page-8नेहरू द्वारा एनडीसी बैठकों की अध्यक्षता से जुड़ा एक विचित्र संयोग है. वह यह कि उन्होंने 8 एवं 9 नवंबर, 1952 को पहली एनडीसी बैठक की अध्यक्षता की थी और 11 साल बाद फिर से 8 एवं 9 नवंबर, 1963 को 20वीं एनडीसी बैठक की अध्यक्षता भी उन्होंने ही की. यानी 11 साल के बाद भी एक ही महीने और एक ही तारीख़.
एनडीसी की भूमिका
योजना बनाने का काम एक राष्ट्रीय प्रयास कैसे बने, इस बारे में अध्ययन दल ने एनडीसी की भूमिका को लेकर निम्नलिखित सुझाव दिए:-
(1) नियोजन नीति से जुड़े बुनियादी सवालों, विशेष रूप से उसके लक्ष्यों एवं उद्देश्यों, वैकल्पिक फ्रेमवर्क, रणनीति और महत्वपूर्ण क्षेत्रों से संबंधित सवालों, को सीधे राष्ट्रीय विकास परिषद के समक्ष रखा जाना चाहिए और वहां बहस होनी ही चाहिए.
(2) परिषद को इन बुनियादी मुद्दों को सबसे अधिक महत्व देना चाहिए, ताकि एक राष्ट्रीय सहमति बन सके.
(3) परिषद को स्थायी सलाहकार समिति द्वारा सहयोग मिलना चाहिए, जिसमें प्रत्येक राज्य से आधिकारिक सलाहकार, संबंधित केंद्रीय मंत्रालय और योजना आयोग के लोग शामिल हों.
(पैरा-6.13)
45 साल पहले यह रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी और तबसे अभी तक केंद्र-राज्य संबंध खराब ही होते चले गए. अध्ययन दल और इसी विषय पर बनी अन्य रिपोर्ट्स के सुझावों के आधार पर एआरसी के सदस्यों ने अपनी रिपोर्ट तैयार की. उस समय एआरसी के अध्यक्ष कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं सांसद के. हनुमंथैय्या थे, जो कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री भी थे. अपनी रिपोर्ट में एआरसी ने पाया कि हमारी चिंता भारत की एकता को मज़बूत बनाए रखने की है, इसलिए हमें संघ के पास सभी प्रशासनिक शक्ति होने के बारे में नहीं सोचना चाहिए. भारतीय सरकार में दो स्तर हैं, एक संवैधानिक और दूसरा प्रशासनिक. जहां तक संवैधानिक संरचना का संबंध है, केंद्र के पास भारत की एकता की रक्षा करने के अधिकार हैं और वह किसी अड़ियल राज्य को भारतीय एकता की अवधारणा का पालन करने के लिए कह सकता है तथा उसके उपाय कर सकता है. हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर, अति अधिकार से परहेज किया जाना चाहिए. वैसे प्रशासनिक शक्तियों का केंद्रीकरण भी अच्छा नहीं है. यह केंद्र के ख़िलाफ़ लोगों का दिमाग तैयार कर सकता है. (पी. 5)
इसके अलावा, एआरसी सावधान करता है कि केंद्र में एक शक्तिशाली नेतृत्व और साथ ही केंद्र एवं राज्य में एक पार्टी का शासन केंद्र-राज्य की समस्याओं के निपटारे के लिए एक वैकल्पिक और अतिरिक्त संवैधानिक चैनल प्रदान करता है. लेकिन यह स्थिति 1967 के आम चुनाव के बाद बदली है. (पी. 6)
दूरस्थ केंद्र और केंद्र के ख़िलाफ़ लोगों का मानस तैयार करना, यह बात किसी कांग्रेस विरोधी व्यक्ति ने नहीं कही थी, बल्कि ख़ुद एक प्रतिष्ठित कांग्रेस नेता हनुमंथैय्या ने कही थी. एकल पार्टी के सत्ता पर नियंत्रण को लेकर उन्होंने जो कहा था, वह भारत के राजनीतिक इतिहास का एक भूला हुआ हिस्सा बन गया है. 1989 के बाद, कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी को ख़ुद के बल पर केंद्र में सरकार बनाने के लिए साधारण बहुमत तक नहीं मिला. हालांकि, एक बार आम चुनावों के पहले या बाद में गठबंधन सरकार जब सत्ता में आती है, तो सत्ता उसे भ्रष्ट और पूर्ण सत्ता उसे पूर्णत: भ्रष्ट बना देती है.
एनडीसी की बैठक
यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब तक नेहरू प्रधानमंत्री और योजना आयोग के अध्यक्ष रहे, राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक लगातार दो दिनों के लिए आयोजित की गई. नेहरू के समय आयोजित बैठकों में प्रतिभागियों को बिना समय सीमा निर्धारित किए अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति होती थी. अपने 17 वर्षों के कार्यकाल के दौरान (15 अगस्त, 1947-27 मई, 1964) प्रधानमंत्री नेहरू ने 20 एनडीसी बैठकें आयोजित कीं, जिनमें से 16 दो दिवसीय बैठकें थीं और बाक़ी एक दिवसीय. इस प्रकार 36 दिनों की बैठकें हुईं. नेहरू द्वारा एनडीसी बैठकों की अध्यक्षता से जुड़ा एक विचित्र संयोग है. वह यह कि उन्होंेने 8 एवं 9 नवंबर, 1952 को पहली एनडीसी बैठक की अध्यक्षता की थी और 11 साल बाद फिर से 8 एवं 9 नवंबर, 1963 को 20वीं एनडीसी बैठक की अध्यक्षता भी उन्होंने ही की. यानी 11 साल के बाद भी एक ही महीने और एक ही तारीख़.
डॉ. मनमोहन सिंह 15 जनवरी, 1985 से 31 अगस्त, 1987 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे. इन ढाई वर्षों के दौरान राष्ट्रीय विकास परिषद की 38वीं बैठक 8 एवं 9 नवंबर, 1985 को हुई और अगली बैठक 29 अप्रैल, 1986 को एक दिन के सत्र के तौर पर हुई. एनडीसी की कोई बैठक 30 अप्रैल, 1984 से लेकर 31 अगस्त, 1987 के बीच आयोजित नहीं हुई. मनमोहन सिंह 22 मई, 2004 के बाद से प्रधानमंत्री हैं. 10वीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007) और 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2011) का हिस्सा उनके प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान ही पूरा हुआ है. एनडीसी की दो दिवसीय बैठक 27 एवं 28 जून, 2005 को आयोजित की गई थी, लेकिन 2006 से 2012 के दौरान केवल एक दिन की एनडीसी बैठक हर साल हुई है. या तो उनके पास समय नहीं है या फिर इस तरह की दो दिवसीय बैठकों की कोई ज़रूरत ही नहीं है, जहां एनडीसी के सभी सदस्यों को ख़ुद को व्यक्त करने के लिए पूरी तरह से समय मिल सके.
संयोग से, केंद्र सरकार ने आयोग योजना को प्लांड कमिशंस ऐंड ओमिशंस और एनडीसी को नो डिबेट क्लब में बदल दिया है. योजना आयोग की वेबसाइट पर एक अपील है, जिसमें 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए दृष्टिकोण के संबंध में टिप्पणियां एवं सुझाव देने को कहा गया है. इसमें लिखा है कि एक समावेशी और भागीदारी दृष्टिकोण विकसित करने के लिए योजना आयोग ने ़फैसला किया है कि एक दृष्टिकोण पत्र वेब आधारित सलाह प्रक्रिया के ज़रिए लाया जाएगा, जिसमें सभी इच्छुक व्यक्ति भाग ले सकते हैं. हमने एक बहु-आयामी रणनीति विकसित की है, जो कुछ उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों से हमें रूबरू कराएगी, जिनके बारे में हम जानना चाहते हैं. हम आपके कमेंट इन सभी क्षेत्रों के लिए आमंत्रित करते हैं. देश के लिए एक बेहतर भविष्य बनाने में हमारी मदद करें. आप अपना सुझाव इस ई-मेल आईडी पर भेज सकतेहैं :-approach-plan@nic.in.
योजना आयोग उस पुरानी प्रत्यक्ष लोकतंत्र प्रक्रिया को दोहराना चाहता है, जो प्राचीन भारत की पंचायतों और अथीनियन लोकतंत्र में प्रचलित थी. प्रत्यक्ष लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी होती थी, बिना बिचौलियों या निर्वाचित प्रतिनिधियों पर निर्भर हुए. सावधान! यदि प्रत्यक्ष लोकतंत्र भारत में अपनाया गया, तो यह सभी मंत्रियों, सांसदों और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों के बाहर निकलने का कारण बन जाएगा.

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