दो हजार चौबीस की दीवार पर लिखी इबारत हम देख रहे हैं। क्या आपको भी दिखाई दे रही है, क्या आप भी पढ़ पा रहे हैं। रोना, पीटना, बहाने लगाना, ईडी , चुनाव आयोग, गरीबों को राशन, गोदी मीडिया, एजेंसियां और न जाने क्या क्या। हर हारे हुए राज्य में हार के कई कई कारण हैं। लेकिन क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि झूठ और बेहूदा प्रचार की भाजपाई और मोदी शैली ने राहुल गांधी को, उनकी मुहब्बत की दुकान को और कांग्रेस को उत्तर भारत या हिंदी प्रदेशों में आने वाले समय तक के लिए नकार दिया है।
यह सही है कि सभ्य समाज मोदी को पसंद नहीं करता। उतना ही सच यह भी है कि इस सभ्य समाज की चुनाव में भागीदारी भी लेश मात्र की होती है। बरक्स इसके यह सोचिए कि देश का वोटर कौन है मध्य वर्ग, निम्न मध्य वर्ग और निम्न वर्ग। एक और भी वोटर है जिस पर आजादी के बाद पहली बार मोदी ने अपनी नज़र डाली और उसे अपनी ऊपरी चमक धमक से बौरा दिया। वह है पहली बार का वोटर । 18 साल का होने पर पहली बार वोट देने जा रहा युवा। इसका प्रतिशत कितना है। कांग्रेस यहां चूकी । कांग्रेस संगठन में चूकी। कांग्रेस बूथ लेवल पर काम करने से चूकी । केवल मुहब्बत की दुकान और भाषणबाजी से क्या हासिल होता है शायद अभी भी कांग्रेस की समझ नहीं आया होगा। मैंने एक बार नहीं कई बार लिखा है कि राहुल गांधी समझदार व्यक्ति हैं लेकिन वे राजनीतिक नहीं हैं।‌उनके बारे में जो कहा जाता है कि वे ‘नेचुरल पॉलिटिशियन’ नहीं हैं, यह एकदम सही बात है।‌ इसके बावजूद तमाम कांग्रेसी, मोदी विरोधी और बड़े बड़े पत्रकार राहुल गांधी से तमाम तरह की उम्मीदें पाले बैठे हैं। यह भी मैंने कई बार लिखा है कि उनकी ऐतिहासिक यात्रा पढ़े लिखे समाज से नीचे के समाज में किसी तरह की पैठ नहीं बना पायी। पता कीजिए छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में । यात्रा की भनक तक नहीं है किसी को। कांग्रेस को लड़ते हुए जो हम देख रहे हैं यह राहुल गांधी न भी होते तो भी बीजेपी के सामने कांग्रेस होती ही होती। पढे लिखे और उच्च मध्य वर्ग में यात्रा ने कांग्रेस को मजबूती दी है। बस इतना ही है। और हम देश का भ्रम पाले बैठे हैं। इसके बाद मांग उठी थी कि राहुल गांधी उन राज्यों में यात्रा करें जिनमें चुनाव होने वाले हैं। क्या हुआ उसका । सच तो यह है कि कांग्रेस की कोई रणनीतिक मुहीम रही ही नहीं।
पिछली बार मैंने लिखा था कि यदि विपक्ष पांचों राज्य जीत भी जाए तो भी चौबीस मोदी के नाम होगा। ऐसा क्यों होगा बताने की जरूरत नहीं, इस पर कई बार लिखा जा चुका है। अब इस हार के बाद आप चौबीस की कल्पना कीजिए। मान कर चलिए कि कांग्रेस ने चौबीस की लड़ाई मोदी के लिए बहुत आसान कर दी है। फिर भी न मोदी और न आरएसएस इस लड़ाई को आसान मानने वाले हैं। देश के नक्शे पर नजर डालिए और देखिए वह कितना भगवा हो चुका है। दक्षिण भारत को फिलहाल छोड़ दीजिए। अपनी युवावस्था से मोदी अपनी महत्वाकांक्षाओं को मन में समेटे हुए उत्तर भारत और हिंदी प्रदेशों को बड़े कूटनीतिक और हर पैंतरे के साथ समझ रहे हैं। उन्होंने यह अच्छी तरह समझा है कि जो पार्टी उत्तर भारत पर राज करेगी वही देश पर राज करेगी। मोदी ने अपना डंका तरह तरह से बजवाया।‌देश में और विदेशों में उनके आईटी सेल ने ‘मोदी मोदी’ के नारों के साथ मेहनत की । लोकतंत्र के मानदण्डों पर जो नहीं होता है और नहीं होना चाहिए ,वह सब किया।‌ यहां तक कि कांग्रेस को खलनायक की तरह पेश करके जनता में उसके प्रति नफरत के बीज बोये। मर्यादा, नैतिकता और सत्य की राह पर चलना यह मोदी की शैली में नहीं है। सब कुछ अमर्यादित और अलोकतांत्रिक। सारा देश समझा लेकिन कांग्रेस के लोग समझ कर भी नहीं समझे और नकली समाज में मुहब्बत की दुकान खोलने की बात कर बैठे। यह गांधी का समय नहीं है। ज़ालिम को परास्त करने के लिए समाज का निर्माण अपने अनुकूल करना पड़ता है। लेकिन कांग्रेस लुटियंस दिल्ली की आबोहवा में ही रही । हर तरह से कमजोर है आज हमारा विपक्ष।
किसी ने कहा फासिस्ट ताकतों से मुकाबला करने के लिए एक स्टालिन चाहिए। बेतुकी सी बात है।‌ मेरा सवाल आज भी अनुत्तरित है कि मोदी सरकार को बेनकाब करने के लिए सिविल सोसायटी के लोग गांव गांव, शहरों शहरों में क्यों नहीं गये। जब हर्ष मंदर और उनके लोग ‘कांरवा- ए-मुहब्बत’ के जरिए देश भर में घूम सकते हैं तो इस सरकार के खिलाफ एक मिशन के रूप में क्यों नहीं यात्रा की जा सकती। आज भी असंगठित क्षेत्रों में सबसे ज्यादा जरूरी है घूम घूम कर मोदी सरकार का ‘सच’ बताना।
देश का सबसे ज्यादा सत्यानाश हुआ है सोशल मीडिया से। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया के समानांतर चैनलों से। इस सोशल मीडिया ने सबसे ज्यादा कुंद किया है सड़कों पर होने वाले संघर्षों को। किसान आंदोलन ने जो आस जगाई थी वह धुआं धुआं होकर रह गई। सोशल मीडिया के कुछ चैनलों या वेबसाइट्स को छोड़ दें जैसे वायर, प्रिंट, क्विंट, स्क्रॉल या न्यूज लॉण्ड्री जैसे तो बाकी ने क्या किया। ‘सत्य हिंदी’ एक चर्चित नाम है। पर सत्य हिंदी के कार्यक्रमों का स्वरूप क्या है। एक एंकर और चार छ घिसे पिटे पत्रकार। ऐसे पत्रकारों पर कल रवीश कुमार ने अपने वीडियो में टिप्पणी की है। ये लोग कहीं जाते नहीं, ऊपर ही ऊपर घूमते हैं। अपने दोस्तों से थोड़ा बहुत फीडबैक ले लेते हैं और शाम की चर्चाओं में अपनी भड़ास निकाल देते हैं। हमारे विचार में तो सत्य हिंदी की दुकान अब बंद हो जानी चाहिए। वे क्या दे रहे हैं समाज को। हर राज्य के अपने चैनल हैं और अपना मीडिया है। लोग आपसे क्या लें और क्या सीखें। बस मोदी विरोध। इस मोदी विरोध ने ही सब कबाड़ा किया है। मोदी सरकार पर इतने सारे गम्भीर सवाल उठे – राफेल से लेकर अडानी तक। न विपक्ष और न ये सोशल मीडिया कुछ कर सका । अब और खतरनाक समय आ रहा है। ऐसे नहीं तो मोदी सरकार ही अपने निरंकुश तरीकों से सोशल मीडिया के इन चैनलों पर लगाम लगा देगी । तैयारियां कई दिनों से शुरु हो चुकी हैं।
इंडिया गठबंधन 6 दिसंबर को दिल्ली की मीटिंग में क्या करेगा, देखना है। कहा जा रहा था कि आगामी चुनावों में सीट शेयरिंग से इस सरकार को परास्त किया जा सकता है। लेकिन हमें तो अब यह भी खटाई में पड़ता नजर आ रहा है। बीजेपी इसी में सेंध लगाएगी।‌ एक के मुकाबले एक का तोड़ निकालेगी बीजेपी। इससे भी ज्यादा जरूरी है बूथ मैनेजमेंट। क्या ये लोग करेंगे। जब चारों ओर मोदी मोदी की गूंज हो और राम मंदिर का कभी न रुकने वाला शोर हो तो ऐसे में क्या रणनीति बनाएगा विपक्ष। चालाक आदमी सन्नाटे को भी शोर में इस कदर बदल देता है कि आप डिप्रेशन से निकल कर नाचने लगें। इस भारत को समझिए। नेहरू को छोड़ दीजिए। उनके पास कम समय रहा। लेकिन इंदिरा गांधी के बाद से गरीब और मजलूम की किसने सुध ली । गरीब को गरीब बनाये रखना जो तब से शुरु हुआ वह आज तक चल रहा है लेकिन मोदी ने बड़े शातिर तरीके से इस गरीब की नजर पर ऐसा परदा डाल दिया है कि वह मोदी के सिवा किसी और को देखता ही नहीं। उसे लोकतंत्र और संविधान नहीं पता लेकिन वोट की कीमत पता है और वह भी मोदी के पक्ष में। क्या विपक्ष इन सब बातों को सलीके से समझता है।
फिर कहता हूं राहुल गांधी पर लट्टू होने वाले पत्रकार खुद के आईने को साफ करें। आरफा खानम शेरवानी से जयपुर में एक लड़की राहुल गांधी के बारे में आक्रामक तरीके से कह रही थी वह ‘डिज़र्व’ ही नहीं करता है। आरफा ने कहा वे तिरेपन साल के हो गये हैं फिर भी तुम ऐसा कह रही हो फिर उसने उतना ही जोर देकर कहा – जब वो ‘डिज़र्व’ ही नहीं करता है तो …. हमारे वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग राहुल गांधी को महान नेता स्वीकार करते हैं। हमारा तो सुझाव है श्रवण जी को इंडिया गठबंधन का सलाहकार हो जाना चाहिए। जिंदगी न ठहरी है, न ठहरेगी। हम चौबीस में शर्तिया मोदी का एकछत्र राज देखेंगे। लेकिन इतना तय है हर किसी नेता और हर सत्ता की उम्र तय है। भारत की राजनीति फीनिक्स पक्षी की तरह अपनी आग से फिर पनपेगी और स्वच्छ तरीकों से हम नयी राजनीति देखेंगे। इतिहास चक्र इसी को कहते हैं। फिलहाल तो राष्ट्रवादियों की क्रूर सत्ता को देखने और भुगतने के लिए तैयार रहिए। इमरजेंसी से भी ज्यादा भयानक दौर चलने वाला है। डराना उद्देश्य नहीं है हमारा, सिर्फ सतर्क करना है।

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