केजरीवाल का लक्ष्य लोकसभा है. बकौल योगेंद्र यादव, लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को बड़ी सफलता हासिल होगी और केजरीवाल प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लिहाजा, केजरीवाल दिल्ली को शहादत के लिए इस्तेमाल करेंगे, ताकि वह राष्ट्रीय नेता बन सकें. लेकिन, यह तभी मुमकिन होगा, जब कांग्रेस या भाजपा उन्हें ऐसा करने देगी. राजनीतिक माहौल हालात के मुताबिक ज़रूरत से ज़्यादा धुंधला हो रहा है. पिछले कुछ दशकों से पीढ़ियों और विचारों के प्रसार पर नियंत्रण रखने वाला अधिपति वर्ग भाजपा के प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से झटके में आ गया है. 
sansad-bhपरपीड़क स्वपीड़क के प्रति सहानुभूति का भाव रखता है. अरविंद केजरीवाल की किसी भी क़ीमत पर इस्तीफ़ा देने की तीव्र इच्छा को रौंदना भाजपा और कांग्रेस के लिए क्रूरता जैसा क़दम होगा. बतौर आंदोलनकारी, दुर्भाग्यवश खुद को अराजक नेता बता देने वाले केजरीवाल को हर दिन एक नई लड़ाई के बारे में सोचना होता है, ताकि उनके चाहने वाले और समर्थक यह न सोचने लगें कि वह बिक गए हैं. पुराने वामदल से टूटकर अलग हुए कई समूहों की तरह आम आदमी पार्टी को भी हर दिन कुछ नया करना पड़ता है. साथ ही कुछ नई घोषणाएं करनी होती हैं. उन्हें स्थायी क्रांति का वादा करना पड़ता है और हर वक्त शहादत के रास्ते तलाशते रहना होता है. हालांकि, केजरीवाल एक चतुर रणनीतिकार हैं. ख़बरों में बने रहना, बातचीत करते रहना, देश भर में पार्टी के लिए अपील करते रहना बहुत ही शानदार और तर्कशील योजना है. दिल्ली उनके लिए अभ्यास का मैदान था, लेकिन इसने इतना दे दिया कि उन्हें अब इसकी ज़रूरत ही नहीं रह गई.
केजरीवाल का लक्ष्य लोकसभा है. बकौल योगेंद्र यादव, लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को बड़ी सफलता हासिल होगी और केजरीवाल प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लिहाजा, केजरीवाल दिल्ली को शहादत के लिए इस्तेमाल करेंगे, ताकि वह राष्ट्रीय नेता बन सकें. लेकिन, यह तभी मुमकिन होगा, जब कांग्रेस या भाजपा उन्हें ऐसा करने देगी. राजनीतिक माहौल हालात के मुताबिक ज़रूरत से ज़्यादा धुंधला हो रहा है. पिछले कुछ दशकों से पीढ़ियों और विचारों के प्रसार पर नियंत्रण रखने वाला अधिपति वर्ग भाजपा के प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से झटके में आ गया है. उन्होंने ऐसे किसी झटके की उम्मीद भी नहीं की थी. वे कहते हैं कि निश्‍चित तौर पर यह कॉरपोरेट घरानों की ताकत का असर है या कोई षड्यंत्र है. वे बार-बार विचार और उम्मीद करते हैं कि ऐसा नहीं होगा. वहीं, तीसरे मोर्चे की गतिविधियां भी इस अधिपति वर्ग की चिंता का सबब बन रही हैं. तेजी से बदलते हुए राजनीतिक माहौल ने भाजपा को नकारने के लिए एक नए गठबंधन का प्रादुर्भाव किया. तीसरे मोर्चे को भी लगता है कि उसके पास सरकार बनाने का मौक़ा है.
तमिलनाडु में एक अम्मा हैं, जिन्हें राज्य में 35 संसदीय सीटों पर जीत मिलने पर अपने लिए बड़ी उम्मीद है. लिहाजा, जयललिता ने माकपा और भाकपा को साथ मिला लिया. दोनों ही ईसाई दुल्हन की उस सहेली की तरह साथ आ गए, जिसे उम्मीद होती है कि एक दिन वह भी दुल्हन का फेंका हुआ गुलदस्ता लपकने में कामयाब होगी. उनके बाद दीदी हैं. वह भी ग़ैर-कांग्रेस, ग़ैर-भाजपा और ग़ैर-वामदल के तीसरे मोर्चे की नेता के तौर पर अपनी उम्मीदें पाले बैठी हैं. ममता बनर्जी को भी पश्‍चिम बंगाल में 35 सीटें जीतने की उम्मीद है. इसके सहारे वह भी तीसरे मोर्चे की पीएम प्रत्याशी का दावा कर रही हैं. उनके बाद हैं बहन जी. वह 15 अगस्त, 2014 को लालकिले की प्राचीर से तिरंगा फहराना चाहती हैं. अगर मायावती सपा के मूर्खतापूर्ण व्यवहार से फायदा उठा पाईं, तो उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में 40 सीटें जीत सकती है. दरअसल, सपा ने हिंदू वोट बैंक के लिए अपना परंपरागत मुस्लिम मतदाता गंवा दिया है. राजनीति में हो रहा हर तेज बदलाव आपके सामने पीएम बनने की उम्मीदों से लबरेज एक नया नेता पेश कर देता है. उन्हीं में एक हैं केजरीवाल, जो 30-40 सीटें जीतने की आस लगाए बैठे हैं.
सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी अर्से से पीएम बनने का सपना संजोए बैठे हैं. शरद पवार, नवीन पटनायक एवं नीतीश कुमार के सपने भी कुछ अलग नहीं हैं. ये चारों नेता अपने क्षेत्रों में 20 सीटें ही जीत सकते हैं. इनकी अपेक्षाएं तेजी से बदलती राजनीति के नाटकीय मोड़ पर निर्भर हैं. समस्या यह है कि इन सपनों के साथ ये सभी तीसरा मोर्चा बनाने के लिए संगठित होना चाहते हैं, जो संभव नहीं है.
वर्ष 1999 और 2004 में कांग्रेस और भाजपा मिलकर 300 सीटें हासिल करने में नाकाम रहीं. वर्ष 2009 में कांग्रेस ने सभी को चौंकाते हुए 200 से ज़्यादा सीटें जीतीं और दोनों बड़े दल मिलकर 300 का आंकड़ा पार गए. इस बार कांग्रेस को 100 सीटें मिलने की भी उम्मीद नहीं है. उम्मीद है कि यह पार्टी 80 सीटों पर ही सिमट कर रह जाएगी. हालांकि, भाजपा 230 से ज़्यादा सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है. इसके ख़िलाफ़ दलील दी जा सकती है कि देश के कई हिस्सों में भाजपा की मौजूदगी ही नहीं है. लिहाजा, कहा जा सकता है कि उन इलाकों में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिल पाएगी. पिछली बार विशेषज्ञों ने मतगणना की सुबह यही दलील देते हुए कहा था कि कांग्रेस 175 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाएगी, जबकि कांग्रेस ने 200 से ज़्यादा सीटें जीती थीं. इस बार फिर मुझे लग रहा है कि एक स्पष्ट विजेता सामने आएगा. मुझे अम्मा, बहन जी और दीदी के लिए दु:ख है.

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