मै महाराष्ट्र से हूँ लेकिन यह गित मेरे सबसे प्रिय गितो मे से एक है. भाजपा सत्ता के नशे में अपना दिमागी संतुलन खो रही है. लेकिन इसी भाजपा ने सत्ता में आने के लिए अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत तो ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे से कीया था. लेकिन पिछले 11 सालों से विकास के नाम पर चंद पुंजिपतियो की तिजोरीयाँ भरने के अलावा आम भारतीयों के लिए कुछ भी नहीं करने के कारण अब लोगों का ध्यान बाँटने के लिए, लगभग हर दिन कोई न कोई विवाद खड़ा करते हूऐ, अपनी राजनितिक रोटियां सेंकने के लिए, अब भाषा, वेशभूषा, खानपान, रंग, जाती – धर्म, लिंग तथा विशिष्ट परिवेश के या गीत – संगित या रचनाओं को लेकर विवाद खड़े करते हूऐ कहीं पर लवजेहाद तो कहीं पर हिजाब तो कहीं पर गोमांस को लेकर एक विशिष्ट समुदायों के लोगों को माँबलिंचिग तो एनआरसी के आड मे डिटेंशन सेंटरों मे लोगों को बंद करने के बाद अब कोई संविधानिक पद पर कार्यरत मुख्यमंत्री ने रविंद्रनाथ टागोर के गित ‘आमार शोनार बांग्ला’ को लेकर जो विवादस्पद बयान दिया है. यह मुख्यमंत्री के पद की शपथ ग्रहण समारोह में ली गई शपथ का उल्लंघन किया है. वह शपथ इस प्रकार के आशय की है, “मै आजसे इस प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में पदभार सम्हालते हूऐ, मै इस प्रदेश में रहने वाले सभी लोगों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करते हूऐ अपने मुख्यमंत्री पदका निर्वाह करुंगा ” आज रविंद्रनाथ टागोर के 85 वर्षों के बाद दुसरे भारतीय बंगाली है, जिन्हें 1998 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. उन अमर्त्य सेन का आज 92 वा जन्मदिन है. और इस तरह से रविंद्रनाथ टागोर के गित को लेकर जो स्टेटमेंट दिया है, उससे राष्ट्र की एकता और अखंडता को खतरा निर्माण हो सकता है. मुख्यमंत्री जैसे संविधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति अपने पद ग्रहण समारोह में ली गई शपथ का उल्लंघन कर रहे हैं.


राजनीतिक रूप से भी यह बात बंगाल में सत्ताधारी बनने की इच्छा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी की तरफ से बंगाली भाषा में बात करने वाले मजदूरों के साथ जो बर्ताव भाजपा शासित राज्यों में किया जा रहा है .उन्हें सिर्फ बंगाली भाषा में बोलते हूऐ देखकर जबरदस्ती से उठाकर बंगला देश में डिपोर्ट करने के अनेक उदाहरण हैं. जिसमें एक गर्भवती महिला भी है. और अब विश्व कवी रविंद्रनाथ टागोर के “आमार शोनार बांग्ला “गित जो पडोसी बंगला देश (1971) बंगला देश के नाम से अपने आप को पाकिस्तान से स्वतंत्र कर लेने का मुख्य उद्देश्य बंगाली भाषा ही था . और इसिलिए पाकिस्तान से स्वतंत्र होने के बाद, बंगला देश ने अपने राष्ट्रगीत के रूप में रविंद्रनाथ टागोर के 1905 के दौरान कर्झन ने बंगाल का विभाजन करने का फैसला लेने के प्रतिरोध स्वरुप ही, रविंद्रनाथ टागोर ने लिखा हुआ “आमार शोनार बांग्ला” गित को अपने देश के राष्ट्रगीत के रूप में लिया है . तो उसका सम्मान करना चाहिए. क्योंकि रविंद्रनाथ टागोर ने ही लिखा हुआ गितो मे से एक ”जन- गण- मन’ भारत का राष्ट्रगीत है. इसमें आपत्तिजनक बात क्या है ? उल्टा हमे अभिमान होना चाहिए कि हमारे देश के कवि के गित को बंगला देश ने भी अपना राष्ट्रगीत के रूप में लिया है. और उसके कॉपीराइट वगैरे की बात तो और भी परस्परविरोधी लग रही है. क्योंकि एक तरफ उस गित को बैन करने की बात कर रहे हैं. और दुसरी तरफ कॉपी राईट की बात भी की जा रही है. तो मै सिर्फ कॉपी राईट नियम के बारे में बताना चाहता हूँ कि कॉपी राइट नियम है कि “साहित्य के कॉपीराइट के नियम के अनुसार मूल साहित्यिक कृतियाँ लेखक के जीवन काल और उनकी मृत्यु के बाद 60 वर्षों तक सुरक्षित रहती है.मतलब (1967) मे इस गित का कॉपी राईट खत्म हो गया है. और उसके चार साल बाद बंगला देश का निर्माण हुआ है. यह विवाद खड़ा करना शतप्रतिशत बौद्धिक दिवालियापन का लक्षण दिखाई दे रहा है.


जैसे कुछ समय पहले आर एस एस के प्रमुख मोहन भागवत ने रविंद्रनाथ टागोर ने ‘ स्वदेशी समाज’ शिर्षक की किताब मे “हिंदुराष्ट्र के समर्थन में लिखा है . “ऐसा दावा किया था. जिसके प्रतीवाद मे मैनें हिंदी मराठी तथा अंग्रेजी मे रविंद्रनाथ टागोर और उनके ‘राष्ट्र राज्य की संकल्पना’ (Ravindranath Tagor and his Concept of Nation State) इस शिर्षक से लेख लिखा है. जो कोई भी सोशल मीडिया पर गुगल सर्च करते हूऐ देख सकते हैं. असलियत में भाजपा और उसके मातृसंघठन आर एस एस के फौंडेशन मे ही द्वेष फैला कर समाज में ध्रुवीकरण करने का मुख्य तत्व होने की वजह से, धर्म – जाति भाषा,लिंग, रहन-सहन, खान – पान, वेशभूषा, साहित्य, संगीत, नाटक- सिनेमा तथा सभी प्रकार की कलाओं से लेकर सभी प्रकार के इझम, मतलब ध्रुवीकरण करने के लिए जो भी मुद्दे काम आते हैं. उनका इस्तेमाल बेरहमी से कर रहे हैं. जैसे सौ वर्षों पहले इटली में बेनिटो मूसोलिनी और जर्मनी में अडॉल्फ हिटलर ने किया था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण (1925) बिल्कुल उनका ही अनुकरण करते हूऐ हुआ है. जिसको मैंने अपने बचपन में आजसे साठ साल पहले (1965) मैनें खुद आर एस एस की शाखा में सबसे अधिक मात्रा में मुस्लिमों का द्वेष और कम्युनिस्ट तथा सेक्यूलर और नेताओं मे नंबर एक पर महात्मा गाँधी दो नंबर पर जवाहरलाल नेहरु के खिलाफ गलत जानकारी दी जाती हुई मैने खुद अनुभव किया है. आज आर एस एस की राजनीतिक इकाई भाजपा सिर्फ उसका अनुसरण कर रही है. जो भारत जैसे बहुलता वाले देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है.

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