कांग्रेस एक हथियार था जिसका इस्तेमाल महात्मा गांधी ने जनता के संघर्ष के लिए किया. लेकिन इसका इस्तेमाल उन्होंने अपने तानाशाही नियमों के तहत किया. कांग्रेसियों ने हमेशा गांधी का पालन किया लेकिन उनके नियमों का नहीं. कांग्रेसियों ने गांधी जी के नेतृत्व का स्वागत तो किया, लेकिन स़िर्फ आज़ादी पाने तक. उसके बाद वे गांधी जी से परे हो गए और कांग्रेस को शासन करने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया, जबकि गांधी चाहते थे इसका विलय कर दिया जाए.
लगभग एक शताब्दी पूर्व लंदन में दो भारतीयों की मुलाक़ात हुई. उनमें जो ज्यादा उम्र का था, वह दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों के मानवाधिकार के मामले को लेकर वहां पहुंचा था और दूसरा नौजवान ऊर्जा से भरपूर था और भारत से ब्रिटिश शासन को उखा़ड फेंकने के लिए समर्पित. दोनों में भारत के भविष्य को लेकर लंबी बहस हुई. नौजवान ने मज्जिनी और गरीबाल्डी के बारे में सूक्ष्मता से अध्ययन किया था. इन लोगों (मज्जिनी और गरीबाल्डी) ने इटली के एकीकरण और उसे स्वंतत्रता दिलाने में ब़डा योगदान किया था. नौजवान मज्जिनी की आत्मकथा का मराठी में अनुवाद करने पर भी विचार कर रहा था. नौजवान चाहता था कि औद्योगीकरण और आधुनिकता के मामले में भारत यूरोप का अनुकरण करे. लेकिन उम्रदराज व्यक्ति इस विचार से भयग्रस्त था. वह चाहता था कि भारत आधुनिकता, मशीनों, पश्‍चिमी दवाओं और शहरीकरण को ख़ारिज करे. उम्रदराज व्यक्ति ने वापस दक्षिण अफ्रीका लौटकर अपनी पहली क़िताब लिखी, जिसमें उन्होंने तर्क दिए कि क्यों भारत को आधुनिक मशीनीकरण को ख़ारिज कर देना चाहिए. यह क़िताब थी हिंद स्वराज.
अगले चालीस वर्षों में दोनों के रास्ते भिन्न रहे. उम्रदराज व्यक्ति राष्ट्रपिता बना और उसे भारत की आज़ादी का श्रेय दिया गया. नौजवान ने अपने तमाम साल एकांत कारावास में गुज़ारे और उसके बाद अपना जीवन लेखन और विचारों को प्रतिपादित करने के लिए समर्पित कर दिया. एक पश्‍चिमी सभ्यता के पैरोकार और आधुनिकतावादी से वह हिंदू सभ्यता के स्वर्णिम अतीत की तरफ़ लौट गया. उसे उम्रदराज व्यक्ति की हत्या में भी फंसाया गया. उसकी पहचान गुप्त रही और एक विभाजनकारी के रूप में हुई. वहीं उम्रदराज व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली.
यह दोनों व्यक्ति थे गांधी और सावरकर, जिन्होंने 1909 में  आज़ादी के लिए भारत द्वारा अ़िख्तयार किए जाने वाले रास्ते को लेकर आपस मेें बहस की थी. गांधी चाहते थे कि कम से कम सरकार और हस्तशिल्प के साथ भारत गांवों का गणतंत्र बने. भारत ने उनकी तो पूजा की, लेकिन उनके सुझाए रास्तों को बुरी तरह नकार दिया. उनके सबसे अच्छे शिष्य जवाहर लाल नेहरू के विचार सावरकर से पूरी तरह मिलते थे. वे भी भारत के लिए आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण चाहते थे. मंगलयान को अपने रास्ते भेज कर भारत ने एकबार फिर गांधी के विचारों को नकारकर सावरकर और नेहरू के विचार को चुना  है. सावरकर को अब आधुनिकतावादी के बजाए हिंदुत्ववादी के तौर पर पहचाना जाता है. हालांकि, उनकी भारत के बारे महात्वाकांक्षा उसी प्रकार विकासोन्मुखी थी जैसी किसी भी दूसरे की होती है.
कांग्रेस एक हथियार था जिसका इस्तेमाल महात्मा गांधी ने जनता के संघर्ष के लिए किया. लेकिन इसका इस्तेमाल उन्होंने अपने तानाशाही नियमों के तहत किया. कांगे्रसियों ने हमेशा गांधी का पालन किया लेकिन उनके नियमों का नहीं. कांग्रेसियों ने गांधी जी के नेतृत्व का स्वागत तो किया, लेकिन स़िर्फ आज़ादी पाने तक. उसके बाद वे गांधी जी से परे हो गए और कांग्रेस को शासन करने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया, जबकि गांधी चाहते थे इसका विलय कर दिया जाए. स़िर्फ गांधीवादी ही गांधी के सिद्धांतों में विश्‍वास करते रहे, लेकिन उनके जाने के बाद गांधीवादियों की कोई क़ीमत नहीं रह गई.
भारत की स्थिति इस समय विश्‍व में सशक्त रूप में मौजूद है. न केवल इसलिए क्योंकि यह एक आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति है, बल्कि इसलिए कि यह आर्थिक और सैन्य ताक़त बन चुका है. मंगल पर भेजा गया यह यान सिद्ध करता है कि अन्य देशों मुक़ाबले तकनीकी दक्षता के मामले में भारत ज्यादा सक्षम है. इस कार्यक्रम की शुरुआत जानबूझकर जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस द्वारा आज़ादी के पहले ही कर दी गई थी जब उन्होंने कांग्रेस की नेशनल प्लानिंग कमेटी की स्थापना की थी. बोस की जगह तो जल्द ही गांधी ने ले ली, लेकिन नेहरू इस कार्यक्रम के साथ लगातार बने रहे. ये नेहरू ही थे जिन्होंने विज्ञान और तकनीक का महत्व समझा. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप उन्होंने आर्थिक नीतियों के बारे में गांधी के नियमों को दरकिनार अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी जिससे आधुनिकता के साथ पूरी रफ्तार के साथ दौ़डा जा सके. नाभिकीय ऊर्जा का महत्व समझ कर भाभा के नेतृत्व में नाभिकीय शोध के एक कार्यक्रम की स्थापना की. साराभाई इस क़डी में दूसरे वैज्ञानिक थे. साराभाई के संबंध नेहरू और गांधी से उस समय से थे जब गांधी को साबरमती आश्रम को चला पाने में परेशानी महसूस हो रही थी. साराभाई का योगदान भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए अभूतपूर्व है.
यह वही भारत था जो औद्योगिक विकास के साथ हरित क्रांति के लिए भी समर्पित था. इसने आईटी सेक्टर में भी अपनी जगह बनाई. अब इसने अंतरिक्ष कार्यक्रम के भी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है और सभी बातों से ऊपर पूर्व राष्ट्रपति कलाम हमें इस बात की याद दिलाते हैं कि भारत किस तरह उन लोगों की इज़्ज़त करता है जिन्होंने रक्षा तकनीक के लिए काम किया है. भारतीय राजनीति विकास और तकनीक के साथ-साथ ग़रीबी दूर करने को लेकर एक जनमत बना हुआ है. सावरकर  और नेहरू एक दूसरे से उतने ही अलग थे जितने की दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति आपस में हो सकते हैं. लेकिन भारत ने इन दोनों के विकास पथ का अनुसरण किया. हम सभी को गांधी के नैतिक साहस और कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए श्रद्धांजलि देनी चाहिए. हमें हिंद स्वराज को प़ढना तो चाहिए, लेकिन इसे भारत के ब्लूप्रिंट की तरह नहीं देखना चाहिए.

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