राज्य में चलने वाले विकास कार्यक्रमों से यहां के विभिन्न आदिवासी क्षेत्र पूरी तरह उपेक्षित हैं और सरकारी अमला सिर से पैर तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है. इस क्षेत्र में नक्सलवाद की समस्या के सिर उठाने की यही सबसे बड़ी वजह है. पिछले दिनों यहां के जनपद मंडला में एक नाबालिग आदिवासी ल़डकी द्वारा एक बच्चे को जन्म देने से खलबली मच गई.
राज्य शासन के सभी विभागों ने अपना पल्ला झाड़ते हुए इस घटना को छुपाने की पूरी कोशिश की. घटना ने आदिवासियों के जीवनयापन की समस्या के निदान और सामाजिक संस्कारों की पूर्ति में शासकीय सहयोग के दावे की कलई खोल दी है.
मंडला ज़िले की ग्राम पंचायत खारी के कुणोपानीग गांव के आदिवासी रोज़गार की तलाश में गांव से दूसरे शहरों को चले जाते हैं. यहां एक आदिवासी परिवार की 14 वर्षीय नाबालिग बच्ची ने एक संतान को जन्म दिया. बताया जाता है कि लड़की अपने माता-पिता की अनुपस्थिति में दूसरे के खेतों पर काम करने जाती थी.
इसी दौरान कुछ दबंग लोग उसका शारीरिक शोषण करते थे. मां-बाप के साथ न रहने के कारण लड़की अपने शारीरिक शोषण के बारे में थाने में रिपोर्ट दर्ज़ नहीं करा पाई. वह गर्भवती हो गई और फिर उसने बच्चे को जन्म दे दिया. उस ल़डकी के अल्पवयस्क होने के कारण नवजात शिशु कुपोषण का शिकार था. इस घटना के बाद शासन-प्रशासन की जमकर किरकिरी हुई है.
मंडला राज्य के उन आदिवासी ज़िलों में है, जहां भ्रष्टाचार चरम पर है. ज़िले के आला अधिकारियों को छोड़िए, यहां विभिन्न विभागों में कार्यरत बाबू स्तर के कर्मचारियों की कोठियां इस बात की ओर इशारा करती हैं कि विभिन्न योजनाओं और विश्व बैंक से मिलने वाले पैसों का आम आदमी के हित में कितना उपयोग किया जाता है. अधिसूचित आदिवासी ज़िला होने के कारण कई योजनाओं के लिए प्राप्त होने वाला अनुदान नियमानुसार सीधे ज़िला प्रशासन को ही जारी किया जाता है. सरकारी आंकड़ों में मंडला की साक्षरता दर 72 प्रतिशत दर्ज़ है, जबकि वस्तुस्थिति इसके ठीक विपरीत है.
ग्राम कुणोपानीग में हुई घटना के संदर्भ में चौथी दुनिया ने जब यहां के महिला एवं बाल विकास अधिकारी शशि उईके से बातचीत की तो उन्होंने घटना के बारे में कोई जानकारी होने से मना कर दिया. हां, उन्होंने यह जानकारी ज़रूर दी कि इस क्षेत्र में महिला कार्यकर्ता कार्यरत हैं, परंतु उनके संदर्भ में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी गई. प्रश्न यह उठता है कि इस नाबालिग ल़डकी के साथ हुई घटना के संदर्भ में महिला एवं बाल विकास अधिकारी, ज़िला पंचायत एवं आदिवासी विकास से संबंधित कर्मचारियों द्वारा कोई ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
पीड़िता के पिता एवं मां द्वारा दिए गए बयान के अनुसार, भुखमरी के चलते गांव के ज्यादातर परिवार रोज़गार की तलाश में पलायन कर जाते हैं. गांव में अकेले केवल उनके बच्चे ही रहते हैं. इस दौरान असामाजिक तत्वों द्वारा शारीरिक शोषण जैसी घटना को अंजाम देना आसान हो जाता है.
राज्य में पंचायतीराज प्रणाली लागू होने के बाद से समस्याओं के निराकरण के लिए पंच और ग्रामीण आपस में बैठकर मामलों को सुलझाने की कोशिश करते हैं, नतीजतन आदिवासी क्षेत्रों में होने वाली इस तरह की घटनाएं पुलिस तक नहीं पहुंच पाती हैं. मध्य प्रदेश में आदिवासियों के शोषण की घटनाएं आम हैं. इन घटनाओं के विरुद्ध सुनवाई के लिए कोई भी सक्षम तंत्र नहीं है.
संविधान में उल्लेखित व्यवस्था के अनुसार, अधिसूचित ज़िलों को सर्वाधिक संवेदनशील मानते हुए इनके विकास और सुरक्षा की सबसे अधिक ज़िम्मेदारी ज़िला प्रशासन की ही होती है. ग्राम कुणापानीग में पैदा संतान अपनी मां के नाबालिग होने के कारण पूरी तरह से विकसित नहीं हो सकी. ज़िला प्रशासन ने उस बच्चे को इलाज के लिए जबलपुर मेडिकल कॉलेज भेजा, लेकिन चार दिनों तक ज़िंदगी और मौत से लड़ने के बाद नवजात ने दम तोड़ दिया. ज़िला प्रशासन ने उपरोक्त घटना की न तो कोई जांच की है और न ही आदिवासियों के लिए किसी नए सुरक्षातंत्र की स्थापना का कोई प्रयास किया. सरल प्रवृत्ति के आदिवासी भी ऐसी घटनाओं को एक दुर्घटना मानकर भूल जाते हैं. लेकिन यह समस्या का निदान तो कतई नहीं है

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