जाने कब और कैसे
आटे के साथ गुथते-गुथते
सब्जियों के साथ छिलते -कटते
परदों पर झूलते हुए
तस्वीरों पर लटके हुए
एक औरत की धूरी ठहर जाती है…

खुद उसे भी पता नहीं चलता

की वो कब…..???

चादरों में फोल्ड हो गयी

लंच बाक्स में पैक हो गयी

और……..

और थालियों में परोस दी गयी
बस कैलेंडर ::::::::::
बदलते चले जातें हैं
रिश्ते फैलते चले जातें हैं
और औरतें……
उबलती रहती हैं
चूल्हे पर दूध के जैसी

कभी शिशु की बोतल में

भर जाने को

तो कभी चाय में
मिल जाने को

कभी खीर तो कभी

दही हो जाने को
बनी रहती हैं द्वारपाल
उस बिन्दु की सदैव
जो खींचती है रेखा
अतीत को वर्तमान
और वर्तमान को भविष्य बनाने को…
अपनी गंध, त्याग और
प्रेम तपस्या से
युगों- युगों तक महकाने को…..
कुछ जो मचल जाती हैं पंख लगाने को
दृन्ढ़ भावों के रंग जीवन में सजाने को
कोख संग कार्यालय हर भार उठाने को
उड़तीं हैं – गिरतीं हैं – संभलती हैं सदा
धूरी से उठकर धूरी पर टिक जाने को……

संजना तिवारी

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