झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के अकेले लड़ने के ऐलान के बाद महागठबंधन के भविष्य को लेकर विपक्षी दलों में कुछ उदासीनता दिखने लगी थी, लेकिन अब फिर से वैकल्पिक महागठबंधन को लेकर कवायद तेज हो गई है. गठबंधन टीम का ‘प्लान-बी’ भी तैयार है. यह प्लान अपेक्षाकृत संवेदनशील परिस्थितियों के मद्देनजर तैयार किया जा रहा है.


page7भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य के विपक्षी दलों ने महागठबंधन बनाने की कवायद तो शुरू की, पर सीटों के बंटवारे पर पेंच फंसता दिखाई पड़ रहा है. सीटों को लेकर सभी विपक्षी दल अपनी डफली-अपना राग अलापते नजर आ रहे हैं. लेकिन अंदरखाने सभी दलों को यह अहसास भी है कि अगर एक साथ मंच पर नहीं आए, तो भाजपा को शिकस्त देना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. कांग्रेस जहां दिल्ली में सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रही है, वहीं झामुमो को यह पूरी तरह लग रहा है कि इस बार झारखंड की गद्दी पर बैठने का सबसे उपयुक्त समय है.

झामुमो को यह अहसास है कि रघुवर दास के बड़बोलोपन और कार्यप्रणाली के कारण जहां भाजपा के अधिकांश कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं, वहीं राज्य की जनता भी विकास के खोखले दावे और सरकार द्वारा किए गए झूूठे वादों से नाराज है और इसका सीधा फायदा झामुमो को मिलेगा.

झामुमो नेता हेमंत सोरेन इस बार ताज पहनने को बेताब भी दिख रहे हैं और महागठबंधन में अगर सब ठीक-ठाक रहा तो जाहिर है कि वोटों का बंटवारा रुकेगा और महागठबंधन एक नयी ताकत के रूप में उभरेगी. लेकिन झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने यह कहकर विपक्षी दलों को मुश्किल में डाल दिया कि इनकी पार्टी अकेले अपने दम पर ही चुनाव लड़ेगी.

इसके बाद सभी दल सकते में आ गए हैं. वैसे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने कहा है कि महागठबंधन में न कोई मतभेद है और न कोई रार, झामुमो नेता हेमंत सोरेन की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से बात हो चुकी है और नवंबर में महागठबंधन का खाका बनकर तैयार हो जाएगा. विपक्ष के महागठबंधन को लेकर दिल्ली में बात तो बढ़ी है, पर यह कितनी बार टूटेगी और कितनी बनेगी यह तो वक्त ही बताएगा.

अपना गणित, अपने दावे

झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के अकेले लड़ने के ऐलान के बाद महागठबंधन के भविष्य को लेकर विपक्षी दलों में कुछ उदासीनता दिखने लगी थी, लेकिन अब फिर से वैकल्पिक महागठबंधन को लेकर कवायद तेज हो गई है. गठबंधन टीम का ‘प्लान-बी’ भी तैयार है. यह प्लान अपेक्षाकृत संवेदनशील परिस्थितियों के मद्देनजर तैयार किया जा रहा है. लोकसभा चुनाव को लेकर विपक्षी दलों में जो पेंच है, उसी को देखते हुए इस अलग व्यवस्था की रूपरेखा तो तैयार हो रही है.

लेकिन अभी तक झामुमो एवं कांग्रेस द्वारा पत्ते नहीं खोले जाने के कारण अन्य विपक्षी दल भी अभी रणनीति भांपने में लगे हुए हैं. राज्य के लोकसभा की 14 सीटों को लेकर कांग्रेस ने जो फार्मूला फौरी तौर पर तैयार किया है, उस फार्मूले में सभी दल अपने पूरे सम्मान के साथ फिट होते नहीं दिख रहे हैं. वैसे झामुमो के छिटकने के कयास मात्र से ही कांग्रेस अलर्ट हो गई है. कांग्रेस बाबूलाल मरांडी की झाविमो के साथ ही राजद एवं वामदलों को साधने में जुटी है और आपात स्थिति में झामुमो को छोड़कर इन दलों को साथ लेकर लोकसभा चुनाव में उतर सकती है.

इधर झामुमो ने भी एक तुर्रा छोड़ा है कि झामुमो ममता बनर्जी और मायावती के संपर्क में है, भले ही इन दलों का वजूद झारखंड में न के बराबर है, लेकिन इसका संदेश खासा बड़ा होगा. ममता बनर्जी से जुड़कर झामुमो गैर भाजपाई बांग्लाभाषी मतदाताओं को रिझाना चाहती है. इसी प्रकार मायावती से रिश्ता जोड़कर दलित मतदाताओं को भी अपनी ओर लाने की कोशिश में है. वैसे देखा जाय तो यह स्पष्ट है कि झामुमो प्रेशर पॉलिटिक्स कर रहा है.

झामुमो की नजर विधानसभा चुनाव पर ज्यादा है और वो चाहती है कि कांग्रेस विधानसभा चुनाव के लिए सीटों का बंटवारा अभी ही कर ले. कांग्रेस लोकसभा की सात सीटों पर अपनी दावेदारी कर रही है. बदले में वो विधानसभा चुनाव में झुकने को तैयार है. गौरतलब है कि कांग्रेस का अभी झारखंड से एक भी लोकसभा सदस्य नहीं है.

दरअसल झामुमो पिछले चुनावों के आधार पर सीट शेयरिंग की पक्षकार है. इसने विधानसभा में 40 सीटों पर दावेदारी पेश की है. झामुमो का तर्क है कि पिछले चुनाव में इसने 19 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि 18 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी. इधर बाबूलाल भी 20 सीटों पर अपनी दावेदारी जता रहे हैं. बाबूलाल मरांडी का भी यही कहना है कि उनकी पार्टी झाविमो ने आठ सीटें जीती थी, जबकि पांच पर दूसरे स्थान पर थे.

जहां तक कांग्रेस की बात है, पिछले विधानसभा चुनाव में उसके छह विधायक थे, जबकि 10 सीटों पर दूसरे नंबर पर थी. लोहरदगा उपचुनाव में कांग्रेस के सुखदेव भगत ने बाजी मारी थी और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा के कांग्रेस में शामिल होने के बाद इसके आठ विधायक हो गए. जाहिर है कि कांग्रेस भी ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपनी दावेदारी पेश कर रही है. कांग्रेस लोकसभा में सात और विधानसभा में 20 सीट की अपनी मांग पर अड़ी हुई है.

महागठबंधन को लेकर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद काफी सक्रिय थे और सभी दलों को एक साथ लाने में उनकी भूमिका अहम रही, इसलिए राजद भी 10 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहता है, हालांकि पिछले चुनाव में राजद का एक भी उम्मीदवार चुनाव जीत नहीं पाया था, लेकिन इसके छह प्रत्याशी दूसरे नंबर पर थे. दूसरे नंबर के आधार पर हो रही दावेदारी के कारण ही महागठबंधन में पेंच फंसता दिख रहा है.

सीटों को लेकर फंस रहा पेंच

इस महागठबंधन की सबसे खास बात यह दिख रही है कि झामुमो के अभी तक घोर विरोधी रहे बाबूलाल मरांडी इस महागठबंधन को बनाए जाने को लेकर सबसे ज्यादा तत्पर दिखाई दे रहे हैं. लेकिन उनकी पार्टी कांग्रेस आलाकमान पर दबाव बना रही है कि लोकसभा चुनाव तक विधानसभा के लिए नेतृत्व घोषित न किया जाय. इसका नुकसान हो सकता है. एकजुट होकर चुनाव लड़ें और विधानसभा के समय नेतृत्व पर फैसला हो, नेतृत्व घोषित करने से पहले नफा-नुकसान देख लिया जाय.

बाबूलाल की पार्टी लोकसभा में दो सीटें चाहती है, गोड्‌डा एवं कोडरमा. कोडरमा से खुद बाबूलाल मरांडी चुनाव लड़ेंगे, बाबुलाल की इस क्षेत्र में अच्छी पकड़ है और यहां से वे पहले सांसद भी रह चुके हैं. लेकिन गोड्‌डा संसदीय सीट पर पेंच फंसता दिख रहा है. यहां से कांग्रेस के फुरकान अंसारी की मजबूत दावेदारी है, जबकि झाविमो यहां से प्रदीप यादव को मैदान में उतारना चाहती है. प्रदीप यादव की भी पकड़ इस क्षेत्र में अच्छी है.

राजद भी पलामू या चतरा पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा है. इधर, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की विधायक पत्नी गीता कोड़ा के कांग्रेस में शामिल होने के बाद चाईबासा सीट को लेकर मामला फंस रहा है. चाईबासा सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है और इसके बागुन सुम्ब्रई आधा दर्जन बार यहां से जीत हासिल कर चुके हैं, पर झामुमो सभी आदिवासी सुरक्षित सीटों पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा है. कांग्रेस गीता कोड़ा को चाईबासा संसदीय सीट से उतारने का मन बना चुकी है.

गीता कोड़ा के कांग्रेस के शामिल होने से भाजपा का भी गणित गड़बड़ा गया है. पिछले लोकसभा चुनाव में गीता कोड़ा ने भाजपा को पूरी मदद की थी, जिसके कारण भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा चाईबासा से चुने गए.

इधर महागठबंधन कुछ छोटे दलों को भी अपने साथ लाने की कोशिश में है. वैसे इन दलों को लोकसभा की तो कोई सीट नहीं दी जाएगी, पर विधानसभा में एडजस्ट करने की कोशिश होगी. बसपा, झारखंड पार्टी और वाम दलों से इस सम्बन्ध में बातचीत चल रही है. कई विधानसभा क्षेत्रों में इन पार्टियों का दबदबा है. झाविमो अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी भी इन दलों को साथ लेकर चलने के पक्ष में हैं.

खूंटी संसदीय क्षेत्र में एनोस एक्का की पार्टी का पैठ है, वहीं पलामू एवं चतरा में बसपा का भी प्रभाव अच्छा-खासा है और इन सभी का फायदा यूपीए लेना चाहता है. वैसे महागठबंधन को लेकर राहुल गांधी से हेमंत एवं बाबूलाल मरांडी की कई दौर की वार्ता हो चुकी है और सभी दल भाजपा को शिकस्त देने के लिए एक साथ आना चाहते हैं. विपक्षी दलों की यह मजबूरी भी है, क्योंकि पिछले लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में अलग-अलग लड़कर वे अपना हस्र देख चुके हैं.

लोकसभा चुनाव में तो केवल झामुमो ही अपनी इज्जत बचा पाया था, उसने दो सीटें जीती थी, जबकि अन्य 12 सीटें भाजपा के खाते में गईं. ठीक उसी तरह, विधानसभा चुनाव में भी हुआ. विपक्षी दलों में वोटों के बिखराव के कारण ही भाजपा झारखंड गठन के बाद पहली बहुमत की सरकार बना सकी. इसलिए, भले ही किसी दल को झुकना पड़े, भाजपा को शिकस्त देने के लिए सभी पार्टियों का एक मंच पर आना उनकी मजबूरी है.


मज़बूत गठबंधन बनाकर भाजपा को सदन से बाहर करेंगे : हेमंत सोरेन

नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन ने कहा है कि भाजपा को लोकसभा और विधानसभा दोनों से ही आउट करना है. पूरे विपक्ष का यही लक्ष्य है और यही कंसर्न है. हमारा भी यही उद्देश्य है और राज्य में मजबूत गठबंधन तैयार होगा. गठबंधन में थोड़ा बहुत इधर-उधर होता है. इसे सब मिल-बैठकर सुलझा लेंगे. उन्होंने कहा कि लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा भी इश्यू है. विधानसभा की तैयारी में भी विलंब नहीं होना चाहिए, इसके लिए अलग से टाईम वेस्ट करने की जरूरत नहीं है.

ग्राउंड रियलिटी देखते हुए काम होना चाहिए. ऐसी तैयारी होनी चाहिए कि दोनों ही चुनाव में कहीं भी भाजपा को जगह न मिले. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस के आला नेता अहमद पटेल से बात हुई है. झामूमो के अलग लड़ने के दावों शिबू सोरेन के ऐलान को लेकर पूछे गए सवाल पर हेमंत सोरेन ने कहा कि मैंने भी सुना है, लेकिन किस संदर्भ में कहा है, देखना होगा. कई बार बातें तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती है. पार्टी अध्यक्ष से अभी बात नहीं हुई है.

गुरुजी से बात करूंगा, उसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है. अभी मुख्य मुद्दा भाजपा को बाहर रखने का है. इसके लिए जो भी बेहतर परिस्थिति होगी, इस पर काम किया जाएगा. यह पूछने पर कि हाल के दिनों में यह भी चर्चा थी कि आप तृणमूल व बसपा के साथ कोई फ्रंट बना रहे हैं, सोरेन ने कहा कि इसमें कहीं कोई सच्चाई नहीं है.


कोट

लोकसभा चुनाव तक विधानसभा के लिए नेतृत्व घोषित न किया जाय. इसका नुकसान हो सकता है. एकजुट होकर चुनाव लड़ें और विधानसभा के समय नेतृत्व पर फैसला हो, नेतृत्व घोषित करने से पहले नफा-नुकसान देख लिया जाय.

-बाबूलाल मरांडी, अध्यक्ष, झारखंड विकास मोर्चा

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