• संख्या की कसौटी पर जीत रहे कोविंद
  • व्यक्तित्व की कसौटी पर जीत चुकीं मीरा
  • तिकड़म के आगे हार गए अनुभवी आडवाणी

थोड़ी देर से ही सही, लेकिन विपक्ष ने राष्ट्रपति प्रत्याशी के लिए जोरदार नाम चुनकर एकबारगी सत्ता पक्ष को सकते में ला खड़ा किया. केंद्र सरकार ने दलित प्रत्याशी रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बना कर विपक्ष को झटका दिया था, लेकिन विपक्ष ने मीरा कुमार जैसी दमदार दलित प्रत्याशी को मैदान में उतार कर राष्ट्रपति चुनाव को रोचक-रोमांचक बना दिया है. रामनाथ कोविंद पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं. लेकिन मीरा कुमार की शिक्षा-दीक्षा कोविंद की तुलना में काफी ऊपर है.

वे देश की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष थीं और राजनीति में आने से पहले वे भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी थीं. लिहाजा, मीरा कुमार की उम्मीदवारी रामनाथ कोविंद पर भारी है. यह अलग बात है कि अंकगणितीय समीकरणों से सत्ता का प्रत्याशी चुनाव जीत जाए और विपक्ष का उम्मीदवार हार जाए, लेकिन व्यक्तित्व के चयन में सत्ता पक्ष पर विपक्ष की जीत दर्ज हो चुकी है.

राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए आम सहमति बनाने के तमाम प्रहसन खेले गए. कभी विपक्ष का भोज तो कभी पक्ष का भोज. कभी विपक्ष की कमेटी तो कभी पक्ष की कमेटी, कभी इधर की मुलाकातें तो कभी उधर की, लेकिन यह सब जानी-समझी हुई नौटंकी थी. भाजपा ने खुद ही पहले संघ प्रमुख का नाम उड़वाया. शिव सेना से मोहन भागवत का नाम उछलवाया, फिर उसे असरदार करने के लिए भागवत की प्रणब मुखर्जी से मुलाकात करवाई और नियोजित भ्रम फैलाकर अचानक रामनाथ कोविंद का नाम प्रस्तावित कर दिया.

भाजपा ने राष्ट्रपति पद के लिए दलित नाम चुना, जिसके नाम पर विपक्ष कोई चूं-चां नहीं कर पाए. लेकिन विपक्ष ने भाजपा के दलित-दांव पर भारी पव्वा रख दिया. मीरा कुमार की उम्मीदवारी से अब विपक्ष के उन नेताओं के समक्ष धर्मसंकट की स्थिति खड़ी हो गई है, जिन्होंने दलित होने के कारण रामनाथ कोविंद का पक्ष लेने का बयान दिया था.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि उनकी पार्टी (जदयू) कोविंद के पक्ष में वोट डालेगी. राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी का समर्थन करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोविंद के राज्यपाल बनाए जाने पर विरोध किया था. नीतीश का कहना था उनसे सलाह लिए बगैर राज्यपाल की नियुक्ति की गई. रामनाथ कोविंद को समर्थन देने के नीतीश के फैसले से विपक्ष मुश्किल में है.

बिहार में महागठबंधन में शामिल राजद के नेता लालू यादव ने इस मसले पर नीतीश से पुनर्विचार करने की अपील की है. नीतीश का फैसला विपक्षी दलों के लिए अप्रत्याशित इसलिए भी रहा क्योंकि नीतीश ने ही शुरुआत में विपक्षी दलों की तरफ से सर्वसम्मति के आधार पर राष्ट्रपति उम्मीदवार उतारने की बात कही थी. उन्होंने इस सिलसिले में कुछ विपक्षी नेताओं से बात भी की थी और 20 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले भी थे.

लेकिन कोविंद के नाम की घोषणा के कुछ अर्सा पहले से नीतीश कुमार विपक्षी दलों से अलग-थलग रह रहे थे. राष्ट्रपति चुनाव के मसले पर 26 मई को सोनिया गांधी की अध्यक्षता में बुलाई गई भोज-बैठक में नीतीश शामिल नहीं हुए, जबकि अगले ही दिन नरेंद्र मोदी की तरफ से दिए गए भोज में वे शामिल हुए. इसे लेकर विपक्ष काफी परेशान है. कोविंद की उम्मीदवारी घोषित होने पर उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी कहा था कि अगर विपक्ष ने कोई दलित उम्मीदवार नहीं उतारा, तो बसपा कोविंद के पक्ष में वोट देगी, लेकिन वे मीरा कुमार के मैदान में उतरने के बाद पलट गईं.

इसी तरह मुलायम सिंह यादव भी कोविंद के प्रति समर्थन जता चुके थे. लेकिन सपा के आधिकारिक अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मीरा कुमार के प्रति समर्थन जताया है. मीरा कुमार के मैदान में आ जाने से भाजपा को इन पार्टियों का वोट नहीं मिलने के आसार बढ़ गए हैं. कोविंद के नाम पर डंवाडोल में पड़ी कई अन्य पार्टियां भी अब मीरा कुमार के समर्थन में आ सकती हैं. अब तक 17 पार्टियों ने आधिकारिक तौर पर मीरा कुमार को समर्थन देने की घोषणा की है.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का भी कहना है कि विपक्ष ने मीरा कुमार का नाम पहले ही घोषित कर दिया होता, तो राष्ट्रपति चुनाव को लेकर परिदृश्य कुछ और ही होता. लिहाजा, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी एक बड़ा राजनीतिक अवसर चूक गईं, या दांव लगाने में पिछड़ गईं, ऐसा कहा जा सकता है. त्रिसदस्यीय भाजपाई कमेटी ने सोनिया गांधी से भावी प्रत्याशी का नाम पूछा, तो उन्होंने भाजपा को पहले पत्ते खोलने को कहा.

विश्लेषक यह भी कहते हैं कि अगर सोनिया ने उस समय लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति बनाए जाने की इच्छा जता दी होती, तो भाजपा चारो खाने चित हो गई होती. लेकिन सोनिया ऐसा कुछ भी नहीं कर पाईं. दरअसल मीरा कुमार का नाम तो विपक्ष के ध्यान में कोविंद के चयन के बाद आया, लेकिन आडवाणी पर दांव खेलना भाजपा के लिए भारी पड़ जाता और विपक्ष की राजनीति भाजपा के अंदरूनी समीकरणों की गिल्लियां बिखेर कर रख देती. विपक्ष की इस चाल से राजग में दरारें पड़ जातीं, पार्टी व्हिप की ऐसी-तैसी हो जाती और भाजपा को जमीन दिख जाती.

लालकृष्ण आडवाणी को लेकर भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा का ट्‌वीट पहले ही सुर्खियां और समर्थन दोनों बटोर चुका था. शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने ट्‌वीट में लिखा था कि पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ही राष्ट्रपति पद के लिए बेहतर उम्मीदवार हैं. भाजपा को उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहिए. लालकृष्ण आडवाणी को पितामह कहने वाले बिहारी बाबू ने लिखा कि कुछ गंभीर चिंतन करने वाले नागरिकों की प्रतिक्रियाओं से मैं काफी प्रभावित हूं. यह देश सत्ता के शीर्ष पर काबिज किसी एक व्यक्ति या एक छोटे प्रभावशाली समूह की मर्जी से नहीं चल सकता. यह देश किसी एक व्यक्ति का या किसी एक समूह का नहीं वरन सवा सौ करोड़ देशवासियों का है.

राष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण पद पर किसी की योग्यता और अनुभव को पूरी तरह नजरअंदाज कर अपनी मर्जी नहीं थोपी जा सकती. मेरे विचार से आडवाणी ही किसी भी पार्टी के जरूरी मापदंडों से ऊपर हैं, जो किसी से प्रभावित नहीं होते. आखिर राष्ट्रपति के नॉमिनेशन को लेकर अजीब सी चुप्पी क्यों हैं? किसी पार्टी या किसी व्यक्ति को आडवाणी की योग्यता, उनके लंबे संसदीय अनुभव और उनके सार्वजनिक जीवन के अनुभवों में क्या कोई कमी दिखाई देती है? शत्रुघ्न के इस ट्‌वीट पर चर्चा भी खूब हुई और उन्हें समर्थन भी खूब मिला. लेकिन विपक्ष के नेता सियासी थर्मामीटर के इस तापमान को पढ़ नहीं पाए.

राष्ट्रीय राजनीति के मैदान के नए लेकिन खुर्राट नेता नरेंद्र मोदी ने उम्र के आधार पर लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को किनारे लगा दिया. मोदी ने इन नेताओं की आयु पूरी होने के पहले ही इनकी राजनीतिक हत्या कर दी. उम्र अगर आधार हो तो 60 साल से ऊपर के किसी भी व्यक्ति को किसी भी पद पर नहीं होना चाहिए.

जब सरकारी अधिकारी या कर्मचारी का 58 और 60 साल में रिटायर हो जाना नियम है तो नेताओं में कौन सा सुर्खाब का पर लगा है कि वे 60 से ऊपर के हों तो प्रधानमंत्री बन जाएं, लेकिन आडवाणी 75 साल के हो जाएं तो उनकी हत्या कर दी जाए! उम्र की इसी नैतिकता के आधार पर मोदी को इस्तीफा देकर योगी जैसे युवा को देश का प्रधानमंत्री बना देना चाहिए था और कोविंद की जगह किसी दूसरे युवा दलित को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित करना चाहिए था. आम लोगों के ये सवाल नैतिक मूल्यों से जुड़े हैं, नेताओं पर ये लागू नहीं होते. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तिकड़म के आगे आखिरकार हार ही गए अनुभवी आडवाणी.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश के लोगों को इसी में गोरव-बोध है कि देश का प्रधानमंत्री वाराणसी का सांसद है और होने वाला राष्ट्रपति कानपुर का रहने वाला है. रामनाथ कोविंद भी 70 साल के हो चुके हैं. लिहाजा, रिटायरमेंट के पहले की उनकी आखिरी पोस्टिंग है. इसके पहले देश को यूपी से कोई पूर्णकालिक राष्ट्रपति नहीं मिला. मोहम्मद हिदायतुल्ला एक बार 24 दिन के लिए और दूसरी बार 25 दिन के लिए देश के कार्यकारी राष्ट्रपति बने थे. रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल थे.

बिहारवासियों को भी कोविंद के राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाए जाने पर इसलिए खुशी मिली, क्योंकि वे बिहार के राज्यपाल थे. बिहार के लोगों को यह खुशी 1962 में भी मिल चुकी है, जब बिहार के राज्यपाल डॉ. जाकिर हुसैन भारत के राष्ट्रपति बने थे. डॉ. जाकिर हुसैन आजादी के बाद बिहार के चौथे राज्यपाल थे और वे देश के भी चौथे ही राष्ट्रपति बने. डॉ. जाकिर हुसैन छह जुलाई 1957 से 11 मई 1962 तक बिहार के राज्यपाल रहे.

रामनाथ कोविंद का जन्म कानपुर देहात की डेरापुर तहसील के गांव परौख में 1945 में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा संदलपुर ब्लॉक के ग्राम खानपुर परिषदीय प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय हुई. कानपुर नगर के बीएनएसडी से इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद डीएवी कॉलेज से बी. कॉम और डीएवी लॉ कालेज से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद दिल्ली में रहकर तीसरे प्रयास में सिविल सेवा की परीक्षा पास की, लेकिन एलायड सर्विसेज़ मिलने के कारण नौकरी ठुकरा दी और वकालत करने लगे. 1977 में जनता पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के वे निजी सचिव बने.

इसके बाद वे भाजपा में आए. कोविंद को भाजपा ने 1990 में घाटमपुर लोकसभा सीट से टिकट दिया लेकिन वे चुनाव हार गए. वर्ष 1993 और 1999 में पार्टी ने उन्हें प्रदेश से दो बार राज्यसभा भेजा. पार्टी के लिए दलित चेहरा बने कोविंद अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रवक्ता भी रहे. वर्ष 2007 में पार्टी ने रामनाथ कोविंद को भोगनीपुर सीट से चुनाव लड़ाया, लेकिन वे फिर चुनाव हार गए. अगस्त 2015 में उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया था. कोविंद नरेंद्र मोदी के काफी करीबी हैं. भाजपा रामनाथ कोविंद को मायावती के खिलाफ एक दलित चेहरे के तौर पर आजमाना चाहती थी, लेकिन उनके लगातार चुनाव हारने के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया.

विपक्ष ने 23 जून को पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाए जाने का ऐलान किया. अब राष्ट्रपति का चुनाव ‘दलित बनाम दलित’ हो गया है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा, ‘हमने मीरा कुमार को राष्ट्रपति चुनाव में उतारने का फैसला किया है. हमें उम्मीद है कि अन्य दल भी हमारे साथ आएंगे.’ 17 राजनीतिक दलों ने संसद भवन में हुई विपक्ष की बैठक में हिस्सा लिया और मीरा कुमार के नाम पर मुहर लगा दी. ‘दलित बनाम दलित’ का चुनाव काफी रोचक हो गया है. रामनाथ कोविंद राजग के साफ छवि वाले नेता हैं, तो दूसरी तरफ मीरा कुमार का प्रशासनिक करियर और राजनीतिक जीवन भी स्वच्छ रहा है. उच्च शिक्षित मीरा कुमार विनम्र, मृदुभाषी और हमेशा मुस्कुराने वाली भद्र महिला मानी जाती हैं.

मीरा कुमार पूर्व उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम की बेटी हैं. वे वर्ष 1973 में भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुईं. कई देशों में नियुक्त रहीं और बेहतर राजनयिक साबित हुईं. तीन जून 2009 को मीरा कुमार पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष निर्विरोध चुनी गई थीं. 1975 में वे पहली बार बिजनौर से संसद में चुनकर आई थीं. 1990 में वे कांग्रेस पार्टी कार्यकारिणी समिति की सदस्य और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव भी चुनी गईं. 1996 में मीरा कुमार दूसरी बार सांसद बनीं और तीसरी बार 1998 और 2004 में बिहार के सासाराम से लोकसभा सीट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंची.

लालू प्रसाद यादव ने भरा राष्ट्रपति का पर्चा!

17 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए लालू प्रसाद यादव ने नामांकन दाखिल किया है. लालू प्रसाद यादव ने बुधवार 23 जून को नामांकन दाखिल किया. लोकसभा सचिवालय ने आधिकारिक तौर पर बताया कि लालू प्रसाद यादव ने नामांकन पत्र दाखिल करते हुए मतदाता के तौर पर पंजीकृत संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज अपने नाम की कॉपी और 15 हजार रुपए जमानत राशि के रूप में जमा किए हैं. 23 जून को दो लोगों ने राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन भरा, जिसमें लालू प्रसाद यादव के अलावा तमिलनाडु के धरमपुरी जिले के अग्नि श्रीरामचंद्रन शामिल हैं. अब तक दो दर्जन से अधिक लोग नामांकन दाखिल कर चुके हैं.

राष्ट्रपति चुनावों के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के पहले दिन छह लोगों ने नामांकन दायर किया था, जिसमें मुम्बई के पटेल दम्पति सायरा बानो मोहम्मद पटेल और मोहम्मद पटेल अब्दुल हामिद शामिल हैं. इनके अलावा तमिलनाडु के के.पद्मराजन, मध्यप्रदेश के आनंद सिंह कुशवाहा, तेलंगाना के ए.बाला राज और पुणे के कोंडेकर विजयप्रकाश ने भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना नामांकन-पत्र दाखिल किया है.

लालू प्रसाद यादव को लेकर किसी भ्रम में न रहें, ये लालू वो लालू नहीं हैं. यानि, ये लालू राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष नहीं हैं. संयोग यह है कि दोनों का नाम और गृह जिला समान है. राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन भरने वाले लालू प्रसाद यादव भी बिहार के सारण जिले के हैं और राजद अध्यक्ष लालू यादव भी सारण के रहने वाले हैं.

कौन-कौन हुए राष्ट्रपति, कैसे बनते हैं राष्ट्रपति

भारत का राष्ट्रपति देश का सबसे सर्वोच्च पद और तीनों भारतीय सेनाओं का प्रमुख होता है. राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है. संसद और राज्य के विधानमंडल के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा देश के राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है.

भारत की आजादी से अब तक देश के 14 राष्ट्रपति चुनाव हुए, जिनमें 13 व्यक्ति भारत के राष्ट्रपति चुने गए. डॉ. राजेंद्र प्रसाद अकेले ऐसे राष्ट्रपति हुए, जो दो कार्यकाल में राष्ट्रपति रहे. छोटे अंतराल के लिए तीन कार्यकारी राष्ट्रपति हुए. भारतीय संविधान के भाग 5 के अनुच्छेद 56 के द्वारा भारत के राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच साल का होता है. राष्ट्रपति की बर्खास्तगी और अनुपस्थिति में ही उपराष्ट्रपति कार्यभार संभालता है. ये हैं भारत के अबतक के राष्ट्रपतिः-

  1. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद. जन्म-1884, मृत्यु-1963, कार्यकाल-26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962.
  2. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन. जन्म-1888, मृत्यु-1975. कार्यकाल-13 मई 1962 से 13 मई 1967.
  3. डॉ. जाकिर हुसैन. जन्म-1897, मृत्यु-1969, कार्यकाल-13 मई 1967 से 3 मई 1969.
  4. वराहगिरी वेंकट गिरि. जन्म-1894, मृत्यु-1980, कार्यकाल- 24 अगस्त 1969 से 24 अगस्त 1974.
  5. फखरुद्दीन अली अहमद. जन्म- 1912, मृत्यु- 2002, कार्यकाल- 24 अगस्त 1974 से 24 अगस्त 1977.
  6. नीलम संजीव रेड्डी. जन्म-1913, मृत्यु-1996, कार्यकाल-25 जुलाई 1977 से 25 जुलाई 1982.
  7. ज्ञानी जैल सिंह. जन्म-1916, मृत्यु-1994, कार्यकाल-25 जुलाई 1982 से 25 जुलाई 1987.
  8. आर वेंकटरमण. जन्म-1910, मृत्यु-2009, कार्यकाल-25 जुलाई 1987 से 25 जुलाई 1992.
  9. डॉ. शंकर दयाल शर्मा. जन्म-1918, मृत्यु-1999, कार्यकाल-25 जुलाई 1992 से 25 जुलाई 1997.
  10. के. आर. नारायणन. जन्म-1920, मृत्यु-2005, कार्यकाल-25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002.
  11. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम. जन्म-1931,मृत्यु-2015, कार्यकाल-25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007.
  12. प्रतिभा देवी पाटिल. जन्मः 1934, कार्यकाल-25 जुलाई 2007 से 25 जुलाई 2012
  13. प्रणब मुखर्जी. जन्म-1935, कार्यकाल-25 जुलाई 2012 से अबतक.
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