muतथागत की तपोभूमि बोधगया स्थित अपने दामन में गरिमामय अतीत को लपटे मगध विश्वविद्यालय वर्तमान में वित्तीय अनियमितता, भ्रष्टाचार, फर्जी डिग्री तथा अनेक तरह की गड़बड़ी के आगोश में पल रहा है. बिहार के सबसे बड़े विश्वविद्यालय मगध विश्वविद्यालय में पढ़ना कभी गर्व की बात माना जाता था. देश ही नहीं विदेशी छात्र-छात्राएं भी मगध विश्वविद्यालय में पढ़ना गौरव की बात मानते थे. लेकिन बीसवीं सदी के अंतिम दशक में मगध विश्वविद्यालय अपनी गरिमा को खोकर फर्जी डिग्री के लिए पूरे देश में चर्चित हो गया. मामला यहां तक पहुंंच गया कि मगध विश्वविद्यालय के कई कर्मचारियों व पदाधिकारियों को जेल की हवा खानी पड़ी. इसी तरह मगध विश्वविद्यालय में वित्तीय गड़बड़ी के कई मामले हाईकोर्ट में चल रहे हैं.

ताजा मामला बिहार सरकार द्वारा मगध विश्वविद्यालय को दिये गए 120 करोड़ रुपये के आंवटन का है. वित्तीय वर्ष 2014-15 और 2015-16 में मगध विश्वविद्यालय को कई मदों में आवंटित राशि में भी गड़बड़ी का मामला सामने आया है. बिहार सरकार के निगरानी विभाग को जब मगध विश्वविद्यालय में करोड़ो रुपये की वित्तीय गड़बड़ी के मामले का पता चला तो स्वत: संज्ञान लेते हुए प्राथमिकी संख्या 8/16 दर्ज करते हुए जांच शुरू कर दी. जांच से पूर्व विजिलेंस ने मगध विश्वविद्यालय को एक प्रश्नावली भेजते हुए संबंधित कागजातों की मंाग की.

लेकिन विश्वविद्यालय ने जो कागजात विजिलेंस को सौंपे इससे जांच कर रहे पदाधिकारी संतुष्ट नहीं थे. जिसके कारण बीते 19 फरवरी 2016 को विजिलेंस की चार सदस्यीय टीम ने मगध विश्वविद्यालय पहुंचकर विभिन्न मदों में आवंटित की गई राशि और खर्च का पूर्ण ब्यौरा मगध विश्वविद्यालय के वित्त पदाधिकारी से मांगा. कागजात उपलब्ध कराने में वित्त पदाधिकारी ने सहयोग नहीं किया, जिससे निगरानी टीम में शामिल डीएसपी और इंस्पेक्टर ने कुलसचिव डा. सीताराम सिंह से इस बात की शिकायत की. वहीं दूसरी ओर मगध विश्वविद्यालय शिक्षकेत्तर कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अमितेश प्रकाश ने विश्वविद्यालय में पदाधिकारियों की ओर से किये जा रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

उन्होंने निगरानी विभाग तथा राज्य के कुलाधिपति को करोड़ों की वित्तीय गड़बड़ी से संबंधित कागजात सौंपा है. अमितेश प्रकाश ने बताया कि नैक की टीम जब मगध विश्वविद्यालय की गे्रडिंग का निरीक्षण करने लिए आने वाले थी, तब तक मगध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मोहम्मद इश्तियाक ने बिना राजभवन की अनुमति लिए आंतरिक स्त्रोत के पांच करोड़ रुपये खर्च कर दिए. वहीं दूसरी ओर स्टूडेंट इंफार्मेशन सेंटर के निर्माण के लिए एक करोड़ आठ लाख रुपये का ठेका बिना टेंडर के ही अपने चहते ठेकेदार को दे दिया. इन सब के अलावा कई वित्तीय गड़बड़ियों के मामले भी सामने आ रहे हैं. विजिलेंस की टीम जब 19 फरवरी 2016 को मगध विश्वविद्यालय मुख्यालय पहुंची तो वहां हड़कम्प मच गया.

टीम का नेतृत्व डीएसपी आर.के पौदार कर रहे थे. टीम में इंस्पेक्टर मुरारी प्रसाद, एसआई रामहरि यादव शामिल थे. टीम ने मगध विश्वविद्यालय के आय-व्यय, अनुदान संबंधित 2014-15 तथा 2015-16 के वित्तीय कागजात मांगे. इसके अलावा साथ ही इन वर्षों में कार्यरत कुलपति, कुलसचिव, परीक्षा नियत्रंक, वित्त पदाधिकारी, वित्त परामर्शी तथा कॉलेज इंस्पेक्टर के नाम, पते तथा मोबाइल नंबर भी मांगें.

निगरानी टीम द्वारा इस अवधि में मगध विश्वविद्यालय को सरकार से अलग-अलग मदों में आवंटन की विवरणी, विश्वविद्यालय व अंगिभूत कॉलेजों द्वारा खर्च की गई विवरणी की मांग की गई. बताया जाता है कि विजिलेंस की जांच का मुख्य मुद्दा मगध विश्वविद्यालय को सरकार द्वारा 120 करोड़ रुपये का आवंटन है.
मगध विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. सीताराम सिंह से मिली जानकारी के अनुसार सरकार ने मगध विश्वविद्यालय में नैक आगमन के पूर्व 120 करोड़ रुपये के आवंटन की सहमति दी थी. सरकार के वित्त विभाग ने बिना आवंटित किए उक्त राशि को आवंटित दिखा दिया था.

इसी को लेकर विजिलेंस की टीम ने जांच की. कुलसचिव ने बताया कि सरकार द्वारा आंवटित राशि की जो जानकारी विजिलेंस की टीम ने मांगी, उन्हें वह जानकारी उपलब्ध करा दी गई है. इस संबंध में मगध विश्वविद्यालय के वित्त पदाधिकारी देवेश कुमार सिन्हा ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा योजना मद में वित्तीय वर्ष 2014-15 तथा 2015-16 में उपलब्ध कराये गए बीस करोड़ रुपये के हिसाब-किताब से जुड़े मामले की जांच के लिए विजिलेंस की टीम आई थी. उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों में राज्य सरकार द्वारा योजना मद में मगध विश्वविद्यालय को करीब पांच करोड़ रुपये मिले हैं. इसकी रिपोर्ट विजिलेंस की टीम को सौंप दी गई है.

विजिलेंस के डीएसपी आर.के पौदार ने बताया कि मगध विश्वविद्यालय में वित्तीय गड़बड़ी से संबंधित कोई लिखित शिकायत नहीं मिली है. लेकिन हाल के दिनों में हुई कुछ घटनाओं को देखते हुए विजिलेंस के वरीय अधिकारियों ने स्वत: संज्ञान लेते हुए जांच शुरू की है. नियम है कि जब भी किसी विभाग को विकास कार्यों के लिए राशि दी जाती है तो उसकी उपयोगिता प्रमाण पत्र की जांच होती है. फिलहाल इन्हीं मामले की जांच की जा रही है. सबसे बड़ी बात है कि राज्य सरकार से आवंटित 120 करोड़ रुपये कहां गए? इस बात को बताने के लिए कोई तैयार नहीं है.

मगध विश्वविद्यालय के कुलसचिव का कहना है कि इस राशि को वित्त विभाग ने बिना आवंटन के ही मगध विश्वविद्यालय को आवंटित दिखा दिया है. जबकि यह राशि मगध विश्वविद्यालय को मिली ही नहीं. मगध विश्वविद्यालय में वित्तीय अनियमितता चरम पर है और इस मामले में मगध विश्वविद्यालय के पूर्व तथा वर्तमान के कई पदाधिकारियों के शामिल होने की संभावना है. मगध विश्वविद्यालय के शिक्षकेत्तर कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अमितेश प्रकाश ने बताया कि मगध विश्वविद्यालय में वित्तीय गड़बड़ी तथा नियम के विपरित करोड़ो रुपये खर्च करने के सैकड़ों दस्तावेज उन्होंने राजभवन को सौंपे हैं.

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