biharनित्यानंद राय, ऐसा नाम जिसकी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए चर्चा न तो प्रदेश भाजपा में थी और न ही यहां की मीडिया में. लगभग सभी को चौंकाते हुए भाजपा अलाकमान ने नित्यानंद राय के हाथ में बिहार प्रदेश भाजपा की कमान सौंप दी. आखिर यह कैसे और क्यों हुआ इसे लेकर अब यहां सत्ता के गलियारों में तरह तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं. इस अनुमान की गहराइयों में हम भी डूबे इससे पहले नित्यानंद राय की शख्सियत को समझना जरूरी है.

नित्यानंद राय की छवि साफ है और शुरू से ही संगठन से जुड़े रहने के कारण पार्टी में इनकी भूमिका भी हमेशा महत्वपूर्ण रही है. इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये प्रदेश भाजपा की गुटबाजी से दूर हैं और किसी खास खेमे विशेष के भी नहीं माने जाते. जहां तक शिक्षा की बात है, नित्यानंद राय बीए ऑनर्स हैं. राय आरएसएस के काफी करीब रहे हैं. वे संघ से होकर ही भाजपा में आए.

प्रदेश के तीनों शीर्ष नेताओं, सुशील कुमार मोदी, नंदकिशोर यादव और प्रेम कुमार से इनकी निकटता है. हालांकि इस मनोनयन के बाद अब पार्टी के तीनों बड़े पदों पर पिछड़े या अति पिछड़े नियुक्त हो गये हैं. विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रेम कुमार अति पिछड़ी जाति से हैं तो वहीं, विधान परिषद में विपक्ष के नेता व विधानमंडल दल के नेता सुशील मोदी पिछड़ी जाति के हैं.

अब प्रदेश की कमान भी पिछड़ी जाति के पास है. सवाल उठता है कि सवर्णों की वर्चस्व वाली पार्टी ने आखिर बिहार में अपने समीकरण क्यों बदल डाले. कहा जा रहा है कि प्रदेश भाजपा के युवा और चर्चित यादव चेहरे पर भरोसा जताकर पार्टी ने बिहार में नए अध्याय की शुरुआत की है. यह तीसरी बार है, जब भाजपा ने प्रदेश की बागडोर किसी यादव के हाथों मे सौंपी है. इसके पहले जगदंबी प्रसाद यादव और नंदकिशोर यादव यह जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.

नित्यानंद राय को कमान सौंपने के बाद यह तय हो गया कि प्रदेश भाजपा अपना चेहरा बदलना चाहती है. वह सवर्णों की पार्टी के रूप में बनी अपनी पहचान में बदलाव लाना चाहती है. जानकार बताते हैं कि बिहार में पिछला चुनाव हारने के बाद भाजपा के रणनीतिकारों ने हार के कारणों पर गहन मंथन किया. इसका निष्कर्ष यह निकला कि पिछड़ा व अतिपिछड़ा का गणित मोदी लहर पर भारी पड़ गया.

लालू और नीतीश के एक साथ आ जाने से दलितों और पिछड़ों की ऐसी गोलबंदी हुई कि भाजपा और इसके सहयोगी दलों के नेता ताकते रह गए और महागठबंधन प्रचंड बहुमत के साथ बिहार की सत्ता पर काबिज हो गया. पिछले दिनों जिन नेताओं की चर्चा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में हो रही थी, इनमें से अधिसंख्य सवर्ण ही थे. यह माना जा रहा था कि किसी सवर्ण के हाथों में ही प्रदेश भाजपा की कमान होगी.

हालांकि, मंगल पांडेय कहते हैं कि इसे सवर्ण या पिछड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह साफ दिख रहा है कि लालू और नीतीश के पिछड़ावाद की राजनीति में सेंध लगाने के लिए भाजपा ने नित्यानंद को आगे कर दिया है. भाजपा यह साफ संदेश देना चाहती है कि वह केवल सवर्णों के लिए ही नहीं बल्कि पिछड़ों व अतिपिछड़ों के लिए भी हर दरवाजा खुला रखेगी. बिहार में लालू की ताकत, खासकर यादवों को साधने के लिए नित्यानंद को आगे किया गया है.

गौरतलब है पिछले विधानसभा चुनाव के समय में भी भाजपा ने यह प्रयास किया था, पर तब इसमें सफलता हाथ नहीं लगी थी. उस समय भूपेंद्र यादव, नंदकिशोर यादव और राककृपाल यादव की तिकड़ी के सहारे भाजपा ने यादव वोटों में सेंधमारी की नाकाम कोशिश की थी. एक बार फिर भाजपा ने नित्यानंद को आगे कर दांव खेला है.

भाजपा को उम्मीद है कि अभी चुनावोें में वक्त है और नित्यानंद को काम करने का पूरा मौका मिलेगा. नित्यानंद राय ने भी बिना वक्त गंवाए ऐलान कर दिया है कि वह पूरे बिहार का दौर करेंगे और लोगों से मिलेंगे. राय बहुत जल्द अपनी एक नई टीम बनाने वाले हैं. वे महागठबंधन की सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे. बिजली दर में बढ़ोतरी के खिलाफ नित्यानंद पहले ही सरकार को चेतावनी दे चुके हैं.

राय कहते हैं कि मेरा एक-एक पल भाजपा को मजबूत करने के लिए है. पार्टी का हर एक कार्यकर्ता मेरी ताकत है. सहयोगी दलों का भी पूरा सहयोग मुझे हासिल है. जल्द ही बिहार सरकार के खिलाफ एक बड़े आंदोलन का शंखनाद होगा.

बिहार भाजपा के अध्यक्ष पद पर नित्यानंद राय की नियुक्ति भाजपा की भावी रणनीति के संकेत हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के एक वर्ष बाद यह बिहार भाजपा में बड़ा बदलाव है. भाजपा की तैयारी बता रही है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा, नित्यानंद की ओट में वोट के समीकरण को दुरुस्त कर लेना चाहती है. मगर, इस बदलाव के साथ ही प्रदेश में पार्टी के चारों शीर्ष पद से सवर्णों का सूपड़ा साफ हो गया है.

सांसद नित्यानंद पर दांव लगाने का मतलब साफ है कि भाजपा की नजर राजद प्रमुख लालू प्रसाद के परंपरागत वोट बैंक पर है. पार्टी आलाकमान की अपेक्षाओं पर नित्यानंद कितना खरा उतरेंगे यह तो समय बताएगा. लेकिन इतना साफ है कि सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश में भाजपा को अपने वोट बैंक को बरकरार रखने की चुनौती भी कम नहीं होगी.

ललन सिंह से फिर खफा हुआ राजद

किस्सा मुंगेर महोत्सव का है, जिसमें प्रभारी मंत्री के अपमान के बहाने ललन सिंह पर जमकर निशाना साधा गया. इस बार डंका पीटा है, राजद के प्रवक्ता प्रगति मेहता ने. यहां एक बात उल्लेखनीय है कि प्रगति मेहता राजद के टिकट पर ललन सिंह के खिलाफ मुंगेर से चुनाव भी लड़ चुके हैं. प्रगति मेहता ने मुंगेर जिला प्रशासन पर आरोप लगाया है कि महोत्सव में जन प्रतिनिधयों की पूरी तरह अवेहलना की गई.

प्रभारी मंत्री कपिलदेव कामत की मौजूदगी में ही जलसंसाधन मंत्री ललन सिंह से महोत्सव का उद्घाटन करा दिया गया. इससे प्रभारी मंत्री का अपमान हुआ है. मुंगेर के मेेयर तक का सम्मान नहीं किया गया. श्री मेहता का कहना है कि जिला प्रशासन ने सामान्य शिष्टाचार का भी परिचय नहीं दिया. प्रभारी मंत्री के रहते ललन सिंह से महोत्सव का उद्घाटन कराना यह दिखाता है कि जिला प्रशासन ने सामान्य शिष्टाचार का भी ध्यान नहीं रखा. प

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