यह अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए का मिशन हिंदुस्तान 2015 है, जो भारत को टुकड़े-टुकड़े कर इसके वज़ूद को ख़त्म करने की ख़ौ़फनाक साज़िश है. इस मिशन पर अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है. सीआईए की मंशा है कि वह भारत को 2015 तक इतना खंडित कर दे कि देश के अंदरूनी हालात 1947 की भयावह स्थितियों में तब्दील हो जाएं. अराजकता और अ़फरात़फरी इस क़दर फैले कि सरकार का समाज पर से नियंत्रण खत्म हो जाए. और, तब भारत के बिगड़े हालात सुधारने के बहाने इसकी सत्ता पर सीआईए अपनी दबिश बनाए और आ़खिरकार भारत अमेरिका का ग़ुलाम बन जाए.

सरकार को जवाब देना चाहिए कि हमारी इस रिपोर्ट में कोई सच्चाई है भी या नहीं. देश के खिला़फ साज़िश दो ताक़तवर देशों की खु़फिया एजेंसियां कर रही हैं, हम जितनी छानबीन कर रहे हैं उतनी ही खौफनाक तस्वीर उभर रही है. सरकार अगर जवाब नहीं देती तो मानना चाहिए कि सरकार सो रही है और देश के राजनैतिक दल लुंजपुंज हो गए हैं. हम चाहते हैं कि प्रधानमंत्री या गृहमंत्री कहें कि हमारी रिपोर्ट में कोई सच्चाई नहीं है, और तब हम अपने को पुन: परख पाएंगे. लेकिन अगर खामोशी रहती है तो मान लेना चाहिए कि देश के साख वाले लोगों के साथ हादसों की शुरूआत होने वाली है, चाहे वे हादसे चरित्र हनन के रूप में हों या शारीरिक हमलों के रूप में. दलालों की मंडी में मीडिया के चंद साख वालों से इतना ही कहना है कि आज के बाद कल उनका ही नंबर आने वाला है. आंख खोलने का आज ही व़क्त है.

इस खौ़फनाक मिशन में सीआईए का साथ दे रही है कुख्यात इज़रायली खु़फिया एजेंसी मोसाद. इन दोनों के एजेंट पूरे देश में हर स्तर पर अपना जाल बिछा चुके हैं. वे अपने खतरनाक मंसूबे पर ब़खूबी अमल भी कर रहे हैं. यही वज़ह है कि सीआईए ने अपने मिशन को पूरा करने के लिए हमारे ही देश की कुछ नामी-गिरामी चुनिंदा हस्तियों को बेहिसाब क़ीमत पर खरीद लिया है. जिसमें शामिल हैं हरेक तबके के लोग. पत्रकार, उद्योगपति, आला अधिकारी, समाजसेवी और मनोरंजन जगत की जानी-मानी हस्तियां.
भारतीय खु़फिया एजेंसियों के पास इस बाबत पूरी खबर है. रॉ और आईबी के पास वह ऩक्शा भी मौजूद है, जो सीआईए ने अपने मिशन के लिए तैयार किया है. इस ऩक्शे में भारत को उतने ही टुकड़ों में बांटा गया है, जितने कि यहां राज्य हैं. यानी कुल 28 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों को अलग-अलग देश के रूप में दर्शाया गया है. यह ऑपरेशन बिल्कुल उसी तरह से अंजाम दिया जा रहा है, जिस तर्ज़ पर सोवियत संघ के टुकड़े-टुकड़े किए गए थे. इस ऩक्शे के साथ जो दस्तावेज़ मिले हैं, उनमें सा़फ तौर पर इस बात का ज़िक्र है कि भारत को धर्म, जाति और चरित्र के आधार पर तोड़ा जाए. अलग-अलग धर्म-संप्रदाय के प्रतिष्ठित और समाज को नेतृत्व देने वाले लोगों के खिला़फ गंदी और हौलनाक़ साज़िश रच ऐसी दुश्वारियां पैदा कर दी जाएं कि वे सामाजिक तौर पर बर्बाद हो जाएं. ताकि सामाजिक सौहार्द बिगड़े. सांप्रदायिकता फैले. दंगे भड़कें और सीआईए अपने मक़सद में कामयाब हो जाए. भारत के अलावा दुनिया के अन्य साठ विकसित देश भी सीआईए के निशाने पर हैं. हालांकि दिखावे के तौर पर अमेरिका यह कहता है कि उसकी यह ज़ंग आतंक के ख़िला़फ है. अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में स्थित नासा के दफ्तर में मौज़ूद इंटरनेट की दुनिया का बादशाह गूगल सीआईए के निशाने वाले देशों की एक-एक हरक़त की पूरी ख़बर अपने ई जासूसों के ज़रिए सीआईए तक पहुंचाता है. पर पहला टारगेट हमारा देश भारत ही है.
दरअसल मालेगांव ब्लास्ट भी सीआईए और मोसाद की इसी योजना की एक कड़ी थी. 12 अप्रैल 2008 को सीआईए और मोसाद ने इस सिलसिले में भोपाल के श्रीराम मंदिर में एक मीटिंग भी की थी, जिसमें रॉ और आईबी के कई पूर्व और वर्तमान अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया था. सीआईए और मोसाद की इस नापाक साज़िश की खबर हमारे उच्च ख़ु़फिया अधिकारियों को है, पर उन्होंने कितनी जानकारी प्रधानमंत्री को दी, कहा नहीं जा सकता. क्योंकि इन साज़िशों पर रोक लगाने के लिए अभी तक सरकार ने कोई क़दम नहीं उठाया है. कुछ पत्रकारों पर शक़ है कि वे सीआईए और मोसाद के लिए सूचनाएं इकठ्ठा कर रहे हैं. पत्रकार अगर अपने पेशे से गद्दारी करे तो वह अच्छा इन्फार्मर बन जाता है, क्योंकि उसकी पहुंच आसानी से सूचना और निर्णय करने वाले केंद्रों तक होती है. साउथ और नार्थ ब्लाक के दरवाज़े आसानी से पत्रकारों के लिए खुल जाते हैं.
ख़ु़फिया एजेंसियों के पास खबर है कि सीआईए के लिए मु़खबिरी करने वाले एक पत्रकार मैथ्यू रोजेनबर्ग, पाकिस्तान के संघशासित स्वायत्त कबायली क्षेत्र फाटा और पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत एन डब्ल्यू एफ पी के अधिकारियों कैप्टन हयात खान एवं हबीब खान के साथ पिछले दिनों लगातार सघन यात्रा पर थे. एक बड़े खु़फिया अधिकारी बताते हैं कि मैथ्यू रोज़ेनबर्ग सीआईए और मोसाद दोनों के ही संयुक्त एजेंट हैं. मैथ्यू ने सीआईए के लिए तालिबान आतंकवादियों के खिला़फ पाकिस्तान में चल रहे सैन्य अभियान की भी म़ुखबिरी की थी. पाकिस्तान से उन्हें चेतावनी भी मिली थी. पर भारत में मैथ्यू के लिए ऐसी दिक्कतें नहीं हैं, क्योंकि भारत के कई बड़े अधिकारी मैथ्यू की ही तरह सीआईए के एजेंट हैं. ख़ु़फिया रिपोर्टों में इस बात की भी जानकारी दर्ज़ है कि विदेशी अख़बारों में रिपोर्ट करने के नाम पर शातिर जासूसों का दल दिल्ली से अपनी गतिविधियां चलाता है.
दूसरी ओर, आतंक का स़फाया करने के नाम पर भारत और अमेरिका के बीच खु़फिया सूचनाओं का धड़ल्ले से आदान- प्रदान हो रहा है. अमेरिका यह कहता है कि आतंकवाद के खिला़फ जारी उसकी जंग में भारत एक प्रमुख सहयोगी है और इस बहाने पिछले दस-बारह सालों से भारत और अमेरिका के बीच खु़फिया सहयोग ब़ढता ही जा रहा है. इस खु़फिया सहयोग का एक परिणाम यह हो रहा है कि निर्णय लेने से पहले अधिकारी भारत के हितों से ज़्यादा विदेशी हितों का ध्यान रख रहे हैं.
भारत में जब एनडीए की सरकार थी, तब अमेरिका की एक अन्य खु़फिया एजेंसी एफबीआई को दिल्ली में ऑफिस खोलने की अनुमति भी दे दी गई थी. पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने अमेरिकी एजेंसियों की भारत में मौज़ूदगी को सरकारी रूप से सत्यापित किया. और यहीं से शुरू हुआ भारत की खु़फिया सुरक्षा और लोकतंत्र में अमेरिकी खु़फिया एजेंसियों का मज़बूत हस्तक्षेप.
हालांकि यह सिलसिला पचास के दशक से ही शुरू हो चुका था, पर उस व़क्त भारत में अमेरिका विरोधी माहौल था. सीबीआई के एक बड़े अधिकारी बताते हैं कि सीआईए ने बेहद योजनाबद्ध तरीक़े से भारतीय नेताओं, अधिकारियों को अपने जाल में फांसना शुरू किया. एजुकेशन टूर और फेलोशिप का चारा डालकर देश के जाने-माने लोगों के बच्चों को अमेरिका भेजने की रणनीति तैयार की गई. धीरे- धीरे देश में अमेरिकापरस्त लोगों की तादाद ब़ढती गई. उस व़क्त भारत पर सोवियत संघ का जादू चलता था. जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने देश में सीआईए, केजीबी आदि के एजेंटों की सेंधमारी पर कड़ाई से रोक लगाने की कोशिश भी की. बावज़ूद इसके उनके कैबिनेट में ही एक कद्दावर नेता सीआईए एजेंट के तौर पर मौज़ूद था. उसी व़क्त से सीआईए ने सरकार में हरेक स्तर पर अपनी मज़बूत पकड़ बनानी शुरू कर दी थी. ख़ु़फिया सूत्र बताते हैं कि यह नेता 1964 से ही सीआईए एजेंट का काम कर रहा था. जब 18 मई 1974 को पोखरन परीक्षण किया गया था, तब इस बात की सूचना पहले ही उसी नेता के ज़रिए सीआईए को मिल चुकी थी. उस समय जगजीवन राम रक्षा मंत्री हुआ करते थे. उन्हें इस बात की पूरी जानकारी थी. वह इस बात से इतने नाराज़ थे कि उन्होंने पटना की एक आमसभा में इस बात को ज़ाहिर भी कर दिया था. पर चूंकि उस नेता का क़द इतना बड़ा था कि सरकार की उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं थी.
बहरहाल,  पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी अमेरिका से नजदीकी रिश्ते ब़ढाने के इच्छुक नहीं थे. लिहाज़ा उनके खिला़फ अपने ही देश में अमेरिकापरस्त लोगों ने गोलबंदी शुरू कर दी. लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद धीरे-धीरे देश में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती ही गई, जो अमेरिका से दोस्ती के हिमायती थे. मनमोहन सरकार द्वारा परमाणु क़रार हो या वाजपेयी सरकार द्वारा सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने की बात. नरसिंह राव की सरकार हो या देवगौड़ा की, जिन्होंने परमाणु परीक्षण टालने की कोशिश की और उनकी इस कोशिश को अमेरिकापरस्ती के रूप में ही देखा गया. जब इराक युद्ध हुआ तो उस समय भारत की सत्ता पर काबिज चंद्रशेखर की सरकार ने अमेरिकी लड़ाकू विमानों को ईंधन देने में मदद की. यह भी अमेरिका समर्थित लॉबी का ही दबाव था. भारत में लगभग हर दल में अपनी पैठ बना चुकी सीआईए के हौसले इसके बाद बढ़ते ही चले गए.
आज भी भारतीय न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका पर क़ब्ज़ा करने की सीआईए की मुहिम बदस्तूर जारी है. प्रधानमंत्री कार्यालय हो या रक्षा और गृह मंत्रालय. या फिर आईबी, रॉ, सीबीआई जैसी खु़फिया और जांच एजेंसियां. इन सभी के अधिकारियों का नियमित अंतराल पर अमेरिका जाना, प्रशिक्षण लेना और वर्कशाप के नाम पर लेक्चर देना इसी की कड़ी है. इन अधिकारियों को बाकायदा अमेरिका जाने की फेलोशिप दी जाती है. गृह मंत्रालय के एक बड़े अधिकारी ने बेहद चिंतित अंदाज़ में कहा कि अमेरिका खु़फिया एजेंसियों की भारतीय तंत्र में घुसपैठ ने भारतीय खु़फिया और जांच एजेंसियों को उनका पिछलग्गू बना दिया है. भारतीय खु़फिया एजेंसियों की औकात बस इतनी रह गई है कि वह अमेरिकी खु़फिया एजेंसियों के सवालों का पूरी कर्तव्यपरायणता से जवाब दें. पर उनसे कोई सवाल न करे अगर किसी केस के सिलसिले में भारतीय खु़फिया एजेंसियां सीआईए से सवाल करने की ग़ुस्ताख़ी कर भी दें तो सीआईए उनको जवाब देना ग़ैरज़रूरी समझती है. भारतीय जांच एजेंसियों के लिए यह स्थिति बेहद अपमानजनक होती है. पर वे विवश हैं, क्योंकि भारत अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की आग में झुलस रहा है. और ऐसे में अमेरिकी खु़फिया एजेंसियों से मदद लेना उसकी मजबूरी बन चुकी है. पर इन सबके दरम्यान एक कड़वा सच यह भी है कि अमेरिका से अपने रिश्ते निबाहने की वज़ह से भारत की अपने पड़ोसी देशों से दूरियां ब़ढ रही हैं, जो भारत के हित में कतई नहीं हैं. पर अमेरिका की योजना का हिस्सा ज़रूर हैं.
आईबी के एक सचिव स्तर के अधिकारी कहते हैं कि यह वही अमेरिका है, जो पहले खुलकर भारत का विरोध करता था, पर आज वह भारत को सहयोगी बताते नहीं अघाता. सा़फ है कि अमेरिका भारत का इस्तेमाल चीन के खिला़फ कर रहा है. उसी तरह, जैसे पहले वह पाकिस्तान का इस्तेमाल चीन के खिला़फ करता था. आज अमेरिका की एजेंसियों ने कुछ भारतीय अधिकारियों को इस क़दर पालतू बना लिया है कि वे सीआईए के लिए राष्ट्रद्रोह करने तक को तैयार हैं. रॉ के भगोड़े अधिकारी रबिंद्र सिंह का उदाहरण हमारे सामने है.
रबिंद्र सिंह रॉ के संयुक्त सचिव थे. उन पर रॉ के साउथेस्ट एशिया डिपार्टमेंट को संभालने की ज़िम्मेदारी थी, पर काम वह सीआईए के लिए करते थे. जब यह बात सार्वजनिक हुई तो वह अमेरिका भाग गए. अमेरिका ने उन्हें बाइज्ज़त शरण दी और उसके बदले रबिंद्र सिंह से दुनिया भर में हो रही भारतीय खु़फिया एजेंसियों की गतिविधियों की गहनतम जानकारियां उगलवा लीं. भारत सरकार अमेरिका से इस पर नाराज़गी भी नहीं जता पाई.
सीआईए की साज़िश की जड़ें भारत में कितनी ग़हरी हैं, इसका अंदाज़ा स़िर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि सीआईए को न स़िर्फ भारतीय खु़फिया एजेंसियों की एक-एक योजनाओं की जानकारी रहती है, बल्कि नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में बन रही रणनीतियों की भी उसे पूरी खबर होती है.
भारत को पूरी तरह पंगु बनाने की खातिर सीआईए ने एक नया पैंतरा खेला है. आतंकवाद से निबटने के बहाने अमेरिका और इजरायल भारत पर अब इस बात का दबाव बना रहे हैं कि वह उनके उपकरण खरीदे और खु़फिया मिशन में उन्हीं का इस्तेमाल करे, ताकि सूचनाओं को साझा करने में कोई परेशानी न हो. तकनीकी उपकरणों की खरीद पर सरकारी बातचीत लगभग अंतिम चरण में है. पिछले दिनों हेडली प्रकरण के नाम पर सीआईए प्रमुख पैनेटा के भारत आने पर इस पर गंभीरता से बातें हुईं. उस व़क्त भारत के बड़े अधिकारियों के साथ इजरायल के गृह विभाग के उच्चाधिकारी भी मौज़ूद थे.
अब ज़रा सोचिए, अगर तकनीकी उपकरणों का साझा इस्तेमाल भारतीय खु़फिया एजेंसियां करने लगीं तो उनकी हल्की सी ज़ुंबिश भी सीआईए और मोसाद की निग़ाह से नहीं बच सकती. और इस तरह भारतीय खु़फिया एजेंसियां पूरी तरह सीआईए और मोसाद की मुट्ठी में होंगी. यानी कि सुरक्षा के स्तर पर भारत को ख़ाक़ में मिलाने की पूरी तैयारी है.
खु़फिया विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि सीआईए की नज़रों में भारतीय खु़फिया एजेंसियों की कोई अहमियत नहीं है. सीआईए के अधिकारी रॉ या आईबी के अधिकारियों पर रत्ती भर भरोसा नहीं करते. उनके साथ दोयम दर्ज़े का व्यवहार किया जाता है. जब कभी अमेरिकी राष्ट्रपतियों या खु़फिया अधिकारियों का भारत आना हुआ है, सुरक्षा की पूरी कमान सीआईए अपने हाथों में ले लेती है. उस समय भारतीय खु़फिया अधिकारियों की भूमिका महज़ गूंगे-बहरे दर्शक की होती है. हवाई अड्डे से होटल या दूतावास तक की सुरक्षा व्यवस्था और प्रोटोकाल के दौरान भी भारतीय अधिकारी महज़ दिखावे की भूमिका में होते हैं. उन्हें इस बात की भनक तक नहीं लगने दी जाती कि अमेरिकी अधिकारी या राष्ट्रपति का अगला कार्यक्रम क्या है?
ऐसे में ज़ाहिर है, आने वाले दिन भारतीय अस्मिता के लिए बेहद घातक साबित होने वाले हैं.

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1 COMMENT

  1. लेखक की बात से इन्कार नही किया जा सकता कि पश्चिमी देश मजबुत भारत नहीं बल्कि मजबुर भारत देखना चाहते हैं।यह भी सच है कि अमेरिकी खुफियातंत्र बहुत गहनरिसर्च कर देश की विदेश निति तय करता है।भारत में बहुतेरे नेता बिके हुए है और कयी बिकने के लिए तैयार बैठे है।

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