प्रोफेसर मधू दंडवते जी का जन्म, 21 जनवरी 1924 के दिन महाराष्ट्र के अहमदनगर में हुआ था ! अहमदनगर एक ऐतिहासिक शहर है ! सोलहवीं शताब्दी में निजामशाही की सल्तनत थी ! (1550-1590) चांदबिबी जिन्हें चांद खातून या चांद सुलताना के नाम से भी जाना जाता है ! शासक यहां की रही है ! जिसने मुगलों के साथ जबरदस्त टक्कर दी थी ! उन्होंने बिजापूर (1596-99)और अहमदनगर (1580-1590) सम्राट अकबर की सेना से अहमदनगर की रक्षा के लिए जाना जाता है ! और आज भी जनता के लिए इतिहास के तौर पर अद्भूत परिचय देता है !


उसके बाद अहमदनगर का किला आजादी के दिवानों का केंद्र बन गया था ! मुंबई के गोवालिया टॅंक के मैदान में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित करने वाली समस्त कांग्रेस कार्यकारिणी के ज्यादातर सदस्यों को 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जिसमें, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आझाद, आचार्य नरेंद्र देव, सरदार वल्लभ भाई पटेल, तथा संपूर्ण कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्यों को, इस किले के अंदर कैद कर के रखा था !


उसी अहमदनगर के किले के कैदखाने मे, जवाहरलाल नेहरू की विश्व प्रसिद्ध किताब ‘भारत एक खोज’ उसी दौरान लिखि गई है ! और मौलाना अबुल कलाम आझाद ने ‘घुबार- इ-खातिर’ शिर्षक से अपनी साहित्यिक प्रतिभा के साथ अपनी किताब, तथा आचार्य नरेंद्र देव का मशहूर ‘बौद्ध धर्म दर्शन’ इस ग्रंथ के लिखने की शुरुआत इसी किले से हुई है !


और भारत छोड़ो आंदोलन के सितारे तथा समाजवादी पार्टी के और राष्ट्र सेवा दल के संस्थापकों में से रावसाहब पटवर्धन और अच्युतराव पटवर्धन भी इसी शहर के प्रतिष्ठित परिवार से हैं ! और जिन्हें आजादी के आंदोलन की वजह से ‘सेनापति बापट’ के नाम से जाना जाता है ! वह सेनापति बापटने भी इसी शहर के उसी स्कूल से अपनी – अपनी पढ़ाई की है ! जिसका नाम ‘अहमदनगर एज्युकेशन सोसायटी’ है ! इसी स्कूल से प्रोफेसर मधू दंडवतेजी ने अपनी मॅट्रिक तक पढ़ाई पूरी की है ! जिसकी स्थापना महाराष्ट्र के समाजसुधारको में से एक न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे ने की है !


इसी स्कूल में दंडवतेंजी को क्रिकेट के खेल में रुचि निर्माण हुई ! जो खेल उनके पिताजी को भी बहुत पसंद था ! इसलिए उन्होंने तो मॅट्रिक के बाद उन्हें क्रिकेट के लिए अगली पढ़ाई के लिए मुंबई भेज दिया ! तो मधू दंडवते ने मुंबई के मशहूर रुइया कॉलेज में विज्ञान की शाखा में प्रवेश लिया ! और वहां दो साल पढ़ने के बाद ‘रॉयल इन्स्टिट्यूट ऑफ सायन्स’ जैसे प्रतिष्ठित विज्ञान की संस्था से फिजिक्स जैसे विषय में पोस्ट ग्रेजुएट तक कि पढ़ाई पूरी की ! हालांकि पिताजी खुद इंजीनियर थे ! इसलिए उनकी इच्छा थी कि मधू दंडवते ने भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई करनी चाहिए ! लेकिन उनकी रुचि भौतिक शास्त्र में होने की वजह से उन्होंने भौतिक शास्त्र में एम. एस्सि. तक की पढाई पूरी करने के बाद, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने शुरू किया हुआ (1945) ‘सिद्धार्थ कॉलेज’ में पोस्ट ग्रेजुएट के विद्यार्थियों को फिजिक्स पढाने के लिए सिध्दार्थ कॉलेज में प्रोफेसर बने ! जो उपाधि दंडवतेंजी के साथ आज भी चले आ रही है ! और वैसे भी पढाना उनका जूनून था ! जबकि वह सांसद बने, मंत्री बने लेकिन पढाने के लिए जब – जब उन्हें समय मिला उन्होंने बहुत खुशी से आईनस्टाईन के ‘सापेक्षता’ के सिध्दांत को पढाने में सब से अधिक रुचि ली है !
इस सिध्दांत पर बीसवीं शताब्दी के अंत में, जब वह केंद्र में मंत्री थे ! और कलकत्ता में आएं थे ! तो हमारे घर पर खाने पर बुलाया था ! तब हमारे बच्चे मॅट्रिक की क्लास में पढाई कर रहे थे ! और बचपन से ही उन्हें, हमारे घर में आने वाले सभी समाजवादी, गांधीवादी तथा राष्ट्र सेवा दल के, नेता तथा कार्यकर्ताओं का हमारे घर पर आना- जाना जारी होने की वजह से उन सभी के बारे में काफी करीब से परिचय था ! तो उन्हें दंडवतेंजी के बारे में पहले से ही मालूम था, कि वह फिजिक्स के प्रैफेसर रहे हैं ! तो उन्होेंने उन्हें सापेक्षता पर सवाल किया ! तो उन्होंने कहा कि “इसी तरह आइनस्टाइनको कुछ विद्यार्थियों ने पुछा था, कि” सापेक्षता का मतलब क्या है ?” तो आइनस्टाइनने क्या कहा वहीं मैं भी बताऊंगा जो बहुत ही सरल और सुंदर है ! “सापेक्षता का अर्थ बहुत आसान है ! अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ती के निकट घंटों बैठ कर भी यही लगता है कि, अभी कुछ मिनट ही हुए हैं ! इसके विपरीत किसी अप्रिय व्यक्ति के साथ पांच मिनट भी घंटों के जैसे लंबे लगते हैं ! यही ‘सापेक्षता’ है ! दंडवते जी की यह बात सुनकर मेरी पत्नी भी बहुत प्रभावित हुई ! क्योंकि वह खुद विज्ञान की शिक्षिका रही है ! और यह बात भले ही 30 साल पहले की है ! लेकिन आज भी मुझे जैसे कि वैसे ही याद आ रही है !
आजसे सौ वर्ष पहले, दंडवते परिवार पहले से ही बहुत सुसंस्कृत और पढने लिखने वाला था ! मधू दंडवते के दादा साहित्यकार थे ! तो माता को सामाजिक काम में रुचि थी ! और पिताजी अहमदनगर मुन्सिपालटी के अग्निशमन दल के प्रमुख इंजीनियर थे ! तथा उनकी बुआ कवियित्री थी ! और उनके पति श्रीधर बालकृष्ण रानडे साहित्यकार थे ! दंडवते जी के घर में ही बहुत अच्छा ग्रंथालय था ! जिसमें गांधी, विवेकानंद,गोपाल कृष्ण गोखले तथा महाराष्ट्र के समाजसुधारको की किताबों से लेकर, शेक्सपिअर तथा अन्य अंग्रेजी साहित्य मौजूद रहने की वजह से ! उन्हें बचपन से ही पढने का चस्का लग गया था ! और इस तरह के किताबों की पढ़ाई की वजह से सामाजिक और राजनीतिक लेखन करने की शुरूआत हो चुकी थी !


बचपन में प्राथमिक शिक्षा के समय उन्हें उनके शिक्षक के द्वारा ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ पढ़ने के लिए दिए गए ! और कुछ दिनों बाद शिक्षक ने मधू दंडवते को पुछा कि “रामायण की कथा में नायक कौन लगता है ?” तो मधूजी ने तपाकसे जवाब दिया कि “सीता राम की तुलना में श्रेष्ठ है ! ऐसी मेरी राय बनी है !” यह सुनकर शिक्षक महोदय भौचक्का होकर और गुस्से से, बोलने लगे कि “पूरी दुनिया राम को ही इस महाकाव्य का नायक मानती है ! और एक तू है कि सीता को राम की तुलना में नायक बोल रहा है !” लेकिन मैं अपने मन-हि-मनमे सोच रहा था कि” सीता सिर्फ एक महिला होने की वजह से उसे रावण के कब्जे से मुक्त कर के लाने के बाद, सिर्फ किसी ने उसके चरित्र को लेकर, संशय व्यक्त करने की वजह से, राम ने उसे अग्निपरीक्षा से गुजर ने के लिए मजबूर किया ! लेकिन सीताने उस अग्निपरीक्षा से सहिसलामत बाहर आकर, अपने आप को निष्कलंक साबित किया था ! यह सीता के साथ अन्याय किया गया था ! ऐसा मेरे बालमन को लगा था ! और इसीलिए रामायण में मुझे राम की तुलना में सीता ही नायिका लगती है !
और वैसे ही ‘महाभारत’ के एकलव्य के साथ किए गए अन्याय, “द्रोणाचार्य के पास एकलव्य धनुर्विद्या सिखने के लिए गए थे ! और निचली जाति के होने की वजह से उन्होंने उसे धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया ! लेकिन एकलव्य ने अपने आप को प्रेरित करने के लिए, द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर धनुर्विद्या में पारंगत होने के लिए, विलक्षण कष्ट करते हुए, महारत हासिल करने के बाद ! गुरु द्रोणाचार्य को अपनी विद्या से प्रभावित करने की कोशिश की ! तो वह गुस्से से उसे बोले कि “तू धनुर्विद्या सिखने के लिए लायक नहीं होने के बावजूद तूने यह हिमाकत की है !” तो एकलव्य ने हाथ जोड़कर क्षमायाचना करते हुए कहा कि “मैं अपनी इस गलती के लिए प्रायश्चित करने के लिए तैयार हूँ ! ” तो द्रोणाचार्य ने कहा कि “तुम अपना अंगुठा काटकर मुझे दे दो ! ” मुझे उस उम्र में ही लगा कि ज्ञान के क्षेत्र में इस तरह की गैरबराबरी ठीक नहीं है ! और यही से मेरे जीवन पर आचार्य जावडेकर, एस. एम. जोशी, ना. ग. गोरे, रावसाहेब और अच्युतराव पटवर्धन बंधू तथा सानेगुरुजी जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का सबसे अधिक प्रभाव होने की वजह से !

मुझे राष्ट्र सेवा दल जैसे समता मुलक समाज निर्माण करने वाले संघटना जिसके यह सभी लोग संस्थापक थे ! इस वजह से मै राष्ट्र सेवा दल में शामिल हुआ ! और साथ ही मेरे जीवन पर प्रभाव डालने वाले लोगों में लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी, गोपाल कृष्ण गोखले, न्यायमूर्ती महादेव गोविंद रानडे, और मैने कार्ल मार्क्स, महात्मा फुले डॉ. बाबासाहब आंबेडकर तथा गौतम बुद्ध के तत्वज्ञान के पढाई से सामाजिक समता के लिए लढने की प्रेरणा मिली है !


वैसे तो मै मुंबई के सिद्धांर्थ कॉलेज मे शिक्षक होने की वजह से, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के साथ मुझे उनसे वार्तालाप करने का मौका मिला है ! और मेरे मनपर उन्होंने महाड के तालाब में दलितों को भी पानी भरने के लिए जो अहिंसक सत्याग्रह का आंदोलन किया था ! जिसके बारे में उन्होंने मुझे अपने अनुभव बताए थे ! और उन्होंने दुसरा अनुभव, केंद्रीय मंत्री रहते हुए, ‘हिंदू कोड बिल’ को लाने के लिए कोशिश कि थी ! लेकिन उसमें उन्हें अन्य सदस्यों के विरोध की वजह से नाकामयाबी मिली ! तो उन्होंने कहा कि “मैने तो हिंदू धर्म की महिलाओं को संपत्ति में समान रूप से अधिकारों के लिए ही तो हिंदू कोड बिल पास करने की कोशिश की थी ! जिसे सनातनी हिंदूओ ने जबरदस्त विरोध किया ! और मैंने निराश होकर अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया ! डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की स्रि – शुद्रो को अधिकार दिलाने के लिए की गई कोशिशों का मेरे दिल पर बहुत अधिक प्रभाव हुआ है !
जब मैं सिध्दार्थ कॉलेज में प्रोफेसर था ! तब साहित्य, काव्य, भारतीय शास्त्रीय संगीत, के प्रति मेरी रुचि पहले से ही थी ! लेकिन बिथोवन और मोझार्ट जैसे पास्चात संगीत का श्रवण करने की शुरुआत की और कई भाषाओं के नाटक तथा कलात्मक सिनेमाओ को देखने का आनंद उठाया है ! लेकिन मैं खुद कभी भी गायक या वादक नही बन सका ! सिर्फ एक श्रोता की भूमिका में मैंने आनंद लिया है ! क्रिकेट तो मेरा मनपसंद खेल रहा है ! और मैंने मेरी शिक्षा के दौरान खुब खेला भी है ! और बाद में लोकसभा के सदस्य बनने के बाद ! मैंने लोकसभा और राज्यसभा के बिचमे होने वाली मैचों में कप्तानी की है ! और उसमे जितने को लेकर राष्ट्रपति से मुझे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है !


मुंबई में सिध्दार्थ कॉलेज में शिक्षक के साथ – साथ प्रोफेसर मधू दंडवते सोशलिस्ट पार्टी के कामों में रुचि लेते हुए उन्होंने राष्ट् सेवा दल की कार्यकर्ति प्रमिला करंडे को देखा उनकी कला के प्रति लगन तथा विशेष रूप से सेवा दल के कलापथ में नृत्यों में शामिल, देखकर कलाप्रेमी मधू उनपर लुब्ध होकर उन्हें पता चला कि वह उनके अभिन्न मित्र डॉ. जी. जी. पारिख जिस गणेश प्रसाद नामकी बिल्डिंग में रहते थे, उसी बिल्डिंग में प्रमिला करंडे के माता पिता के साथ प्रमिला रहती थी ! और डॉ. जी. जी. पारीख की जीवन संगिनी मंगला पारिख भी राष्ट्र सेवा दल और समाजवादी पार्टी के कामों में रुचि लेतीं थी ! तो उनके करंडे परिवार के साथ अच्छे संबंध थे ! और करंडे परिवार खुद आजादी के आंदोलन में सक्रिय होने की वजह से उन्होंने अपनी बेटी प्रमीला को भी काफी प्रोत्साहन दिया था ! इस तरह मंगला पारीख के मध्यस्थता से मधू दंडवते और प्रमिला करंडे का मधू दंडवते के साथ जीवन साथी के रूप में 1953 में सफर शुरू हुआ है ! (अंग्रेजी में मेड फॉर इच अदर ) सचमुच ही एकदूजेके लिए ही बनी हुई जोडी थी ! क्योंकि मधूजी राजनीति के साथ एक संवेदनशील रसिक व्यक्ति थे और प्रमिलाताई मुंबई के जेजे आर्ट स्कूल की पढ़ाई की हुई एक कलाकार पत्नी जिसने कला के साथ सामाजिक गैरबराबरी तथा सचमुच का समाजवादी समाज बनाने हेतु अपने आप को खपा दिया है ! उन्हीं की बदौलत महिलाओं के लिए आरक्षण से लेकर 541- A जैसे सुरक्षा दिलाने वाले कानून बनाने के लिए अहं भूमिका निभाई है !
हालांकि राष्ट्र सेवा दल के भीतर सुयोग्य लडके – लडकियों की आपसमे शादी होने के बहुत उदाहरण है ! मधू दंडवते – प्रमिला के जैसे दुसरे मधू लिमये – चंपा, यदुनाथ थत्तेजी और जान्हवी, डॉ. श्रीधर देशपांडे और आवाबेन, वसंत बापट और नलूताई, प्रोफेसर सदानंद वर्दे और सुधाताई, सनत मेहता और उषाबेन वैसे ही सुधा बोडा – तुलसी बोडा, पन्नालाल सुराणा और विणाताई तथा दशरथ पाटील और कमलताई, शिवाजीराव पाटील और विद्याताई ( मशहूर अभिनेत्री स्मिता पाटील के माता पिता ) आचार्य श्रीपाद केलकर और इंदुताई, बापू कालदाते और सुधाताई हमारी खुद की शादी भी उसी तरह हुई है ! अगर मै राष्ट्र सेवा दल के लोगों की शादियों की फेहरिस्त देने लगुंगा, तो यह लेख उसी से पूरा हो जाएगा ! मुख्य मुद्दा राष्ट्र सेवा दल के जैसा, अन्य भी परिवर्तनों के लिए काम कर रहे संगठनों की तुलना में ! सब से अधिक आंतरजातीय और बगैर दहेज तथा अन्य कर्मकांड को छोड़कर शादीया राष्ट्र सेवा दल में सब से अधिक शादियाँ हुई है ! और वह सिलसिला लगातार जारी है !
क्योंकि राष्ट्र सेवा दल की मान्यता है कि, जबतक आंतरजातीय- आंतरधर्मीय तथा विभिन्न भाषा तथा प्रदेश के लोगों में इस तरह के पारिवारिक संबंध नहीं बनेंगे तबतक जाति निर्मूलन तथा राष्ट्रीय एकात्मता सिर्फ बडबोलो की बाते रह जायेगी ! सही परिवर्तन तभी संभव है, जब हमारे आपसी पारिवारिक रिश्ते बनेंगे, और महात्मा गाँधी और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भी, जबतक आंतरजातीय विवाह नही होंगे, तबतक जातियों को नष्ट करना संभव नहीं है ! गांधी जी ने तो अपने जीवन में संकल्प बना लिया था कि “जबतक विवाह के जोड़े में एक सवर्ण और दूसरा पिछड़े समाज के होंगे, तो ही मै ऐसे किसी भी विवाह में शामिल रहुंगा ! “और इस संकल्प के कारण उन्होंने अपने आश्रम के भी बहुत करीबियों के शादी में शामिल होने से मना कर दिया था !


इस तरह से प्रोफेसर मधू दंडवतेजी की जीवन यात्रा महाराष्ट्र के संत तुकाराम महाराज के वचन ” बोले तैसा चाले” ( जो बोलता है वैसे ही अपने जीवन में अमल में लाता है ! ) जैसे भारतीय राजनीति में चंद लोगों में से एक रहे हैं ! उन्होंने अपने जीवन में विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने की शुरुआत अपनी उम्र के अठारह साल में भारत छोड़ो आंदोलन से शुरू की, तो समाजवादी पार्टी के मजदूर और किसानों तथा भूमिहीन लोगों से लेकर, मुंबई जैसे महानगरों के बेघरों को घर दिलाने से लेकर, भाषा के आधार पर राज्य निर्माण करने वाले साठ के दशक में संयुक्त महाराष्ट्र के आंदोलन से लेकर, गोवा मुक्ती आंदोलन मे तो, प्रमिलाताई और मधू दंडवते जान की परवाह किए बिना शामिल रहे हैं ! और पोर्तुगीज पुलिस की मार की वजह से उन्हें जवानी में जो जख्म कमर के जोडों में हुए थे ! 1955-56 में बंदुक के दस्ते और पैरों में पहने हुए जुतो के साथ ! उनके उपर किए गए अत्याचार का खामियाजा ढलती उम्र में, हड्डियों के कैंसर की बिमारी में चुकाना पडा है ! और उसी वजह से, उनकी 12 नवंबर 2005, 81 साल की उम्र में मृत्यु हुई है !


1970 में मुंबई से पदवीधर मतदाताओं के तरफसे प्रथम बार, महाराष्ट्र की विधानपरिषद में सदस्य बनने के कुछ ही महीनों में बैरिस्टर नाथ पै की अचानक मृत्यू होने की वजह से कोंकण क्षेत्र के राजापुर लोकसभा क्षेत्र से पार्टी के आदेश पर उन्होंने पहले काफी ना – नूकूर करने के बाद, 1971 में पहली बार लोकसभा का चुनाव में राजापुर से खड़े हुए ! और महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सिटो में से कांग्रेस ने बंगला देश की लड़ाई में इंदिरा गाँधी जी ने पाकिस्तान के साथ युद्ध करते हुए ! पूर्व पाकिस्तान को बंगला देश बनाने में अहं भूमिका निभाई थी इसलिए उनका भारतीय मतदाताओं पर इस चुनाव में जबरदस्त प्रभाव हो चुका था ! और इसिलिये महाराष्ट्र में 47 सिटो पर कांग्रेस जितकर आई थी ! लेकिन मधू दंडवते पहली बार लोकसभा में राजापुर मतदाता संघ के प्रतिनिधि के रूप में लोकसभा में पहुंचे !

और 1975 मे आपातकाल में जेल में बंद रहे ! तथा 77 मे दोबारा राजापुर से चुनकर आने के बाद, तत्कालीन जनता पार्टी की सरकार में रेलमंत्री बनने के बाद, उन्होंने 1974 के रेल कर्मचारियों की हड़तालमे शामिल होने वाले पचास हजार से अधिक कर्मचारियों को इंदिरा गांधी ने नौकरी से निकाल बाहर किया था ! तो प्रोफेसर दंडवतेजी ने उन्हें रेल मंत्रालय का कार्यभार संभालने के तत्काल बाद पचास हजार कर्मचारियों को वापस नौकरीयो पर बहाल करने का ऐतिहासिक फैसला लिया ! हालांकि रेल्वे के बड़े-बड़े अफसरों ने काफी विरोध किया ! लेकिन प्रोफेसर मधू दंडवते जी ने उन्हें समझाया, “कि इन्हें वापस काम पर लेकर, रेल विभाग का घाटा कम करने के लिए मै खुद आश्वासन देता हूँ ! और रेल मंत्री होने के बावजूद उन्होंने उन कर्मचारियों के बीच मे जाकर उन्हें अपने और देश के लिए किस तरह रेल विभाग अगर अच्छा काम करने से कैसे सभी की भलाई होगी ! और भारतीय रेल के इतिहास में पहली बार रेल्वे में मुनाफा कमाने की शुरुआत हुई है ! वह साल 1977 भारतीय रेल का 125 वा साल था ! और दंडवतेजी के रेल कर्मचारियों के साथ किए गए आवाहन की वजह से रेल कर्मचारियों ने अथक मेहनत करते हुए रेल के इतिहास में पहली बार 125 करोड़ रुपये का मुनाफे का बजट पेश करने के लिए मददगार साबित हुआ है ! और इस बात की तत्कालीन प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने भी भूरि- भूरि तारीफ की है !


उसी तरह उन्होंने प्रवासी रेल गाडीयो में तीन वर्ग थे ! प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी के डिब्बे में लकडी की बेंच होती थी ! जिन्हें उन्होंने बदलकर द्वितीय श्रेणी के जैसे ही नर्म फोम के गद्दीनुमा बेंच बनाने की शुरुआत की ! इसे भी रेल के बड़े-बड़े अफसरों ने विरोध किया था ! लेकिन उसे अनदेखी करते हुए उन्होंने अपनी कल्पना से नर्म गद्दीनुमा सिटो को बनाए रखने का प्रयास जारी रखा, जो आज भी कायम है !
वह लोकसभा में कोंकण क्षेत्र के राजापुर से चुनकर जाते थे ! और आजादी के इतने सालों के बाद भी, कोंकण क्षेत्र में रेल मार्ग नही के बराबर थे ! और कोंकण क्षेत्र के हर घर से मुंबई में काम करने के लिए लोगों को जाने की जरुरत थी ! और आवागमन के लिए सड़क मार्ग से बहुत ही भीडभरे गाडीयो में आना- जाना बहुत ही तकलीफ भरा है ! तो मधू दंडवते 1971 से संसद में जाने के समय से ही कोंकण रेल की मांग कर रहे थे ! और दुसरी बार वह संसद में पहुंचे, और उन्हे ही जनता पार्टी के सरकार में 1977 में रेल मंत्रालय की जिम्मेवारी सौपने के साथ, हड़ताली कर्मचारियों को नौकरियों में बहाली के साथ – साथ उन्होंने कोंकण रेल मार्ग का काम शुरू करने की शुरूआत की ! जिससे आज सिर्फ कोंकण ही नहीं, समस्त वेस्ट कोस्ट जिसमें गोवा, कर्नाटक, केरल, तामिळनाडू तक आवागमन के लिए रास्ता भी नजदीक का हो गया ! और मुंबई जैसे औद्योगिक राजधानी में कोंकण क्षेत्र के लोगों का, आना- जाना काफी सुविधाजनक हो गया है !
वैसे ही उन्होंने रेल में यात्रियों की भीड़ को देखते हुए, हरेक गाडी में डिब्बो की संख्या बढाकर उस अतिरिक्त बोझ को ढोने के लिए और एक इंजिन लगाने का फैसला लिया ! तो इसे भी रेल्वे के अफसरों ने विरोध किया, तो उस समय प्रोफेसर मधू दंडवते जी का प्रिय विषय भौतिकशास्त्र का सिध्दांत काम आया ! और उसमें के ‘थिअरी अॉफ ट्रॅजेक्टरी’ और उनके प्रिय खेल क्रिकेट के मैदान पर का अनुभव काम में आया ! और उन्होंने यह दोनों उदाहरणों के साथ रेल अधिकारीयों को समझाने में कामयाबी हासिल की ! और आज हम डबल एंजीन और एक ही गाडी के पहले से अधिक डिब्बे !
वैसे ही उन्होंने बहुत ही चतुराई से अपने समाजवाद के प्रयोग, रेल विभाग में करने का प्रयास किया ! जिसमें पहली बार भारतीय रेल में वर्गहीन गाडी लेकिन सभी सुविधाओं के साथ ! जिसका रेल्वे के अधिकारीयों ने विरोध किया ! लेकिन उन्होंने 26 दिसंबर 1977 के दिन मुंबई से हावड़ा जानेवाली गाडी जिसे रेल के अफसरों ने ‘इस्टर्न एक्सप्रेस’ नाम देने का सुझाव दिया ! लेकिन मधू दंडवते पढ़ने लिखने वाले, और साहित्य कला में रुचि रखने वाले होने की वजह से ! उन्होंने कहा कि मुंबई से कलकत्ता जाने वाली गाड़ी रविंद्रनाथ की भूमि के तरफ जा रही है ! तो इसका नाम ‘गितांजली’ एक्सप्रेस रखा जाना चाहिए ! और उसमे रविंद्रनाथ की गितांजली के उपर आधारित खुब सारे ऑइल कलर के चित्रों से सजाया गया था ! और रविंद्रनाथ का साहित्य जो प्रवासी पढ़ने के लिए लेकर, गाडी से उतरने के पहले वापस रखेंगे, ऐसी योजना बनाई थी ! लेकिन प्रवासियों को वह साहित्य इतना अच्छा लगा, कि वे हावडा स्टेशन पर उतरने के पहले, अपने साथ लेकर चले गए !
हमारे देश में जबसे संसदीय जनतंत्र शुरू हुआ ! और शेकडो की संख्या में मंत्री बने और चले गए ! लेकिन प्रोफेसर मधू दंडवते के जैसे रचनात्मक सोच रखने वाले कितने मंत्री रहे होंगे ? और मुख्य रूप से रेल भारत की धमनियों के जैसे फैला हुआ विश्व के सबसे बड़े विभाग में! कुछ चंद दिनों के भीतर प्रोफेसर दंडवतेजीने रेलकर्मियों से लेकर, प्रवासी तथा रेल मार्ग तथा अन्य तकनीकी विकास के लिए जो प्रयोग करने का प्रयास किया ! वह रेल विभाग के इतिहास में बार – बार याद किया जायेगा !


दंडवते बाद में श्री. वी. पी. सिंह की सरकार में वित्तमंत्री बने थे ! और श्री. आई. के. गुजराल के सरकार में योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे हैं ! उस समय नर्मदा बचाओ आंदोलन जोरों पर चल रहा था ! और मै उसी दौरान उन्हें मध्यस्थता करने के लिए, विनती करने के लिए, उनके पास गया था ! तो वह बोले कि “सुरेश तुम मेधा राष्ट्र सेवा दल के होने के कारण, मुझे मेरे अपने परिवार के सदस्यों के जैसे ही लगते हो ! लेकिन यह बांधो के खिलाफ आंदोलन ठीक नहीं है ! क्योंकि वैसे ही हमारे देश में बारीश के पानी पर फसल उगाना एक जुआ जैसे है ! कभी बारिश आती नहीं तो सुखा हो जाता है ! तो कभी अतिवृष्टि के वजह से गिला अकाल का सामना करना पडता है !

कबतक हमारे किसान ऐसे बेभरोसे के मौसम पर निर्भर होकर खेती करेंगे ? बांध बनेंगे तो उन्हें खात्री का पानी मिलेगा ! और एक की जगह दो या तीन फसल उगा कर, उन्हें अपने जीवन स्तर को उन्नत बनाने के लिए मददगार साबित होगा ! इसलिए मेरा कहना है कि आप लोग बांधो का विरोध करने वाले आंदोलन मत करो ! ” तो मैंने कहा कि ” नाना आप और अन्य वामपंथी दलों के लोग, अपने आप को समाजवादी बोलते हुए ! सोवियत रूस के मॉडल से प्रभावित हुए लोगों के जैसा ही, विकास की अवधारणा के समर्थक हो ! जो अमेरिका, कनाडा या इंग्लैंड या फ्रांस जैसे पुंजीवादी देशों के जैसे ही बडे – बडे बांध या बडे – बडे कल-कारखानो और अस्र – शस्त्रों की स्पर्धा के हिमायती हो ! आप अन्य राजनेताओं की तुलना में पढने – लिखने वाले नेता है ! लेकिन आजकल आप को समस्त देश के रेल से लेकर, वित्त मंत्रालय और योजना आयोग जैसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते – निभाते पढ़ने के लिए समय नहीं मिलता होगा ! बडे-बडे बांध तकनीकी स्तर पर अब संपूर्ण विश्व में गलत साबित हो रहे हैं ! क्योंकि आप उन्हें बनाने के लिए जितना धन खर्च करते हैं ! उतना पैसा वापस भी नहीं होती है ! और पर्यावरण के लिए बहुत ही नुकसान दायक, तथा बांध से विस्थापन के शिकार होने वाले, लोगों को आज तक स्थापित करने का काम एक भी परियोजना में नही हुआ है ! भाक्रा – नांगल से लेकर हमारे महाराष्ट्र के कोयना बांध के लोग इतने सालों के बाद दर – दर की ठोकरें खाते हुए अभी तक घुम रहे हैं ! इसलिए बडे-बडे बांधों का निर्माण हर तरह से तकनीकी दृष्टि से भी आउटडेटेड तकनीक बोला जा रहा है ! और तथाकथित प्रथम दुनिया में तो अब बड़े बांध नही बनाने के निर्णय लिए जा रहे हैं ! और उन्होंने पुराने बडे बांधों को नष्ट करने के निर्णय लेना शुरू किया है !

यह सब हाल ही में एक अमेरिकी तकनीशियन ( PATRICK MCCAULEY ) नामके लेखक ने ने अपनी “SILENCED RIVERS THE ECOLOGY AND POLITICS OF LARGE DAMS” इस शिर्षक की किताब में तीन सौ से अधिक पन्ने पर संपूर्ण विश्व के बड़े-बड़े बांधों का अध्ययन करने के बाद ! और Cost benefit analysis करते हुए ! किताब को नर्मदा बचाओ आंदोलन को अर्पित किया है ! तो उन्होंने कहा कि “कहां मिलेगी ?” तो अनायास ही मेरी शबनम बॅग में थी ! तो मैंने उन्हें कहा कि “आप इसे रख सकते, और जब भी आप का पढ़ने का काम हो जाये तो मुझे वापस करने का कष्ट करेंगे ! क्योंकि यह किताब की कॉपी मेरे पास एक ही है ! और मुझे समय-समय पर रेफर करने के लिए चाहिए !” प्रोफेसर मधू दंडवते जी का बडप्पन देखिए ! उन्होंने वह किताब अपने पास रखने के चंद दिनों में ही ! उन्होंने मुझे फोनपर कहा कि ” सुरेश तुमने बहुत ही बडा काम किया ! और तुमने सही कहा है कि हम समाजवादी सोवियत रूस के विकास के मॉडल को अपना आदर्श मानने वाले सचमुच ही बहुत बडी गलती कर रहे हैं ! इस किताब ने तो मेरी आंखें खोलने का काम किया है ! तुम्हें बहुत धन्यवाद !!” इसे कहते हैं सच्चा जनतांत्रिक समाजवादी ! मैंने अपने जीवन में दो ऐसे समाजवादी नेता और एक साधना के संपादक श्री. यदुनाथ थत्तेजी को भी इसी विषय पर और इसी किताब के माध्यम से विकास कि अवधारणा के बारे में बदलाव लाते हुए अपनी आंखों से देखा हूँ ! दूसरे प्रोफेसर जी. पी. प्रधान जो दंडवतेजी के बहुत ही करीबी मित्रों में से एक थे !
इतना अच्छा राजनेता 1971 से लगातार कोंकण क्षेत्र के राजापुर लोकसभा में पांच बार जाने वाले प्रोफेसर मधू दंडवते जी को आखिर के चुनाव में अपना डिपॉजिट तक गवाने की नौबत क्यों आई ? इस पर एक नजर डालने की जरूरत है ! जिस क्षेत्र की ग्रामपंचायत से लेकर पंचायत समिती तथा जिलापरिषद और विधानसभा में समाजवादी लोगों का दबदबा रहा था ! लेकिन 1991 के चुनाव में सबसे पहले हार का सामना करना पड़ा ! और 96 के चुनाव में तिसरे नंबर पर रहे ! और डिपॉजिट तक गवां बैठे ! जिस आदमी ने अपने संपूर्ण राजनीतिक जीवन में एक रुपये का भ्रष्टाचार नहीं किया ! जब भी मंत्री के पद से मुक्त होते थे तब उसी दिन शाम तक वह सरकारी आवास खाली करने वाले ! और आज उनके विरोधी भी बोल नहीं सकते कि इस आदमी ने मंत्री रहते हुए भ्रष्टाचार किया या अपने पद का दुरुपयोग किया है ! और जातीय वाद तथा सांप्रदायिकता के खिलाफ मरते दम तक भूमिका निभाई थी !


मेरी मान्यता है कि, 1985 – 86 के बाद शाहबानो के कोर्ट ने दिया हुआ, निर्णय को लोकसभा में बदलने के निर्णय! और उसके बाद आयोध्यास्थित बाबरी मस्जिद के ताले खोलना, और साथ ही बीजेपी के द्वारा रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए निकाली गई रथयात्राओ और 6 दिसम्बर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद के विध्वंस से भारत के सेक्युलर राजनीति के विनाश की शुरुआत हुई है ! और सवाल आस्था का है कानून का नही के इर्द-गिर्द संपूर्ण राजनीति शुरू हो गई है !
और आजादी के बाद राजापुर में पहले बैरिस्टर नाथ पै और उनके निधन के बाद, प्रोफेसर मधू दंडवते 1971 से लगातार पांच बार लोकसभा में गए हैं ! और 1991 में पहली बार हार का सामना करते हुए ! उसके बाद के 1996 के चुनाव में अपना डिपॉजिट खोने की नौबत, सिर्फ सांप्रदायिकता की राजनीति का सुत्रपात होने के बाद हुआ है ! क्योंकि उसी कोंकण क्षेत्र के भीतर 1941 के 4 जून को राष्ट्र सेवा दल की स्थापना के बाद, गांव – गांव में राष्ट्र सेवा दल की शाखाओं से लेकर स्कूल और विभिन्न शिक्षा संस्थानों का निर्माण किया गया था ! और इस कोंकण क्षेत्र के जो लोग, मुंबई में नौकरी करने के लिए आए थे ! उनके अपने मंडल भी बने हुए हैं ! जिसमें राष्ट्र सेवा दल का काम था ! लेकिन सत्तर के दशक के बाद शिवसेना का जन्म, और मराठी माणूस के उपर होने वाले अन्याय जैसे भावना भड़काने वाले जुमले, तथा बेरोजगार युवाओं के द्वारा मुंबई में ! और उसी के तर्ज पर कोंकण क्षेत्र के भीतर पैठ बनाने की शुरुआत हुई ! और 1952 से समाजवादी और राष्ट्र सेवा दल के ही ज्यादा तर लोगों ने मराठी के मुद्दे पर शिवसेना में चले जाने की स्थिति में परिवर्तन होते-होते ! 1996 के चुनाव में प्रोफेसर मधू दंडवते जी के जीवन के आखिरी चुनाव में इस तरह की हार का सामना करना पड़ा है ! आज हम उनकी जन्मशताब्दी मना रहे हैं ! लेकिन उन्हें सचमुच ही जन्मशताब्दी के बहाने याद करना है ! तो वर्तमान समय में भारतीय राजनीति धर्म, जाति तथा भाषा के इर्द-गिर्द हो चुकी है ! और इसे बदलने के लिए संकल्प करना ही ! प्रोफेसर मधू दंडवते जी को सही श्रद्धांजली हो सकती है ! अन्यथा जन्मशताब्दी मनाना एक कर्मकांड के अलावा और कुछ नहीं !

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