नवम्बर 2011 के द्वितीय सप्ताह में एशियन सोशल फोरम के निमंत्रण पर प्रथम बार बंगलादेश की यात्रा करने का अवसर प्राप्त हुआ ! हालाँकि पंद्रह साल कलकत्ता में रहने के बावजूद (1982-97) कुछ पारिवारिक दायित्वों के कारण हम बंगलादेश नहीं जा सकें ! और कलकत्ता छोडकर चौदह साल बाद यह मौका मिला तो हम सबसे पहले कलकत्ता के बंगलादेश कान्सुलेट से नवम्बर 17 के दिन वीसा लेकर 18 नवम्बर को सुबह बससे ढाका के लिए निकल पड़े ! कलकत्ता-ढाका अंतर पाचसौ किलोमीटर से भी कम है ! जेसौर रोड से बस निकलीं बहुत पुराना रोड होने के कारण कम-से-कम सौ-दो सौ साल पुराने वृक्षों के बीच से हमारी बस चली जा रही थी ! और बहुतही मनोहर दृश्य था ! इसलिए उन्हें देखकर मनहि मनमें प्रार्थना कर रहा था कि तथाकथित विकास के नाम पर रास्ता बडा करने के वक्त इन वृक्षों की कटाई नहीं होनी चाहिये ! पांच घंटे के भीतर हमारी बस सीमा तक हरिपुर नाम की जगह पर पहुँच गईं थीं ! और उतरकर सीमा पार करने के बाद दुसरी बस ढाका के लिए पकडनी थी ! जो हमें रात के खाने के पहले ढाका पहुंचाने वाली थी ! लेकिन सीमा पुलिस बल द्वारा बताया गया कि ! आपको जमीन से जाने का वीसा में लिखा नहीं है ! हमने कहा कि हमें तो जमीन से ही जाने का है ! और हमारे पासपोर्ट को देखिये पाकिस्तान, ईरान सिरिया, तुर्किस्तान, लेबनान, इजिप्त के सभी प्रवास बाय रोड से ही है ! लेकिन वह नहीं मानें ! और बादमे बताया गया कि आपको अगर कलकत्ता वापस जाना है तो आखिरी बस निकलने वाली है !

तीन चौथाई सफर करने के बावजूद हमे सीमा पर के हरिपुर नाम की जगह से वापस कलकत्ता आना पडा ! और दूसरे दिन सुबह ढाका की फ्लाइट जो आधे घंटे में कलकत्ता से ढाका पहुंचा दिया ! इस तरह का बंगलादेशमे सुबह के ग्यारह बजे आगमन हुआ ! तो एअरपोर्ट पर एशियन सोशल फोरम के बंगलादेश के आयोजन समिति से स्वयंसेवक आयें थे ! वह हमें पहले ढाका विश्वविद्यालय में लेकर गये ! वहां पर रजिस्ट्रेशन की फारमॅलिटी करके ढाका शहर के किसी एन जी ओ के गेस्ट हाउस में रहने का इंतजाम किया था ! वहां पर लेकर गये जो ढाका शहर के अलग हिस्सों में था ! एशियन सोशल फोरम के तीन दिन के कार्यक्रम के लिए उन्ही की गाडी से आना-जाना किया ! जोके ढाका विश्वविद्यालय के प्रांगण में था ! मैंने भारत के तथा अन्य देशों के भी विश्वविद्यालय देखें है ! लेकिन ढाका विश्वविद्यालय जैसा विशाल परिसर और कोई याद नहीं आ रहा ! और विद्यार्थी-विद्यार्थीनीयो का आपसमे मेलजोल गजब का था ! यही विश्वविद्यालय बंगलादेश निर्मिती का केंद्र बिंदु रहा है ! और यही के शिक्षक और विद्यार्थी पाकिस्तानी सेना के द्वारा शेकडो की संख्या में मारे भी गये हैं ! इसलिए शहीद स्मारक भी विश्वविद्यालय के प्रांगण में ही है ! हमारी आखिरी दिन की सभा उसी शहीद स्मारक के ओपन थियेटर में हुई थी !

और मुझे आज भी याद है कि, हमारे भारत-पाक-बंगलादेश मैत्री संघ के पाकिस्तान के प्रतिनिधि फारूख तारिक ने भरी सभा में पाकिस्तानी सेना के द्वारा शेकडो की संख्या में मारे गये लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए,शायद पहली बार किसी पाकिस्तानी द्वारा भरी सभा में माफी मांगते हुए देखकर मुझे बहुत सुकून महसूस हुआ ! और मैंने फारूख तारिक को गले लगा कर उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद दिया ! मैंने कहा कि पता नहीं पाकिस्तान सरकार ने खुद माफी मांगी या नहीं, लेकिन आज आपने हमारे भारत-पाक-बंगलादेश मैत्री संघ की लाज रख ली ! और पब्लिकली माफी मांग कर बहुत ही बडा काम किया है ! और पता नहीं पाकिस्तान मिडिया और पाकिस्तानी जनता की इस कार्यक्रम के बाद क्या प्रतिक्रिया होगी ? जो आपको यहां से वापस जाने के बाद भुगतना पड़ सकता है ! क्योंकि पाकिस्तान का तथाकथित इस्लामी राष्ट्रवाद के बुखार में आपको शायद कुछ भुगतना पड सकता है !

एशियन सोशल फोरम के कार्यक्रम के बाद मैं और दो दिन ज्यादा ठहरा था ! क्योंकि 1971 के बाद बिहारी मुस्लिम जो जनरल अयूब खान के बुलावे पर नया पाकिस्तान बनाने के लिए बिहार के हुनर वाले मुस्लिम कारागिरोको विशेष रूप से बुलाया था ! और 1971 युद्ध में यह सभी बिहारी मुस्लिम बंगलादेश के खिलाफ पाकिस्तान की तरफ से होने के कारण ! इन्हें बंगलादेश की नागरिकता नहीं दि जा रही है ! इसकी जानकारी मुझे थी ! तो आज वह किस हालत में है ? यह जानने की उत्सुकता थी ! और दुसरा कारण बंगलादेश में रह रहे हिंदूओ की क्या स्थिति है ? क्योंकि बाबरी विध्वंस के बाद बंगलादेश में हिंदुओ के उपर काफी हमले हुए थे ! और 71 के बाद भी और बाबरी मस्जिद के बाद भी गुजरात का 2002 का स्टेट पाॅन्सर दंगे ने तो आग में घी का काम किया है ! और समय-समय पर वह हमलों के शिकार होते रहते हैं! यह जानकारी होने के कारण आज वह किस हालत में है ? यह जब मुझे मौका मिला तो क्यों नहीं उनकीं हालत अपने आँखो से जब मैं पहली बार आया हूँ ! तो जानने का इरादा पहले से ही लेकर आया था !

हमारे रहने की व्यवस्था जहाँ पर की थी उस जगह से बिहारी मुस्लिमों का कैम्प करीब था तो सुबह वहां चले गये ! वहां पर कोई मोहम्मद अख्तर नाम के उस कैम्प के सचिव मिलें ! इस जगह का नाम मोहम्मदपूर टाऊन हॉल कैम्प है 8000 लोग रहते हैं ! 600 मकान है ! हालाँकि वह (झुग्गी-झोंपड़िया थी ! ) बस्ती में सेनिटेशन नहीं था और भारत के किसी भी शहर की झुग्गी-झोंपड़ियों से भी बदतर हालत ! सबसे हैरान करने वाली बात गंदगी और उस कारण बदबू से सर फटा जा रहा था ! वहां बैठके बात करना बडा मुश्किल था ! क्योंकि मक्खियों के कारण मुंह खोलने में डर लगता था ! लेकिन जब बस्ती में आही गये तो बगैर बातचीत किये जाना भी ठीक नहीं था ! इस बस्ती को चारों ओर से कटीले कांटे लगें हुए तारों की बाड में जेल जैसे घेरकर रखा हुआ था ! बगैर इजाजत वह अंदर-बाहर नहीं जा सकता है !

दुसरे कैम्प में भी गये थे जो उसीके आसपास था जिसमें 30,000 आबादी है और इस कैम्प का नाम जिनेवा कैम्प है ! इसके सदर अब्दुल जब्बार जो 1964 में बिहार के मुंगेर से है वही मुझे बोले कि पाकिस्तान के तरफ से बुलाया गया था ! और आकर पाँच-छह साल भी नहीं हुआ ! तो स्वतंत्र बंगलादेश की मांग शुरू हो गई ! और हमें पाकिस्तान की सेना भरोसा देते रहीं कि बेफिक्र होकर रहो हम इन बंगालीयोको खत्म कर के रख देंगे ! तो फिर आप ही उर्दू भाषा वाले राज करोगे ! 1946 -47 में पाकिस्तान के बनने के तुरंत बाद ही पाकिस्तानी सरकार द्वारा उर्दू राष्ट्रभाषा का ऐलान करना सबसे बड़ी गलती रही है ! जो मैंने पाकिस्तान के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, स्वात घाटी तथा वर्तमान फटा जो कभी नार्थ ईस्ट फ्रंटियर के नाम से जाना जाता था ! इन सभी पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में भी ! उर्दू का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है ! पाकिस्तान के पाचो हिस्सों की अपनी-अपनी बोली जाने वाली भाषाओं रहते हुए ! और उर्दू पाकिस्तान की भाषा नहीं है ! यह तो शत-प्रतिशत भारत और वह भी उत्तर प्रदेश के कुछ अंचलों में बोली जाने वाली भाषा है इसका जन्म ही फारसी, खडी बोली के मिश्रण से हुआ है !

पंजाबी, सिंधी, बलुची और पाकिस्तानी अन्य इलाके में नहीं बोलीं जाने वाली भाषा ! जबरदस्ती से पाकिस्तानी राष्ट्रभाषा के रूप में ! बटवारे के बाद लादने की कोशिशने बंगलादेश की नींव रखी गई ! और वर्तमान पाकिस्तान में भी भाषा का मसला विवादस्पद है ! और सबसे अहम बात पाकिस्तान की निर्मिती की एक वजह उर्दू भाषा भी है ! और इसी कारण भारत के काफी लोगों की गलतफहमी है कि ! उर्दू भाषा मुसलमानों की भाषा है ! जो कि भारत के दो प्रतिशत मुसलमानों को उर्दू भाषा आती है क्या इसमें मुझे संदेह है ! दक्षिण भारत के लगभग सभी प्रदेशोंके मुसलमानों की भाषा दक्षिण में जो-जो प्रदेश है वही तेलगु, मलयालम, कानडी, तमिल भाषा बोलने वाले मुसलमान है ! और बिहार जैसे राज्य में भागलपुर के मुसलमानों को अंगिका में बोलते हुए देखकर ! अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा, मैथिली और महाराष्ट्र में कोंकणी, मालवणी, अहिराणी गुजरात में गुजराती इत्यादि बोलीं भाषा में व्यवहार करते हुए देखकर ! मुझे उर्दू को मुसलमानों की भाषा ! यह संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में गलत लगता है ! और मुसलमानों को लेकर राजनीति करने वाले हिंदू-मुस्लिम दोनों राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी भूल लगती है !

बिहार से अलग-अलग जगहों से अपने रोजी-रोटी के लिए गए मुस्लिम 1971 के बाद धोबीका कुत्ता ना घर का और नहीं घाट का जैसे हालात में बंगलादेश के अंदर पडे हुए हैं ! और पाकिस्तान उन्हें लेने के लिए टाल-मटोल कर रहा ! पाकिस्तान ने 1974 में बंगलादेश के साथ समझौता किया है ! लेकिन सिर्फ पाकिस्तानी, 40,000 मुसलमानों को लेकर गये ! और बिहारी मुस्लिम आज भी अधर में लटके हुए हैं ! भारत ने लेने का सवाल ही नहीं है ! एक बार बिहारी मुसलमानों ने भारत चलने का प्रयास किया है और उन्हें बंगलादेश की रक्षा सेना ही बुरी तरह से पीट-पीटकर वापस आने पर मजबूर कर दिया ! और बंगलादेश अपने स्वतंत्रता की अर्धशताब्धि मना रहा है ! और बिहारी मुस्लिम आज भी अधर में लटके हुए हैं ! और नागरिकता नहीं होने के कारण सरकारी नौकरी मिल नहीं सकतीं ! या बैंक का लोन भी नहीं मिल सकता जिस कारण वह कोई भी व्यवसाय नहीं कर सकते !

मतलब किस हालत में जीवन जी रहे होंगे इसकी कल्पना करकेही रौंगटे खड़े होते हैं ! और यही लोग पचास साल पहले कुछ हजार की संख्या में थे ! अब वह चालीस लाख की संख्या में हो गए हैं ! और पूरे बंगलादेश में 70-80 कैम्प में तेरह अलग-अलग जिलो में रह रहे हैं ! मेरे साथ वर्तमान सत्ताधारी दल के लोग थे मैंने उन्हें कहा ! कि अब चालिस साल बाद इनके बच्चे भी बंगला भाषा में बोलते हुए देखकर, मुझे लगता है कि, अब आप की पार्टी ने पुरानी रंजिश भूला कर शुद्ध मानवीयता के आधार पर इन्हें नागरिकता देने का काम करना चाहिए ! जो बंगलादेश की कानून व्यवस्था के लिए भी बहुत जरूरी है ! क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को अधर में लटका कर रखना यानी कानून व्यवस्था के लिए खतरा मोल लेना है ! क्योंकि इन्हें अपने रोजी-रोटी के लिए क्या-क्या करना पड़ता होगा ? मै तो सोचकर हैरान हो रहा हूँ ! और मुझे खुशी है कि मेरे साथ जो भी कोई थे उन्होंने कहा कि दादा आपनी सच्ची कथा बोलछेन आमि निश्चयी नागरिकतार जोन्ने चेष्टा कोरबो ! ( दादा आप सही कह रहे हैं हम अवश्य नागरिकता के लिए कोशिश करेंगे !)

आज इस बात को दस साल पूरे हो चुके हैं ! इस बीच कोलकाता में 2019 के दिसंबर महीने में भारत-बंगलादेश फोरम के कार्यक्रम के लिए बंगलादेश से दस-पंद्रह लोग आए थे ! और उनमें कुछ बिहारी मुस्लिम के सवाल पर काम करने वाले भी लोग थे ! और उन्होंने मुझे कहा कि जल्दी ही इन सब को नागरिकता मिल रही है ! उम्मीद करता हूँ कि अब तक मिल गई होगी ! सुबह बिहारी मुस्लिमों का कैम्पों के बाद ! दोपहर के खाने के बाद ढाका के धनमंडी इलाके में गया था ! जहाँ पर काफी बडी संख्या में हिंदुओ की आबादी रहती है ! और वही पर ढाकेश्वरी माता का मंदिर है ! जिसके कारण ढाका का नाम भी है ! और रामकृष्ण मिशन का काफी बडा आश्रम भी देखा हूँ ! धनमंडी ढाका का मलबार हिल या नईं दिल्ली का लुटियन्स इलाके के जैसा ही खांस इलाका है ! जहाँ पर बंगलादेश की संसद, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के आवास भी है !
दोपहर के चार बजे के आसपास मै एक हजार साल पुराने ढाकेश्वरी माता का मंदिर है ! जिसे राजा सेन ने बनाया है ! वहां पर गया ! क्योंकि उसके पहले रामकृष्ण मिशन आश्रम वाले लोगों से मिलना हुआ था ! और उन्होंने कहा कि बंगलादेश के हिंदूओ की समिती का कार्यालय ढाकेश्वरी माता के मंदिर के प्रांगण में है ! आपको बंगलादेश के टोटल हिंदूओ की क्या स्थिति है ? यह जानकारी वही पर मिलेगी !

इसलिए मैं ढाकेश्वरी माता के मंदिर में आया तो मंदिर के पुजारी श्री प्रदीप कुमार चटर्जी उम्र 64 ने कहा, कि कार्यालय में बैठने वाले सभी पदाधिकारियों की अपनी-अपनी नौकरी,पेशावर वकील, डॉक्टर लोग है ! इसलिए वह लोग श्याम के छह बजे के बाद ही ऑफिस खोलते हैं ! और साथ-साथ बहुत ही मासूमियत से बंग्ला में बोलें कि आपनी माके प्रणाम कोरबेनना ? ( क्या आप माता ढाकेश्वरी के दर्शन नहीं करेंगे ?)! साथीयो मै आपको कन्फेशन दे रहा हूँ कि ! जहाँ तक मुझे याद है मैंने उम्र के पंद्रह साल का था जब राष्ट्र सेवा दल में शामिल होने के कारण ! तबसे कोई मंदिर में जाकर दर्शन वगैरा नहीं किया है ! कलकत्ता पंद्रह साल रहा मेरी मा कुछ दिन के लिए हमारे पास ठहरी थी तब उसे कालीमाता के मंदिर में दर्शन के लिए लेकर गया था ! और मै मंदिर के बाहर उसकी चप्पलें सम्हालते बैठा रहा !

लेकिन ढाकेश्वरी मंदिर के पुजारी मोशाय की मासूमियत या विदेश में रहने का असर, पता नहीं पर उन्होंने बोलने के दुसरे क्षणमें मैंने ढाकेश्वरी माता की मूर्ति के सामने साष्टांग दण्डवत किया ! और मनहीमनमे कहा कि हे माते इस जमीन पर रहने वाले सभी जीवों को सुख -शांति से रहने दो ! उसके बाद पुजारी ने प्रसाद दिया ! मैंने खाने के बाद वह बोले कि मेरा घर बगल में ही है ,आप कुछ समय बैठ सकते तबतक ऑफिस भी खुल जायेगा ! मै उनके साथ उनके घर में गया उन्होंने चाय-नाश्ता दिया ! और बातचीत में पता चला कि उन्होंने अपने बच्चों को कलकत्ता के पास सोदपूर भेज दिया है और यहां वह और उनकी पत्नी सिर्फ रहते हैं !

तबतक ऑफिस भी खुल गया था ! तो वह खुद मुझे ऑफिस लेकर गये ! और मेरा परिचय देते हुए पदाधिकारियों को कहा कि मैं भारत के महाराष्ट्र के नागपुर से आया हूँ ! और बंगलादेश के हिंदूओ की क्या स्थिति है ? यह जानने के लिए आया हूँ ! तो उन्होंने भी चाय-मुडी, संदेश नाम की मिठाई खिलाकर मेरा स्वागत किया ! काफी रिपोर्टें और पेपर्स दियें ! और अंतिम बात मेरे निकलने के पहले बोले कि आज भी बंगलादेश में एक करोड़ से अधिक संख्या में हिंदुओ की आबादी रहती है ! सबसे बड़ी आबादी ढाका में और दो नंबर चटगाँव और अन्य इलाकों में फैले हैं ! आप नागपुर से है इसलिए आपको विशेष रूप से अनुरोध है कि भारत के जितने भी हिंदुओ के संघटन है उन्हें सभी को हाथ जोड़कर विनती है कि जब-जब आप लोग भारत में मुसलमानों के उपर आक्रमण करते हो तब-तब तुरंत उसके प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे उपर आक्रमण होता है ! मुख्य रूप से बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद बंगलादेश में हिंदुओ की असुरक्षा और बढ गई है ! और नरेंद्र मोदी गुजरात में जो भी कुछ कर रहे हैं ! उसकी कीमत हम लोग आए दिन चुका रहे हैं ! (यह बात नवम्बर 2011 की है ! ) तो मेहरबानी करके उन्हें कहिएगा कि आप भारत के मुसलमानों को ठीक से रहने दो तो हम भी सुरक्षित रहेंगे !

आप सभी को तस्लीमा नसरीन की लज्जा किताब पता होगी ! संघ परिवार ने तस्लीमा की इजाजत लिए बगैर अपने हर भाषा के पत्र-पत्रिकाओं उसे तोड़-मरोड़कर करके प्रकाशित किया है ! मुझे रह-रहकर आश्चर्य लगता है कि बंगलादेश या पाकिस्तान में और आजकल कश्मीरी पंडितों को लेकर भी खुब छाती पिट-पीटकर बोलते रहते हैं ! कि देखो वहापर हिंदुओ के साथ कैसे-कैसे अत्यचार हो रहे हैं ! इन्हें इतनी भी अक्ल नहीं है ! कि यह एक चेनरिअॅक्शन जैसा है ! जो मुझे बंगलादेश जाने के पहले से ही लगता था ! लेकिन अभी तो मैं खुद अपने आँखो और कानों से देख-सुन कर लौटा हूँ ! और बंगलादेश के हिंदूओ के समिती के पदाधिकारियों के आँखो में पानी और दोनों हाथ जोड़ कर मुझे कह रहे हैं कि ! भारत के मुसलमानों को जब-जब आप लोग सताते हो तब-तब तुरंत उसके प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे उपर आक्रमण होता है! तो मेहरबानी करके उन्हें कहिएगा कि आप भारत के मुसलमानों को सुखी रखों तो हम यहाँ पर सुख-चैन से रह सकेंगे!
और बंगलादेश की यात्रा से लौटने के बाद मुझे नागपुर के हेडगेवार विचार मंच के पदाधिकारियों का फोन आया कि आप बंगलादेश की यात्रा से लौटे हो तो ! क्या हमारे मंचपर आपके अनुभव बताने के लिए आने वाले शनिवार को आप आ सकते ?

तो मुझे तुरंत डबडबाई आँखों से बंगलादेश हिंदुओ की समिति के पदाधिकारियों का हाथ जोड़कर की हुई प्रार्थना याद आई! और मैंने जीवन में पहली बार संघ के द्वारा आयोजित किसी कार्यक्रम में जाने का निर्णय लिया ! और वहां जाने के बाद देखा कि ! हमारे देश की रक्षा की तीनों सेनाओ के रिटायर अधिकारियो से हाॅल भरा हुआ था ! उनमेसे कुछ लोगों को मै जानता था ! जिन्होंने बंगलादेश की मुक्ति के समय भारत की तरफ से भाग लिया था ! मुझे बंगलादेश की हिंदुओ की समिति के पदाधिकारियों ने कुछ रिपोर्टिंग का साहित्य दिया था ! जो मै अपने साथ उस सभा में लेकर गया था ! और उनके पते ईमेल तथा टेलिफोन नंबर भी ! और उन्होंने जो हाथ जोड़कर विनती की थी ! वह मैंने दोहराई ! और कहा कि आप लोग अपने आप को हिंदुओ के सबसे ज्यादा हिमायती समझते हो ! लेकिन भारत जैसे हिंदुओ की बहुतायत वाले देश में सुरक्षित रहते हुए गत अस्सी साल से भी ज्यादा समय से गर्वसे कहो कि हम हिंदू है ! और मुसलमानों को लेकर लगातार दुष्प्रचार करते रहते हो ! लेकिन कभी सोचा है कि ! भारत के बाहर भी हिंदुओ की आबादी रहती है ! और उनके उपर क्या गुजरती होगी ? विवेक, पांचजन्य, ऑर्गनायझर और अन्य भाषाओं की आपकी सभी पत्रिकाओं में तस्लीमा नसरीन की लज्जा सुविधाजनक ढंग से और तस्लीमा नसरीन की बगैर इजाजत लिए छापी है ! तो बंगलादेश के हिंदूओ के उपर आक्रमण क्यों हुआ ? यह सवाल आपके किसी के भी मनमें क्यों नहीं आता है ? मै 6 दिसंबर 1992 के बाद कलकत्ता में आनंद बाजार पत्रिका के सीनियर संपादक और बंगला भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार मित्र गौर किशोर घोष के साथ बैठा हुआ था ! और बंगलादेश के हिंदूओ के समिती के पदाधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ लोग! उन्हें अपने साथ क्या हुआ ?

यह सब आपबीती बता रहे थे ! और गौरदाने सुनने के तुरंत बाद ही मुझे कहा कि सुरेश तुम बोलों ! तो मैंने तपाकसे कहा कि दुनिया के किसी भी कोने में बहुसंख्यक समुदाय अगर अल्पसंख्यक समुदाय के साथ बलप्रयोग करेंगे तो सर्वस्वी गलत है ! जो हिटलर ने जर्मनी में यहूदियों के साथ किया है ! और आज की तारीख में यहूदियों ने 1948 में इस्राइल नाम का अपना देश बनवाने के बाद लगभग वैसेही अत्यचार मूल-निवासी फिलीस्तीनियों के साथ कर रहे हैं ! यह भी उतना ही गलत है ! जितना कि हिटलर ने जर्मनी में यहूदियों के साथ किया था ! क्या इस तरह की चेनरिऑक्शन कभी रुकेगी नहीं ? क्योंकि भारत में 6 दिसंबर को आयोध्या में जो भी कुछ हुआ है ! उसकी रिऑक्शन पाकिस्तान और बंगलादेश के हिंदूओ के साथ होना निश्चित ही गलत है ! और यह बातें तस्लीमा नसरीन की लज्जा लिखने के पहले की है! और आगे जाकर मैंने बोला कि अगर संभव हो तो आप अपना प्रभाव इस्तेमाल कर सकते हो ! तो मै आपको कंपनी देने के लिए तैयार हूँ ! हम लोग जिस तरह से 1989 के भागलपुर दंगे के बाद लगातार भागलपुर जा रहें हैं !(शांति-सदभावना के काम के लिए ! ) वैसे ही बंगलादेश के हिंदूओ की क्या स्थिति है ? उसका जायजा लेकर बंगलादेश के हिंदूओ के लिए भी बहुत जरूरी है, हमने जाना चाहिए ! लेकिन गौरदा को चौथी (इसके पहले तीन हो चुकी थी ! और उसके बावजूद वह लगभग हर महीने में एक सप्ताह के लिए हमारे साथ भागलपुर आते थे ! )

बायपास सर्जरी का सामना करना पड़ा !और हमारे बंगलादेश के अभियान को हमे पूरा नहीं कर सकने की टीस आज भी हमारे हृदय में होते रहती है ! पता नहीं दोबारा आप लोग मुझे बुलाओगे या नहीं इसलिए आजही कुछ बातें साफ-साफ बोलकर जाना चाहता हूँ ! क्या मुझे इजाजत है ? तो सभी ने एक स्वर में बोला कि बोलिए ! तो मैंने कहा कि कबतक आप लोग इस तरह की सांस्कृतिक संगठन के नाम पर धार्मिक वैमनस्य को हवा देकर लोहिया की भाषा में हिंदुओ के खिलाफ ही (हिंदु बनाम हिंदु !) करते रहोगे ? और हम सेक्युलर लोगों को ही कटघरे में खड़ा कर के पुछते रहोगे की आप लोग मुस्लिम अपिज्मेंट करते हो ! और इसी कारण महात्मा गाँधी जी की जान ले ली ! जो गांधी आजादी का जश्न मनाने की जगह नोवाखली के हिंदूओ की रक्षा करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर काम किया है ! और हम लोग भी उन्हिकी राह पर चलने की कोशिश भागलपुर दंगे के बाद कर रहे हैं !

 

हमें हिंदूओ के खिलाफ बताकर और मुस्लिमपस्त बोलकर आप लोग क्या हासिल करना चाहते हैं ? हमारे ही युसुफ मेहेरअलि, हमारे ही हमिद दलवाई, असगर अली इंजीनियर अपनी जान जोखिम में डालकर मुस्लिम फिरकापरस्ती के खिलाफ काम किया है ! और हम सेक्युलर लोगों को सुडो सेक्युलर बोलते हो ? अरे भाई इसी हिंदूओ और मुसलमानों का आपसमे रहना व्यवहारिक नहीं है ! बोलकर ही पाकिस्तान बनाना संभव हुआ ! और अभी पाकिस्तान, बंगलादेश से भी ज्यादा संख्या में मुसलमानों की आबादी भारत में रहती है ! और अब किस तरफसे बटवारा करना चाहते हों ? किसी भी कौम के साथ लगातार इस तरह का आलम जारी रहेगा तो आखिर उसका परिणाम क्या होगा ? बीस करोड़ लोगों को मारने का दुनिया में कोई उदाहरण नहीं है ! और बीस करोड़ अपनी गर्दन आपको अपने आप सौंप देंगे? क्या कुछ भी प्रतिकार नहीं करेंगे ? क्यों आग के साथ खिलवाड़ कर रहे हो ? यह कुछ सवाल मै आपको सोचने के लिए करके जा रहा हूँ ! कभी सोचा तो मुझे अवश्य बताएँ मै खुशी-खुशी चला आऊंगा ! धन्यवाद मुझे बोलने के लिए बुलाया इसलिए ! सभी को नमस्कार करता हूँ !

 

हालाँकि मैंने इसके पहले की सभी बातें दस साल पहले की लिखी हैं ! लेकिन अक्तूबर में दुर्गा पूजा के दौरान बंगलादेश में जो भी कुछ हुआ था ! और बंगलादेश के अमनपसंद लोगोने जिस तरह से मुस्लिम गुनाहगारोंके खिलाफ संपूर्ण बंगलादेश में जगह-जगह बहुत बडी संख्या में जुलुस निकालें ! और बंगलादेश सरकार ने तुरंत सक्त कारवाई की ! उसके बावजूद त्रिपुरा में मुसलमानों के उपर आक्रमण क्यों हुआ ? और यह करने वाले लोग कौन हैं ? और इनपर क्या कार्रवाई हुई ? क्या संघ परिवार जिंदगी भर सिर्फ और सिर्फ हिंदू-मुस्लिमके इर्द-गिर्द ही राजनीति करते रहेंगे ? यह सब करके देश का ताना बाना तार तार कर रहे हो ! और इससे बडा देशद्रोही काम और क्या हो सकता है ? चले देशभक्त बनने ! और दूसरों को सर्टीफिकेट बाँटने ! पहले अपने गरेबान में झाँकियों फिर फब्तियां कसीयो !

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