देश में आईटी एक्ट की जिस धारा 66ए को सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल पहले रद्द कर दिया, वो कानून की किताबों में न सिर्फ बरकरार है ‍बल्कि पुलिस उस धारा में मामले भी दर्ज कर रही है और निचली ‍अदालतें उस पर सुनवाई भी कर रही हैं। सुप्रीम कोई में इस कानून को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान हैरानी जताई कि रद्द होने के बाद भी इस धारा के तहत मामले कैसे और क्यों दर्ज हो रहे हैं? या यूं कहें कि बिना अग्नि के ही शादी के फेरे बेधड़क हो रहे हैं और किसी को इस पर कोई अफसोस या चिंता भी नहीं है। न्यायिक तंत्र की इस अव्यवस्था को एक न्यायाधीश ने अगर हैरतनाक से भी ज्यादा ‘भयावह’ कहा तो यह हमारे न्याय ‍और पुलिस तंत्र की कार्यशैली पर बहुत गंभीर टिप्पणी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि किसी को होश नहीं है कि कानून की कोई धारा अगर रद्द् हो चुकी है तो वह कानून की किताबें में बरकरार कैसे है? उसे कौन हटाएगा या संशोधित करेगा? यदि किताबों में संशोधन का उल्लेख है भी तो इतना अदृश्य सा क्यों है कि किसी की निगाह में ही नहीं आता? और अगर 6 साल बाद भी कानून की किताबों से वह धारा हटी नहीं है तो क्या उसे हटाने का काम भी क्या सुप्रीम कोर्ट का है? यह काम भी यदि सुप्रीम कोर्ट का है तो बाकी न्याय तंत्र और पुलिस तंत्र का काम क्या है?

यह वाकई गंभीर मसला है। क्योंकि पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन आॅफ सिविल लिबर्टीज) द्वारा दायर याचिका में कहा गया है देश में रद्द की गई धारा के तहत 11 विभिन्न राज्यों में 745 मामले दर्ज किए गए हैं। जबकि सर्वोच्च अदालत ने इस धारा 66 ए को 24 मार्च 2015 में ही रद्द कर दिया था। इस धारा के तहत किसी को भी कंप्यूटर या किसी अन्य अन्य संचार उपकरण जैसे मोबाइल फोन या टैबलेट के माध्यम से संदेश भेजने के लिए अधिकतम तीन साल की जेल सजा हो सकती थी। इसी धारा के तहत पुलिस को अपने विवेक के अनुसार ‘आक्रामक’ या ‘खतरनाक’ के रूप में या झुंझलाहट, असुविधा आदि के प्रयोजनों के लिए गिरफ्तारी करने का अधिकार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को ‘असंवैधानिक रूप से अस्पष्ट’ कहा था। इसके बावजूद यह धारा कानून की किताबों में बनी हुई है और पुलिस इसके अंतर्गत मामले दर्ज करती जा रही है। सर्वोच्च अदालत की कड़ी टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि आईटी अधिनियम का अवलोकन करने पर देखा जा सकता है कि धारा 66ए उसका हिस्सा है और नीचे टिप्पणी है, जिसमें लिखा है कि इस प्रावधान को रद्द कर दिया गया है।

कोर्ट के आश्चर्य जताने के बाद वेणुगोपाल ने सफाई की मुद्रा में कहा, ‘जब पुलिस अधिकारी को मामला दर्ज करना होता है तो वह धारा देखता है और नीचे लिखी टिप्पणी को देखे बिना मामला दर्ज कर लेता। अब हम यह कर सकते हैं कि धारा 66ए के साथ ब्रैकेट लगाकर उसमें लिख दिया जाए कि इस धारा को निरस्त कर दिया गया है। हम नीचे टिप्पणी में फैसले का पूरा उद्धरण लिख सकते हैं।’ इस पर कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि जो धारा रद्द हो चुकी है, उसकी सूचना सभी जिला अदालतों को भेजें। ताकि किसी भी व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले किसी भी प्रतिकूल परिणाम का सामना न करना पड़े।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के ठाणे जिले के पालघर में सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर दो लड़कियों-शाहीन ढाडा और रिनू श्रीनिवासन को गिरफ्तार किए जाने के बाद अधिनियम की धारा 66ए में संशोधन के लिए कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने भारत सरकार के ‍िखलाफ पहली बार 2012 में इस मुद्दे पर जनहित याचिका दायर की थी। शाहीन और रिनू ने शिवसेना नेता बाल ठाकरे के निधन के मद्देनजर मुंबई में बंद के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। तब जस्टिस जे. चेलमेश्वर और आरएफ नरीमन की पीठ ने व्यक्ति के विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘मौलिक’ बताते हुए कहा था, ‘जनता का जानने का अधिकार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए से सीधे प्रभावित होता है।’
गजब बात यह है कि पुलिस इन धाराओ के तहत आरोप पत्र भी दायर कर रही है और निचली अदालतें उन पर सुनवाई भी कर रही हैं। कर्नाटक में एक ऐसे ही मामले की सुनवाई हुई, जिसमें अतंत: आरोपी बरी हुआ। बताया जाता है कि महाराष्ट्र में इस रद्द हो चुकी धारा के तहत सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए हैं। उसके बाद यूपी का नंबर है। ये सभी मामले कोर्ट में चल रहे हैं।

इस पूरे प्रकरण से यह खुलासा होता है कि पुलिस और न्याय व्यवस्था कितने तदर्थ भाव से काम करती है। जो चल रहा है, सो चल रहा है। किसी ने यह जानने की जुर्रत नहीं कि जो धारा पहले ही खारिज हो चुकी है, उसके तहत चार्ज शीट कैसे दी जा सकती है और मुकदमा कैसे चल सकता है? सर्वोच्च अदालत के फैसलों की रोशनी में कानून की किताबों में तत्काल संशोधन सरकार की ‍जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी का पालन सु‍निश्चित हो रहा है या नहीं, यह देखने का काम कार्यपालिका और न्यायपालिका का है। अगर कानून की किताबों में संशोधन तत्काल हो गया होता तो सैंकड़ों लोगों को इन धाराओ के तहत पुलिस प्रताड़ना का बिकार नहीं होना पड़ता। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश में लोकतंत्र होना ही काफी नहीं है, लोकतंत्र को संचालित करने वाली संस्थाओ का मानस भी लोकतांत्रिक होना चाहिए। और यह भी कि कानून लोगों को न्याय दिलाने के लिए है न कि उन्हें अपराधी साबित करने के लिए है।

अभी तो केवल धारा 66ए का मामला ही उजागर हुआ है। अतीत में कई ऐसी धाराएं हैं, जिन्हें सर्वोच्च अदालत ने ‘असंवैधानिक’ मानकर रद्द किया, उनमें से कितनी अभी भी प्रचलन में है और ऐसी रद्द हो चुकी धाराओ में कितने मामले दर्ज हुए हैं या हो रहे हैं, इसका आंकड़ा अगर सामने लाया जाए तो पूरी व्यवस्था की पोल खुल जाएगी। अब हर आरोपी के सामने यह पुष्टि करने की चुनौती भी होगी कि जिस धारा के तहत उसे आरोपी बनाया गया है, वह ‘संवैधानिक’ है भी या नहीं? वैसे भी हर सामान्य व्यक्ति कानून का ज्ञाता नहीं होता।

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