AFSPAअफस्पा (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट) महज एक शब्द नहीं, बल्कि एक विवादास्पद कानून है, जिसकी आड़ में कई निर्दोष लोगों की जानें चली गईं. अफस्पा को लेकर समय-समय पर जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर के कई राज्यों से विरोध की आवाज उठती रही है. स्थानीय सरकारें एवं केंद्र सरकारों के बीच अफस्पा एक विवाद का मुद्दा रहा है.

हाल में एक खबर आई कि असम सरकार केंद्र की सिफारिशों से पहले राज्य के कुछ इलाकों से विवादित आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट हटाने पर विचार कर सकती है. गौरतलब है कि असम को अशांत इलाका घोषित करते हुए केंद्र सरकार ने 27 नवंबर 1990 को इस अधिनियम को लागू किया था. केंद्र सरकार ने उल्फा के नेतृत्व में आतंकवाद पर काबू पाने के लिए पूरे राज्य में अफस्पा लगाने का फैसला लिया था.

असम सरकार इस कानून को पूरे राज्य से हटाने की कोशिश पहले से कर रही थी. गृह मंत्रालय के साथ हुई बैठक में राज्य सरकार ने यह मुद्दा उठाया था कि राज्य के कई हिस्सों से इस अधिनियम को हटाया जाए. राज्य के एडीजी (स्पेशल ब्रांच) पल्लब भट्‌टाचार्य ने बताया कि राज्य के किन-किन इलाकों से अफस्पा हटाया जाना चाहिए, यह फैसला चर्चा के बाद लिया जाएगा. उन्होंने बताया कि राज्य में बड़ी संख्या में सेना के जवान तैनात हैं. अगर इस अधिनियम को कुछ इलाकों से वापस लेना है तो राज्य सरकार को उन क्षेत्रों में वैकल्पिक सुरक्षा का इंतजाम करना होगा. इसके बाद इस अधिनियम के बजाय, उन क्षेत्रों में कार्रवाई करने के लिए आईपीसी का इस्तेमाल किया जाएगा.

यह खबर आने के 24 घंटे बाद ही केंद्र सरकार ने आदेश जारी किया कि अफस्पा कानून के तहत पूरे असम को और तीन महीनों के लिए अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया गया है. केंद्र ने यह कदम विद्रोही समूहों उल्फा (यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम), एनडीएफबी (नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड) और अन्य विद्रोही समूहों की विभिन्न हिंसक गतिविधियों का हवाला देते हुए उठाया है. एक गजट अधिसूचना में गृह मंत्रालय ने कहा कि मेघालय से लगे सीमावर्ती क्षेत्रों के अलावा समूचे असम को अफस्पा के तहत तीन मई से तीन महीने के लिए अशांत घोषित कर दिया गया है. मंत्रालय ने कहा कि असम में 2016 में हिंसा की 75 घटनाएं हुईं, जिसमें चार सुरक्षाकर्मियों सहित 33 लोग मारे गए और 14 अन्य लोगों का अपहरण किया गया.

इसके अलावा 2017 में हिंसा की नौ घटनाएं हुई हैं जिसमें दो सुरक्षाकर्मी समेत चार लोग मारे गए. इन सभी हिंसा की वारदातों को विद्रोही गुटों यानी उल्फा और एनडीएफबी ने अंजाम दिया. एक दूसरे गजट नोटिफिकेशन में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के तीन जिलों तिराप, चांगलंग और लोंगडिंग के अलावा असम की सीमा से लगते 16 पुलिस थानों में पड़ने वाले इलाकों को भी  तीन महीनों के लिए अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया है. गृह मंत्रालय ने इस फैसले को यह कहकर सही ठहराया है कि इन इलाकों में एनएससीएन (आईएम), एनएससीएन (के), उल्फा, एनडीएफबी जैसे गुट हिंसा फैला रहे हैं.

इन दो खबरों से एक आम पाठक भ्रमित जरूर हो सकता है. एक तरफ राज्य सरकार कह रही है कि राज्य में हिंसा कम हो रही है, इसलिए अफस्पा हटाने की कोशिश की जा रही है, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने विद्रोही समूहों की विभिन्न हिंसक गतिविधियों का हवाला देते हुए अफस्पा को पूरे राज्य में तीन महीने बढ़ाने के लिए कदम उठाया है. तीन जनवरी 2017 को नागालैंड में भी केंद्र सरकार ने अशांत राज्य बताकर अफस्पा छह महीने के लिए बढ़ाया था. पिछले कई दशक से असम समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंसक गतिविधियां होती रही हैं.

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक पूर्वोत्तर के राज्यों को अशांत बताकर अफस्पा को बनाए रखेंगे. आजादी के इतने साल बाद भी देश के कुछ हिस्सों में वही दमनकारी नीति क्यों अपनाना पड़ा? जब कोई राज्य सरकार अपनी इच्छाशक्ति दिखाकर अफस्पा   हटाने की कोशिश करती है, तो केंद्र सरकार उसे बनाए रखने का प्रयास करती है. लेकिन असम में अब भाजपा की नवनिर्मित सरकार है. असम की भाजपा सरकार का यह निर्णय केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ कैसे हो सकता है? ऐसा तो नहीं कि अफस्पा को लेकर राज्य और केंद्र सरकार में मतभेद की स्थिति पैदा हो गई है.

गौरतलब है कि 2015 को त्रिपुरा से अफस्पा हटाया गया था. इससे यह बात साफ हो गई कि अगर राज्य सरकार मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय दे और कानून-व्यवस्था दुरुस्त हो, तो किसी भी राज्य से अफस्पा हटाया जा सकता है. यह स्थानीय सरकार की ईमानदार कोशिश का नतीजा है कि इतने विवादास्पद कानून को बिना रोक-टोक के राज्य से हटा लिया गया. 16 फरवरी 1997 को केंद्र सरकार ने त्रिपुरा में अफस्पा लगाया था, जब राज्य में विरोधी गुट नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा और ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स चरम पर था. दोनों गुट अब भी बांग्लादेश में सक्रिय हैं और वहीं हथियार का प्रशिक्षण ले रहे हैं. इन गुटों की मांग है कि त्रिपुरा को भारत से अलग किया जाए.

दूसरी तरफ मणिपुर में भी कई दशकों से इस कानून को हटाने को लेकर विरोध चल रहा है. इरोम शर्मिला इस कानून के खिलाफ 16 साल आमरण अनशन कर चुकी हैं. राज्य में अफस्पा को लेकर संतोष हेगड़े एवं जस्टिस जीवन रेड्‌डी कमेटी गठित की गई थी, जिसने अपनी रिपोर्ट में इस कानून को दोषपूर्ण बताया था. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2013 में राज्य में मुठभेड़ के छह मामलों को लेकर फैसला सुनाया था. फैसले में सभी मुठभेड़ को फर्जी बताया गया था. इतना कुछ होने के बाद भी राज्य में अफस्पा को लेकर स्थानीय सरकार कोई कदम नहीं उठा रही है. राज्य की नव निर्मित भाजपा सरकार भी अबतक अफस्पा हटाने को लेकर गंभीर नहीं दिखाई देती है.

क्या है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा)

आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट संसद में 11 सितंबर 1958 को पारित किया गया था. यह कानून पूर्वोत्तर के अशांत राज्यों जैसे असम, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम एवं नागालैंड में लागू है. यह कानून अशांत क्षेत्रों में सेना को विशेषाधिकार देने के लिए बनाया गया था. 1958 में अफस्पा बना तो यह राज्य सरकार के अधीन था, लेकिन 1972 में हुए संशोधन के बाद इसे केंद्र सरकार ने अपने हाथों में ले लिया. संशोधन के मुताबिक किसी भी क्षेत्र को अशांत क्षेत्र घोषित कर वहां अफस्पा लागू किया जा सकता है.

इस कानून के तहत सेना को किसी भी व्यक्ति को बिना कोई वारंट के तलाशी या गिरफ्‌तार करने का विशेषाधिकार है. यदि वह व्यक्ति गिरफ्‌तारी का विरोध करता है तो उसे जबरन गिरफ्‌तार करने का पूरा अधिकार सेना के जवानों को है. अफस्पा कानून के तहत सेना के जवान किसी भी व्यक्ति की तलाशी केवल संदेह के आधार पर ले सकते हैं. गिरफ्‌तारी के दौरान सेना के जवान जबरन उस व्यक्ति के घर में घुस कर तलाशी ले सकते हैं. सेना के जवानों को कानून तोड़ने वाले व्यक्ति पर इस कानून के तहत फायरिंग का भी पूरा अधिकार है. अगर इस दौरान उस व्यक्ति की मौत भी हो जाती है तो उसकी जवाबदेही फायरिंग करने या आदेश देने वाले अधिकारी पर नहीं होगी.

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