2-2गैस मूल्य निर्धारण, इसे तय करने वाले नौकरशाहों को लेकर उठे विवाद और उसके बाद पेट्रोलियम मंत्रालय एवं सार्वजनिक क्षेत्र की दो कंपनियों में हुए बदलाव को बाबूशाही पर ध्यान रखने वाले लोग बहुत रुचि के साथ देख रहे हैं. यहां याद रखने वाली बात यह है कि चुनाव के बाद केंद्र मेंे होने वाले बदलावों के मद्देनज़र बहुत संभव है कि पेट्रोलियम नीतियों की बड़े स्तर पर समीक्षा की जा सकती है. पेट्रोलियम सेक्रेटरी पद के लिए दावेदारों में उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्य सचिव जावेद उस्मानी भी शामिल थे, लेकिन सरकार ने इस पद के लिए 1978 बैच के आईएएस अधिकारी सौरभ चंद्र को नामित किया. इस पद पर पहले विवेक राय थे. दूसरा बड़ा परिवर्तन दिनेश कुमार सर्राफ को ऑयल एंड नेचुरल गैस कमीशन का मुखिया बनाया जाना था. इस पद के लिए पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोईली वर्तमान प्रमुख का ही सेवा विस्तार किए जाने के पक्ष में थे, लेकिन कैबिनेट ने इसे नहीं माना. इसी बीच बी अशोक इंडियन ऑयल के चेयरमैन बनने के लिए तैयार हैं, वहीं निशि वासुदेव हिंदुस्तान पेट्रोलियम की पहली प्रमुख बन गई हैं. वह इस पद पर काबिज होने वाली पहली महिला हैं.
 
कूटनीतिक हाथापाई  
2-3भारतीय कूटनीति की अवस्था वर्तमान में बेहतर नहीं रह गई है, चाहे वह पड़ोसियों के साथ संबंध हों या फिर अमेरिका के साथ देवयानी को लेकर हुआ विवाद. लेकिन, हाल के दिनों में विदेश मंत्रालय ने कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए नए राजदूतों की नियुक्ति की है. क्रमबद्ध रूप से कई आईएफएस अधिकारी अपनी नियुक्ति वाले स्थान पर जा रहे हैं. महत्वपूर्ण नियुक्तियों में चीनी मामलों के जानकार एवं 1984 बैच के आईएफएस अधिकारी गौतम बंबावाले को भूटान का राजदूत नियुक्त किया गया है. भूटान भारत और चीन के बीच में ख़ास महत्व रखता है. सूत्रों के अनुसार, दूसरी महत्वपूर्ण नियुक्तियों के तहत रुचि घनश्याम दक्षिण अफ्रीका की नई राजदूत होंगी, वहीं अजय बिसारिया पोलैंड और विक्रम डोरास्वामी, जो इस समय अमेरिका डेस्क के प्रमुख हैं, उज्बेकिस्तान के राजदूत होंगे. इसका मतलब देर से ही सही, लेकिन भारत अपने कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में ध्यान दे रहा है, जिसका इशारा वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने बजट के दौरान यह घोषणा करके दिया था कि देश के कूटनीतिक बजट में 20 प्रतिशत का इजाफा किया जाएगा. लेकिन, क्या ये उपाय काफी साबित होंगे?
 
उत्तर प्रदेश में तबादले
2-1उत्तर प्रदेश का एक अलग और बहुत अजीब सा रिकॉर्ड रहा है, विशेषत: प्रशासन के मामले में. प्रदेश में जबरदस्त रूप से राजनीतिक रूप लिए नौकरशाही पर प्रशासनिक शिथिलता का आरोप लगता है और उसे बड़े पैमाने पर रूटीन तबादलों का सामना करना पड़ता है. ऐसा कहा जाता है कि कोई भी नौकरशाह किसी एक जगह पर तीन महीने से ज़्यादा टिक नहीं पाता है. मजेदार रूप से बीते साल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नौकरशाहों के स्थानांतरण को लेकर नीति की घोषणा की थी, जिसमें स्थानांतरण के लिए कुछ विशेष नियम बनाए गए थे, लेकिन इस घोषणा का भी ख्याल नहीं रखा गया और इसके विशेष नियमों पर ध्यान देने से ज़्यादा इन्हें तोड़ा गया.  मामले पर निगाह रखने वालों का ध्यान अखिलेश की घोषणा पर इसलिए गया, क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल में बहुत बड़ा फेरबदल किया है. इसके तहत 233 अधिकारियों का स्थानांतरण किया गया, जिनमें 26 आईएएस और 15 आईपीएस शामिल थे. शायद इसी वजह से हाईकोर्ट का निर्णय आया, जिसके अनुसार राज्य में सभी स्थानांतरण तब तक के लिए प्रतिबंधित कर दिए गए, जब तक कि राज्य सरकार हाल में आए स्थानांतरण के नियमों को लागू करके राज्य में सिविल सर्विस बोर्ड नहीं बनाती. राज्य के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने इसका बचाव करते हुए कहा कि ये रूटीन स्थानांतरण हैं, जिन्हें निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए किया गया था.

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