बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कानून बनाने वाले नेताओं के वकालत करने पर रोक लगाने के लिए 500 से अधिक एमपी, एमएलए और एमएलसी को नोटिस जारी किया है. इस संबंध में बार काउंसिल द्वारा गठित एक्सपर्ट कमिटी जल्द फैसला ले सकती है.

हम कोर्ट में अक्सर बड़े नेताओं, सांसदों और विधायकों को जिरह करते देखते हैं. ये विधायक और सांसद ऐसे समय भी कोर्ट में वकालत करते दिख जाते हैं, जब उन्हें संसद या विधानसभा में सत्र के दौरान मौजूद होना चाहिए था. लेकिन बार काउंसिल के नियमों के उल्लंघन के आधार पर अब इस पर रोक लग सकती है. पिछले साल 21 दिसंबर को बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस मामले में एक एक्सपर्ट कमिटी का गठन किया था. बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, अभिषेक मनु सिंघवी, केटीएस तुलसी, पी चिदंबरम और मीनाक्षी लेखी जैसे कई बड़े नेताओं को नोटिस भेजा है. कमिटी के सदस्यों का कहना है कि राजनेताओं का कोर्ट में वकालत करना कनफ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट के दायरे में आता है. उन्होंने बताया कि एमपी और एमएलए का वकालत करना भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 और 15 का भी उल्लंघन है.

एक सरकारी कर्मचारी को जब वकालत करने से रोका गया है, तब उसी आधार पर एक लोकसेवक कोर्ट में केस कैसे लड़ सकता है. यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है. इतना ही नहीं, एक जनप्रतिनिधि वकील के रूप में अपने क्लाइंट से फीस लेता है और सरकारी खाते से वेतन और भत्ते भी लेता है, यह प्रोफेशनल मिसकन्डक्ट का मामला बनता है. यह व्यवस्थापिका और न्यायपालिका दोनों के लिए एक गंभीर मामला है, क्योंकि कई जनप्रतिनिधि अक्सर राजनीतिक दलों और कॉरपोरेट के बड़े-बड़े मामलों का कोर्ट में पक्ष रखते दिख जाते हैं. विधिवेत्ताओं का यह आचरण उनके लॉ प्रोफेशन और जनहित दोनों के खिलाफ है. इतना ही नहीं, संसद में जजों पर महाभियोग चलाने में सांसदों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. लेकिन जब आप उसी जज के सामने कोर्ट में वकील के रूप में अपना पक्ष रखते हैं, तब यह सीधे-सीधे कन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट का मामला बनता है. अगर आप कोर्ट में लॉ प्रैक्टिस करना चाहते हैं, तब इसे पूर्णकालिक रूप से करना होगा और अगर आप एमपी और एमएलए हैं, तो आपको अपने क्षेत्र के विकास के लिए पूरा समय देना चाहिए. ऐसा नहीं करना अपने प्रोफेशन के साथ धोखा देना है.

बार काउंसिल में एक्सपर्ट कमिटी के चेयरमैन एडवोकेट मनन कुमार मिश्रा हैं. एक्सपर्ट कमिटी के अन्य सदस्यों में जाने-माने वकील भोज चन्द्र ठाकुर, रमेशचंन्द्र जी शाह और डीपी ढाल शामिल हैं. बार काउंसिल ने फरवरी के पहले हफ्‌ते में इस मामले को लेकर जनरल काउंसिल की मीटिंग बुलाई थी. मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि बार काउंसिल के नियमों के अनुसार सरकारी कर्मचारी अदालत में प्रैक्टिस नहीं कर सकते हैं. बार काउंसिल में दायर याचिका के आधार पर जनप्रतिनिधियों को नोटिस जारी किया गया है. उन्होंने कहा कि नेताओं को नोटिस भेजकर यह पूछा गया है कि क्यों न उन्हें कोर्ट में प्रैक्टिस करने से रोक दिया जाए. उन्हें नोटिस भेजने के पीछे मकसद यह है कि बाद में वे ये न कहें कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इनकी मान्यता रद्द कर न्यायिक व्यवस्था का उल्लंघन किया है.

भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने एमपी और एमएलए के वकालत करने पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है. इससे पहले अश्विनी उपाध्याय ने लिखित रूप में बार काउंसिल से विधायकों और सांसदों को कोर्ट में बहस करने से रोकने का अनुरोध किया था. इसके पीछे उनका तर्क था कि ये जनप्रतिनिधि सरकार से वेतन, भत्ते व अन्य सुविधाएं लेते हैं, तो फिर उन्हें वकालत के जरिए अतिरिक्त आमदनी करने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए. याचिका में इस बात का जिक्र किया गया था कि कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के सदस्यों को एक वकील के रूप में वकालत करने की अनुमति नहीं है.

यह संविधान की भावना के विपरीत है. अश्विनी उपाध्याय कहते हैं कि बार काउंसिल में इस बात को उठाने के बाद भी जनप्रतिनिधियों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. नेताओं को बार काउंसिल के नोटिस का जवाब एक हफ्ते के अंदर देना था. लेकिन न ही कोई जवाब आया और न ही बार काउंसिल ने इसे गंभीरता से लिया. इतना ही नहीं, नोटिस पर आखिरी सुनवाई की तारीख 22 जनवरी रखी गई थी. लेकिन जब नोटिस का जवाब ही नहीं दिया गया है, तो फिर सुनवाई क्या होगी? इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है, जिसपर इसी हफ्‌ते सुनवाई हो सकती है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में भी जनप्रतिनिधियों के अदालत में केस लड़ने पर रोक लगाई गई थी. बीसीआई नियम 49 के अनुसार, कोई व्यक्ति, फर्म, निगम या सरकारी कर्मचारी एक वकील के रूप में अदालत में अभ्यास नहीं कर सकता है. अश्विनी उपाध्याय ने कोर्ट में सांसदों और विधायकों को वकील के रूप में अभ्यास करने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और बीसीआई अध्यक्ष के सामने भी अपना पक्ष रखा था. याचिका में इसका भी जिक्र है कि संसद या विधानसभाओं के सत्र के दौरान भी ये विधि निर्माता वकील के तौर पर कोर्ट में केस की पैरवी करते हैं. इस दौरान वे कोर्ट में ऐसे केस भी लड़ते हैं, जो अपने संगठनों, रिश्तेदारों और कॉरपोरेट घरानों के वित्तीय हितों से जुड़े मामले होते हैं.

मनन कुमार मिश्रा ने बताया कि कई बार लोगों के बीच यह चर्चा होती है कि जज ने फैसला सुनाने में पक्षपात किया है या दबाव में आकर फैसला दिया है. लोगों का ऐसा कहना है कि कोर्ट रूम में बड़े नेताओं के वकालत करने से उनके रुतबे का असर अप्रत्यक्ष तौर पर जज द्वारा लिए गए फैसले पर भी पड़ता है.

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