educationविश्व बैंक की वर्ल्ड डेवेलपमेंट रिपोर्ट-2018 ‘लर्निंग टू रियलाइज एजूकेशंस प्रॉमिस’ में दुनिया के उन 12 देशों की सूची जारी की गई है, जहां की शिक्षा व्यवस्था सबसे बदतर है. इस सूची में भारत का स्थान दूसरे नंबर है. रिपोर्ट के अनुसार, कई सालों तक स्कूलों में पढ़ने के बावजूद लाखों बच्चे पढ़-लिख नहीं पाते हैं. वे गणित के आसान सवाल भी नहीं कर पाते हैं. ज्ञान का यह संकट सामाजिक खाई को और बड़ा कर रहा है और इससे गरीबी को मिटाने और समाज में समृद्धि लाने के सपने को पूरा नहीं किया जा सकता है. यह विडंबना है कि 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद भी स्कूली शिक्षा में वर्गभेद बढ़ता जा रहा है. इधर सरकारी स्कूलों से लोगों का भरोसा लगातार कम हुआ है और यहां बच्चों की संख्या घट रही है, जबकि प्राइवेट स्कूलों में इसका उल्टा हो रहा है.

बीते 1 अप्रैल को शिक्षा के अधिकार कानून को लागू हुए 8 साल पूरे हो चुके हैं. 1910 में गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा सभी बच्चों के लिए बुनियादी शिक्षा के अधिकार की मांग की गई थी. फिर आजादी के बाद शिक्षा को संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में ही स्थान मिल सका, जो कि अनिवार्य नहीं था और यह सरकारों की मंशा पर ही निर्भर था. 2002 में भारत की संसद में 86वें संविधान संशोधन द्वारा इसे मूल अधिकार के रूप में शामिल कर लिया गया. इस तरह से शिक्षा को मूल अधिकार का दर्जा मिला. फिर 1 अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार कानून 2009 पूरे देश में लागू हुआ, जिसके तहत राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना है कि उनके राज्य में 6 से 14 साल के सभी बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ-साथ अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों और इसके लिए उनसे किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लिया जा सकेगा.

आज शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के आठ साल बाद हमारे सामने चुनौतियों की एक लंबी सूची है. पर्याप्त और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, शिक्षकों से दूसरा काम कराया जाना, नामांकन के बाद बीच में ही बच्चों के पढ़ाई छोड़ देने की दर और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने जुलाई 2017 में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में शिक्षा का अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार, अधिकतर राज्य सरकारों के पास यह जानकारी नहीं है कि उनके राज्य में ज़ीरो से लेकर 14 साल की उम्र के बच्चों की संख्या कितनी है. यह रिपोर्ट कहती है कि देशभर के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है और बड़ी संख्या में स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं. इन सबका असर शिक्षा की गुणवत्ता पर देखने को मिल रहा है.

इस कानून की कई ऐसी समस्याएं हैं, जिनका दुष्प्रभाव आज हमें देखने को मिल रहा है. जैसे, यह कानून केवल 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों को ही मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है. इसमें 6 वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की कोई बात नहीं की गई है, यानि कानून में बच्चों का प्री-एजुकेशन नजरअंदाज किया गया है. इसी के साथ, 15 से 18 वर्ष के आयु समूह के बच्चों को भी इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है, यानि कक्षा 8 से बारहवीं तक के बच्चों के लिए शिक्षा की कोई गारंटी नहीं है, जिसकी वजह से उच्च शिक्षा की संभावनाएं बहुत क्षीण हो जाती हैं. जो परिवार थोड़े-बहुत सक्षम हैं, वे अपने बच्चों को पहले से ही प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं, लेकिन जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर है, कानून द्वारा उन्हें भी इस ओर प्रेरित किया जा रहा है. लोगों का सरकारी स्कूलों के प्रति विश्वाश लगातार कम होता जा रहा है, जिसके चलते साल दर साल सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या घटती जा रही है.

1964 में कोठारी आयोग, भारत का ऐसा पहला शिक्षा आयोग था, जिसने प्राथमिक शिक्षा को लेकर कई ऐसे महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे, जो आज भी लक्ष्य बने हुए हैं. आयोग का सुझाव था कि समाज के अंदर व्याप्त जड़ता और सामाजिक भेद-भाव का समूल नष्ट करने के लिए समान स्कूल प्रणाली एक कारगर औजार होगा. समान स्कूल व्यवस्था के आधार पर ही सभी वर्गों और समुदायों के बच्चे एक साथ सामान शिक्षा पा सकते हैं. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो समाज के उच्च वर्गों के लोग सरकारी स्कूल से भागकर प्राइवेट स्कूलों का रुख़ करेंगे और पूरी प्रणाली ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी.

— साभार: चरखा फीचर्स

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