महिमा श्री

भारतीय वांग्मय में साहित्य श्रुति परंपरा से आया है।हमारे यहाँ कथा कहने और सुनने की लंबी परम्परा रही है। जिसमें बच्चों और बड़ों सभी का सामान रुची रहा है।भारतीय लोक संस्कृति में लोक कथाएं इतनी समृद्ध रही हैं कि हरेक प्रदेश की सिर्फ लोक कथाँए ही पढ़ी जाए तो कई जन्म लेने पड़े। लोक कथाएं ही साहित्य के रुप में आगे आई। कथा साहित्य के क्षेत्र में राजा-महाराजाओं के जीवन-चरित्र और पौराणिक विषयों को लंबे समय तक बाल साहित्य का पर्याय माना जाता रहा है।

कथा सरित सागर, जातक कथाएं, सिंहासन बतीसी, वैताल पचीसी, हितोपदेश, अकबर-बीरबल के चुटकलें, तेनालीराम की कहानियाँ, विक्रम-वेताल, मुल्ला नसिरुद्दीन की कहानियाँ, गोपाल भांड के कारनामें, ढोला-मारु, पंचतंत्र की कहानियाँ, नल-दमयंती, महाभारत के प्रमुख चरित्र, बाल हनुमान, कृष्ण-सुदामा, शंकुतला आदि अनगिनत कहानियाँ सुनाई और पढ़ी जाती रहीं हैं।

विदेशी साहित्य की श्रेणी में  गुलीवर की कहानी,  हैंस हैंडरसन की परीकथाओं लोकप्रिय हुई।

बाल साहित्य के शुरुआत में मौलिक लेखन की परंपरा विरल रही। विश्व साहित्य में विष्णु शर्मा की पंचतंत्र की कहानियाँ का तो महत्वपूर्ण स्थान रहा है और अब तक विश्व की पचास भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। माना जाता है कि ग्रीक की ईसप की कहानियाँ तथा अरब की अरेबियन नाइट्स की कथाओं का मूल आधार पंचतंत्र है।

बाल साहित्य का सबसे बढ़िया फेज शुरु हुआ। बड़ी संख्या में प्रकाशक इन कहानियों को प्रकाशित करने के लिए आगे आए। बाद में हिंदी के मुर्धन्य साहित्यकारों ने बाल मनोविज्ञान की कहानियां लिखी जो बच्चों और बड़ो में आज तक लोकप्रिय रही हैं।कथा सम्राट प्रेमचंद की गुल्ली डंडा, बड़े भाई साहब, ईदगाह, आत्माराम, पंच-परमेशवर, पुरस्कार जैसी रचनाएं आज भी हिंदी बाल-साहित्य की बेजोड़ उपलब्धियां हैं । हरिशंकर परसाई, मस्तराम कपूर, डॉ प्रकाश मनु, मनहर चौहान, रमेश तैंलग, शेरजंग गर्ग का भी बाल साहित्य में उल्लेखनीय योगदान है।

अस्सी के दशक में बाल साहित्य की लोकप्रियता चरम पर थी। अस्सी से नब्बे के दशक में बाल साहित्य का प्रकाशन सबसे अत्यधिक देखा गया।सभी शिक्षित घरों में बच्चों के बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाते । नंदन, चंपक,पराग, बाल भारती, सुमन सौरभ, चंदा मामा आदि पत्रिकाएं बच्चों के बीच बहुत लोकप्रिय रही हैं। उसके बाद कॉमिक्स का जमाना आया।डायमंड पॉकेट बुक्स,राज कॉमिक्स आदि के कॉमिक्स ने बच्चों के बीच अपनी जगह बना ली। जिसमें अमर चित्र कथा, नागराज, चाचा चौधरी, पिंकी, स्पाइडर मैन, मोटू-पतलु, सुपर कंमाडो ध्रुव आदि। इनमें मुझे चाचा चौधरी और पिंकी बहुत प्रिय रहे।

नब्बे के दशक में भारतीय बाल साहित्य में कुछ नवीन रचनाएं आई।जिसमें सत्यजीत राय की फेलुदा सीरीज चर्चित रही है।रस्किन बांड की कहानियां, हरिश गोयल की साइंस फिक्शन की किताब, राजन- इकबाल, एस.सी बेदी आदि भी खूब पढ़े गये।

आज फेसबुक पोस्ट से पता चला। नंदन का प्रकाशन बंद करने की घोषणा कर दी गई है। उसके संपादक और सभी कर्मचारियों के लिए बहुत ही बुरा दिन है, उनके परिवार के लिए आजीविका का प्रमुख स्त्रोत का बंद हो जाना, भविष्य के लिए चिंतनीय  तो है ही साथ ही बाल साहित्य के प्रकाशन पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है।क्या बच्चों में पढ़ने की रुची हम नहीं पैदा कर पा रहे हैं ? या डिजिटल तकनीक की दूनिया में डूबी नई पीढ़ी को किताबों की तरफ देखने की फुर्सत ही नहीं है? या  उसे किताबों से ही अरुची हो गई है ? क्या स्मार्ट फोन और एनीमेटेड कार्टून, फिल्में और वेब सीरीज़ ने पुस्तकों से जुड़ने का मौका ही नहीं दे रही ?कोरोनाकाल की समस्या को साईड में रख दें क्योंकि बाल साहित्य बंद होने का खतरा काफी पहले से मंडरा रहा है। यह भी सच है कि किसी भी पत्रिका की लोकप्रियता उसके सर्कुलेशन और गुणवत्ता पर टिकी होती है। तो क्या नंदन पहले जैसी साम्रगी देने में कहीं चुक रही रही थी। साथ ही ये भी देखा जाना चाहिए कि जिन घरों में नंदन पढ़ा जाता रहा है क्या वे अपनी नई पीढ़ी के लिए भी उसे खरीद रहे थे या नहीं।

नंदन सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्य

नंदन के पूर्व संपादक “जयप्रकाश भारती” ने हिंदी बाल साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया ।जय प्रकाश भारती को हिंदी बाल साहित्य का युग निर्माता कहा जाता है। अपने संपादन काल में नंदन को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्य का दर्जा दिलवाया।नंदन सबसे अधिक पढ़ी जानेवाली बाल पत्रिका रही है। प्रमुख रूप से नंदन की कहानियाँ पौराणिक एवं परी कथाएँ होती थी, पर समय के साथ एवं अपने बाल पाठकों की बदलती रुचि को ध्यान रख कर नंदन में समकालीन विषयों एवं प्रसिद्ध जीवनियों पर कहानियाँ प्रकाशित करना प्रारम्भ कर दिया इसके अलावे उसमें कई शिक्षाप्रद स्थाई स्तंभ हुआ करते थे जो बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए अच्छा माने जाते थे। 1964 में नंदन का पहला अंक आया था। इस पहले अंक को पंडित नेहरु को समर्पित किया गया था।

मुझे याद है बचपन में नियमित रुप से पिता जी अपने लिए धर्मयुग, काद्बिनी आदि पत्रिकाएं मंगवाते और हम बच्चों के लिए पराग, चंपक, बाल भारती और सुमन सौरभ। चंपक में ज्यादातर जानवरों के ऊपर लिखी गई कहानियाँ होती । जो बहुत ही रोचक लगती। उसमें एक खरगोश होता जिसका नाम चीकू होता जो मेरा सबसे पसंदीदा व प्रिय चरित्र रहा है। अभी भी कोई गोलु-मोलु सा बच्चा जिसके आगे के दो दांत बड़े हो दिख जाता तो चीकू की याद आ जाती है।इस तरह से समय समय पर हम शायद बचपन में पढ़े और जीये गए प्रिय पात्र को याद कर लेते हैं।

 

विश्व बाल साहित्य प्रकाशन

चंपक के संपादक श्री विश्वनाथ थे जिन्होंने डेल्ही प्रेष की स्थापना की( जिसे विश्व बाल साहित्य प्रकाशन भी कहा जाता है) घर-घर बाल साहित्य को लोकप्रिय बनाया और स्कूल पुस्तकालयों में बाल साहित्य को पहूँचा कर बच्चों के बीच सुलभ बनाया।

डेल्ही प्रेष भारत की सबसे बड़ी पत्रिका समूह प्रकाशन हैं। बाल साहित्य की पत्रिकाओं को जिसमें चम्पक शामिल थी एक साथ कई अलग-अलग भाषाओँ में छपती और देश के हर कोने में पहुँचती थीं। “विश्व बाल साहित्य” के द्वारा प्रकाशित बाल किताबों ने भी कीर्तिमान गढा, खजाने की खोज, मिश्र का खजाना, स्काउट कैंप में चोरी, आकाशगंगा की सैर, जलती हुयी पूँछ, मनीष और नरभक्षी, चीकू औरे चुन्चुं, हीरों का रहस्य, मिशन आकाशगंगा, जैसी कई किताबें 4 से 5 रुपय में आसानी से मिलती थी। जिसका श्रेय डेल्ही प्रेस के संपादक स्वर्गीय श्री “विश्वनाथ” जी को बेशक जाता है।उन्होंने खुद ही इस विधा में कई किताबें लिखीं और ये चम्पक के संपादक भी रहे। विश्वनाथ जी ने अपने संपादन में विश्व बाल साहित्य की किताबों को न सिर्फ हर दुकान, हर घर तक पहुँचाया बल्कि स्कूलों तक बड़ी आसानी से पहुँचाया।

चिल्ड्रेन -बुक ट्रस्ट

बाल साहित्य के प्रसारण में चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसकी स्थापना 1957 में श्री के. शंकर पिल्लई द्वारा किया गया। पाँच से सोलह वर्ष आयु तक के लिए चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट ने बेहतरीन साम्रगी उपलब्ध करवाया। पौराणिक कथाएं, रहस्य-रोमांच, शिक्षाप्रद ,उपन्यास, कहानियाँ आदि प्रकाशित किये गए।

आधुनिक बाल साहित्य के प्रणेता

डॉ. हरिकृष्ण देवसरे को आधुनिक बाल साहित्य का प्रणेता माना जाता है। आपने बाल साहित्य संबंधी 300 पुस्तकें लिखी हैं। साहित्य अकादमी द्वारा बाल साहित्य के सम्रग योगदान के लिए वर्ष 2011 में सम्मानित किया गया।

आज सभी कॉमिक्स के पात्र डिजिटल दुनिया के बांशिदे हो चुके हैं।कॉर्टून शोज और फिल्में जैसे हैरी पॉटर लगातार कई वर्षों से पहली पसंद बनी हुई है। लंबु-पतलु , तेनाली राम से लेकर शक्तिमान , छोटा हनुमान, छोटा भीम डिजिटल अवतार में छाया हुआ है।विदेशी एनिमेटेड कार्टून फिल्मों और सोज  के बच्चे दिवाने हैं। नोबिता ,द जंगल -बुक, हैरी पॉटर, कुंग फूं पंडा, फैंटासटिक बिसटस, मेडागास्कर, स्टुअर्ट लिटिल, टिनटिन, एंगरी बर्ड, द सिम्पसन, स्कूबी-डूबी आदि लोकप्रिय फिल्मों और सोज की लिस्ट बहुत लंबी है। होम वर्क बनाने के बाद बच्चे बचे हुए समय में इन्हें ही देखना पसंद करते हैं जिससे जाहिर तौर लगता है आज नंदन पत्रिका बंद हुई है कल किसी और की बारी न हो।

वैसे हाल के दिनों में भोपाल से तक्षशिला का बाल कला केंद्र व साहित्य द्वारा द्विमासिक मासिक बाल पत्रिका “ साईकिल” का प्रकाशन और तेजी से लोकप्रियता अर्जित करना बाल पत्रिकाओं के भविष्य उज्जवल पक्ष को दिखाता है।

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