इंदर कुमार गुजराल बहुत ही तहज़ीबयाफ्ता इंसान थे. शुरू शुरू में वह मुझे राजनीतिक कम, संस्कृतिकर्मी अधिक लगे. उनकी सभी प्रमुख भाषाओं की साहित्यिक विधाओं के प्रति न केवल जानकारी थी बल्कि उनका गहन अध्ययन भी था. चाहे अंग्रेजी हो, हिंदी, उर्दू या पंजाबी. वह इन भाषाओं से जुड़े साहित्यकारों को जानते, पहचानते और पढ़ते थे. वह संस्कृतिकर्मियों से भी रूबरू रहते थे. उन्हें आप थिएटर में भी देख सकते थे, किसी कला प्रदर्शनी में या साहित्यिक सेमिनार ने भी. उनकी विद्वता के लोग कायल थे. मेरी उनसे पहली मुलाक़ात 1970 के दशक में टेंट कॉफ़ी हाउस में हुई.तब वह कॉफ़ी हाउस सभी संस्कृतियों का संगम माना जाता था. वह राजनेताओं,कलाकारों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, कवियों -कहानीकारों-उपन्यासकारों का अड्डा हुआ करता था. वहां खूब गर्मागर्म राजनीतिक बहसें हुआ करती थीं. आपको थिएटर के कलाकार किसी न किसी नाटक पर चर्चा करते भी दीख जाते थे. कई नामी पेंटर दीख जाते थे और छात्र नेता भी.

इंदर कुमार गुजराल के अलावा चंद्रशेखर, मोहन धारिया, डॉ राम मनोहर लोहिया जैसे राजनेता अक्सर दीख जाते थे जबकि पत्रकारों और लेखकों में जगप्रवेश चंदर, एम.एल. कोतरू, योगेंद्र बाली, ओ.पी. कोहली, रघुवीरसहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, एस. सहाय, सुरिंदर निहाल सिंह, खुशवंत सिंह, सतिन्दर सिंह, राज गिल, सुभाष किरपेकर,के.एन.मलिक, जे.डी.सिंह तो साहित्यकारों में देवेंद्र सत्यार्थी, अमृता प्रीतम, विष्णु प्रभाकर, तारासिंह कोमल आदि तथा कला के संसार से एम.एफ. हुसैन और राम कुमार भी पहचाने जाते थे रंगमंच की दुनिया से कमलेश कुमार कोहली, विनोद व कविता नागपाल, बी के सूद आदि अक्सर देखे जाते थे.इन सभी लोगों की इंदर कुमार गुजराल के साथ बैठकबाजी देखने को मिला करती थी. देवेंद्र सत्यार्थी ने लोकगीतों पर बहुत काम किया था. जब वह भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘आजकल’ के संपादक थे उस समय इन लोकगीतों की पूरी श्रृंखला प्रकाशित की थी. उनके बारे में मशहूर था कि टेंट कॉफ़ी हाउस में वह अपनी कहानियां सुनाने के लिए लोगों को पकड़ा करते थे किसी को कॉफ़ी पिलाने के प्रलोभन में तो किसी को नाश्ता खिलाने के लिये.जब कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति सत्यार्थी जी को उनके श्रोता के रूप में नहीं मिलता तो ऐसी स्थिति में वह कॉफ़ी हाउस के बैरों में से किसी को पकड़ लेते और उसे अपनी कहानियाँ सुनाना शुरू कर देते और उनकी राय भी पूछते थे. सत्यार्थी जी की इस आदत से इंदर कुमार गुजराल भी परिचित थे. उन्होंने देवेंद्र सत्यार्थी से जब उनकी कहानी सुनाने की इस आदत के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह आम आदमी से जुड़ी कहानियां लिखते हैं. उनके समाज के परिवेश, उनकी जीवन शैली, खानपान की आदतों और ढंग को उसी तरह से उलीकना चाहते हैं जैसे वे बसर करते हैं. सही श्रोता इस क्षेत्र में उनका मार्गदर्शन करते हैं.

जगप्रवेश चंदर, ओ.पी. कोहली तथा इंदर वर्मा इस टेंट कॉफ़ी हाउस को शरू करने के सूत्रधारों में माने जाते थे. उन्होंने इंडियन कॉफ़ी वर्कर्स को-ऑपरेटिव के साथ बातचीत करके इस टेंट कॉफ़ी हाउस की शुरुआत की थी.स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार जगप्रवेश चंदर दिल्ली विधानसभा के सदस्य रहे (1952-56) जिसमें चौधरी ब्रह्म प्रकाश मुख्यमंत्री थे. उनके बाद गुरमुख निहाल सिंह दूसरे मुख्यमंत्री (1955-56) बने जो प्रसिद्ध पत्रकार सुरिंदर निहाल सिंह के पिता थे. बाद में यह विधानसभा भंग कर दी गयी और उसके स्थान पर दिल्ली महानगर परिषद अस्तित्व में आयी जिसमें जगप्रवेश चंदर चौथे मुख्य कार्यकारी पार्षद बने-राधा रमन, विजय कुमार मल्होत्रा और केदार साहनी के बाद. तब वर्तमान दिल्ली विधानसभा वजूद में नहीं आयी थी.

यह कॉफ़ी हाउस क्रांतिकारी चर्चाओं, छात्रों,बुद्धिजीवियों, राजनीतिकों और सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत लोगों के अड्डे के रूप में चर्चित था.इसे दिल्ली के सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन के एक महत्वपूर्ण भाग के रूप में भी देखा जाता था जिसे ‘कॉफ़ी हाउस संस्कृति’ के तौर पर जाना जाता था. यह जगह अपनी सस्ती कॉफ़ी, इडली, डोसा और नाश्ते के लिए मशहूर थी. यहां के कर्मचारी पगड़ी और कमरबंद पहनते थे जिससे एक तरह का शाही लुक प्रतीत होता था.यहां की जीवंत चर्चाओं और खुले वातावरण के कारण दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र और देश के प्रमुख लोग भी आते थे. कुछ लोग इसे कॉफ़ी हाउस नहीं बल्कि देश के ‘लिविंग रूम’ जैसा महसूस किया करते थे जहाँ ‘कॉफ़ी पर चर्चा’ होती थी और नयी सोच व योजनाओं पर बहसें हुआ करती थीं. यहां का माहौल जहाँ क्रांतिकारी, बौद्धिक, राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र था वहाँ माओवाद, नक्सलवद, वियतनाम युद्ध पर भी खूब बहसें हुआ करती थीं. उस समय उत्तर और दक्षिण वियतनाम में जंग चल रही थी. दक्षिण वियतनाम पर अमेरिकी प्रभाव वाली सरकार थी जबकि उत्तर वियतनाम में हो ची मिन्ह की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार. उत्तर वियतनाम के समर्थक वियतकांग छपामार बहुत सक्रिय थे जिनसे दक्षिण विएतनाम सरकार और अमेरिकी सैनिक खौफ़ज़दा रहते थे. वामपंथी विचारधारा वाले लोग अपने टेबल पर बहुत मुखर हुआ करते थे.

इसे टेंट इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह एक अनौपचारिक, सस्ती और लोकप्रिय जगह थी जो आम जनता के लिए खुली थी लेकिन इसका सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा था. यहां ‘मानवता का भाग्य तय’ करने वाले लोग मिलते थे.यहीं से राजनीतिक और सामाजिक विचारों का जन्म हुआ जिससे यह कॉफ़ी हाउस दिल्ली के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.इंदर कुमार गुजराल को इस टेंट हाउस में दिलचस्पी क्यों और कैसे हुई इस बाबत उन्होंने बताया था कि देश-विदेश में कॉफ़ी हाउसों को मिलनस्थल और गंभीर चर्चाओं का केंद्र माना जाता है. इस कॉफ़ी हाउस में यह सिफत तो थी ही, इसके अलावा इसका खुला वातावरण, चारों ओर चहकते-दमकते-चमकते चेहरे खुशमिज़ाज़ी और बेफिक्री का माहौल पैदा करता था. यहां बेसख्ता बुलंद आवाज़ में बातचीत कर-कह-सुन सकते थे बिना किसी को तकलीफ पहुंचाए. चारों ओर का खुशगवार माहौल आपको एक अलग तरह की ऊर्जा प्रदान करता था. कभी आप किसी दिशा में पेंटरों को आते हुए देख रहे हैं तो दूसरी तरफ से संगीत, रंगमंच और कला की दुनिया से जुड़े प्रसिद्ध कलाकारों को, किसी तीसरी तरफ से राजनीतिकों के झुंड चले आ रहे हैं तो बगल से हिंदी भवन का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद साहित्यकार और वहां जुड़े श्रोता भी. धूमिमल गैलरी भी टेंट हाउस के करीब है वहां से कभी परमजीत सिंह, राम कुमार को आते हुए भी देखा था. एक बार तो एम एफ हुसैन और जगदीश स्वामीनाथन के साथ धूमिमल गैलरी के मालिक रवि जैन सीधे मेरे पास आकर बैठ गए. क्या किसी दूसरे कॉफ़ी हाउस में इतनी हस्तियों को एकसाथ जुड़े देखा है! हां, टेंट कॉफ़ी हाउस में आम और जिज्ञासु लोगों के अलावा विभिन्न विधाओं के ऐसे हुनरमंद भी बैठे मिल जायेंगे जो आज अपने सीनियर्स के संग आये हैं, कल अकेले अपने तईं आएंगे अपने शिष्यों के साथ.

इस कॉफ़ी हॉउस की जिंदगी की शुरुआत लोहे के खंबों पर तने शामियाने से की गयी थी जिसकी वजह से यह टेंट कॉफ़ी हाउस कहलाता था. इसकी बगल में एक पक्की इमारत थी थिएटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग जहाँ इस कॉफ़ी हाउस को रसोई घर और फैमिली रूम के लिए तीन कमरे मिले हुए थे. थिएटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग में दिल्ली सरकार के कुछ ऑफिस हुआ करते थे. इनमें प्रमुख आरटीओ का ऑफिस मुझे आज भी याद है जहाँ से मैंने अपना पहला ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया था. हिंदी भवन भी इसी बिल्डिंग में होता था. यहां होने वाली साहित्यिक गतिविधियों में भी मैं भाग लिया करता था. यहीं मेरी भेंट डॉ. हरिवंश राय बच्चन, जैनेंद्र जैन,विष्णु प्रभाकर, यशपाल जैन, कमला रत्नम, साप्ताहिक हिंदुस्तान के तत्कालीन संपादक बाँके बिहार भटनागर आदि से हुई थी.पंजाबी के उपन्यासकार और कहानीकार कर्नल नरेंद्रपाल सिंह, गुरमुख सिंह जीत, प्यारा सिंह दाता, लोचन बख्शी, गुलज़ारसिंह संधु, तारासिंह कोमल, उर्दू के मुस्तबा हुसैन रेडियो के देवेंदर, हेमेंद्र तथा दूरदर्शन के सत्येंद्र शरत, शरद दत्त आदि भी मिल जाते थे. मुस्तबा हुसैन शरद दत्त के मित्र थे और हिंदी व्यंग्य में भी रुचि रखते थे.हिंदी भवन के कार्यक्रम के बाद कुछ लोगों को टेंट कॉफ़ी हाउस में भी देखा जाता था.

इस टेंट कॉफ़ी हाउस में बैठने के लिए सौ डेढ़ सौ सीटें ही थीं लेकिन यहां आने वाले लोगों की संख्या कभी भी हज़ार पांच सौ से कम नहीं होती थी. शाम का जलवा तो देखने लायक हुआ करता था जहाँ बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और छात्रों के अलावा प्रेमी जोड़े भी देखे जाते थे. उन दिनों टेंट कॉफ़ी हाउस का ऐसा आकर्षण का केंद्र था जिससे बचकर निकल पाना मुश्किल होता था.कभी कभार तो ऐसे हालात भी पैदा हो जाते थे कि कॉफ़ी के लिए प्याले कम पड़ जाते. खड़े होकर कॉफ़ी पीने वालों के झुंड भी खूब हुआ करते थे. उनकी बहसें भी टेबल पर बैठे राजनेताओं और बुद्धिजीवियों से कम गर्मागर्म और दिलचस्प नहीं हुआ करती थीं. इस कॉफ़ी हाउस की बढ़ती हुई लोकप्रियता देख तथा यहां पर होने वाली चर्चाओं को सुनने की दृष्टि से सरकार की गुप्तचर एजेंसियों के लोग भी दीखने लगे थे. उनकी उपस्थिति से यहां आने वाले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का माथा ठनका था. उन्हें अहसास हो गया कि कॉफ़ी हाउस की गतिविधियों पर ‘सरकारी नज़र’ पड़ गयी है. वे गुप्तचर इस कॉफ़ी हाउस में दिन भर बैठने लगे. बाद में उन्होंने अपनी रिपोर्ट में इस कॉफ़ी हाउस में होने वाली राजनीतिक चर्चाओं का ब्यौरा सरकार को दिया जिसे ‘देश हित में न बताते हुए’ 16 मई, 1976 को पहले सरकारी नोटिस दिया गया और उसके के बाद इस टेंट कॉफ़ी हाउस को तोड़ दिया गया. याद रहे वह इमरजेंसी का दौर था. बाद में इस कॉफ़ी हाउस की जगह पालिका बाजार बनाया गया.

इस टेंट हाउस के टूट जाने से यहां आने वाले नियमित लोगों को खासी कोफ्त हुई. इंडियन कॉफ़ी हाउस ने बाद में मोहन सिंह पैलेस की छत पर नया कॉफ़ी हाउस खोला लेकिन वहां टेंट कॉफ़ी हाउस जैसा खुला खुला माहौल नहीं था और न ही वैसी रौनक़. इस नए कॉफ़ी हाउस में वह पुरानी पहचान और तपिश नहीं थी जहाँ युवाओं को’ फयुहरर, सर्वहारा, साम्राज्यवाद, फासीवाद जैसे शब्द सुनने को मिलते थे. टेंट कॉफ़ी हॉउस के टूट जाने के बाद छात्र, युवा और सरकारी बाबुओं की पसंद रीगल सिनेमा के पास पहली मंज़िल पर स्थित स्टैंडर्ड कॉफ़ी हाउस था जहाँ कॉफ़ी के साथ एक खास किस्म का बिस्कुट मिला करता था. वहां पर लोग अपनी मन पसंद के गाने भी सुन सकते थे. रीगल सिनेमा के बाईं तरफ गेलार्ड रेस्टोरेंट के करीब एक कोने में भी कॉफ़ी हाउस था जहाँ विष्णु प्रभाकर जैसे साहित्यकार शाम को बैठा करते. वह अपने घर कुंडेवालान से पैदल चलकर इस कॉफ़ी हाउस में आते थे. आजकल वहां पिंड बलूची रेस्टोरेंट है. कुछ लोग मद्रास होटल के कॉफ़ी हाउस में जाने लगे तो कुछ एम्बेसी रेस्तरा में.

मैं देश विदेश के कई कॉफ़ी हाउसों में गया हूं जो पत्रकारों, साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों और राजनेताओं का मिलन स्थल है. जैसे जयपुर कॉफ़ी हाउस में ही मेरी रमेश थानवी, ओम थानवी, प्रमोद भसीन, ईशमधु तलवार, ओम सैनी,महेंद्र जैन,महेश झालानी आदि से मुलाक़ात हुई थी जबकि पटना के कॉफ़ी हाउस में जुगनू शारदेय ने मेरी मुलाक़ात फ़रिश्वरनाथ रेणु से कराई थी. रेणु जी को मैं 1966 से जानता था.वह बिहार से नियमित रूप से ‘दिनमान’ के लिए लिखा करते थे. 1967 में ‘दिनमान’ के संपादक सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय जब बिहार में अकाल की स्थिति कवर करने के लिए गए तब रेणु जी भी उनके साथ थे. अज्ञेय जी ने अकाल के चित्र लिये जबकि रिपोर्ट रेणु ने लिखी थी. पटना मुलाक़ात में रेणु जी के साथ कॉफ़ी पीते हुए उन्होंने मूझे सलाह दी कि सहरसा और पूर्णिया में बिहारी सिखों से ज़रूर मिलें. उनके अपने गुरूद्वारे हैं और वे लोग बहुत सुंदर कीर्तन करते हैं. रेणु जी की सलाह पर अमल करते हुए मैं बिहारी सिखों से मिला था दोनों स्थानों पर.

लाहौर के गुलबर्गा के एक कॉफ़ी हाउस में एडवोकेट और पाकिस्तान मानवाधिकार की अध्यक्ष अस्मा जहांगीर से मुलाक़ात हुई थी. वहीं एक बार ‘पाकिस्तान टाइम्स’ के तत्कालीन संपादक आई ए रहमान और अज़ीज़ सिद्दीकी के साथ बैठकर ‘भारत-पाकिस्तान:हमसायगी के रिश्ते’ पर एक गैर-राजनीतिक सेमिनार के आयोजन को लेकर दोनों देशों के पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को न्योतने पर चर्चा हुई थी. इसी कड़ी में कराची के क्लिफटन के एक कॉफ़ी हाउस में वहां के मशहूर पत्रकार एम वी नकवी, सुल्तान अहमद और डेली ‘जंग’ के एडिटर महमूद शाम तथा सिंध विधानसभा में विधायक हिंदू नेता मेहरूमल जगवाणी आदि से उसी मुद्दे पर सलाह मशविरा हुआ था. पारसी सांसद बैरम आवारी से भी उनके आवारी रिसोर्ट में भेंट हुई.सभी को ‘संडे मेल’ के मालिक समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया का यह सुझाव बहुत पसंद आया और जिन जिन लोगों से भी इस बारे में चर्चा हुई उन्होंने दिल्ली में आयोजित होने वाले इस सेमिनार में शामिल होने की राजामंदी भी दे दी थी.

इस विषय और इसके अलावा भारत-पाकिस्तान के रिश्तों और पाकिस्तानी अवाम के नज़रिये पर भी मेरी अलग से मुलाक़ात कराची में भारत के तत्कालीन काउंसल जनरल मणि त्रिपाठी से हुई थी. उनकी पत्नी शशि त्रिपाठी भी मिलीं जो वहां डिप्टी काउंसल जनरल थीं. दोनों पति -पत्नी भारतीय विदेश सेवा ( आईएफएस) के अधिकारी हैं. मणि उड़िया हैं जबकि शशि का संबंध सिख परिवार से है. वह डॉ गोपाल सिंह ‘दर्दी’ की भतीजी हैं जिन्होंने गुरु ग्रन्थ साहब का अंग्रेजी में अनुवाद किया है. इन सब का उल्लेख इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि इनमें से अधिसंख्य लोगों को इंदर कुमार गुजराल जानते हैं. जिस गैर-राजनीतिक भारत-पाकिस्तान सेमिनार का मैंने ज़िक्र किया है उसमें गुजराल साहब ने दो दिनों तक शिरकत की थी. यह सेमिनार दिल्ली के अशोक होटल में हुआ था नवंबर, 1991 को.अस्मा जहांगीर के अतिरिक्त गुजराल साहब पाकिस्तानी पत्रकारों के नामों और उनके लेखन से भी परिचित थे. नकवी साहब और सुल्तान अहमद दिल्ली में सेमिनार में हिस्सा लेने के लिए कराची से आये थे. डॉ गोपाल सिंह से गुजराल कई बार मिल चुके थे. जब गुजराल साहब सोवियत संघ में भारत के राजदूत थे, डॉ गोपाल सिंह बुलगारिया में. एक बार बातचीत में उन्होंने बताया कि वह शशि और मणि त्रिपाठी को भी मिल चुके हैं. गुजराल साहब का परिचय क्षेत्र का दायरा खासा व्यापक था.

इसे भी संयोग ही कहा जाएगा कि भारत के जो दो पंजाबी प्रधानमंत्री हुए हैं दोनों ही इंदर कुमार गुजराल (4 दिसंबर, 1919-30 नवंबर,2012) और डॉ. मनमोहन सिंह (26 सितम्बर,1932-26 दिसंबर 2024) अविभाजित भारत झेलम ( पाकिस्तान) जन्मा हैं. गुजराल साहब सोहावा में तो डॉ सिंह गाह में. दोनों का निधन भी 92 वर्ष की आयु में हुआ. इसे आप क्या कहेंगे प्रारब्ध या फिर से संयोग. यहां यह बता देना अभीष्ट होगा कि उस समय दो सोहावा तहसील थीं एक झेलम वाली तो दूसरी गुजरात ज़िले में. इस ज़िले से मेरा संबंध इस मायने में है कि मेरी छोटी मौसी वहीं ब्याही हुई थीं और साल में एक बार रावलपिंडी से आने पर उनके यहां मेरा जाना होता था. यह सोहावा मंडी बहावलदीन के पास है. गुजराल साहब का ऐसा बहुआयामी व्यक्तित्व था कि उनके पक्ष का कोई न कोई सिरा मैं अपने बचपन या पत्रकारी जीवन के नज़दीक पाता हूं.

इंदर कुमार गुजराल ने अखिल भारतीय छात्र संघ का सदस्य होने के नाते उन्होंने लाहौर में 8 अगस्त, 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया था जिसके कारण वह जेल भी गए थे. क्योंकि यह आंदोलन देश भर में पूरे जोशोखारोश से हुआ था मैं भी रावलपिंडी में अपने चाचा परमानन्द जी के संग नारे लगाने वाली भीड़ में शामिल हो गया था. तब मेरी आयु थी सात बरस ( अगस्त, 1935 जन्मा हूं). बच्चा समझकर मेरे साथ चाचा जी को भी छोड़ दिया गया था. जब मैंने गुजराल साहब से इस घटना का ज़िक्र किया था तब उन्होंने कहा था कि उस दौर का जज्बा ही कुछ ऐसा था.

1964 में इंदर कुमार गुजराल कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए लेकिन इससे पहले 1958 में वह नई दिल्ली नगरपालिका के उपाध्यक्ष रहे थे. गुजराल साहब इंदिरा गाँधी के विश्वासपात्रों में थे. अप्रैल, 1964 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना दिया गया था. इमरजेंसी के दौरान जून 1975 में उन्हें सूचना और प्रसारणमंत्री बनाया गया. उन्हें दूरदर्शन का ज़िम्मा सौंपा गया तथा मीडिया पर सेंसरशिप का दायित्व. जब वह सरकार की नीतियों पर पूरी तरह से अमल करने में नाकामयाब रहे तो उन्हें वहां से हटाकर विद्या चरण शुक्ला को यह दायित्व सौंप दिया गया. क्योंकि वह इंदिरा गांधी के विश्वस्त लोगों में थे उन्हें 1976 में तत्कालीन सोवियत संघ में भारत का राजदूत बनाकर मास्को भेज दिया गया. 1977 में जब मैं सोवियत संघ की यात्रा पर था तो मास्को में गुजराल साहब से मेरी खासी लंबी मुलाक़ात हुई थी. (जारी)

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