115b348c-9c4c-4a85-bb00-229उत्तर प्रदेश पुलिस की सुस्त चाल अपराधियों को पकड़ने में नाकाम रही है. पहले अपराधी पुलिस से घबराते थे, अब पुलिस अपराधियों से घबराती है. उसे अपनी वर्दी छिन जाने का डर हमेशा सताया करता है. डरे भी क्यों न, क्योंकि अपराधियों के तार ऐसे ताकतवर नेताओं एवं अधिकारियों से जुड़े होते हैं, जो कहीं न कहीं मददगार साबित होते हैं. इससे अपराधियों के हौसले बढ़े हुए हैं. उन्हें वर्दी का कतई खौफ नहीं है. गलती होने के बाद भी वे उलटे पुलिस पर रौब जमाते हैं. पुलिस सब कुछ जानते हुए भी उन पर हाथ डालने से कतराती है. यह सबको मालूम है कि अगर पुलिस अपने पर आ जाए, तो वह क्या नहीं कर सकती. लेकिन, पिछले कुछ समय से प्रदेश की राजनीति में दागियों की पौ बारह होने से अपराधियों को शह ज़्यादा मिली है, जिसके चलते आम जनता में डर की भावना पैदा हुई है.
पुलिस की कार्यशैली पर निगाह डालें, तो थानों में ठेकों की तरह काम करने वाले दबंग पुलिसकर्मी आम जनता को कतई तरजीह नहीं देते. मोटी पगार पाने के बाद भी वे उगाही से बाज नहीं आते. लालच का आलम यह कि वे लाश को भी नहीं छोड़ते. क़ानून की रखवाली करने वाले पुलिसकर्मी अगर कफन पर वसूली छोड़कर ईमानदारी की रोटी खाने की आदत डाल लें, तो क़ानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार हो सकता है. अगर वे चोरी, छिनैती, राहजनी, मार-पीट अथवा इसी तरह की अन्य छोटी-मोटी वारदातों की गंभीरता से सुनवाई कर लें, तो मजाल कि उनके क्षेत्र में क़ानून व्यवस्था बिगड़े. छोटे-मोटे अपराधी पुलिस की अनदेखी के चलते बड़े गिरोह बनाकर बैंक, ट्रेन, सर्राफे एवं मॉल्स दिनदहाड़े लूट रहे हैं.
जनता को सचेत करने के लिए थानों की दीवारों पर दलालों से बचने के लिए मोटे-मोटे अक्षरों में सुझाव लिखे रहते हैं. आख़िर जनता दलालों का सहारा क्यों लेती है? दरअसल, मित्र पुलिस का चोला ओढ़ने वाले खाकीधारियों पर आम जनता को भरोसा नहीं है. न्याय पाना तो दूर, प्राथमिकी दर्ज कराने में ही उसे लोहे के चने चबाने पड़ जाते हैं, एड़ियां घिस जाती हैं. दलालों की शरण मजबूरी है. ऐसे में सुशासन की मंशा जताने वाली अखिलेश सरकार भ्रष्टाचार के इस बड़े संजाल को कैसे काट सकेगी?
गुजरात मॉडल का नाम सुनकर सपा प्रमुख चिढ़ते ज़रूर हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वहां का बच्चा-बच्चा सुरक्षित है. जेवर से लदी युवतियों को अकेले बाहर निकलने में डर नहीं लगता, लेकिन उत्तर प्रदेश में क़दम-क़दम पर डर है. कागजों को दुरुस्त करने में ही जुटी रहने वाली पुलिस आम आदमी को कम, अपनी नौकरी बचाने में ज़्यादा लगी रहती है. लोगों की परेशानियां सुनने के लिए उसके पास वक्त नहीं है. दूसरी बात यह कि थानों में पुलिसकर्मियों की खासी कमी है, वे हर रोज वीआईपी लोगों की सुरक्षा व्यवस्था तय करने में ही लगे रहतेे हैं. 2012 में ही अखिलेश सरकार ने पुलिस महकमे में कई आमूलचूल परिवर्तन किए. सरकार ने पुलिसकर्मियों से हमदर्दी जताते हुए सहूलियत देने के लिए उन्हें उनके गृह जनपद के निकट तैनाती कर फरमान जारी कर दिया, लेकिन यह फरमान सरकार के लिए सिरदर्द साबित हुआ. गृह जनपद के निकट तैनात खाकीधारी जनता की सुरक्षा की बजाय सगे-संबंधियों के साथ जमीनों, रंजिश के मामलों एवं अन्य गतिविधियों में रुचि लेने लगे. उनकी शह के चलते अपराध बढ़ गए. 1986 से 2012 तक पुलिस आपराधिक वारदातों में उतनी लिप्त नहीं पाई गई, जितनी सपा सरकार में छूट मिल जाने से.
बदायूं कांड की गूंज दिल्ली तक सीमित नहीं रही, बल्कि बीबीसी लंदन, डेली मेल और न्यूयार्क टाइम्स ने भी उसे प्रमुखता से छापा. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस मामले पर चिंता जताई है. महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर चौतरफ़ा घिरी अखिलेश सरकार ने दो सिपाहियों को बर्खास्त कर पीड़ित परिवारों को पांच-पांच लाख रुपये एवं सुरक्षा देने और फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाने का निर्णय लिया है. कांग्रेस और बसपा ने भी चिंता जाहिर की है. आईजी एसटीएफ का कहना है कि 60 से 65 प्रतिशत घटनाएं उस वक्त होती हैं, जब महिलाएं शौच के लिए जाती हैं. वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत इसे निराधार बताते हुए कहते हैं कि कल वह स्कूल जाने को लेकर भी ऐसा कह सकते हैं. कांग्रेस के नसीब पठान ने कहा कि यह घटना दबंग लोगों को राजनीतिक संरक्षण दिए जाने और पुलिसिया मिलीभगत का परिणाम है.
बसपा प्रमुख मायावती ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन और बदायूं मामले की सीबीआई जांच की मांग की है. उन्होंने कहा कि प्रदेश में अराजकता का माहौल है. अपराधी खुलेआम मनमानी कर रहे हैं. केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भी बदायूं कांड में शामिल आरोपियों को सख्त सजा देने और देश के हर ज़िले में रेप क्राइसिस सेल खोले जाने की मांग की. बदायूं कांड से उत्तर प्रदेश पुलिस के काले कारनामों का एक बार फिर खुलासा हुआ है. जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो कौन करेगा इतने बड़े प्रदेश की सुरक्षा? हैरत की बात यह रही कि जिस समय बदायूं कांड को लेकर पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा हुआ था, तभी आजमगढ़ में भी 17 वर्षीय दलित बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना घटित हो गई. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, आपराधिक घटनाओं के मामले में उत्तर प्रदेश 22वें स्थान पर है. क़ानून व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अब खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पुलिस अधिकारियों की परफॉर्मेंस की पड़ताल करने में जुट गए हैं.

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