना अधिकारियों और माफियाओं की कमाई का जरिया बनी हुई है. खाद्य सुरक्षा योजना के तहत गरीबों के लिए हर महीने जो गेहूं और चावल मुफ्त या निम्न दर पर बांटने के लिए दिया जा रहा है, वह गरीबों के पास नहीं पहुंच कर बाजार में बिक रहा है और घोटालेबाजों को मोटी कमाई दे रहा है. गरीबों के लिए दिया जाने वाला अनाज सरकारी गोदामों से सीधे व्यापारियों के भंडारों में पहुंच जाता है. कोटेदार भी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के दबाव में भ्रष्टाचार पर उतर आते हैं. सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों की ‘मांग’ पूरी करना कोटेदारों को अपना धंधा बचाए रखने के लिए जरूरी हो गया है.

कई कोटेदार खुलेआम कहते मिलेंगे कि सप्लाई और स्टॉक चेकिंग के नाम पर अधिकारी और कर्मचारी मनमानी करते हैं और भारी रकम वसूलते हैं. अधिकारियों, बाबुओं, सप्लाई इंसपेक्टरों और सप्लाई क्लर्कों के घर में उनके वेतन का अनाज थोड़े ही आता है! मुफ्त के अनाज के साथ-साथ रिश्वत की भारी रकम इनके लिए रुटीन की आमद है. मांग पूरी नहीं की तो दुकान का लाइसेंस रद्द करने की धमकी मिलना आम बात है. राशन माफिया और आपूर्ति विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से प्रदेशभर में अनाज की कालाबाजारी का गोरखधंधा बेखौफ चल रहा है. गोदामों से गरीबों का अनाज राशन माफिया के वाहनों से खुलेआम ढोया जाता है. कानपुर के फतेहपुर, घाटमपुर, जहानाबाद जैसे इलाकों में तो सरकारी गोदाम माफियाओं के इशारे पर खुलते हैं और बंद होते हैं.

अब नेता का आधिकारिक बयान भी सुनते चलें…

उत्तर प्रदेश के खाद्य, रसद एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के राज्यमंत्री अतुल गर्ग आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार करते हैं कि खाद्यान्न घोटाले से सरकार को हर महीने कम से कम 10 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाया गया. गर्ग के मुताबिक, खाद्यान्न घोटाले में 105 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और घोटाले में लिप्त 450 लोगों को चिन्हित किया गया है, जिनके खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है. मंत्री ने यह माना कि यह अपने किस्म का पहला घोटाला है, जिसे नकली आधार कार्ड और यहां तक कि अन्य राज्यों के नागरिकों के आधार कार्ड की गलत फीडिंग कर के अंजाम दिया गया. गर्ग ने कहा कि योगी सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार से 10 लाख अधिक राशन कार्ड बनवाए थे, ताकि गरीबों तक अनाज पहुंच सके. लेकिन मानवता के आधार पर जिन लोगों के लिए राशन दिया गया, उसे घोटालेबाजों ने बीच से ही गायब कर दिया. सरकार हर वर्ष नौ हजार करोड़ रुपए का राशन बांटती है.

हैरत में डालता है खाद्यान्न घोटाले का यह आंकड़ा

खाद्यान्न घोटाले का आधिकारिक आंकड़ा देखें तो आप हैरत में पड़ जाएंगे. जबकि योगी सरकार के कार्यकाल का यह घोटाला बहुत पुराना नहीं है. सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि शामली जिले में 9 आधार कार्डों के जरिए पांच सौ राशन-कार्ड धारकों का राशन हड़पा गया. इलाहाबाद में 107 आधार-कार्डों के जरिए 37574 राशन कार्ड धारकों का राशन हड़पा गया. इसी तरह मेरठ में 108 आधार कार्ड से 27324 राशन-कार्ड धारकों का राशन, गाजियाबाद में 69 आधार-कार्डों से 16,568 राशन-कार्ड धारकों का राशन, गौतमबुद्धनगर में 36 आधार-कार्डों से 16058 राशन-कार्ड धारकों का राशन, कानपुर नगर में 17 आधार-कार्डों से 9292 राशन-कार्ड धारकों का राशन, बिजनौर में 37 आधार-कार्डों से 8837 राशन-कार्ड धारकों का राशन, आगरा में 41 आधार-कार्डों से 8468 राशन-कार्ड धारकों का राशन और मुरादाबाद में 83 आधार-कार्डों के जरिए 6718 राशन-कार्ड धारकों का राशन हड़पा गया.

यूपी की राजधानी लखनऊ में 24 आधार-कार्डों के जरिए 4794 राशन-कार्ड धारकों का राशन गायब किया गया. इसी तरह सहारनपुर में 7 आधार-कार्डों से 3700 राशन-कार्ड धारकों का राशन, गाजीपुर में 31 आधार-कार्डों से 3065 राशन-कार्ड धारकों का राशन, अमरोहा में 32 आधार-कार्डों से 2527 राशन-कार्ड धारकों का राशन, वाराणसी में 13 आधार-कार्डों से 2064 राशन-कार्ड धारकों का राशन, फतेहपुर में 7 आधार-कार्डों से 1898 राशन-कार्ड धारकों का राशन, जालौन 7 आधार-कार्डों से 1870 राशन-कार्ड धारकों का राशन, फिरोजाबाद में 6 आधार-कार्डों से 1510 राशन-कार्ड धारकों का राशन, मऊ में 21 आधार-कार्डों से 1509 राशन-कार्ड धारकों का राशन, कन्नौज में 10 आधार-कार्डों से 1325, बरेली में महज चार आधार-कार्डों से 1299 राशन-कार्ड धारकों का राशन, इटावा में 9 आधार-कार्डों से 1135 राशन-कार्ड धारकों का राशन, हाथरस में 5 आधार-कार्डों से 1065, बागपत में 13 आधार-कार्डों से 1024 राशन-कार्ड धारकों का राशन, मिर्जापुर में 7 आधार-कार्डों से 1023 राशन-कार्ड धारकों का राशन, रायबरेली में 9 आधार-कार्डों से 927 राशन-कार्ड धारकों का राशन, मैनपुरी में 7 आधार-कार्डों से 898 राशन-कार्ड धारकों का राशन, ललितपुर में 5 आधार-कार्डों से 776 राशन-कार्ड धारकों का राशन, औरैया में 9 आधार-कार्डों से 665 राशन-कार्ड धारकों का राशन, मथुरा में 6 आधार-कार्डों से 488 राशन-कार्ड धारकों का राशन, बुलंदशहर में 7 आधार-कार्डों से 360 राशन-कार्ड धारकों का राशन, कासगंज में 2 आधार-कार्डों से 144 राशन-कार्ड धारकों का राशन, बहराइच में 21 आधार-कार्डों से 138 राशन-कार्ड धारकों का राशन, संत रविदासनगर में 3 आधार-कार्डों से 115 राशन-कार्ड धारकों का राशन, रामपुर में 2 आधार-कार्डों से 93 राशन-कार्ड धारकों का राशन, आजमगढ़ में 5 आधार-कार्डों से 70 राशन-कार्ड धारकों का राशन, कानपुर देहात में 2 आधार-कार्डों से 61 राशन-कार्ड धारकों का राशन, बलरामपुर में 3 आधार-कार्डों से 38 राशन-कार्ड धारकों का राशन, हमीरपुर में मात्र एक आधार-कार्ड पर 29 राशन-कार्ड धारकों का राशन, अलीगढ़ में 3 आधार-कार्डों से 356 राशन-कार्ड धारकों का राशन, सुल्तानपुर 3 आधार-कार्डों से 279 राशन-कार्ड धारकों का राशन, गोंडा में 2 आधार-कार्डों से 209 राशन-कार्ड धारकों का राशन और हापुड़ में 2 आधार-कार्डों से 186 राशन-कार्ड धारकों का राशन गायब किया गया.

खाद्यान्न घोटाले को ही खा गई सीबीआई

मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में वर्ष 2004 में भीषण खाद्यान्न घोटाला उजागर हुआ था. इसे दो अरब का अनाज घोटाला बताया गया था. घोटाले की जांच सीबीआई को दी गई थी, लेकिन सीबीआई ने इस मामले में कुछ फौरी कार्रवाई के अतिरिक्त कुछ नहीं किया, 14 साल बीत गए. इस खाद्यान्न घोटाले की लीपापोती करने और सारे तथ्यों को छिन्न-भिन्न करने में सरकारी अमले के साथ-साथ अदालतों ने भी भूमिका अदा की. जांच के नाम पर हास्यास्पद हरकतें हुईं. आधा मामला सीबीआई को जांच के लिए दिया गया तो आधा मामला एसआईटी को जांच के लिए दे दिया गया. यह आधी-आधी जांच पूर्ण-सत्य तो क्या अर्ध-सत्य तक भी नहीं पहुंच पाई. उस समय भी गरीब परिवारों के लिए आया 35 हजार करोड़ रुपए का अनाज गरीबों को न देकर खुले बाजार में बेच डाला गया था. करोड़ों रुपए का सरकारी अनाज तस्करी कर नेपाल, बांग्लादेश और अफ्रीकी देशों में भेजा गया था.

नेपाल, बांग्लादेश सीमा पर 60 लाख रुपए से अधिक का अनाज पकड़े जाने के बाद सरकारी मिलीभगत से हो रही तस्करी का भंडाफोड़ हुआ था. मुलायम सिंह ने विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर मामले की जांच उसे ही सौंप दी. वर्ष 2004 में मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में हुए अरबों रुपए के खाद्यान्न घोटाला मामले की जांच के लिए वर्ष 2005 में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसके आधार पर वर्ष 2007 में सीबीआई को जांच का आदेश दिया गया था. हालांकि जब मायावती सत्ता में आई थीं तब उन्होंने भी मामले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की थी. केंद्र में उस समय कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन वह चुप्पी साधे रही.

जानकार बताते हैं कि वर्ष 2002 से लेकर 2007 के बीच सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, जवाहर रोजगार वचन कार्यक्रम (दोनों मनरेगा से जुड़े), दोपहर भोजन योजना (मिड-डे मील स्कीम), अन्नपूर्णा कार्यक्रम, अंत्योदय कार्यक्रम, गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) एवं गरीबी रेखा से (एपीएल) सहयोग योजना जैसी केंद्रीय योजनाओं के तहत केंद्र से भेजा गया लाखों टन अनाज खाद्यान्न माफियाओं ने हड़प लिया. तब यह भी खुलासा हुआ था कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामों और उत्तर प्रदेश सरकार के गोदामों से सरकारी गेहूं-चावल तस्करी के रास्ते नेपाल, बांग्लादेश और अफ्रीकी देशों तक गया और वहां के बाजारों में बिका.

इस भीषण घोटाले में खाद्यान्न माफियाओं ने नौकरशाहों और सरकारी अमले की मिलीभगत से आगरा, अलीगढ़, आजमगढ़, इलाहाबाद, औरैया, बलरामपुर, बदायूं, बहराइच, बलिया, इटावा, ऐटा, फतेहपुर, फिरोजाबाद, फर्रुखाबाद, गाजीपुर, गोंडा, हरदोई, जौनपुर, जालौन, झांसी, कौशाम्बी, कानपुर, कन्नौज, लखीमपुर खीरी, ललितपुर, लखनऊ, मिर्जापुर मऊ, मथुरा, मैनपुरी, महोबा, मुजफ्फरनगर, प्रतापगढ़, पीलीभीत, संत कबीरनगर, संत रविदास नगर, सोनभद्र, श्रावस्ती, शाहजहांपुर, सीतापुर, वाराणसी समेत कई अन्य जिलों को शिकार बनाया और लाखों टन सरकारी अनाज गायब कर दिया. उत्तर प्रदेश के 31 जिलों में पैदावार से अधिक अनाज मंडी में बिकने के लिए पहुंच गया.

रायबरेली में तो वर्ष 2002 से 2007 के दरम्यान पैदावार से एक लाख क्विंटल अधिक अनाज मंडी में बिकने के लिए पहुंच गया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई को जांच का दायित्व सौंपते हुए अनाज घोटाले से सम्बद्ध सभी जांच छह महीने में पूरा करने का आदेश दिया था. लेकिन सीबीआई ने 14 साल लगा दिए, पर अब तक कुछ नहीं किया. सीबीआई ने नेताओं की तरह हाईकोर्ट का आदेश ताक पर रख दिया.

सीबीआई की कार्रवाई केवल दस्तावेजी संदर्भ बन कर रह गई. सीबीआई ने केवल लखीमपुर खीरी और बलिया में हुए खाद्यान्न घोटाले से जुड़े 175 अधिकारियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी. सीबीआई ने इन दोनों जिलों में वर्ष 2004-05 के बीच हुए खाद्यान्न घोटाले के संदर्भ में नौ एफआईआर दर्ज की थी. इनमें से आठ बलिया खाद्यान्न घोटाले की थी और एक लखीमपुर खीरी के घोटाले की. बलिया के आठ तत्कालीन सीडीओ, कई एसडीएस, तहसीलदार और ग्राम प्रधान समेत 71 लोग नामजद किए गए थे. मायावती सरकार ने एक दिसम्बर 2007 को खाद्यान्न घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की थी.

हालांकि एसआईटी ने भी यह कहा था कि घोटाले में केंद्रीय खाद्य विभाग के अधिकारी भी लिप्त हैं और मामला अंतरराष्ट्रीय तस्करी से भी जुड़ा है, लिहाजा मामले की जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए. जांच अपने हाथ में लेने के बाद भी काफी खींचतान के बाद सीबीआई ने खाद्यान्न घोटाले के 52 मामलों में से केवल नौ मामलों में ही अपनी रिपोर्ट मुख्यालय को सौंपी. सीबीआई ने कम स्टाफ का रोना रोकर यूपी पुलिस के नौ इंस्पेक्टरों, नौ सब-इंस्पेक्टरों, 18 हेड कॉन्सटेबुलों, कम्प्यूटर के चार विशेषज्ञों, खाद्य विभाग के दो अधिकारियों, 10 सरकारी वाहनों और उस के ड्राइवरों की फौज अपने साथ जोड़ी, लेकिन सीबीआई के अधिकारी केवल सरकारी सुविधाएं ही भोगते रह गए.

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