kamal-morarkaकिसान इस देश की रीढ़ हैं. किसानों को उनकी समस्याओं से उबारना देश का प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए. किसानों को इतना ताकतवर बनाने की ज़रूरत है कि देश की राजधानी दिल्ली एवं विभिन्न राज्यों की राजधानी तक उनकी आवाज़ पहुंचे और उस पर तत्काल कारगर सुनवाई हो. किसान मंच की तऱफ से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित किसान अधिकार दिवस में मुख्य अतिथि की हैसियत से आमंत्रित ख्यातिलब्ध समाजसेवी एवं उद्योगपति कमल मोरारका ने यह बात कहते हुए सम्मेलन में बड़ी संख्या में मौजूद किसानों से एकजुट होने का आह्वान किया और प्रसन्नता ज़ाहिर की कि किसान मंच उत्तर प्रदेश से लेकर देश भर में किसानों को गोलबंद करने की सार्थक कोशिश में लगा है.

श्री मोरारका ने कहा कि किसान मंच जाग्रत हो रहा है, यह बहुत सुखद है. किसानों को इतना जागरूक और एकजुट हो जाना चाहिए कि उनकी आवाज़ उठे, तो केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक सतर्क हो जाएं तथा वे उनकी उपेक्षा न कर पाएं. श्री मोरारका ने कहा कि देश बहुत बड़ा है, किसानों की समस्याएं भी अलग-अलग हैं. उनकी समस्याओं के निपटारे के लिए किसान मंच सशक्त माध्यम बने. वह राष्ट्रीय स्तर से लेकर क्षेत्रीय स्तर तक सरकार और किसानों के बीच मजबूत कड़ी का काम करे, तभी विकास का असली मकसद पूरा हो पाएगा.

किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद सिंह ने जैविक कृषि के माध्यम से देश के लाखों किसानों से सीधे जुड़े कमल मोरारका का नाम किसान मंच के राष्ट्रीय संरक्षक के रूप में प्रस्तावित किया, जिसका राष्ट्रीय महामंत्री प्रताप गोस्वामी एवं उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शेखर दीक्षित समेत सभी लोगों ने हर्षध्वनि से समर्थन किया. लखनऊ के गांधी सभागार में पूर्व केंद्रीय मंत्री कमल मोरारका ने कहा कि देश में किसान उपेक्षित है, यह सबसे तकलीफदेह स्थिति है. किसान हितों की बात उठाने का कोई कारगर मंच भी नहीं है. ऐसे में किसान मंच ने इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया है. पूर्व सांसद एवं वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने कहा कि राष्ट्रद्रोह को लेकर हो रही तमाम सियासी बहसें बेमानी हैं, क्योंकि असली राष्ट्रद्रोह किसानों की उपेक्षा है.

अब यह तय होना चाहिए कि जिस ज़िले में किसानों की समस्याओं का निराकरण करने में कोताही हो या कोई किसान आत्महत्या कर ले, वहां के डीएम को राष्ट्रद्रोही घोषित किया जाए. किसानों को तबाही की स्थिति में पहुंचाने वाली सरकारें और राजनीतिक पार्टियां असली राष्ट्रद्रोही हैं. किसानों से सारी राजनीतिक पार्टियां वोट लेती रहीं, लेकिन उनकी समस्याओं के समाधान की कोई नीति नहीं बनी, जबकि बड़े बकाएदारों को सरकार लगातार छूट देती रही. इसलिए किसानों में ऐसी ताकत पैदा करनी होगी कि उनकी उपेक्षा करके कोई नेता सड़क पर चल न पाए.

उन्होंने कहा कि देश में जैविक कृषि को पुनर्जीवित करने का श्रेय कमल मोरारका को जाता है. किसानों को फिर से जैविक कृषि की परंपरा पर लौटने का आह्वान करते हुए उन्होंने यह आश्वासन दिया कि जैविक कृषि उत्पाद खरीदने की भी समुचित व्यवस्था होगी और किसान मंच उसका ज़रिया बनेगा. इस मौक़े पर श्री मोरारका और श्री भारतीय के हाथों मासिक पत्रिका किसान सत्ता का विमोचन भी हुआ. किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद सिंह ने कहा कि होली के बाद पूरे प्रदेश में किसान जागरण यात्रा निकाली जाएगी, जो लखनऊ से शुरू होगी और लखनऊ में ही उसका समापन एक रैली के साथ होगा.

इसके पीछे उद्देश्य यह है कि किसानों को एक साथ जागरूक और गोलबंद किया जाए, ताकि उनकी उपेक्षा के प्रति राजनीतिक दल सचेत हो जाएं. सिंह ने कहा कि पूरी दुनिया में किसानों को अधिक सब्सिडी और उद्योगपतियों को कम है, लेकिन सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले भारतवर्ष में 70 फीसद रियायत उद्योगपतियों को है, जबकि किसानों को महज 30 फीसद सब्सिडी मिलती है. मंच के प्रदेश अध्यक्ष शेखर दीक्षित ने कहा कि जाति-धर्म में बंटे किसानों को एकजुट कर जुझारू आंदोलन खड़ा करने की तैयारी है, ताकि सरकार पर दबाव बने और किसानों के हित में काम हो.

दीक्षित ने कहा कि किसान मंच की पहल पर उत्तर प्रदेश में किसानों की जागरूकता और एकजुटता अब इस मुकाम पर पहुंचने वाली है कि अगर काम नहीं, तो टैक्स नहीं की नीति भी अख्तियार की जा सकती है. जो फसल उगाएगा, उसे अधिक से अधिक ़फायदा मिले, इसके लिए भारी जन-दबाव बनाने की तैयारी है. विनोद सिंह एवं शेखर दीक्षित ने भारत जैसे कृषि प्रधान देश में स्मार्ट सिटी की अवधारणा पर कटाक्ष किया और कहा कि देश को स्मार्ट गांवों की अधिक ज़रूरत है.

सम्मेलन को स्वामी विद्या चैतन्य, प्रताप गोस्वामी, कवि वेदव्रत वाजपेयी, नागेंद्र नागमणि, उमेश तिवारी, नृपेंद्र सिंह चौहान, श्रीचंद्र जैन, कविता दमभरे, भोपाल सिंह चौधरी समेत कई नेताओं ने संबोधित किया. कार्यक्रम की शुरुआत आल्हा से हुई. राष्ट्रीय आल्हा गायक रामेश्वर आज़ाद एवं उनकी टीम ने आल्हा से समा बांधा. दूसरी तऱफ लेखक-निर्देशक अनिल गुरु के लघु नाटक दास्तां किसानों की के मंचन ने उपस्थित किसानों को भावुक कर दिया. लखनऊ कलाकार एसोसिएशन ने किसानों की समस्याओं और आत्महत्याओं पर अपनी नाट्य-प्रस्तुति दी.

किसान मंच ने उन चार किसानों के परिवार के सदस्यों को भी सम्मानित किया, जिन्होंने बदहाली से आजिज आकर आत्महत्या कर ली. इनमें उन्नाव के कोरारा गांव का वह किसान परिवार भी शामिल था, जिसके मुखिया ने खराब फसल देखकर फांसी लगा ली. आत्महत्या के पीछे वजह यह थी कि उसे एक किलो आटा देने को भी कोई तैयार नहीं हुआ.

उसके बच्चे भूख से बिलख रहे थे. जब वह खाली हाथ घर पहुंचा, तो उसकी बेटी ने खाना मांगा. दु:खी किसान ने बाग में जाकर फांसी लगा ली. इसी तरह सीतापुर, झांसी, हमीरपुर, बुलंदशहर एवं बांदा समेत कई ज़िलों में फसल खराब होने और सरकार की तऱफ से कोई राहत न दिए जाने से दु:खी होकर कई किसानों ने आत्महत्या कर ली. सम्मेलन में गौरव दीक्षित, संजय द्विवेदी, मोहम्मद इकबाल, नितिन अस्थाना, अजय श्रीवास्तव, वसीम खान, अमित पांडेय, सोनू तिवारी, प्रशांत तिवारी, विकास दीप समेत बड़ी संख्या में पदाधिकारी-कार्यकर्ता मौजूद थे. महिलाओं की भागीदारी खास तौर पर उल्लेखनीय रही.

किसानों को राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक मजबूती देने वाला मांग-पत्र

कृषि और आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसान मंच का प्रस्ताव और 25 सूत्रीय मांग-पत्र देश की कृषि नीति को नया आयाम देने और किसानों को राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक तौर पर मजबूती के साथ स्थापित करने वाला मसौदा साबित होगा. 

मंच की 25 सूत्रीय मांगें

  • भूमि अधिग्रहण बिल 2015 में बदलाव की ज़रूरत है. मुआवज़े और बाकी विवादित मुद्दों पर किसान संगठनों से बातचीत कर सरकार को एक नया सर्वमान्य बिल तैयार करना चाहिए.
  • इस समय सरकारी नीतियों की वजह से हो रही किसानों की आत्महत्याएं सबसे ज्वलंत प्रश्न है. किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए एक समग्र नीति की आवश्यकता है. ज़िला स्तरीय अधिकारियों को किसानों की आत्महत्या के लिए जवाबदेह बनाया जाए.
  • किसानों की फसलों की क़ीमत का आकलन स्वामीनाथन रिपोर्ट के मुताबिक हो. फसलों की क़ीमत उत्पादन लागत से कम से कम दोगुनी होनी चाहिए.
  • किसानों का उत्पाद बाज़ार से जोड़ने के लिए अविलंब नीति और ढांचा तैयार किया जाए, ताकि कृषि उत्पादन में बाज़ार के मुताबिक बदलाव में तेजी आ सके.
  • अनाज की बर्बादी रोकने के लिए ब्लॉक एवं पंचायत स्तर पर अत्याधुनिक कोल्ड स्टोरेज के निर्माण के लिए सरकार एक समर्थन नीति बनाए. ब्लॉक स्तर पर ही अनाज भंडारण के लिए कोल्ड स्टोरेज बनाए जाएं. कोल्ड स्टोरेज बनाने का काम ब्लॉक में रहने वाले लोग करें और उसके मापदंड निर्धारण और किराए की ज़िम्मेदारी सरकार उठाए.
  • हर गांव में इंटरनेट की व्यवस्था के साथ-साथ पंचायत को इंटरनेट (इंफॉर्मेशन-हाइवे) के माध्यम से जोड़ने और गांवों में ही युवाओं एवं महिलाओं के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग की व्यवस्था हो.
  • आईटीआई की तर्ज पर हर न्याय पंचायत में आधुनिक कृषि का ट्रेनिंग सेंटर खोलने का प्रावधान हो, ताकि किसान नई तकनीक, नए यंत्रों के बारे में जानकारी हासिल कर सकें और साथ ही सीधे बाज़ार से जुड़ सकें.
  • जिस तरह युवाओं को उद्यमी बनाने के लिए सरकार ने स्टार्ट-अप इंडिया की शुरुआत की, उसी तरह कृषि क्षेत्र में भी व्यवसाय के प्रोत्साहन के लिए नीति बनाए जाए.
  • कृषि बीमा का नया प्रारूप तैयार किया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं से फसल बर्बाद होने पर किसानों को त्वरित राहत मिल सके.
  • किसानों की न्यूनतम आमदनी तय की जाए. एक किसान आय आयोग का गठन किया जाए, जो भूमिहीन कृषि मज़दूरों, भूमिहीन किसानों और छोटे किसानों की ज़रूरतों के मुताबिक नीति बनाए.
  • जैव परिवर्तित फसलों, उनके प्रदर्शन, व्यवसायीकरण और जैव परिवर्तित बीज-पौधों पर पूर्णत: प्रतिबंध लगे.
  • कृषि उत्पादन को बिचौलियों से बचाने और उसे उद्योग से जोड़ने के लिए देश के हर ब्लॉक में उद्योगों की श्र्ृंखला बनाई जाए और उनमें नौजवानों के लिए रा़ेजगार की व्यवस्था हो. किसानों को स्वावलंबी और खेती को लाभदायक बनाने के लिए हर ब्लॉक में स्थानीय कच्चे माल के आधार पर औद्योगिक इकाइयां लगाई जाएं.
  • केंद्र और राज्य सरकारें देश के ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पानी, 24 घंटे बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा व्यवस्था और सड़कों को प्राथमिकता दें.
  • सरकार जिन फसलों को किसानों से खरीदती है, उसकी क्रय-प्रक्रिया और अविलंब भुगतान की नई व्यवस्था लागू होनी चाहिए.
  • कृषि को विश्व व्यापार संगठन से बाहर किया जाए और देश में सभी तरह के कृषि उत्पादों के आयात पर रोक लगाई जाए.
  • सरकार किसान संगठनों एवं प्रतिनिधि मंडलों से वार्ता के लिए संस्थागत संवैधानिक व्यवस्था बनाए, ताकि किसानों की मांगें नीति में लक्षित
    हो सकें.
  • मिलावटखोरी के खिला़फ कड़े क़ानूनों का प्रावधान हो.
  • केंद्र सरकार जैविक खेती के प्रोत्साहन के लिए नई नीति बनाए. जैविक किसानों को आर्थिक एवं तकनीकी सहायता देने के लिए क़ानून बने. ऐसी योजना बने, जिसके तहत रासायनिक खेती एवं ग़ैर-जैविक खेती को जैविक खेती में बदला जा सके. हर ज़िले के पांच ब्लॉकों में जैविक खेती का पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाए और उसी पर आधारित आर्थिक ढांचा तैयार किया जाए, ताकि भविष्य में केमिकल रहित स्वस्थ खाद्य सुरक्षा की ज़रूरत पूरी हो सके.
  • पशुपालन और दुग्ध उत्पादों से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए ऐसी नीति बने, जो गांव के युवाओं, खासकर छात्रों के लिए आय का ज़रिया तैयार कर सके.
  • गांवों को ऊर्जा-स्वावलंबी बनाने के लिए किसानों को सौर ऊर्जा के उत्पादन-वितरण में प्रोत्साहन और हिस्सेदारी मिले. बहुत सारे लोग हैं, जो गांवों में सौर ऊर्जा उत्पादन के इच्छुक हैं. सरकार क़ानून बनाकर उन्हें गांवों में सौर ऊर्जा उत्पादन की अनुमति दे. बिजली की दर सरकार तय करे और बची हुई बिजली को नेशनल ग्रिड से जोड़ने की अनुमति दे.
  • गांवों के स्कूलों का संचालन स्थानीय लोगों के हाथ में हो. स्थानीय उपज और उससे जुड़ी जानकारियों का समावेश पाठ्यक्रम में हो.
  • गांव एवं ब्लॉक के संचालन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी भी स्थानीय लोगों की हो. स्थानीय लोगों को ही प्रोत्साहन और ट्रेनिंग देकर उसमें भर्ती करने का प्रावधान हो.
  • गांवों में बांध, नहर, सड़क या किसी भी निर्माण की निगरानी और प्रगति पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी स्थानीय लोगों के हाथ में हो.
  • राज्य सरकारों के कृषि विभाग की यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वह समय पर इस बात की घोषणा करे कि आने वाले एक-दो वर्षों में किन-किन फसलों की कब और कितनी कमी होगी, ताकि किसान अपनी फसलों के उत्पाद का स्वरूप ज़रूरत के मुताबिक तय कर सकें.
  • केंद्र और राज्य सरकारों को घोषणा करनी चाहिए कि वे देश की सभी ग्रामीण उत्पादन इकाइयों का सामान गुणवत्ता के आधार पर प्राथमिकता के तौर पर खरीदेंगी. सेना, पुलिस, मिड डे मील जैसी योजनाओं में जहां खाद्यान एवं कृषि उत्पाद सरकार सीधे आपूर्ति करती है, वहां का सारा सामान बाज़ार से न खरीद कर ग्रामीण औद्योगिक इकाइयों से खरीदने का प्रावधान होना चाहिए. 

नई कृषि नीति का बेमिसाल प्रस्ताव
किसान मंच ने देश और प्रदेश के किसानों के हित में व्यापक एवं दूरगामी प्रस्ताव पेश किया और सरकार के समक्ष 25 सूत्रीय मांगें रखीं. प्रस्ताव पर हुई बहस में सारे नेता एकराय थे कि सरकार के पास ग्रामीण विकास का कोई रोडमैप नहीं है, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था नव-उदारवादी शक्तियों के अधीन हो गई है. स़िर्फ अधिकतम समर्थन मूल्य या सब्सिडी या फिर कर्ज मा़फी पर्याप्त नहीं है. किसानों की खुशहाली गांवों के आर्थिक विकास से जुड़ी है.

यह तभी संभव है, जब कृषि को सीधे उद्योग से जोड़ा जाए. उत्पादन से लेकर उत्पाद की सफाई, छंटाई, प्रक्रमण एवं मार्केटिंग यूनिट की व्यवस्था और सुविधा गांव-ब्लॉक स्तर पर हो. उत्पादन के भंडारण की रणनीति बनाई जाए. हर ब्लॉक में अत्याधुनिक कोल्ड स्टोरेज और ताप नियंत्रित भंडारण गृह हों. फसल या खेती लाभकारी कैसे हो, खेती की ज़मीन छिनने से कैसे बचे और किसान की फसल बिचौलियों से बचकर सीधे उपभोक्ता तक कैसे पहुंचे, इस पर न तो राज्य सरकारों का ध्यान है और न केंद्र सरकार का.

देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में किसानों का योगदान 50 फीसद से घटकर महज 17 फीसद रह गया है, जबकि कृषि पर 58 फीसद लोग निर्भर हैं. किसान मंच मानता है कि विज्ञान, तकनीक एवं सूचना क्रांति के माध्यम से किसानों की समस्याएं आसानी से हल की जा सकती हैं, स़िर्फ नीयत और नीति की ज़रूरत है. मंच ने अपने आंदोलन को व्यापक शक्ल देते हुए देश के किसानों और किसान संगठनों के सामने एक सुझाव-पत्र भी प्रस्तुत किया. 

तेजी से फैल रहा किसान मंच
प्रदेश अध्यक्ष शेखर दीक्षित ने बताया कि उत्तर प्रदेश के सभी ज़िलों में किसान मंच की इकाइयां काम कर रही हैं, लेकिन 30 ज़िलों में ग्राम पंचायत स्तर तक इकाइयां सक्रिय हैं. उत्तराखंड के 13 ज़िलों में मंच की इकाइयां गठित हैं. मंच के उत्तराखंड अध्यक्ष भोपाल सिंह चौधरी ने कहा कि श्रीनगर स्थित हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में भी किसान मंच की इकाई गठित कर दी गई है. राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद सिंह ने बताया कि महाराष्ट्र में विदर्भ के 10 ज़िलों में किसान मंच काफी सक्रिय है और यवतमाल के गांव-गांव में मंच की इकाइयां काम कर रही हैं.

मध्य प्रदेश के 10 ज़िलों में मंच की इकाइयां गठित हो गई हैं. बिहार में भी किसान मंच की इकाइयां विस्तार ले रही हैं. उल्लेखनीय है कि किसान मंच का गठन देश के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1989 में किया था. महाराष्ट्र में कपास और संतरा पट्टी के किसानों के हक़ की लड़ाई लड़ने में किसान मंच ने अभूतपूर्व भूमिका अदा की थी. किसान मंच के दादरी आंदोलन के समक्ष अनिल अंबानी को घुटने टेकने पड़े और किसानों की ज़मीन पर उद्योग समूह का कब्जा नहीं हो पाया. टांडा में एनटीपीसी विस्तारीकरण में किसानों के उत्पीड़न के खिला़फ किसान मंच डटा रहा. 2012 में पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह और किसान मंच ने कई आंदोलनों में हिस्सेदारी की. 2013 में अन्ना हजारे का समर्थन कर किसान मंच ने उत्तर प्रदेश समेत देश भर में जनतंत्र यात्रा का आयोजन किया. 

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