दुनिया के सभी मनुष्यों के बीच में समन्वय स्थापित करने के लिए ही, गुरू नानक देव जी का आजकी तारीख को जन्म हुआ है. विनम्र अभिवादन
कार्तिकी पुर्णिमा 5 नवंबर मतलब गुरु नानक देव जी का जन्म दिन है. इसे प्रकाश पर्व भी कहा जाता है. नानकदेव जी ने जाति – धर्म के नाम पर चल रहे झगडो के खिलाफ आजसे साढ़े पांचसौ साल पहले बोला है. उसके लिए उन्होंने अपने 70 साल के जीवन में मक्का – मदीना से लेकर वाराणसी, बंगाल, आसाम तथा भारत के सभी राज्यों की यात्रा की है. लेकिन आज साडे पाच सौ सालो के पश्चात क्या नजारा है ? उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हम सभी साथियों को उन्होंने दिखाऐ हूऐ मार्ग से पुनः सक्रिय होकर सांप्रदायिकता तथा जातिवाद और सभी तरह की विषमताओं के खिलाफ लामबंद होना चाहिए.
हालाकी नानकदेव जी ने तो सांप्रदायिकता और जाति व्यवस्था के खिलाफ ही अपने 70 साल के जीवन में अलख जगाने के लिए अपना पूरा जीवन खपाने के बावजूद भी, मैने कुछ जाट, खत्री तथा दलितों के लिए अलग से गुरुद्वारे देखे हैं. और सबसे हैरानी की बात हमारे देश की जातीव्यवस्था से तंग आकर कुछ लोग इस्लाम तथा ख्रिश्चन धर्म का स्विकार करने के बावजूद भी, मैने दलितों के अलग चर्च देखे है. और मुस्लिम समुदाय मे अजलफ- अशरफ वाला पचडा जारी है. हमारे बिहार के दोस्त अलि अन्वर इस मसले को लेकर पिछले पच्चीस साल से अधिक समय से जद्दोजहद कर रहे हैं. मराठी में एक कहावत है कि “जात जो नहीं जाती है.” के अनुसार भगवान महावीर, गौतम बुद्ध नानकदेव तथा महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के भी जीवन का बहुमूल्य समय जाती व्यवस्था को नष्ट करने के लिए खत्म हो गया लेकिन अभी संसदीय राजनीति पूरी तरह से सांप्रदायिक और जाति के ईद- गिर्द राजनीति आकर कोल्हू के बैल के जैसे गोल – गोल घुम रही है. अगर आजके प्रकाशपर्व के दिन हमे नानकदेव के प्रति अपना आदर और सम्मान है तो सांप्रदायिकता और जाति की बेड़ियों को तोड़कर कर आगे बढना चहिये.
नानकदेव जी ने हिंदू धर्म के चार वर्णों की उंच-निच वाली सिढीनुमा रचना के बारे में कहाँ है कि “यह दुनिया के अधःपतन का लक्षण है. सन्यासी दस तो योगी बारा पंथों मे विभाजित हो गये हैं. और वैसे ही अनेक आश्रमवासी जैन मुनियों मे दिगंबर और श्वेतांबर बनकर एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं. उसी तरह शास्त्री लोगों मे वेदांत और पुराणों का अर्थ लगाते हूऐ आपस में झगड़े शुरू हो गये हैं. वैसे ही छ पंथों के छत्तीस पंथों का निर्माण होकर आपस में ही झगड रहे हैं.

कोई काला जादू मे रम गया है. तो कोई अमृत को ढूंढने में लग गया है. तो कोई विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार में लिप्त हो गया है. अखंड सत्य के अनगिनत टुकडे हो गऐ. और सभी विद्रुप हो गऐ है. कलयुग ने लोगों को मायाजाल मे फसा लिया है. इस तरह की स्थिति में मोहम्मद साहब अपने साथियों के साथ आए, और उनके भी अनुयायि बहात्तर पंथों मे बट गये . और अनेक प्रकार के संघर्ष बढ गऐ. उन्होंने रोजे, ईद और नमाज अनिवार्य कर दीऐ. और दुनिया में एक नया कर्मकांड लाद दिया. मुसलमानों मे भी धर्मगुरुओं के और संप्रदायों की विविध श्रेणियों में विभाजन हो गया.
हिंदुवाद और मुहम्मदवाद दोनों मे चार संप्रदायों मे विभाजन हो गया.
इस कारण लोगों मे झगड़े उनके अंदर के बेतहाशा अहंकार क्षुद्रता और गर्व बढने के वजह से गंगा और वाराणसी हिंदुओं के पवित्र स्थल हो गऐ तो मक्का और मदिना मुसलमानों के लिए पवित्र स्थल बन गऐ. मुसलमानों ने सुंता को महत्व दिया तो हिंदूओं ने जनेऊ और टिके को. राम और रहिम एकही नाम है, जिसमें ब्रम्ह का इशारा मिलता है. लेकिन उसमे भी भेद करते हूए लोग सत्यमार्ग से विचलित होकर वेद और कुरान भूल कर लोभ और प्रापंचिकताके पागलपन मे सैतान बनकर, सत्य को परे रखकर ब्राम्हण और मौलवी आपस में झगड़ा करने लग गए. ” ऐसी दुर्दांत परिस्थितियों में नानकदेव के ही शब्दों में “सुणी पुकार दातार प्रभु गुरु नानक जग मही पठाय “(इस परिस्थिति को देखते हुए ईश्वर ने गुरु नानक को भेजा है.) और समन्वय की स्थापना करने के लिए बेई नदी में स्नान करने के बाद उन्होंने पहले शब्द ‘कोई हिंदू नहीं कोई मुसलमान नहीं ‘का उच्चारण करने से ही गुरुवाणी की शुरुआत करते हुए सभी के सामने अविभाजित मानवता की महत्वपूर्ण बात रखते हुए अपने काम की शुरुआत की है.
विभिन्न प्रकार के मतभेदों की दिवारों से आगे हम सभी भाई- भाई है. यह प्रचार – प्रसार करने के लिए उन्होंने दूर दूर तक प्रवास किया है. सभी जगहों पर उन्होंने कुर्तियों और गलत कर्मकांडों से उपर उठकर सच्चा धर्म का पालन करना चाहिए और आपस में भाइचारे को बनाऐ रखना चाहिए. कुछ लोगों को लगता है कि वह धर्मचर्चा करने का काम कर रहे हैं. लेकिन इस बात का गुरुवाणी मे कोई भी संदर्भ नहीं मिलता. उल्टा सभी धर्मों में समन्वय स्थापित करने वाले महात्मा गाँधी जी के भी पहले के महान साधक कहना ज्यादा उचित लगता है. नहीं उन्होंने विभिन्न धर्मों के प्रचारकों को उनके धर्म के मुल सिध्दांतों को बदलने के लिए या विभिन्न धर्मों के बातों को लेकर एक मिलाजुला धर्म बनाने का भी प्रयास न करते हुए जो जिस धर्म में श्रध्दा रख रहा है उसने अपने धर्म के प्रति समर्पित रहते हूऐ सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए यही उनका कहना था जो उनके बाद पांचसौ सालों के बाद महात्मा गाँधी जी ने भी कहां है. ( रघुपति राघव राजा राम इश्वर अल्लाह तेरो नाम यह प्रर्थना रोज उनकी प्रार्थना सभा में गाई जाती थी यह उसिका प्रमाण है. ) नानकदेव जी ने सच्चा मुसलमान कौन सवाल का जवाब खुद ही जवाब दिया है कि ‘मुसलमान कहावन मुसकलू’सच्चा मुसलमान अपने आप को बोल लेना बहुत कठिन है. अगर किसी को सच्चा मुसलमान कहने का अधिकार है तो उसके लिए पहली शर्त पवित्र धर्मप्रेम दुसरा अपने अंदर के पडे हूऐ सभी पापों का नाश करते हूऐ अपने आप को मुस्लिमों का मार्गदर्शक कहने का अधिकार के पहले उसने जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने की आवश्यकता है. इश्वर की इच्छा के आगे विनम्र होते हूऐ इश्वर का आदेश मानते हूऐ आत्मविसर्जन करना चाहिए वही सच्चा मुसलमान बन सकता है.
( वार मेरा, गुरु नानक. पृ. 141)
उन्होंने आगे कहा कि मुसलमानों के पवित्रता के मुख्य तत्व कौन से है ? परंपराओं के अनुसार पांच बार नमाज़ पढना वगैरह नहीं तो आचरण मे श्रेष्ठ गुणो का स्विकार करना ‘
मेहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु!’
समस्त मानव जाति के उपर प्रेमभावना की मस्जिद बनाओ श्रध्दा को नमाज पढने की चटाई बनाओ इमानदारी से परिश्रमो का बनाओ कुरान लज्जा की सुंता करो, शिलभावो के रोजे का पालन करो इसीसे ही आप सच्चे मुसलमान बनेंगे सत्कर्मों का काबा करो, सत्य को गुरु मानों शुभ कर्मों को बोलो नमाज और कलमा ईश्वर को प्रिय उसकी माला का जपमाला करो इसीसे ही मिलेगा सम्मान आखिरी फैसले के समय नमाज रहती है पांच, उनके समय भी पांच नाम भी पांच, लेकिन सच्चि प्रार्थना कौनसी ? पहली याने सच बोलना, दुसरी इमानदारी से मेहनत तिसरी यानी संपूर्ण प्राणिमात्रो के कल्याण के लिए इश्वर की आराधना, चौथी निष्कपट हृदय; और पांचवीं भक्ति इश्वर की इन पांच नमाजो के साथ जब सत्कर्मों का पढा जाता है तब वही सच्चा मुसलमान होता है. आगे चल कर गुरु नानक देव बोलते हैं कि जिनका इसतरह से नमाज और कलमा नहीं होता है तो वह अंदर से झुठे होते हैं और उन्हें कोई प्रतिष्ठा नहीं मिलती है.
( वार मेरा, गुरु नानक. पृ. 140 – 141)
साधारण लोगों को हिंदू और इस्लाम धर्म दो अलग धर्म लगते हैं और दोनों कभी एकसाथ रह सकते हैं, ऐसा लगता नहीं. लेकिन गुरू नानक देव जी ने लोगों को समझाते हुए कहा कि आपसी द्वेष और घृणा का त्याग किया तो दोनों धर्म आत्मोन्नति के और ही ले जाने वाले दो मार्ग है.
‘राह दोवे इकु जाणा सोई सिझसी!’
जो भी कोई दोनों मार्ग एकही है ऐसा जानता है वही सचमुच पुर्णावस्था की खोज कर सकता है दुष्ट निंदक और छिद्रान्वेषी नर्क की आग में जल जायेगे संपूर्ण विश्व तत्त्वतः है बडा ही दिव्य खुदको सत्य मे विसर्जन करो
( राग मेरा, गुरु नानक. पृ. 142)
‘ राह दोवै खसमु एको जाणु ‘
मार्ग दो रहे तो भी इश्वर एक ही है यह जाणिए. गुरू के शब्दों से प्रभु के आदेश जाणो सभी वर्ण – रुपों को अंतर्तम मे समान मानिये. गुरू नानक कहते हैं, सभी एक ही परमात्मा है उस अकेले की ही करो प्रार्थना
( राग गउडी, गुरू नानक. पृ. 223)












