neerav-modiफैक्ट फाइल

  • 29 जनवरी को हुई 11 हज़ार करोड़ के घोटाले की शिकायत
  • 31 जनवरी को 6 लोगों के खिलाफ ए़फआईआर दर्ज़
  • नीरव जैसे 9339 कर्ज़दारों पर बकाया है 11 हज़ार करोड़
  • एनपीए के कारण बंद होने की कगार पर हैं 9 सरकारी बैंक
  • 10 साल में बैंकों ने 6 लाख करोड़ का लोन राइट ऑफ किया
  • मार्च 2018 तक 5 लाख करोड़ पार कर जाएगा एनपीए
  • 2002-2016 के बीच दस गुना बढ़ चुका है बैंकों का क़र्ज़

लूट का सिलसिला नीरव मोदी के नाम के साथ खत्म नहीं होता, बल्कि सत्ता की शह पर सार्वजनिक धन के लुटेरों की ़फेहरिस्त बढ़ती जा रही है. इस सूची में जो नए-नए नाम निकल कर सामने आ रहे हैं, वे राजनीतिक संरक्षण में पल रहे धनपतियों के नाम हैं. सवाल ये है कि बैंकों से हज़ारों करोड़ की हेराफेरी कर ये पूंजीपति देश से कैसे भाग निकलते हैं? 29 जनवरी को जब पंजाब नेशनल बैंक के डीजीएम ने सीबीआई को नीरव मोदी द्वारा किए गए 11 हज़ार 360 करोड़ रुपए के घोटाले की जानकारी दी और 31 जनवरी को सीबीआई ने 6 लोगों के खिलाफ ए़फआईआर दर्ज़ की तो इसके बाद वह देश से बाहर कैसे भाग निकला? यही सवाल नीरव मोदी के मामा और उसके बिज़नेस पार्टनर मेहुल चोकसी की फरारी को लेकर भी उठ रहे हैं. बताया जाता है कि चंडीगढ़ की एक अदालत ने मेहुल चोकसी को 4 अगस्त 2017 को घोषित अपराधी करार दे दिया था. कोर्ट के आदेश के बावजूद मेहुल कैसे देश से भागने में कामयाब हो गया? यदि राजनीतिक संरक्षण नहीं था तो यह मुमकिन कैसे हुआ? गीतांजलि ग्रुप के मालिक मेहुल चोकसी ने इंजीनियरिंग के 7 छात्रों के साथ भी धोखाधड़ी की थी.

राजस्थान इंस्टीट्यूट ऑ़फ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी जयपुर के 7 छात्रों ने 2013 में आरएम सोलूशन्स  नाम से एक कंपनी बनाई और चोकसी की गीतांजलि ज्वेलर्स की फ्रेंचाइज़ी ली. इंजीनियर वैभव खुरानिया और दीपक बंसल की अगुवाई वाली इस कंपनी ने अक्टूबर 2013 में दिल्ली के राजौरी गार्डन में 3 करोड़ खर्च कर गीतांजलि का शोरूम खोला. इसके लिए उन्होंने डेढ़ करोड़ की सिक्योरिटी मनी भी जमा की, लेकिन उन्हें थर्ड ग्रेड और पुराने हीरे दिए गए. शिकायत करने पर कंपनी ने न तो हीरे बदले और न ही शिकायत का कोई जवाब दिया. तब हार कर वैभव और दीपक ने चोकसी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज़ कराई. मेहुल चोकसी ने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट से स्टे ले रखा है.

लेकिन, यह जानना भी जरूरी है कि इस देश में नीरव मोदी जैसे करीब 9339 कर्ज़दार और हैं, जिन्होंने सरकारी बैंकों के 1 लाख 11 हज़ार करोड़ रुपए लंबे अर्से से दबा रखे हैं. बैंक की भाषा में इन्हें विलफुल डिफॉल्टर कहा जाता है. इन डिफॉल्टरों में देश के नामी-गिरामी औद्योगिक घराने शामिल हैं. रोटोमैक ग्रुप के विक्रम कोठरी भी इनमें से एक है. सरकारी एजेंसी सिबिल के आंकड़ों के मुताबिक़, सितम्बर 2017 तक सरकारी बैंकों के 7564 कर्जदारों ने बैंकों के 93 हज़ार 357 करोड़ रुपए दबा रखे हैं.

सन्‌ 2013 में जहां ये रकम 25 हज़ार 410 करोड़ रुपए थी, वहीं पिछले 5 सालों में यह 3407 बढ़कर 93 हज़ार करोड़ से ऊपर हो गयी है. पिछले वर्ष रिज़र्व बैंक ने सुप्रीम कोर्ट को दी गयी एक जानकारी में भी विलफुल डिफॉल्टर्स द्वारा हड़पे गए धन की जानकारी दी थी, लेकिन रिज़र्व बैंक ने इन डिफॉल्टर्स की सूची को सार्वजानिक करने से मना कर दिया था. सिबिल द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार, दिसंबर 2017 तक पंजाब नेशनल बैंक के 1018 कर्जदारों ने बैंक के 12 हज़ार 574 करोड़ रुपए दबा रखे हैं. पीएनबी के बड़े डिफॉल्टर्स में विनसम डायमंड के जतिन मेहता के ऊपर 900 करोड़ तथा एप्पल इंडस्ट्रीज पर 248 करोड़ रुपए बकाया है.

इसी तरह भारतीय स्टेट बैंक के 1665 डिफॉल्टर्स  के ऊपर 27 हज़ार 716 करोड़ की रकम बकाया है, जिसे वो जानबूझ कर वापस नहीं कर रहे हैं. एसबीआई के डिफॉल्टर्स में 1286 करोड़ के कर्ज़दार अकेले विजय माल्या हैं, जो अर्से से भारत से फरार हैं. बैंक ऑ़फ इंडिया के 314 डिफॉल्टर्स ने 6104 करोड़ रुपए तथा आईडीबीआई के 83 विलफुल डिफॉल्टर्स 3659 करोड़ रुपए दबा रखे हैं. सत्ता के संरक्षण के चलते ये कर्ज़दार जनता के पैसे की लूट करने के बावजूद खुले आम घूम रहे हैं और ऐशो आराम की ज़िन्दगी बिता रहे हैं.

इसके अलावा, मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित ज़ूम डेवलपर्स के ऊपर भी डेढ़ हज़ार करोड़ रुपए से अधिक का लोन है. किंगफिशर एयरलाइंस का नाम तो है ही, बीटा नापथाल के ऊपर भी क़रीब 1 हजार करोड़ रुपए का लोन है और ये सब विलफुल डिफॉल्टर हैं. 2002 से लेकर 2016 के बीच भारतीय बैंकों का क़र्ज़ दस गुना से भी अधिक बढ़ गया है. ऐसे में एनपीए बन चुकी इस विशाल राशि के लिए किसी एक व्यक्ति, किसी एक संस्था, किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक सरकार को दोष देना भी ठीक नहीं होगा. दरअसल, एनपीए के इस हमाम में सब नंगे हैं.

यह खेल ऐसा है जिसके खिलाड़ी बदलते रहे, लेकिन खेल बदस्तूर जारी रहा. मज़े की बात यह है कि एक तरफ गरीबों के टैक्स का पैसा लेकर ये धन्नासेठ कर्ज़दार ऐश कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर देश के 9 सरकारी बैंक एनपीए की वजह से बंद होने के कगार पर हैं. खबर यह भी है कि पिछले 10 साल में बैंकों ने इन डिफॉल्टर्स का 3.6 लाख करोड़ का लोन राइट ऑफ किया है, यानी उसे बैंक की बैलेंस शीट में बट्टे खाते में डाल दिया है. वित्तमंत्री अरुण जेटली का कहना है कि इसके लिए बैंक के ऑडिटर्स दोषी हैं. जेटली जी शायद यह बताना नहीं चाहते कि सरकारी बैंकों का ऑडिट आरबीआई भी कराती है, जो सीधे सरकार के नियंत्रण में है.

आखिर कौन हैं ये विलफुल डिफॉल्टर्स? इनकी पहचान जब दस्तावेजों में दर्ज है तो उनसे क़र्ज़ वसूलने में समस्या क्या है? कृषि बनाम कॉरपोरेट एनपीए की बात करें तो कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए हमेशा से कॉरपोरेट सेक्टर के मुक़ाबले बहुत ही कम रहा है. कृषि क्षेत्र में एक किसान ट्रैक्टर, खाद, बीज आदि खरीदने के लिए चंद हज़ार या एक-दो लाख रुपए का लोन लेता है, जबकि कॉरपोरेट क्षेत्र में एक कम्पनी पर ही सैकड़ों-हजारों करोड़ का लोन बकाया है. लेकिन, अ़फसोसजनक यह है कि जहां छोटे-छोटे कर्ज़ों के कारण बैंक वालों की धौंस झेलकर हर साल एक लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं, वहीं सत्ता के गलियारों में गणेश-परिक्रमा करने वाले माल्या और मोदी जैसे व्यापारी हज़ारों करोड़ डकार कर फरार हो रहे हैं. देश के चौकीदार की इस पर इरादतन चुप्पी और चौंकानेवाली है.  किसान क़र्ज़ पर जहां हर ओर चर्चा होती है, वहीं इस बात पर चर्चा नहीं होती कि किस कम्पनी ने कितने करोड़ का लोन लेकर नहीं चुकाया?

शेल कंपनियों की लूट पकड़ नहीं पाए विनोद राय

प्रधानमंत्री बार-बार यह दोहराते रहते हैं कि सरकार ने रजिस्ट्रार ऑ़फ कम्पनीज़ में सूचीबद्ध 3 लाख से ज़्यादा अर्से से निष्क्रिय पड़ी और मुखौटा कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया है. इससे शेल कंपनियों के जरिए कालेधन का कारोबार करने वालों पर लगाम कस गई है. यदि प्रधानमंत्री के इस दावे पर यकीन करें तो नीरव मोदी और मेहुल चोकसी की 200 शेल कंपनियां कॉर्पोरेट मंत्रालय के फंदे से कैसे बच गईं? प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई का कहना है कि इन्हीं दो सौ शेल कंपनियों के जरिए सारा फर्जीवाड़ा करके पीएनबी से हासिल किए गए 11 हज़ार 360 करोड़ रुपए का निवेश किया गया. देश के डूब रहे बैंकों को रिकैपिटलाइज करने के लिए हाल में केंद्र सरकार ने 2.11 लाख करोड़ की नई पूंजी मंजूर की है. पंजाब नेशनल बैंक को रिकैपिटलाइजेशन की मद में पांच हज़ार करोड़ की ताज़ा पूंजी मिली है.

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पीएनबी को एनपीए से उबरने को जो पूंजी मिली, उससे दो गुना ज़्यादा रकम की चोट तो अकेले नीरव मोदी ने ही दे दी है. इसी तरह सरकारी बैंकों का एनपीए से बाहर निकलना तकरीबन नामुमकिन जैसा है. सरकार एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक़, मार्च 2018 तक देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए 9.5 लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर जाएगा. एक और चौंकाने वाली बात यह भी है कि बैंकों के बेहतर प्रबंधन और उनकी कार्यशैली पर नज़र रखने के लिए मोदी सरकार ने 26 फरवरी 2016 को पूर्व सीएजी विनोद राय की अगुवाई में ‘बैंक बोर्ड ब्यूरो’ का गठन किया था. इसका मुख्यालय भी मुंबई में है.

लेकिन घोटालों को सूंघ कर बता देने का दावा करने वाले विनोद राय अपनी ही नाक के नीचे चल रहे हज़ारों करोड़ के पीएनबी घोटाले को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे. आपको याद होगा कि ये वही विनोद राय हैं, जिन्होंने यूपीए शासन के दौरान 26 लाख करोड़ के कोयला घोटाले की पटकथा लिखी थी. बाद में कानूनी जंग में यह सारा मामला टांय-टांय फिस्स साबित हुआ और इस मामले को लेकर मोदी सरकार की खासी  किरकिरी भी हुई. ताज़ा जानकारी के मुताबिक़, विनोद राय की इन दोनों नाकामियों से सरकार खासा नाराज़ है और मार्च 2018 के बाद ‘बैंक बोर्ड ब्यूरो’ पर ताला जड़ने की तैयारी कर रही है.

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