मुंबई: रमजान की आमद पर दुनियाभर में मुसलमान खुशी महसूस करते हैं। वैसे तो सभी जानते हैं कि रमजान का महीना रहमतों, बरकतों, नेकियों और नियामतों का है। लेकिन जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दें कि इस पाक महीने को रमजान क्यों कहा जाता है? अरबी भाषा में गरमी की शिद्दत को रम्ज और धूप से तपती हुई जमीन को रमजा कहा जाता है। इस दौर में चूंकी- रमजान-उल-मुबारक का महीना सख्त गर्मी में आता था, इसलिए इसे रमजान कहा जाने लगा।

एक रिवायत के मुताबिक रमजान अल्लाह के निन्यानवे नामों में से एक है। इसलिए लोग इसे एहतराम के साथ शहरे-रमजान अर्थात माह-ए-रमजान भी कहते हैं। सभी लोग रूहानी उम्मीदों के साथ इस महीने का इस्तकबाल करते हैं। रमजान सब्र का महीना है और सब्र का फल जन्नत है।

रोजेदार जब इस महीने में सिर्फ अल्लाह के लिए अल्लाह के हुक्म से और अल्लाह की खुशी के लिए अपनी पसंद की तमाम चीजें छोड़कर अपनी ख्वाहिशात को रोककर सब्र करता है, तो अल्लाहपाक ऐसी कुरबानी देने वाले बंदों को जन्नत की राहतें और लज्जतें अता फरमाएगा। यह महीना हमदर्दी का है।

इस महीने में हर रोजेदार को भूखे की भूख और प्यासे की प्यास का एहसास होता है। उसे पता चलता है कि दुनिया के जिन लोगों को गरीबी की वजह से फाके होते हैं, उन पर क्या बीतती होगी। रोजे से आदमी में इंसानियत के प्रति हमदर्दी और गम ख्वारी का जज्बा पैदा होता है।

इस महीने में एक रात है शबे कद्र, जो हजारों महीनों से बढ़कर है। अल्लाह तआला ने उसके रोजे को फर्ज फरमाया है। जो शख्स इस महीने में किसी नेकी के साथ अल्लाह का कुर्ब्र (निकटता) हासिल करे, वह ऐसा है, जैसा कि गैर रमजान में फर्ज अदा किया और जो शख्स इस महीने में किसी फर्ज को अदा करे वह ऐसा है, जैसा कि गैर रमजान में सत्तर फर्ज अदा करे।

इस महीने में जो शख्स किसी रोजेदार का रोजा इफ्तार कराए, उसके लिए गुनाहों के माफ होने और आग से खलासी का सबब होगा और रोजेदार के सवाब की मानिंद उसको सवाब मिलेगा। मगर इस रोजेदार के सवाब से कुछ कम नहीं किया जाएगा।

इस महीने में नेकी, हमदर्दी, सहयोग और भाईचारे का एहसास अता होता है। गरीब और अमीर को एक-दूसरे के एहसासात और जज्बात को समझने का मौका मिलता है। इंसानी सेहत को बरकरार रखने मे जो चीजें कारामद हैं, वे तमाम चीजें इस महीने में हासिल होती हैं।