farmer-tearsनासिक के लासलगांव स्थित देश की सबसे बड़ी प्याज मंडी में आजकल प्याज और किसान अपनी किस्मत पर रोते दिख रहे हैं. दूसरों को रुलानेे वाला प्याज इसलिए रो रहा है कि उसे खरीदार नहीं मिल रहे, तो वहीं किसान अपनी किस्मत को कोस रहे हैं. किसानों की भी अजीब विडंबना है. कभी उत्पादन न होने से मारे जाते हैं तो कभी उत्पादन ज्यादा होने से. लेकिन सवाल यह है कि ऐसा किसानों के साथ ही क्यों होता है? क्या आपने कभी सुना है कि दूध का उत्पादन बढ़ जाने से उसकी कीमत घट जाती हो, या शराब का उत्पादन बढ़ जाने से उसे कंपनियांं मुफ्त में बांटने लग जाएं या सड़क पर फेंकने लगेंे. ऐसा सोच पाना भी मुश्किल है. लेकिन, गेहूं का उत्पादन ज्यादा हो जाए तो मूल्य घट जाता है, सरकारी गोदामों में पड़े-पड़े गेहूं सड़ने लगता है. प्याज का उत्पादन बढ़ जाए तो किसानों को अपना उत्पाद फेंकने पर मजबूर होना पड़ता है. ऐसा इसलिए, क्योंकि एक तरफ तो उत्पादन बढ़ा है, दूसरी तरफ निर्यात पर सीमित अंकुश होने और विदेशों से मांग में कमी होने की वजह से महाराष्ट्र के किसानों को प्याज पर अपनी लागत मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है. खबरों के मुताबिक, नासिक में किसान प्याज से भरा ट्रक मंडियों में छोड़ रहे हैं, क्योंकि व्यापारी उनके प्याज की कीमत दो-तीन रुपये प्रति किलोे दे रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा दस रुपये किलोे, जबकि किसानों की लागत ही प्रति किलो 15 रुपये से अधिक है. गौरतलब है कि पिछले साल यही प्याज 63 रुपये प्रति किलो बिका था और इस बार अधिकतम दस रुपये.

नासिक जिला अकेले पूरे देश का करीब दस फीसदी प्याज उगाता है. यहीं का लासलगांव देश का सबसे बड़ा प्याज का मंडी है. इस इलाके के आसपास के क्षेत्र में पिछले 15 महीनों के दौरान करीब 26 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. एक समय इस मंडी से देश-विदेश जाने के लिए तैयार ट्रक प्याज से भरे होते थे, आज हालत यह है कि रोजाना यहां अधिकतम 15 हजार क्विंटल प्याज ही बिकने के लिए आ रहा है, जबकि पहले यह मात्रा 30 हजार क्विंटल से भी अधिक होती थी. कभी इस मंडी में 60 रुपये किलोे बिकने वाला प्याज आज सौ से सात सौ रुपए क्विंटल भी बमुश्किल बिक पा रहा है. औसतन, एक किसान को आज अपने उत्पादन लागत का दस से पांच गुना कम पैसा मिल रहा है. जाहिर है, इस हालात ने नासिक क्षेत्र के किसानों के हौसले को तोड़ कर रख दिया है. एक तो प्याज बिक नहीं रहा, दूसरी तरफ मानसून सिर पर दस्तक दे रहा है. बारिश में अगर प्याज सड़ता है, तो यह किसानों के लिए एक सदमा होगा. ऐसी स्थिति में बैंक और साहूकारों के कर्ज में फंसे प्याज उत्पादक किसान आत्महत्या भी कर सकते हैं.

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गौरतलब है कि पिछले एक साल के दौरान नासिक जिले में ही 35 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. लेकिन, इनके बारे में खबर लिखने या दिखाने की फुर्सत राष्ट्रीय मीडिया को नहीं है. न ही यह खबरें महाराष्ट्र से बाहर आ रही हैं. सवाल है कि तीन साल से सूखे के बाद जब किसानों ने गन्ना की जगह प्याज की खेती शुरू की तो रिकॉर्डतोड़ उत्पादन ने अब फिर से उनकी कमर तोड़ दी है. जाहिर है, अगले साल किसान प्याज की खेती करने से पहले सौ बार सोचेंगे. नतीजतन, अगले साल प्याज का उत्पादन कम हो सकता है, जिससे एक बार फिर प्याज किसानों की बजाय उपभोक्ताओं की आंखों में आंसू लाएगा. किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद सिंह हाल  ही में नासिक और लासलगांव क्षेत्र का दौरा कर लौटे हैं. उन्होंने चौथी दुनिया कोे बताया कि पूरे इलाके के प्याज उत्पादक किसानों की हालत दयनीय है.

वह बताते हैं कि 2014 तक 18 हजार टन प्याज का निर्यात हुआ जिससे किसानों को राहत मिली थी, लेकिन पिछले दो साल से प्याज के निर्यात पर आंशिक अंकुश होने से किसानों की हालत खराब हो रही है. वह कहते हैं कि मौजूदा सरकार द्वारा तत्काल कोर्ई निर्णय नहीं लिए जाने से किसानों को राहत नहीं मिल पा रही है. किसानों को अपना प्याज सौ रुपये क्विंटल तक बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है. हमें याद रखना चाहिए कि 50 फीसदी से अधिक प्याज इसी इलाके से आता है और अगर यहां के किसानों ने प्याज बोना छोड़ दिया तो क्या होगा? विनोद सिंह इस मामले में बिचौलियों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं. किसान मंच के स्थानीय नेता धनंजय धोर्डे बताते हैं कि किसानों ने ब्याज पर कर्ज लेकर और गहने गिरवी रखकर प्याज की खेती की थी. अब एक्सपोर्ट बंद है, दाम मिल नहीं रहा, किसान भला करे तो क्या? प्रति हेक्टेयर 25 से 30 हजार का नुकसान हो रहा है. राज्य और केंद्र सरकार हमारी कोई बात सुन नहीं रही है. हमारे पास आंदोलन करने के अलावा और भला क्या चारा बचा है?

प्याज की खेती का सच और भ्रम को लेकर एपीएमसी लासलगंव एपीएमसी के चेयरमैन नाना साहेब पाटील ने एक रिपोर्ट तैयार की है. यह रिपोर्ट कई ऐसे तथ्यों का खुलासा करती है जो बताती है कि प्याज उत्पादक किसानों की हालत क्या है और सरकार के लिए क्यों जरूरी है कि इस दिशा में एक ठोस नीति और योजना बनाए ताकि हर साल प्याज को लेकर होने वाले बवाल पर लगाम लग सके. यह रिपोर्ट बताती है कि जब 2014 में खुद सरकार ने यह घोषणा की कि ओलावृष्टि की वजह से 30 फीसदी प्याज बर्बाद हुआ, तब क्यों नहीं इसके मूल्य इस बार तय किए गए. इसके अलावा, प्याज को सरकार ने एसेंशियल कमोडिटी में तो शामिल कर लिया, लेकिन इसका एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) तय नहीं किया. फिर, जो प्याज स्टोर किए जाते हैं, वह भी आद्रता और बारिश की वजह से बर्बाद होते हैं. यह बर्बादी हर साल करीब 30 से 35 फीसदी होती है. मार्केट प्राइस तय करते वक्त इन कारकों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है. दूसरी बात यह कि बिना एमएएसपी घोषित किए प्याज कोे एसेंशियल कमोडिटी में शामिल किए जाने से भी प्याज उत्पादक किसानों पर नकारात्मक प्रभाव हुआ. एसेंशियल कमोडिटी के तहत किसी उत्पाद को स्टोर नहीं किया जा सकता है. जबकि, सर्वविदित तथ्य है कि प्याज एक मौसमी फसल है, जिसका इस्तेमाल साल भर होता है और बिना इसे स्टोर किए यह संभव ही नहीं है. एसेंशियल कमोडिटी एक्ट के तहत सरकार कभी भी किसी उत्पादक को किसी भी मूल्य पर आपूर्ति के लिए कह सकती है. ऐसे में, पहले से ही घाटा उठा रहे किसानों को क्या फायदा होगा?

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फिर भी कहते हैं, उत्पादन बढ़ाओ

2015-16 में प्याज का उत्पादन प्रति हेक्टेयर करीब 17 टन हुआ. एक और हिसाब देखिए. चीन हमारे मुकाबले प्रति एकड़ 22 टन और तुर्की 30 टन उपजा रहा है. यानी, हम अब भी चीन और तुर्की के मुकाबले बहुत कम प्याज का उत्पादन कर रहे हैं. यहां प्रति एकड़ 17 टन उत्पादन करने के बाद भी किसानों के हाथ खाली हैंै. सरकार इतने उत्पादन कोे भी संभालने में असफल रही. किसानों की हालत क्या हो गई, हम सब देख रहे हैं. एक तरफ सरकार कहती है, ज्यादा उत्पादन करो, जब किसान ज्यादा उत्पादन करता है तो वह अपनी लागत तक वसूली नहीं कर पाता. अगर उत्पादन कम हो तो उपभोक्ता महंगे उत्पाद से परेशान. उत्पादन अधिक हो तो बेचारा किसान परेशान. इस मर्ज का इलाज क्या है? 2013 के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में 44 हजार करोड़ रुपये के फल और सब्जियां उचित भंडारण के अभाव में सड़ गईं. यह जानकारी लोकसभा में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने दी थी. 2015 तक यह नुकसान 52 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया. 2012 में एक रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 290 लाख टन कृषि उत्पादों के भंडारण की सुविधा है, जबकि उत्पादन 610 लाख टन है. सवाल है कि जब हम अपने अन्न के भंडारण में भी अक्षम हैं तो फिर किस मुंह से हर बार कम उपज के लिए सूखा या अतिवृष्टि कोे जिम्मेदार ठहरा सकते हैंै. आज, जब प्याज हमारे पास अधिक है तो क्यों नहीं उसे सहेजने के लिए हमारे पास नीति, नीयत और सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन इस देश का किसान शायद धरती का सबसे निरीह प्राणी है, जिसके सिर अपनी हर गलती का ठीकरा फोड़ सरकारें पाक-साफ बनी रहती हैं.

प्रधानमंत्री चुनाव से पहले किसानों कोे लागत मूल्य पर 50 फीसदी अतिरिक्त लाभ देने की बात कर रहे थे, आज कहां गया वो 50 फीसदी अतिरिक्तलाभ. स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों का क्या हुआ? आज, अगर इन प्याज किसानों की मदद नहीं की गई तो महाराष्ट्र में एक और नया विदर्भ बनेगा. जाहिर है, इस सरकार में तत्काल निर्णय लेने की क्षमता नहीं है.

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-विनोद सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान मंच. 

हमारे किसानों की लागत ज्यादा हो गई है. खाद के दाम 300 प्रतिशत बढ़ गए हैंै. इसके बाद भी, खरीफ और रबी, दोनों फसलों के दौरान प्याज की लागत मूल्य तक नहीं मिल सका है. किसान लगातार लागत मूल्य से नीचे प्याज बेचने को मजबूर हैं. एक्सपोर्ट कम हो गया है. प्याज का कोई एमएसपी नहीं है. अनुदान की राशि मिलनी चाहिए, जो अभी तक मिली नहीं है.

-नाना साहेब पाटील, चेयरमैन, एपीएमसी, लासलगांव.

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