m15पिछले कई दशक से पानी के लिए तरस रहा बिहार का हेरिटेज शहर गया-बोधगया भारी वर्षा से परेशान है. 5-6 सितंबर को हुई भारी बारिश ने पूरे शहर को डूबो दिया. बारिश के बाद भी आधा दर्जन से अधिक मोहल्ले पानी में डूबे हुए हैं.  बारिश की वजह से गया अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, रेलवे स्टेशन, समाहरणालय, नगर-निगम कार्यालय, अस्पताल समेत शहर के निचले इलाकों में स्थित मोहल्लो में पानी भर गया. गया के हवाई अड्डे के रनवे पर दो फीट पानी का जमाव हो गया, जिसकी वजह से आने-जाने वाली सभी उड़ाने दो दिनों तक रद्द कर दी गईं. इसके अलावा रेलवे स्टेशन के ट्रैक पर भी दो फीट जल जमाव हो गया, जिसकी वजह से दर्जनों ट्रेनों का आवागमन बाधित हो गया और कई ट्रेनों को रद्द करना पड़ा. रेलवे अनुमंडल अस्पताल, अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज सह अस्पताल, जयप्रकाश नारायण अस्पताल, प्रभावती अस्पताल में भी भारी जलजमाव हो गया, जिसकी वजह से अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों काफी परेशानी उठानी पड़ी.

महाबोधि मंदिर, 80 फीट मंदिर समेत एक दर्जन से अधिक विदेशी बौद्ध मठ पानी में डूब गए. भारी बारिश ने गया और बोधगया में बाढ़ का रूप ले लिया. कुछ मोहल्लो की स्थिति इतनी खराब हो गई, उनका जायजा लेने खुद नीतीश कुमार को आना पड़ा. लोगों का कहना है कि 70 की दशक के शुरुआत में ऐसी भारी बारिश हुई थी और तब इतनी तबाही नहीं मची थी, क्योंकि उस समय शहर की आबादी कम थी और मोहल्लों का विस्तार भी बहुत अधिक नहीं हुआ था. अंग्रेजों द्वारा बनाया ड्रेनेज सिस्टम भी अच्छी तरह काम कर रहा था. शहर के आस-पास स्थित नालों, आहर-पईन और छोटी नदियों का अतिकम्रण नहीं हुआ था, लेकिन पिछले दो दशक में भूमि माफियाओं ने आहर-पईन, नदी और बड़े नाले की भूमि को गलत तरीके से बेच कर घरों का निर्माण कर दिया, जिसकी वजह से पानी का निकास बंद हो गया. इन सभी आहर-पईन, नदी नालों का जुड़ाव फल्गु नदी से था. उसका नतीजा यह हुआ कि 24 घंटे की रिकार्ड तोड़ भारी बारिश हुई, तो गया शहर के नए बसे मोहल्ले पंतनगर, अशोक विहार, मधुसूदन कालोनी, मयूर विहार, विष्णुपुरी कालोनी, विष्णु-विहार कालोनी, सिद्धार्थपुरी कालोनी, करीमगंज, दुर्गा बारी रोड मोहल्ला पूरी तरह डूब गया. इनमें से कुछ मोहल्लों में स्थिति इतनी खराब हो गई कि घरों के ग्राउंड फ्लोर पूरी तरह पानी में डूब गए. यहा के निवासियों को अपने घर की छतों या पहले तल्ले पर भागकर जान बचानी पड़ी. वर्षा का पानी इतनी तेजी से घरों में घुसा कि लोगों को घर में पड़ी वस्तुओं को हटाने का भी मौका नहीं मिला. लोगों को खाने और पीने के पानी के लाले पड़ गए. चारों ओर हाहाकर मच गया. छोट-छोटे बच्चों के लिए दूध की समस्या उत्पन्न हो गई. स्थिति की भयावहता को देखकर राज्य सरकार ने जिला प्रशासन की मांग पर दो दिन बाद एसडीआरफ की टीम गया भेजी. जिससे इन मोहल्लों में फंसे हजारों लोगों को बाहर निकाला गया और राहत शिविर में रखा गया. लेकिन अधिकतर लोग दूसरे मोहल्लों में अपने रिश्तेदार के यहां जाकर रह रहे हैं. इन मोहल्लों में जो लोग अपने मकान के पहले मंजिले पर रह रहे हैं, उन लोगों को भी सांप बिच्छु और अन्य तरह के कीड़े-मकोड़ों का डर सता रहा है. हालांकि इसके लिए भी एसडीआरफ की टीम द्वारा दवा का छिड़काव किया जा रहा है. वाबजूद इसके अबतक अनेक घरों में सैकड़ों सांपों को मारा जा चुका है. सर्वे करने वाली एजेंसी इंटेक के आर्किटेक्ट अभिषेक कुमार ने कहा है कि गया शहर की इन समस्याओं के लिए गया शहर की प्राचीनकाल के तालाबों का अतिक्रमण कर उसके अस्तित्व को समाप्त किया जा रहा है. इंटेक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कभी गया शहर में 80 से 100 के आसपास सरोवर हुआ करते थे. ये सरोवर गर्मी में गया शहर को एक तरफ तापमान को ठीक रखते थे, तो वहीं दूसरी तरफ भूर्गीय जलस्तर को ठीक रखते थे. जिससे कि इस शहर के लोगों को पानी की दिक्कत नहीं होती थी. दूसरी ओर गया शहर के प्रसिद्ध बॉटमनाला को शहर के लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है. अभी भी आधा दर्जन से अधिक लोग इस नाले पर घर बनाए हुए हैं. भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी निलेश द्वेवरे जब गया नगर-निगम के नगर आयुक्त बनकर आए तो उन्होंने बॉटमनाला के अतिक्रमण को हटाना शुरू किया था. इस नाले पर बनाए गए कई मकान और कई दुकानें तोड़ी गईं, लेकिन तबतक निलेश द्वेवरे का स्थानातरण हो गया. नए आए नगर आयुक्त ने इस काम को ठंडे बस्ते में डाल दिया. शहर की प्रसिद्ध मधुश्रवा नदी जो बोधगया से निकलकर गया में विष्णुपद मंदिर के पास फल्गु नदी में मिलती थी, इस नदी का लोगों ने अतिक्रमण कर लिया और बाद में इस नदी को मनसरवा नाले के रूप में घोषित कर इसकी भूमि पर दर्जनों मकान बना दिये गए. गया नगर-निगम के पूर्व मेयर शाहगुफ्ता प्रवीण के मकान और पार्क का अधिकांश हिस्सा इसी मनसरवा नाले के ऊपर बना हुआ है. जिसकी वजह से पंतनगर, अशोक विहार, मधुसूदन कॉलनी के लोगों का घर पानी में डूबा हुआ है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जिला प्रशासन ने आस-पास के लोगों को जो अस्थायी रूप से टेंट लगाकर अपना व्यवसाय करते थे उनको हटा दिया, लेकिन पूर्व मेयर के मकान और पार्क को कब तोड़ा जाएगा, जिससे कई मोहल्लों को डूबने से बचाया जा सके.

अभी भी वर्तमान स्थिति में गया शहर के आधा दर्जन मोहल्लों में दो फीट से लेकर तीन फीट तक पानी जमा है जिसे निकालने में भारी परेशानी हो रही है. सबसे बड़ी समस्या पानी हटने के बाद विभिन्न तरह की बीमारी और महामारी होने की संभावना से लोग दहशत में है. लोगों में इस सवाल को लेकर काफी आक्रोश है कि नगर-निगम, अंचल कार्यालय और अन्य संबंधित कार्यालयों की ओर से सरकारी भूमि, नदी और नाले का अतिक्रमण कर फर्जी कागजात बनाकर जो मकान बनाया है इसे प्रशासन की ओर से कब तोड़ा जाऐगा? फिलहाल गया शहर पानी से परेशान है. विश्‍व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला भी शुरू हो रहा है. जिसमें देश-विदेश से लाखों लोगों को आना है. ऐसे में जिला प्रशासन और सरकार की कठिन परीक्षा होगी.

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