म्यांमार से भारत का क्या रिश्ता है या फिर भारत का म्यांमार के प्रति क्या रवैया है, के बजाय यह कहना कहींज्यादा उचित होगा कि भारत की म्यांमार नीति क्या है. भारत के म्यांमार नज़रिए के पीछे कुछ तथ्य तो सभी जान रहे हैं, लेकिन यह कोई नहीं जानता कि भारतीय विदेश नीति में म्यांमार के लिए कोई नीति नहीं है. आज समय आ चुका है जबकि भारत को अपने म्यांमार रवैए की समीक्षा करने की ज़रूरत है. यह इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि दुनिया भर के प्रमुख ताक़तवर देश एशिया में अपना वज़ूद बना रहे हैं और भारत भी दुनिया की एक प्रमुख ताकत बनने की भूमिका तलाश रहा है. भौगोलिक तौर पर म्यांमार हमारे लिए कूटनीतिक महत्व रखता है और वहां हमारे विस्तृत हित मौजूद हैं. म्यांमार हमारे लिए आसियान देशों का रास्ता खोलता है. अगस्त 2007 में सैफ्रन क्रांति के साथ म्यांमार दुनिया भर में सुर्खियां बना, जिसमें वहां के सैनिक शासन ने कठोर कार्रवाई की थी. पेट्रोल की एकाएक बढ़ी कीमतों ने क्रांति को और हवा दी तथा सैनिक दमन के खिला़फ लोग सड़कों पर उतर आए. लेकिन जिस तरह से सेना ने हिंसा का इस्तेमाल कर जनता के आक्रोश का दमन किया, उससे सैनिक शासन के कुछ पक्षधर भी म्यांमार में बदलाव की संभावना तलाशने लगे हैं.
म्यांमार में आज भी संपूर्ण शक्ति सेना के हाथों में निहित है और सेना का मानना है कि म्यांमार को संगठित रखने के लिए देश में सैनिक शासन का कोई विकल्प नहीं है. लिहाजा वहां की जनता के ऊपर एक नया संविधान थोपा जा रहा है, जिसके जरिए सैनिक वर्चस्व को कायम रखते हुए देश की लोकतांत्रिक ताकतों को दरकिनार किया जा रहा है. म्यांमार के प्रति भारत का रवैया रिश्तों को बनाए रखने का था, जिसे वहां के सैनिक शासन के समर्थन के तौर पर भी देखा जा सकता है. आज म्यांमार में स्थिरता और विकास के साथ-साथ लोकतंत्र की मांग को देखते हुए उस रवैये को बदलने की ज़रूरत है. भारत का अभी तक का रवैया उत्तर-पूर्वी राज्यों में विद्रोह और चीन के बढ़ते वर्चस्व को लगाम लगाने के लिए ज़रूरी था. म्यांमार की जनता और लोकतंत्र की उनकी आस भारत के रवैए में शामिल नहीं रही. लिहाज़ा हमारी मौज़ूदा नीति यही रही कि सैनिक शासन का समर्थन करना और लोकतंत्र की मांग को म्यांमार का आंतरिक मामला करार देना. भारतीय विदेश मंत्रालय दावा करता है कि वह म्यांमार पर अपने कूटनीतिक प्रयास कर रहा है, लेकिन इस प्रयास के न तो कोई सुबूत दिखते हैं और न ही कोई असर सामने आ रहा है.

जनवरी 2007 में भारत के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने म्यांमार दौरे के व़क्त कहा था कि भारत ख़ुद लोकतांत्रिक होने के नाते इच्छा रखता है कि सभी देश लोकतंत्र की राह पर चलें, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि वह किसी पर लोकतंत्र थोपने की हिमायत करता है.

ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत की नीति है कि हर देश को अपने लिए व्यवस्था चुनने का अधिकार है. विदेश मंत्री इस बात को भूल गए कि म्यांमार के लोगों ने लोकतंत्र का फैसला बहुत पहले ही कर लिया है और वहां का सैनिक शासन लोकतंत्र की मांग का कठोर दमन कर रहा है. 2007 की क्रांति में सैनिक शासन के दमन के बाद भारत सरकार ने महज़ इतना कहा कि म्यांमार में जल्द से जल्द शांति बहाल होनी चाहिए और सरकार को राजनीतिक सुधार की कवायद तेज़ करनी चाहिए. इसका एक सा़फ मतलब यह है कि भारत सरकार को म्यांमार की मौज़ूदा सैनिक सरकार पर पूरा भरोसा है. भारत सरकार ने 2003 में म्यांमार सरकार से यह समझौता कर लिया था कि उल्फा और एनएससीएन के खापलांग गुट के भारतीय विद्रोहियों को अपने मक़सद के लिए म्यांमार की ज़मीन इस्तेमाल नहीं करने दी जाएगी. इस समझौते के बाद दोनों देशों ने सूचनाओं के आदान-प्रदान के साथ सीमावर्ती इलाक़ों में सैनिक अभ्यास किए. इसके बावजूद म्यांमार का भारतीय उद्देश्य के प्रति रवैया सा़फ नहीं है. 2003-04 के द्विपक्षीय समझौते के बावजूद  सैनिक शासन ने 2001 में गिरफ़्तार किए गए मणिपुरी विद्रोहियों को रिहा कर दिया था. भारतीय नेता म्यांमार को अथाह प्राकृतिक संपदा का स्रोत मानते हैं और उसे गैर विवादित ऊर्जा के एक ठिकाने के तौर पर देखते हैं. बहरहाल यहां भी भारत सरकार की नीतियां फायदे की साबित नहीं हो रही हैं और म्यांमार की इस संपदा का झुकाव भारत की अपेक्षा चीन की तऱफ है. भारत सरकार की इस विफलता के पीछे एक अहम कारण यह है कि वह म्यांमार को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के तौर पर देखता है. बजाय इसके कि वह ख़ुद की एक म्यांमार नीति बनाए, जो उसके राजनीतिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाए. चीन म्यांमार के बंदरगाहों पर अपने युद्धक जहाजी बे़डे लगाने की तैयारी कर रहा है और भारतीय कूटनीतिज्ञ इसके विरोध में म्यांमार की सैनिक व्यवस्था से अपने संबंध गहरे करने की फिराक़ में हैं. क्या भारत का यह रवैया ठीक है? क्या इसकी मदद से वह म्यांमार में चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोक पाएगा? आज ज़रूरत इस बात की है कि वह म्यांमार में लोकतांत्रिक ताक़तों से गहरे संबंध बनाए और अपनी विदेश नीति में म्यांमार को जगह दे?
भारतीय कूटनीतिज्ञ अगर यह समझते हैं कि चीन को रोकने के लिए म्यांमार की सैनिक सरकार से बेहतर रिश्ते कारगर कदम साबित होंगे तो उनको यह समझना चाहिए कि चीन वहां सैनिक शासन का पक्षधर नहीं है. यह बात अलग है कि वह संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार शासन के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल करता है, लेकिन यह भी साफ है कि ज़रूरत पड़ने पर वह लोकतांत्रिक ताकतों के साथ हो सकता है. चीन की म्यांमार नीति में वहां की जनता शामिल है. इसके विपरीत भारत की नीति में वहां लोकतंत्र पर कोई साफ नज़रिया नहीं है और न ही आंग सू की के मामले में भारत की कोई स्पष्ट राय है. एक अहम पहल अमेरिका ने अपनी म्यांमार नीति में बदलाव करके की है. पिछले दो दशकों में पहली बार हुई इस पहल के ज़रिये अमेरिका ने म्यांमार में अपने हितों को साफ करने की कोशिश की है. इसी साल म्यांमार दौरे के दौरान सेक्रेटरी ऑफ स्टेट हिलेरी क्लिंटन का बयान और उसके बाद एक उच्च स्तरीय अमेरिकी दल का म्यांमार दौरा साफ करता है कि अब म्यांमार ज्यादा दिनों तक अंतर्राष्ट्रीय पटल से दूर नहीं रहेगा. दुनिया भर के नीति विश्लेषक मान रहे हैं कि पिछले एक दशक में म्यामार में चीन ने आर्थिक हितों को देखा है तो पिछले कुछ सालों में अमेरिका म्यांमार को आतंक के खिला़फ ज़ारी अपने युद्ध के दृष्टिकोण से देखते हुए अपनी नीति में परिवर्तन कर रहा है. एशिया में अपने सैन्य रिश्तों का विस्तार करने के बाद अब अमेरिका एशिया के इस भाग में चीन के बढ़ते आर्थिक कद को थामने की फिराक में है. लिहाज़ा म्यांमार के साथ-साथ अमेरिका कंबोडिया और लाओस को भी अपनी नई नीति में शामिल करेगा. इसलिए अमेरिका म्यांमार में पहल करके जो संकेत भारत को दे रहा है, उस पर सोचने की ज़रूरत है. क्या अमेरिका ने म्यांमार में कोई भी पहल करने के पहले भारत को अपने मंसूबों के बारे में कुछ बताया है? इसीलिए भारत को ज़रूरत है कि वह म्यांमार रवैये की समीक्षा करने के साथ-साथ एक कारगर म्यांमार नीति को शामिल करे.

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