हमारे ताज अजायब घरों में रक्खे हैं…

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नूह आलम,हिस्टोरियन और शायर

एक दोस्त ने मुझसे सवाल किया, हालांकि सवाल कुछ ख़ास लंबा नहीं था, लेकिन मैं फलेश बेक में चला गया…..और दिमाग़ पूरे 90 डिग्री घूम कर पिछले 250 साल का सफर तय कर के आ गया। हालांकि उसका सवाल अब भी सवाल ही है, क्योंकि जवाब के लिए पूरी एक रात और एक दिन तक सोचने के बाद भी मैं उसे राहत इंदौरी के एक शेर का एक मिसरा(लाइन) ही सुना पाया- “हमारे ताज अजायब घरों में रक्खे हैं….”

और राहत का पूरा शेर है- “हमारे सर की फटी टोपियों पे तंज ना कर/ हमारे ताज अजायब घरों में रक्खे हैं…” । दरअसल राजशाही ख़ानदान से तआल्लुक़ रखने वाले मेरे उस दोस्त ने मेरी पगड़ी पहनी हुई एक तस्वीर देख कर कहा, कि पगड़ी आप पर बहुत फबती है, लेकिन ये तो एक आम पगड़ी है, क्या आपके पास पूर्वजों की कोई कमख़ाब-ज़री की रत्नजड़ित राजशाही पड़गी नहीं है ? उसमें कोई तस्वीर लीजिए और वो लगाइये अपनी प्रोफाइल पर…। वैसे मैं उसे सीधे भी जवाब दे सकता था, लेकिन दोस्त की दोस्ती में गांठ पड़ जाती। इसीलिए शायरी का सहारा लेना पड़ा।

अब उस मासूम को मैं कैसे ये समझाता कि पूर्वजों की पुरानी कमख़ाब और ज़री की रत्नजड़ित पगड़ियां सिर्फ उन्हीं रॉयल्स के पास आज तक महफूज़ हैं, जिन के पूर्वजों ने उन पगड़ियों को अंग्रेजों के पैरो में रख दिया था और अंग्रेज़ ने उन्हें “योर हाइनेस” संबोधित कर पगड़ी वापस उनके सर पर सजा दी थी, इसलिए जब अंग्रेज़ यहां से गए तो अपने साथ नहीं ले गए, “हिज़ हाइनेस” के सर पर ही छोड़ गए। दूसरी तरफ जो सर अंग्रेज़ के आगे नहीं झुके, वे या तो काट दिए गए या धोखे से कटवा दिए गए और आज भी उनके सरों के वो ताज, वो पगड़ियां लंदन के म्युज़ियम की शोभा बढ़ा रही हैं।

लंदन के म्युज़ियम में कोहिनूर जड़ित ब्रिटिश रानी का ताज रखा है….ताज तो उनका ही है, लेकिन कोहिनूर वे महाराजा रणजीत सिंह से लूट कर ले गए थे। टीपू सुल्तान के सर की पगड़ी भी आपको वहां मिल जाएगी। सिर्फ पगड़ी ही नहीं बल्कि टीपू से जुड़ी तो कई बेशक़ीमती निशानियां वहां हैं। नाना साहब पेशवा की पगड़ी और उनसे जुड़ी कई चीजें, बहादुर शाह ज़फर के सर का ताज और तख़्त, रानी झांसी की सोने-चांदी की ज़री की साड़ियां और महाराज कि मराठा पगड़ी, चुरू के महाराज के आभूषण, बांदा के नवाब की तलवारें, नजीबाबाद के नवाब की टोपी, अवध के नवाब की शाही बंदूकें, सतारा के छत्रपती महाराज की पगड़ी के अलावा और भी बहुत सी निशानियां जो उन राजाओं-नवाबों से लूटी गईं, जो अपनी मिट्टी और उसके अस्तित्व के लिए अंग्रेजों से लड़े और फना हो गए।

ये तो बात हुई ब्रिटिश म्युज़ियम की, अब बात ज़रा यहां की भी कर लें, तो यहां भी उस पुराने वक़्त का कुछ कम नहीं है, लेकिन सिर्फ 10 फीसद ही म्युज़ियमों में हैं। बाकी का सब आज भी उसी ठाठ-बाठ के साथ राजशाही वारिसों के पास ही हैं। फिर चाहे वो डाइनिंग टेबल पर खाना परोसने वाली चाँदी की ट्रेन हो या कमख़ाब-ज़री और रत्नजड़ित राजशाही पगड़ियां। बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, इस राजसी शानो-शौक़त के साथ रुतबा भी क़ायम है और उन पगड़ियों को पहनने वाले सर भी। यानी आज भी उन राजाओं-नवाबों के वारिसान उसी आन बान शान के साथ जी रहे हैं, जिस आन बान शान से उनके पूर्वजों ने अंग्रेज़ों के क़दमों में अपने मुल्क को रख दिया था, वो भी सिर्फ अपने राज्य को अंग्रेज़ हुकूमत द्वारा “प्रिंसली स्टेट” और “गन सेल्यूट” का दर्जा मिल जाने की शर्त पर।

लेकिन अफसोस इस बात पर होता है कि जिन राजे-रजवाडों ने अपनी मिट्टी का सौदा, अपने मुल्क का सौदा नहीं किया ….अपने मुल्क के लिए लड़े और अपना सब कुछ अंग्रेजों और ग़द्दारों से लड़ कर फना कर दिया और जिनकी पगड़ियां और निशानियां अंग्रेज़ ले गए, उनकी पगड़ियों को पहनने वाले सर भी आज ढूंढे से नहीं मिलते। उनके वंशज कहां हैं, किस हाल में हैं, इसकी किसी को ना तो ख़बर है और ना ही परवाह। ये वो राजे-रजवाड़े थे, जिनकी जागती आंखों ने ख़ुद को मुल्क की ख़ातिर तबाह करते वक़्त ये ख़्वाब देखा था कि, एक वक़्त तो ऐसा आएगा, जब ये ज़ालिम अंग्रेज़ इस मुल्क से दफा होंगे, तब अपनी धरती होगी और अपना राज होगा, हम फिर से सुर्ख़ रूह होंगे। वतन पर जान देने वाले यहां के लोग और आने वाले आज़ाद मुल्क के हुक्मरां हमारी पगड़ियां फिर हमारे सर पर सजाएंगे…. राजशाही ना भी होगी तो इज़्ज़त और रुतबा तो होगा….लोग ये तो कहेंगे कि ये जो लोग हैं, इन्हीं की वजह से आज हम आज़ादी की सांस एक आज़ाद मुल्क में ले रहे हैं।

लेकिन….फिर अफसोस, कि उनकी जागती आंखों ने जो ख़्वाब देखा था, वो ख़्वाब ही बन कर रह गया। आज उनकी नस्लों की तबाही और बर्बादी की दास्तानें तक भुला दी गई हैं। उनकी पहचान तक कर पाना मुश्किल हो गया है। कई तो ऐसे हैं, जिनके सर पर आम पगड़ी तक नहीं है और कई ऐसे, जिनकी नस्लों के तो सर भी नहीं बचे हैं।

दूसरी तरफ वो हैं, जो अंग्रेजों से हाथ मिला कर, अपने मुल्क के वफादार लोगों को बर्बाद करने में अंग्रेज़ों का साथ देकर न सिर्फ अपनी पगड़ियां बचाने में कामियाब रहे, बल्कि माल ओ दौलत, शान ओ शौक़त…..”प्रिंसली स्टेट” का दर्जा और गन सेल्यूट भी हासिल करने में कामियाब रहे….और अंग्रेज़ी हुकूमत के वक़्त में जिनकी राजशाही (रॉयल्टी) अंग्रेज़ी दूध-घी पी कर इतनी तंदरुस्त और मज़बूत हो गई, कि वे अंग्रेजों के जाने के बाद भी आज़ाद मुल्क के हुक्मरानों को अपनी शर्त पर झुकाते रहे। अपने पैसे और रुतबे के दम पर बड़े-बड़े सरकारी ओहदे हासिल किए….अपने अंग्रेज़ों द्वारा बर्बाद कर देने से बचाए हुए क़िले और महलों को रिसॉर्ट्स में तब्दील कर व्यापार भी कर रहे हैं और करोड़ों कमा रहे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि राजनीति में भी पीछे नहीं हैं, बल्कि आज भी इस आज़ाद मुल्क की आज़ाद राजनीतिक पार्टियों को ब्लैकमेल करते हैं और राजनीति में अपनी आन बान शान के साथ उन्हें निगोशिएट करने में क़ामियाब हैं।

मेरा मन सिर्फ अफसोस नहीं करता है, बल्कि रोता भी है, लेकिन रोते रहने से कुछ हासिल नहीं होने वाला…. तो मैंने एक मुहीम शुरू करने की सोची है…मुल्क की ख़ातिर सिर्फ अपनी जानें ही नहीं बल्कि अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाले सिर्फ राजे-रजवाड़े ही नहीं, बल्कि आम क्रांतिकारियों के घरानों का इतिहास दुनिया के सामने लाया जाए। सिर्फ इतिहास ही नहीं बल्कि उनके वंशजों को ढूंढा जाए और उनके सर पर फिर उनकी पगड़ियां पहुंचाई जाएं। भले ही वे पगड़ियां कमख़ाब-ज़री और रत्नजड़ित ना हों, लेकिन उनमें उस राजशाही की इज़्ज़त, बलिदान और रुतबा जड़ा हुआ हो। आप सब भी इस मुहीम से जुड़ें और हक़दारों तक उनका हक़ पहुंचाने में मदद करें।

अगले लेख से मुहीम ही शुरुवात होगी और सबसे पहले झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के वंशजों का इतिहास, हाल और ब्यौरा लेकर आऊंगा। फिर उनकी पगड़ी उनके सर तक पहुंचाने की जवाबदारी आपकी है….

नोट- सोशल मीडिया एक बेहतरीन माध्यम है अपनी बात सब लोगों तक पहुंचाने का। इसे हल्के में ना लें, बस कोशिश करें कि जो बातें और कोशिशें इस माध्यम से हो रही हैं, उन्हें अमली जामा पहनाया जाए। शुक्रिया….

 

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