यह बात सुनने मे थो़डी अटपटी जरूर लग सकती है लेकिन यह सच है. मलेशियाई विमान हादसे के बाद की जो परिस्थितियां बन रही हैं उन्हें देखकर कुछ ऐसा ही प्रतीत हो रहा है. बीते तीन सालों में हमने सीरिया में रूस और अमेरिका के अहम की जंग में एक देश को बर्बाद होते हुए देखा है. क्रीमिया के मुद्दे पर अगर एक बार फिर अमेरिका और रूस आमने-सामने आ गए तो यूक्रेन ही दोनों के बीच का कुरुक्षेत्र बनेगा और ऐसी अवस्था  में उसका हाल भी सीरिया जैसा होने से कोई नहीं रोक सकता है.  
Untitled-1विमान हादसे अक्सर होते रहते हैं. अमूमन इन हादसों में सभी यात्रियों को अपनी जान से हाथ गंवाना प़डता है. हादसों के पीछे कई तरह के कारण बताए जाते हैं लेकिन मामला ज्यादा गंभीर तब हो जाता है जब राजनीतिक कारणों के लिए यात्री विमान मार गिराए जाएं. ऐसा ही कुछ मलेशियाई विमान एम एच 17 के यात्रियों के साथ हुआ है. यूक्रेन में मार गिराए गए इस हादसे के पीछे क्रिमीयाई विद्रोहियों का हाथ बताया जा रहा है. लेकिन असल सवाल यह है क्या ये अप्रशिक्षित विद्रोही लगभग सा़ढे तीन किलोमीटर ऊंचाई पर सा़ढे सात सौ किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से चल रहे विमान को मार सकने में बिना रूसी सहायता के सक्षम थे? जिस बक मिसाइल सिस्टम के जरिए उन्होंने इस घटना को अंजाम दिया, वह उनके पास कहां से आया? समाजवाद के प्रणेता रूस के इस समाजवाद में साम्राज्यवाद ही दिखता है. यह रूस का घिनौना रूप है.
अमेरिका भी इसके लिए रूस को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानता है. उसका कहना है इस घटना के पीछे रूस के अपने आंतरिक कारण जिम्मेदार हैं जिसके लिए वह विदेशी नागरिकों को भी अपना निशाना बनाने से बाज़ नहीं आया. अमेरिका ने धमकी दी है कि वह इस मामले की जांच कराएगा और इस घटना के पीछे रूस का हाथ सामने आया तो उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. अमेरिका ने कहा है कि सिर्फ इस दुर्घटना के लिए ही नहीं यूक्रेन में हो रही सभी घटनाओं के लिए सीधे तौर रूस ही जिम्मेदार है. अमेरिका का मानना है कि यूक्रेन के रूस समर्थक अलगाववादी पुतिन और रूस सरकार की शह के बिना मलेशियाई विमान पर हमला नहीं कर सकते थे. अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता मैरी हर्फ ने बताया कि जांचकर्ता अब भी यह पता करने की कोशिश में लगे हैं कि हमलावरों का असल उद्देश्य क्या था. उन्होंने कहा, हमें नहीं मालूम कि उनका इरादा क्या है? जांचकर्ता यही पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि हम इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कटघरे में ला सकें.
अमेरिकी खुफिया विभाग के अधिकारियों ने हालांकि इस घटना में सीधे तौर पर रूस की संलिप्तता के सबूत नहीं दिए, लेकिन उन्होंने कहा कि जिस कारण भी मलेशियाई विमान यूक्रेन में गिरा, उसके हालात उत्पन्न करने के लिए रूस ही जिम्मेदार है.
हर्फ ने यह भी कहा कि विद्रोहियों के कब्जे वाले पूर्वी यूक्रेन में जांचकर्ताओं को घटनास्थल पर पहुंचने दिया जा रहा है. अमेरिका ने रूस से सुनिश्‍चित करने के लिए कहा कि पूर्वी यूक्रेन में आतंकवादी जांचकर्ताओं के काम में बाधा न डालें.
कुछ इसी तरह रूस में ब्रिटेन के राजदूत ने भी इस घटना के गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे चुके हैं. इस घटना के तुरंत बाद ही यूक्रेन के राष्ट्रपति पेत्रो पोरोशेन्को ने इसे आतंकी साजिश करार दिया था. उन्होंने यह तत्काल यह आशंका जाहिर की थी कि इसके पीछे रूस का हाथ हो सकता है. यूक्रेन गृहमंत्रालय के सलाहकार ने कहा था कि यूक्रेन की सीमा से आतंकवादियों ने जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली बक का इस्तेमाल कर विमान को मार गिराया.
लेकिन बात सिर्फ इतनी सी नहीं है कि ये सारे देश रूस को धमकी दे रहे हैं. दरअसल इस घटना के दूरगामी परिणाम यूरोप और एशिया के कई हिस्सों को एक बार फिर काफी मुश्किलों में डाल सकते हैं. अमेरिका और सोवियत के बीच शीत युद्ध का एक लंबा दौर दुनिया ने देखा है. तकरीबन 45 सालों तक ये दोनो देश प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से एक-दूसरे के विरुद्ध चालें चलते रहे. परिणाम भी सबके सामने है कि सोवियत टूट कर बिखर गया. लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान पुतिन की अगुआई वाले रूस ने एक बार फिर ऐसे कदम उठाए हैं जो सीधे अमरिकी विरोध में होते हैं. सीरिया में हम इसे पिछले तीन सालों से देख रहे हैं.
असल चिंता यह नहीं है कि ये दोनों देश एक बार फिर आमने-सामने आ जाएंगे दिक्कत यह है कि अगर ऐसा होता है तो विश्‍व के कई देश सीरिया न बन जाएं. जिस तरह से सीरिया के मसले पर रूस वहां की सरकार का समर्थन करता रहा है और अमेरिका विद्रोहियों का, परिणम स्वररूप पूरा देश तबाह हो चुका है. कुछ वैसा ही दूसरी जगहों पर भी हो सकता है. लीबिया के मामले में रूस इकलौता देश था जो गद्दाफी का समर्थन कर रहा था. अब यूक्रेन के साथ रूस के रिश्ते खराब होते ही जा रहे हैं. ऐसे में इस घटना के बाद अमेरिका सीधे तौर पर न सिर्फ रूस पर कार्रवाई कर सकता है बल्कि यूक्रेन को सीधे तौर पर मदद भी पहुंचा सकता है.
इसलिए आम लोगों को तैयार हो जाना चाहिए कि क्रीमिया विश्व का अगला दमिश्क और अलेप्पोह शहर बन सकता है जहां सिवाय बर्बादी और आहों के कुछ और नजर नहीं आएगा.


क्या है बक मिसाइल
मिसाइल छोडने के लिए बक लांचर सिस्टम काइस्ते माल किया जाता है. इसे 9 के 37 बक सिस्टम के नाम से भी जाना जाता है. इसे सोवियत यूनियन ने शीत युद्ध के समय 1979 में बनाया गया था. बक लांचर से छा़ेडी जाने वाली मिसाइल 72 हजार फीट की ऊंचाई तक मार कर सकती है. इससे एक साथ तीन मिसाइल छा़ेडी जा सकती हैं. इस कारण लक्ष्य को भेदने की संभावना काफी ज्याादा होती है. बक मिसाइल सिस्टम को क्रूज मिसाइलों और यूएवी पर हमलों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. मिसाइल बनाने का काम 12 जनवरी 1972 को शुरू हुआ था. रक्षा उपकरण विशेषज्ञों के अनुसार बक मिसाइल सिस्टम रूस में निर्मित मध्यम रेंज का जमीन से हवा में मार करने वाला सिस्टम है. बक मिसाइल सिस्टम अपने पिछले संस्करण एसए 6 से उन्नत है. बक मिसाइल सिस्टम पर मिसाइलों की दिशा निर्धारित करने के लिए रडार प्रणाली भी होती है. एक अन्य रॉकेट पर लक्ष्य बताने वाला स्नोड्रिफ्ट रडार भी मौजूद होता है. मिसाइल लांचर के आधुनिक मॉडल के जरिए ड्रोन विमानों को भी निशाना बनाया जा सकता है.

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1 COMMENT

  1. @ Arun Tiwari जब तक आपको पूरी सच्चाई मालूम न हो तब तक आप को एक तरफा लेख नहीं लिखना चहिये।
    1-रूस क्या पागल हैं जो ऐसा कर अन्तर्राष्ट्रीय समर्थन खोना चाहेगा।
    2-भारत को कैसा लगेगा अगर चीन अपनी सेना को बांग्लादेश,भूटान,श्रीलंका,नेपाल पर रख दे,।

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