13हिंदू धर्म में कई प्रकार के विवाहों के बारे में व्याख्या की गई है. आप अपनी जाति के बाहर भी विवाह कर सकते हैं. आप गंधर्व विवाह कर सकते हैं या फिर अपहरण के जरिए भी विवाहों का वर्णन किया गया है. इसके अलावा भी कई तरीके हैं. राजनीति की मुख्य समस्या यह नहीं है कि विवाह किसके साथ किया जाए, बल्कि असल समस्या यह है कि किसके साथ अधिक दिनों तक विवाह ठहरेगा. जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, गठबंधन भी ज़्यादा हो रहे हैं और तलाक भी. अमर सिंह और जयाप्रदा ने कांग्रेस को मनाने और नकारे जाने के बाद राष्ट्रीय लोकदल का दामन थाम लिया है. दीवारों पर लगे इश्तेहार देखकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश में भाजपा का दामन थाम रहे हैं. वहीं कुछ अन्य बड़े नेता चुनाव लड़ने से ही मना कर रहे हैं.
वामदलों और अम्मा के बीच जल्दबाजी में हुआ गठबंधन जल्दी ही समाप्त हो गया और इसके बाद वामदलों की आंखों में आंसू दिखाई दिए. ममता बनर्जी को जब अन्ना हजारे ने समर्थन दिया, तब उन्हें लगा कि यह तो शाश्‍वत गठबंधन है. रामविलास पासवान ने लालू यादव के छद्म धर्मनिरपेक्षता वाले गठबंधन को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया. मुलायम सिंह यादव का मानना है कि अगर किसी परिवार का एक सदस्य समाजवादी पार्टी का सदस्य है, तो उसकी पूरी बिरादरी को भी पार्टी में ही होना चाहिए. कांग्रेस ने परिवार के महत्व को पूरी तरह समझ लिया है. इसी वजह से उम्मीदवारों के चयन को बेहतर बनाने की राहुल गांधी की योजना दरकिनार कर महाराष्ट्र में पत्नियों, बेटों, भतीजों एवं नाती-पोतों को टिकट दिए जा रहे हैं.
ये सारे जोड़-तोड़ केवल आगामी 16 मई तक ही चलेंगे. एक बार नतीजे आ जाएं, उसके बाद यह सारा विवाह गठबंधन दोबारा से शुरू होगा. भारतीय राजनीति विचारधारा मुक्त क्षेत्र है. यहां तक कि तथाकथित धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता का बंटवारा भी वोटों की गिनती होने तक ही रहता है. ममता बनर्जी एनडीए शासन के दौरान किए गए अपने सहयोग को भूल चुकी हैं और इस वक्त भाजपा की आलोचना उसे सांप्रदायिक कहते हुए कर रही हैं. वहीं पासवान ने वह तरीका दिखा दिया, जिससे अन्य पार्टियां भाजपा से हाथ मिलाएंगी, जब वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी. भारतीय राजनीति की यह त्रासदी है कि दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां 300 से 325 सीटों के बीच सिमट कर रह जाती हैं. बाकी बची 220-245 सीटें अन्य 45 पार्टियों में बंट जाती हैं. तीसरी सबसे बड़ी पार्टी 25 सीटें तभी पाती है, जब वह सौभाग्यशाली हो. 2009 में वामदलों को लगभग इतनी ही सीटें मिली थीं. प्रधानमंत्री पद का ख्वाब देखने वाले बहुत सारे हैं, मगर उन्हें एक बार सच्चाई जांच लेनी चाहिए.
तृणमूल कांग्रेस पश्‍चिम बंगाल की पार्टी है और अन्ना हजारे के साथ या उनके बिना भी वह राष्ट्रीय पार्टी नहीं बन सकती. मायावती ने भी यह ख्वाब देखा है कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश के बाहर भी सीटें जीतेगी, लेकिन यह विचार भी सही सिद्ध नहीं होगा. जयललिता समझदार हैं, इसीलिए वह तमिलनाडु से बाहर निकलने के बारे में नहीं सोचतीं. शरद पवार भी जानते हैं कि एनसीपी का महाराष्ट्र के बाहर कोई जनाधार नहीं है. केवल आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय पार्टी बनने की महत्वाकांक्षा सही रास्ते पर है. अरविंद केजरीवाल का मुख्य एजेंडा यह है कि अपना लक्ष्य पाने के लिए प्रतिदिन ख़बरों में बने रहा जाए. देश भर में 350 उम्मीदवारों को खड़ा करने की जल्दबाजी करने का मतलब यह है कि दिल्ली में अपनाए आदर्शों को भूल जाना. इस वजह से जिसका भी मीडिया में थोड़ा-बहुत नाम है, उसे टिकट दे दिया गया. यह भारतीय राजनीति के लिए नया नहीं है. कुछ नाम ऐसे हैं, जो किसी भी पार्टी से जुड़ सकते हैं और जीत भी सकते हैं. कल्याण सिंह एवं अमर सिंह इसके उपयुक्त उदाहरण हैं.
आम आदमी पार्टी या तो राष्ट्रीय पार्टी हो सकती है या फिर विचारधारा वाली पार्टी. मुझे उम्मीद है कि वह राष्ट्रीय पार्टी ही बनना चाहेगी, क्योंकि उसके सिद्धांत पुराने एवं अव्यवहारिक सिद्ध हो चुके हैं. चुनाव में यह पार्टी वोटकटवा साबित हो सकती है, लेकिन बहुत सीटें जीतना इसके लिए मुश्किल है. दिल्ली, गुड़गांव एवं नोएडा के बाहर इसकी पकड़ बहुत मजबूत नहीं है. इस पार्टी की दस सीटें आ सकती हैं या बहुत अच्छे प्रदर्शन पर यह संख्या बीस तक पहुंच सकती है. निश्‍चित रूप से अरविंद को दिल्ली में इस्तीफ़ा नहीं देना चाहिए था, कुछ करके दिखाना चाहिए था और अपनी ज़िम्मेदारियों को गंभीरता से लेना चाहिए था. आम आदमी पार्टी के लिए असली पुरस्कार चुनाव के बाद का इंतजार कर रहे हैं. अगर चुनाव के बाद कांग्रेस दो अंकों की संख्या तक सिमट जाती है, तो पार्टी टूट भी सकती है. कांग्रेस के बहुत से वरिष्ठ नेता अपनी क्षेत्रीय ताकत के आधार पर एनसीपी के दिखाए रास्ते का अनुसरण कर सकते हैं. ऐसी स्थिति में एक राष्ट्रीय पार्टी के पास इस अंतराल को भरने का मौक़ा होगा. अगर आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के अकारण स्वाभिमान के कारण नहीं बिखरी, तो उसके पास इंदिरा नेशनल कांग्रेस का उत्तराधिकारी बनने का मौक़ा होगा. आमीन.

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