दुनिया बदलती है तो चमत्कारों के विधि और प्रकार भी बदलते हैं। आज के चमत्कार बोतल से जिन्न निकाल कर नहीं किये जाते , क्योंकि ये चमत्कार अब कोई बाबा संत या महाराज नहीं दिखाते बल्कि देश को चलाने वाली पार्टी के आला लोगों ने इसकी जिम्मेदारी उठा ली है। हमारे चेहरों पर चढ़े चश्मे 2014 से पहले के हैं। उसके बाद से किसी भी चीज को देखने और करने का ढंग 380 डिग्री के कोण से बदल गया है। या कहिए साजिशन बदला गया है। इस प्रकिया में सबसे पहले बहुत करीने से संविधान, लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, संसद और चुनाव प्रक्रिया को कुरेदा जाता है। निचले स्तर पर यह सब चलता है तो खुले में मुखर होकर बड़े बड़े झूठ और वादे करने का उपक्रम चलाया जाता है और साथ ही विरोधियों को दुश्मन और देश व समाज विरोधी साबित करने के प्रयत्न किये जाते हैं। धार्मिक देश में देश के संवैधानिक प्रधान को राजा और धीरे धीरे राजा को भगवान या ईश्वर से नवाजा जाता है। और यह सब इसलिए कि नयी पीढ़ी या आने वाली नयी पौध आंख खोले तो ईश्वर का रूपांतरण अपने राजा में देखे। सौ सालों से जो लोग चाहते थे कि इस देश को हिंदू राष्ट्र की कल्पना से वापस पटरी पर लाया जाए वे यह भी चाहते थे कि लोकतंत्र जैसी वाहियात चीज (उनकी नजर में) को समाप्त करके राजा और प्रजा की अवधारणा की पुनर्स्थापना की जाए । यहां तक तो ठीक था। लेकिन वे यह नहीं जानते थे उनकी इस स्थापना में कोई व्यक्ति इस कदर सेंध लगाए बैठा है कि राजा से स्वयं को ईश्वर में रूपांतरित कर देगा। ऐसे लोगों के लिए तो इसे सोने में सुहागा कहिए। हमारे देश के संविधान की यही खूबी है कि जो चाहे आये और संविधान की शपथ लेकर उसे कैसे भी रंग के कपड़ों में लपेट कर अपनी सत्ता चला सके तो चलाए। सत्तर सालों के इतिहास का समझिए अब पटाक्षेप हो चला है। नया इतिहास नये लोगों द्वारा लिखा जाएगा। अलग अलग देशों की अलग अलग प्रकृति के साथ यह सब होता है क्योंकि हर देश, राज्य और राष्ट्र की अपनी एक भौगोलिक संरचना होती है। यह वक्त के द्वारा निर्धारित की गई सतत प्रक्रिया है।
अब सवाल यह है कि देश में ऐसी स्थितियां बनी क्यों? हम नहीं कह सकते कि ऐसी स्थितियां स्वयं से बनीं। ऐसा कभी होता भी नहीं। जब किसी जगह कोई वैक्यूम होता है या खाली स्पेस होती है तो उसे भरा ही जाता है। आजादी के संघर्ष में जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उनके सामने एक स्पेस खाली थी क्योंकि तमाम कांग्रेसी दिन में कुछ और रात में कुछ थे । गांधी ने कांग्रेसियों के इस दोगलेपन को भर कर उन्हें नये सिरे से जगाया और आजादी की एक स्पष्ट रूपरेखा सामने रखी । तभी से गांधी अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बन गये। आज की परिस्थितियों में हर विरोधी दल का नेता देख और समझ रहा है कि देश गलत हाथों में जा रहा है पर अलग अलग बोलियों और सोच समझ के नेता अपने अपने अहंकारों में एक होकर फिर फिर टकराते हैं। कोई ईमानदारी से सोचता है तो कोई देश के भविष्य से ज्यादा अपने दल के हित की सोचता है। इन सबको एक करने वाला कोई गांधी हमारे बीच नहीं है । चिंता सबमें में है। चिंता स्वाभाविक भी है कि आने वाले लोग अगर आ ही गये तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे और लंबे समय तक के लिए उनकी कब्रें खुद जाएंगी। हम इंडिया गठबंधन के लोगों की बात कर रहे हैं। एक तरफ मोदी भगवान का स्वरूप लेते दिख रहे हैं और दूसरी ओर इंडिया गठबंधन की बुनियादी शर्तें भी अभी तैयार नहीं हो सकीं। बुनियादी शर्तें यानी एक कॉओर्डिनेशन कमेटी, न्यूनतम साझा कार्यक्रम, वन टू वन सीट शेयरिंग का फार्मूला आदि। कभी मीटिंग बुलाई जाती है तो फिर उसे रद्द कर दिया जाता है। कभी बिना अन्य लोगों को सूचना दिये मीटिंग बुलाई जाती है तो दूसरे लोग नाराज़ हो बैठते हैं। सबसे बड़ी मुसीबत सबसे बड़े दल कांग्रेस की है। गठबंधन में उसका नेतृत्व कौन करे । सोनिया, राहुल या मल्लिकार्जुन खड़गे। स्वीकार्यता किसकी है। सोनिया को गठबंधन की राजमाता कहिए लेकिन वे बीमार हैं और नेतृत्व करने के लायक नहीं हैं। राहुल गांधी अभी भी बच्चे हैं क्योंकि राजनीति की पाठशाला देर से आये और अभी भी सीख रहे हैं। सच्चाई यही है भले लोग कांग्रेस को राहुल से शुरु करके राहुल पर ही खतम करें। एक बड़ी पदयात्रा से जो लाभ होना था वह हो चुका। राहुल गांधी की पप्पू की छवि मिट गयी (हालांकि तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद एक चौथाई देश में फिर से राहुल को उसी नजर से देखा जाने लगा है) ।दूसरा कांग्रेस का पुनर्जीवित हो गयी । मल्लिकार्जुन खड़गे देर से पृष्ठभूमि में अवतरित हुए। वे कर्मठ हैं और मोदी को अच्छे तरीके से लपेटने में माहिर हैं लेकिन सामान्य जनता की नजर में उनका कद नहीं बढ़ा है। तीन राज्यों (मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़) के मुख्यमंत्रियों ने अपने अपने राज्यों में राहुल की कैसी उपेक्षा की सबने देखा । तो राहुल परिपक्व नेता के रूप में सम्पूर्ण तरीके से स्वीकार्य नहीं। ऐसे में विपक्षी गठबंधन की पार्टियों में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की क्या गति बनेगी कौन जानता है। अखिलेश, ममता , केजरीवाल, नीतीश, लालू , येचुरी वगैरह के कैसे कैसे स्वर रहेंगे कौन जानता है। समय कितना शेष बचा है। उधर मोदी की कोशिश इन्हें समय न देने की है। देश की सभी संवैधानिक संस्थाएं मोदी की मुठ्ठी में हैं। समूचा मीडिया मुठ्ठी में हैं और अब तो अडानी ने एनडीटीवी के अलावा एक न्यूज एजेंसी पर भी कब्जा कर लिया है। यह राम रावण का युद्ध नहीं है। यह हमारी माइथोलॉजी के बदले हुए पात्रों के बीच का युद्ध है जिसमें सबकी भूमिकाएं अदल बदल गयी हैं।‌मोदी, भाजपा और संघ की चुनावी तैयारियों पर कई बार लिखा जा चुका है। इनमें सत्ता की भूख कहिए या हवस कहिए जो भी हो,वह है। विधानसभा चुनावों के तुरंत बाद लोकसभा चुनाव के लिए लग जाना और इधर गठबंधन में असमंजस की स्थिति बने रहना। आप स्वयं सोचें परिणाम क्या होगा।
हमारे इस बड़े देश में सब कुछ जनता की स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता पर होता है। आधी से ज्यादा जनता मोदी को स्वीकार्य कर चुकी है । कुछ सहर्ष कुछ मजबूरी में। कल लाउड इंडिया टीवी के अपने शो में अभय कुमार दुबे ने कहा कि यदि मोदी चौबीस का चुनाव जीत जाते हैं जगह जगह मोदी के वैसे ही मंदिर बनेंगे जैसे दक्षिण में जयललिता और एमजीआर के बने थे। लेकिन हमारा मानना है कि यदि ऐसा हुआ तो मोदी केवल उत्तर भारत के ही नहीं पूरे देश के भगवान या अवतार स्वीकार लिये जाएंगे। उत्तर भारत ही एक तरह से पूरे देश को अपनी राजनीति से प्रभावित करता है। मोदी और संघ का उद्देश्य है पूरे भारत में एकछत्र भगवा राज कायम करना। उसके क्या दुष्परिणाम होंगे उसकी अभी से कल्पना की जा सकती है। इसकी गाज न केवल विरोधी संस्थाओं पर गिरेगी बल्कि पत्रकार, सिविल सोसायटी के लोग, यूट्यूब के चैनल के अलावा आंदोलनकारियों सब इसकी लपेट में आएंगे। विरोधी दलों की नाकामी , आलस और निष्क्रियता की कितनी बड़ी कीमत हम सबको देनी पड़ेगी। अभी भी जिनको उम्मीद है कि फिलहाल कुछ नहीं बिगड़ा है वे सिर्फ कहें नहीं, करते हुए दिखें भी। अब सत्ता भी मोदी की मजबूरी बन गई है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हैं, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट जगत है और दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्र की संकल्पना। इन सबके लिए फिलहाल मोदी सबसे उपयुक्त हैं। तो सोचिए भारत किस गिरफ्त में फंसने जा रहा है। संघ ने आजादी के संघर्ष में अंग्रेजों का साथ दिया और अब भी उसी राह पर चलता दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भारत के कृषि प्रधान देश के तमगे को अब छीन लेना चाहती हैं। उनकी नजर में भारत में खेती की अब कोई जगह नहीं रहनी चाहिए। सबसे बड़ा अफसोस जो हमेशा रहेगा कि विपक्ष देश के लोगों को कभी समझा नहीं सका । और आज भी उसकी कोई ऐसी योजना नहीं दिखती। विपक्ष जनता का नहीं, मोदी जनता में भगवान। लाउड इंडिया टीवी में संतोष भारतीय आजकल कई नये कार्यक्रम लेकर आ रहे हैं। हर हफ्ते एक कार्यक्रम कुछ वकीलों और न्यायाधीशों के साथ होता है और देश के स्टार लोगों के साथ भी दूसरे कार्यक्रम। इन्हें देखें। इनमें ताजगी रहती है।
कल राजकपूर को याद किया गया ‘सिनेमा संवाद’ कार्यक्रम में। बहुत मजा नहीं आया। एक तो बीच बीच में जो विजुअल दिखाएं जाते हैं वे वक्ता की बात से मन भटकाते हैं। वक्ता क्या बोल रहा है उसका एक एक शब्द का महत्व होता है। विस्तार से इस पर बात की जाए । दूसरा बीच बीच में संचालक का ही गायब हो जाना। तीसरा राजकपूर की नारी पात्रों का उनकी फिल्मों में बहुत गहरा महत्व है उसके लिए किसी महिला मर्मज्ञ को बुलाना चाहिए था। शीबा उस संदर्भ में न्याय नहीं कर सकीं। वे तो पहले ही सकते में आ गयी थीं कि मुझे केवल खवातीनों पर बोलने के लिए कह दिया। अमिताभ को चाहिए कि वयोवृद्ध लोगों का जोरदार पैनल लेकर तीन अलग-अलग एपिसोड राजकपूर, दिलीप कुमार और देवानंद पर करें और उनकी फिल्मों से ज्यादा उनसे जुड़े संस्मरण, यदि संभव हो तो। वे नयी बेहतरीन फिल्मों पर भी एक शो करें जैसे जोरम, सैम बहादुर और इधर आईं कुछ अच्छी फिल्मों पर। ‘सत्य हिंदी’ के कार्यक्रम केवल विश्लेषणों के होते हैं। जानकारी चाहिए, विश्लेषण नहीं। मुकेश कुमार का सबसे निचले स्तर का कार्यक्रम वह था जो उन्होंने मप्र के मुख्यमंत्री पर किया था। चार चंपू एक ही तूती बजा रहे थे। देखिए कब तक चलता है यह सब । एक दिन सब खत्म कर दिया जाएगा। और रवीश कुमार भी कब तक चलेंगे। लेकिन रवीश का कोई एपीसोड छोड़ने लायक नहीं होता।

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